भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२२ * मत्स्यपुराण *


| प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु॥ ८८ <br><br> शोभनं कारयेत् कुण्डं यथावल्लक्षणान्वितम्। <br> चतुरस्रं समंतात्तु योनिवक्त्रं समेखलम्॥ ८९ <br><br> चतुरङ्गुलविस्तारा मेखला तद्दुच्छ्रिता। <br> प्रागुदक्प्लवना कार्या सर्वतः समवस्थिता॥ ९० <br><br> शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमखः स्मृतः। <br> मानहीनाधिकं कुण्डमनेकभयदं भवेत्। <br> यस्मात् तस्मात् सुसम्पूर्णं शान्तिकुण्डं विधीयते॥ ९१ <br><br> अस्माद् दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा। <br> आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च॥ ९२ <br><br> द्विहस्तविस्तृतं तद्वच्चतुर्हस्तायतं पुनः। <br> लक्षहोमे भवेत् कुण्डं योनिवक्त्रं त्रिमेखलम्॥ ९३ <br><br> तस्य चोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम्। <br> प्रागुदक्प्लवनं तच्च चतुरस्रं समंततः॥ ९४ <br><br> विष्कम्भार्धोच्छ्रितं प्रोक्तं स्थण्डिलं विश्वकर्मणा। <br> संस्थापनाय देवानां वप्रत्रयसमावृतम्॥ ९५ <br><br> द्व्यङ्गुलो ह्युच्छ्रितो वप्रः प्रथमः स उदाहृतः। <br> अङ्गुलोच्छ्रयसंयुक्तं वप्रद्वयमथोपरि॥ ९६ <br><br> त्र्यङ्गुलस्य च विस्तारः सर्वेषां कथ्यते बुधैः। <br> दशाङ्गुलोच्छ्रिता भित्तिः स्थण्डिले स्यात् तथोपरि। <br> तस्मिन्नावाहयेद् देवान् पूर्ववत् पुष्पतण्डुलैः॥ ९७ <br><br> आदित्याभिमुखाः सर्वाः साधिप्रत्यधिदेवताः। <br> स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ नोत्तरेण पराङ्मुखाः॥ ९८ <br><br> गरुत्मानधिकस्तत्र सम्पूज्यः श्रियमिच्छता। <br> सामध्वनिशरीरस्त्वं वाहनं परमेष्ठिनः। <br> विषपापहरो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ९९ | तदनन्तर मण्डपके पूर्वोत्तर भागमें यथार्थ लक्षणोंसे युक्त एक सुन्दर कुण्ड* तैयार कराये, जो चारों ओरसे चौकोर हो, जिसमें योनिरूप मुख बना हो और जो मेखलासे युक्त हो। यह मेखला चार अङ्गुल चौड़ी और उतनी ही ऊँची, कुण्डको चारों ओरसे घेरे हुए और पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू हो। सभी लोगोंके लिये ग्रह-शान्तिके निमित्त नवग्रह-यज्ञ बतलाया गया है। चूँकि उपर्युक्त परिमाणसे कम अथवा अधिक परिमाणमें बना हुआ कुण्ड अनेकों प्रकारका भय देनेवाला हो जाता है, इसलिये शान्तिकुण्डको परिमाणके अनुकूल ही बनाना चाहिये। ब्रह्माने लक्षहोमको अयुतहोमसे दस गुना अधिक फलदायक बतलाया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक आहुतियों और दक्षिणाओंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये। लक्षहोममें कुण्ड चार हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा होता है, उसके भी मुखस्थानपर योनि बनी होती है और वह तीन मेखलाओंसे युक्त होता है। विश्वकर्माने कुण्डके पूर्वोत्तर दिशामें तीन बित्तेकी दूरीपर देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका भी विधान बतलाया है, जो चारों ओरसे चौकोर, पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू, विष्कम्भ (कुण्डके व्यास)-के आधे परिमाणके बराबर ऊँची और तीन परिधियोंसे युक्त हो। इनमें पहली परिधि दो अङ्गुल ऊँची तथा शेष दो एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये। विद्वानोंने इन सबकी चौड़ाई तीन अङ्गुलकी बतलायी है। वेदीके ऊपर दस अङ्गुल ऊँची एक दीवाल बनायी जाय, उसीपर पहलेकी ही भाँति फूल और अक्षतोंसे देवताओंका आवाहन किया जाय। मुनिश्रेष्ठ! अधिदेवताओं एवं प्रत्यधिदेवताओंसहित सभी ग्रहोंको सूर्यके सम्मुख ही स्थापित करना चाहिये, उत्तराभिमुख अथवा पराङ्मुख नहीं। लक्ष्मीकामी मनुष्यको इस यज्ञमें (सभी देवताओंके अतिरिक्त) गरुड़की भी पूजा करनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) ‘गरुड! तुम्हारे शरीरसे सामवेदकी ध्वनि निकलती रहती है, तुम भगवान् विष्णुके वाहन और नित्य विषरूप पापको हरनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो'॥८८—९९॥ |


* कल्याण—अग्निपुराणाङ्क अ० २४ की टिप्पणीमें कुण्ड-मण्डप-निर्माणकी पूरी विधि द्रष्टव्य है।