मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ९३ * | ३२३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पूर्ववत् कुम्भमामन्त्र्य तद्वद्धोमं समाचरेत्।<br>सहस्त्राणां शतं हुत्वा समित्संख्याधिकं पुनः।<br>घृतकुम्भवसोधारां पातयेदनलोपरि ॥ १००<br><br>औदुम्बरीं तथाऽर्द्रां च ऋज्वीं कोटरवर्जिताम्।<br>बाहुमात्रां स्रुचं कृत्वा ततः स्तम्भद्वयोपरि।<br>घृतधारां तया सम्यगग्नेरुपरि पातयेत् ॥ १०१<br><br>श्रावयेत् सूक्तमाग्नेयं वैष्णवं रौद्रमैन्दवम्।<br>महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम च वाचयेत् ॥ १०२<br><br>स्नानं च यजमानस्य पूर्ववत् स्वस्तिवाचनम्।<br>दातव्या यजमानेन पूर्ववद् दक्षिणाः पृथक् ॥ १०३<br><br>कामक्रोधविहीनेन ऋत्विग्भ्यः शान्तचेतसा।<br>नवग्रहमखे विप्राश्चत्वारो वेदवेदिनः ॥ १०४<br><br>अथवा ऋत्विजौ शान्तौ द्वावेव श्रुतिकोविदौ।<br>कार्यावयुतहोमे तु न प्रसज्येत विस्तरे ॥ १०५ | तत्पश्चात् पहलेकी तरह कलशकी स्थापना करके हवन आरम्भ करे। एक लाख आहुतियोंसे हवन करनेके पश्चात् पुनः समिधाओंकी संख्याके बराबर और अधिक आहुतियाँ डाले। फिर अग्निके ऊपर घृतकुम्भसे वसोर्धारा गिराये। (वसोर्धाराकी विधि यह है—) भुजा-बराबर लम्बी गूलरकी लकड़ीसे, जो खोखली न हो तथा सीधी एवं गीली हो, स्रुवा बनवाकर उसे दो खम्भोंपर रखकर उसके द्वारा अग्निके ऊपर सम्यक् प्रकारसे घीकी धारा गिराये। उस समय अग्निसूक्त (ऋ० सं० १। १), विष्णुसूक्त (वाजसं० ५। १–२२), रुद्रसूक्त (वही १६) और इन्दु (सोम) सूक्त (ऋ० १। ९१) सुनाना चाहिये तथा महावैश्वानर साम और ज्येष्ठसामका पाठ कराना चाहिये। तदुपरान्त पूर्ववत् यजमान स्नानकर स्वस्तिवाचन कराये तथा काम-क्रोधरहित होकर शान्तचित्तसे पूर्ववत् ऋत्विजोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणा प्रदान करे। नवग्रहयज्ञके अयुतहोममें चार वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको अथवा श्रुतिके जानकार एवं शान्तस्वभाववाले दो ही ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। विस्तारमें नहीं फँसना चाहिये॥ १००–१०५॥ |
| तद्वच्च दश चाष्टौ च लक्षहोमे तु ऋत्विजः।<br>कर्त्तव्याः शक्तितस्तद्वच्चत्वारो वा विमत्सरः ॥ १०६<br><br>नवग्रहमखात् सर्वं लक्षहोमे दशोत्तरम्।<br>भक्ष्यान् दद्यान्मुनिश्रेष्ठ भूषणान्यपि शक्तितः ॥ १०७<br><br>शयनानि सवस्त्राणि हैमानि कटकानि च।<br>कर्णाङ्गुलिपवित्राणि कण्ठसूत्राणि शक्तिमान् ॥ १०८<br><br>न कुर्याद् दक्षिणाहीनं वित्तशाठ्येन मानवः।<br>अददन् लोभतो मोहात् कुलक्षयमवाप्नुते ॥ १०९<br><br>अन्नदानं यथाशक्त्या कर्तव्यं भूतिमिच्छता।<br>अन्नहीनः कृतो यस्माद् दुर्भिक्षफलदो भवेत् ॥ ११०<br><br>अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः।<br>यष्टारं दक्षिणाहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥ १११<br><br>न वाप्यल्पधनः कुर्याल्लक्षहोमं नरः क्वचित्।<br>यस्मात् पीडाकरो नित्यं यज्ञे भवति विग्रहः ॥ ११२ | उसी प्रकार लक्षहोममें अपनी सामर्थ्यके अनुकूल मत्सररहित होकर दस, आठ अथवा चार ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! सम्पत्तिशाली यजमानको यथाशक्ति भक्ष्य पदार्थ, आभूषण, वस्त्रोंसहित शय्या, स्वर्णनिर्मित कड़े, कुण्डल, अँगूठी और कण्ठसूत्र (हार) आदि सभी वस्तुएँ लक्षहोममें नवग्रह-यज्ञसे दस गुनी अधिक देनी चाहिये। मनुष्यको कृपणतावश दक्षिणारहित यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो लोभ अथवा अज्ञानसे भरपूर दक्षिणा नहीं देता, उसका कुल नष्ट हो जाता है। समृद्धिकामी मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार अन्नका दान करना चाहिये; क्योंकि अन्नदानरहित किया हुआ यज्ञ दुर्भिक्षरूप फलका दाता हो जाता है। अन्नहीन यज्ञ राष्ट्रको, मन्त्रहीन ऋत्विज्को और दक्षिणारहित यज्ञकर्ताको जलाकर नष्ट कर देता है। इस प्रकार (विधिहीन) यज्ञके समान अन्य कोई शत्रु नहीं है। अल्प धनवाले मनुष्यको कभी लक्षहोम नहीं करना चाहिये; क्योंकि यज्ञमें (दक्षिणा आदिके लिये) प्रकट हुआ विग्रह सदाके लिये कष्टकारक हो जाता है। |