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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

३२२ * मत्स्यपुराण *


| प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु॥ ८८ <br><br> शोभनं कारयेत् कुण्डं यथावल्लक्षणान्वितम्। <br> चतुरस्रं समंतात्तु योनिवक्त्रं समेखलम्॥ ८९ <br><br> चतुरङ्गुलविस्तारा मेखला तद्दुच्छ्रिता। <br> प्रागुदक्प्लवना कार्या सर्वतः समवस्थिता॥ ९० <br><br> शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमखः स्मृतः। <br> मानहीनाधिकं कुण्डमनेकभयदं भवेत्। <br> यस्मात् तस्मात् सुसम्पूर्णं शान्तिकुण्डं विधीयते॥ ९१ <br><br> अस्माद् दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा। <br> आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च॥ ९२ <br><br> द्विहस्तविस्तृतं तद्वच्चतुर्हस्तायतं पुनः। <br> लक्षहोमे भवेत् कुण्डं योनिवक्त्रं त्रिमेखलम्॥ ९३ <br><br> तस्य चोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम्। <br> प्रागुदक्प्लवनं तच्च चतुरस्रं समंततः॥ ९४ <br><br> विष्कम्भार्धोच्छ्रितं प्रोक्तं स्थण्डिलं विश्वकर्मणा। <br> संस्थापनाय देवानां वप्रत्रयसमावृतम्॥ ९५ <br><br> द्व्यङ्गुलो ह्युच्छ्रितो वप्रः प्रथमः स उदाहृतः। <br> अङ्गुलोच्छ्रयसंयुक्तं वप्रद्वयमथोपरि॥ ९६ <br><br> त्र्यङ्गुलस्य च विस्तारः सर्वेषां कथ्यते बुधैः। <br> दशाङ्गुलोच्छ्रिता भित्तिः स्थण्डिले स्यात् तथोपरि। <br> तस्मिन्नावाहयेद् देवान् पूर्ववत् पुष्पतण्डुलैः॥ ९७ <br><br> आदित्याभिमुखाः सर्वाः साधिप्रत्यधिदेवताः। <br> स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ नोत्तरेण पराङ्मुखाः॥ ९८ <br><br> गरुत्मानधिकस्तत्र सम्पूज्यः श्रियमिच्छता। <br> सामध्वनिशरीरस्त्वं वाहनं परमेष्ठिनः। <br> विषपापहरो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ९९ | तदनन्तर मण्डपके पूर्वोत्तर भागमें यथार्थ लक्षणोंसे युक्त एक सुन्दर कुण्ड* तैयार कराये, जो चारों ओरसे चौकोर हो, जिसमें योनिरूप मुख बना हो और जो मेखलासे युक्त हो। यह मेखला चार अङ्गुल चौड़ी और उतनी ही ऊँची, कुण्डको चारों ओरसे घेरे हुए और पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू हो। सभी लोगोंके लिये ग्रह-शान्तिके निमित्त नवग्रह-यज्ञ बतलाया गया है। चूँकि उपर्युक्त परिमाणसे कम अथवा अधिक परिमाणमें बना हुआ कुण्ड अनेकों प्रकारका भय देनेवाला हो जाता है, इसलिये शान्तिकुण्डको परिमाणके अनुकूल ही बनाना चाहिये। ब्रह्माने लक्षहोमको अयुतहोमसे दस गुना अधिक फलदायक बतलाया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक आहुतियों और दक्षिणाओंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये। लक्षहोममें कुण्ड चार हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा होता है, उसके भी मुखस्थानपर योनि बनी होती है और वह तीन मेखलाओंसे युक्त होता है। विश्वकर्माने कुण्डके पूर्वोत्तर दिशामें तीन बित्तेकी दूरीपर देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका भी विधान बतलाया है, जो चारों ओरसे चौकोर, पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू, विष्कम्भ (कुण्डके व्यास)-के आधे परिमाणके बराबर ऊँची और तीन परिधियोंसे युक्त हो। इनमें पहली परिधि दो अङ्गुल ऊँची तथा शेष दो एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये। विद्वानोंने इन सबकी चौड़ाई तीन अङ्गुलकी बतलायी है। वेदीके ऊपर दस अङ्गुल ऊँची एक दीवाल बनायी जाय, उसीपर पहलेकी ही भाँति फूल और अक्षतोंसे देवताओंका आवाहन किया जाय। मुनिश्रेष्ठ! अधिदेवताओं एवं प्रत्यधिदेवताओंसहित सभी ग्रहोंको सूर्यके सम्मुख ही स्थापित करना चाहिये, उत्तराभिमुख अथवा पराङ्मुख नहीं। लक्ष्मीकामी मनुष्यको इस यज्ञमें (सभी देवताओंके अतिरिक्त) गरुड़की भी पूजा करनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) ‘गरुड! तुम्हारे शरीरसे सामवेदकी ध्वनि निकलती रहती है, तुम भगवान् विष्णुके वाहन और नित्य विषरूप पापको हरनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो'॥८८—९९॥ |


