भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तमेव पूजयेद् भक्त्या द्वौ वा त्रीन् वा यथाविधि ।<br>एकमप्यर्चयेद् भक्त्या ब्राह्मणं वेदपारगम् ।<br>दक्षिणाभिः प्रयत्नेन न बहूनल्पवित्तवान् ॥ ११३<br>लक्षहोमस्तु कर्तव्यो यदा वित्तं भवेद् बहु ।<br>यतः सर्वानवाप्नोति कुर्वन् कामान् विधानतः ॥ ११४<br>पूज्यते शिवलोके च वस्वादित्यमरुद्गणैः ।<br>यावत् कल्पशतान्यष्टावथ मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ११५<br>सकामो यस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथाविधि ।<br>स तं काममवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते ॥ ११६<br>पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम् ।<br>भार्यार्थी शोभनां भार्यां कुमारी च शुभं पतिम् ॥ ११७<br>भ्रष्टराज्यस्तथा राज्यं श्रीकामः श्रियमाप्नुयात् ।<br>यं यं प्रार्थयते कामं स वै भवति पुष्कलः ।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ ११८<br>अस्माच्छतगुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयम्भुवा ।<br>आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिः फलेन च ॥ ११९स्वल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य केवल पुरोहितकी अथवा दो या तीन ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ विधिपूर्वक पूजा करे अथवा एक ही वेदज्ञ ब्राह्मणकी भक्तिके साथ दक्षिणा आदिसे प्रयत्नपूर्वक अर्चना करे, बहुतोंके चक्करमें न पड़े। अधिक सम्पत्ति होनेपर लक्षहोम करना चाहिये; क्योंकि यह अधिक लाभदायक है। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। वह आठ सौ कल्पोंतक शिवलोकमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गणोंद्वारा पूजित होता है तथा अन्तमें मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य किसी विशेष कामनासे इस लक्षहोमको विधिपूर्वक सम्पन्न करता है, उसे उस कामनाकी प्राप्ति तो हो ही जाती है, साथ ही वह अविनाशी पदको भी प्राप्त कर लेता है। इसका अनुष्ठान करनेसे पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है, धनार्थी धन लाभ करता है, भार्यार्थी सुन्दरी पत्नी, कुमारी कन्या सुन्दर पति, राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा राज्य और लक्ष्मीका अभिलाषी लक्ष्मी प्राप्त करता है। इस प्रकार मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ १०६-११८॥
पूर्ववद् ग्रहदेवानामावाहनविसर्जनैः ।<br>होममन्त्रास्त एवोक्ताः स्नाने दाने तथैव च ।<br>कुण्डमण्डपवेदीनां विशेषोऽयं निबोध मे ॥ १२०<br>कोटिहोमे चतुर्हस्तं चतुरस्रं तु सर्वतः ।<br>योनिवक्त्रद्वयोपेतं तदप्याहुस्त्रिमेखलम् ॥ १२१<br>द्व्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता कार्या प्रथमा मेखला बुधैः ।<br>त्र्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता तद्वद् द्वितीया परिकीर्तिता ॥ १२२<br>उच्छ्रायविस्तराभ्यां च तृतीया चतुरङ्गुला ।<br>द्व्यङ्गुलश्चेति विस्तारः पूर्वयोरेव शस्यते ॥ १२३<br>वितस्तिमात्रा योनिःस्यात् षट्सप्ताङ्गुलविस्तृता ।<br>कूर्मपृष्ठोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चाङ्गुलोच्छ्रिता ॥ १२४<br>गजोष्ठसदृशी तद्वदायता छिद्रसंयुता ।<br>एतत् सर्वेषु कुण्डेषु योनिलक्षणमुच्यते ॥ १२५मुने! प्रयत्नपूर्वक दी गयी आहुतियों, दक्षिणाओं और फलकी दृष्टिसे ब्रह्माने कोटिहोमको इस लक्षहोमसे सौ गुना अधिक फलदायक बतलाया है। इसमें भी ग्रहों एवं देवोंके आवाहन, विसर्जन, स्नान तथा दानमें प्रयुक्त होनेवाले होममन्त्र पहलेके ही हैं। केवल कुण्ड, मण्डप और वेदीमें कुछ विशेषता है, वह मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। इस कोटिहोममें सब ओरसे चौकोर चार हाथके परिमाणवाला कुण्ड बनाना चाहिये। वह दो योनिमुखों और तीन मेखलाओंसे युक्त हो। विद्वानोंको पहली मेखला दो अङ्गुल ऊँची बनानी चाहिये। उसी प्रकार दूसरी मेखला तीन अङ्गुल ऊँची बतलायी गयी है और तीसरी मेखला ऊँचाई और चौड़ाईमें चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। पहली दोनों मेखलाओंकी चौड़ाई तो दो अङ्गुलकी ही ठीक मानी गयी है। इनके ऊपर एक बित्ता लम्बी और छः-सात अङ्गुल चौड़ी योनि होनी चाहिये। उसका मध्य-भाग कछुवेकी पीठकी तरह ऊँचा और दोनों पार्श्वभाग एक अङ्गुल ऊँचा हो। वह हाथीके होंठके समान लम्बी और छिद्र (घी गिरनेका मार्ग) युक्त हो। सभी कुण्डोंमें यही योनिका लक्षण बतलाया जाता है।