* कल्याण—अग्निपुराणाङ्क अ० २४ की टिप्पणीमें कुण्ड-मण्डप-निर्माणकी पूरी विधि द्रष्टव्य है।

* अध्याय ९३ *३२३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूर्ववत् कुम्भमामन्त्र्य तद्वद्धोमं समाचरेत्।<br>सहस्त्राणां शतं हुत्वा समित्संख्याधिकं पुनः।<br>घृतकुम्भवसोधारां पातयेदनलोपरि ॥ १००<br><br>औदुम्बरीं तथाऽर्द्रां च ऋज्वीं कोटरवर्जिताम्।<br>बाहुमात्रां स्रुचं कृत्वा ततः स्तम्भद्वयोपरि।<br>घृतधारां तया सम्यगग्नेरुपरि पातयेत् ॥ १०१<br><br>श्रावयेत् सूक्तमाग्नेयं वैष्णवं रौद्रमैन्दवम्।<br>महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम च वाचयेत् ॥ १०२<br><br>स्नानं च यजमानस्य पूर्ववत् स्वस्तिवाचनम्।<br>दातव्या यजमानेन पूर्ववद् दक्षिणाः पृथक् ॥ १०३<br><br>कामक्रोधविहीनेन ऋत्विग्भ्यः शान्तचेतसा।<br>नवग्रहमखे विप्राश्चत्वारो वेदवेदिनः ॥ १०४<br><br>अथवा ऋत्विजौ शान्तौ द्वावेव श्रुतिकोविदौ।<br>कार्यावयुतहोमे तु न प्रसज्येत विस्तरे ॥ १०५तत्पश्चात् पहलेकी तरह कलशकी स्थापना करके हवन आरम्भ करे। एक लाख आहुतियोंसे हवन करनेके पश्चात् पुनः समिधाओंकी संख्याके बराबर और अधिक आहुतियाँ डाले। फिर अग्निके ऊपर घृतकुम्भसे वसोर्धारा गिराये। (वसोर्धाराकी विधि यह है—) भुजा-बराबर लम्बी गूलरकी लकड़ीसे, जो खोखली न हो तथा सीधी एवं गीली हो, स्रुवा बनवाकर उसे दो खम्भोंपर रखकर उसके द्वारा अग्निके ऊपर सम्यक् प्रकारसे घीकी धारा गिराये। उस समय अग्निसूक्त (ऋ० सं० १। १), विष्णुसूक्त (वाजसं० ५। १–२२), रुद्रसूक्त (वही १६) और इन्दु (सोम) सूक्त (ऋ० १। ९१) सुनाना चाहिये तथा महावैश्वानर साम और ज्येष्ठसामका पाठ कराना चाहिये। तदुपरान्त पूर्ववत् यजमान स्नानकर स्वस्तिवाचन कराये तथा काम-क्रोधरहित होकर शान्तचित्तसे पूर्ववत् ऋत्विजोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणा प्रदान करे। नवग्रहयज्ञके अयुतहोममें चार वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको अथवा श्रुतिके जानकार एवं शान्तस्वभाववाले दो ही ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। विस्तारमें नहीं फँसना चाहिये॥ १००–१०५॥
तद्वच्च दश चाष्टौ च लक्षहोमे तु ऋत्विजः।<br>कर्त्तव्याः शक्तितस्तद्वच्चत्वारो वा विमत्सरः ॥ १०६<br><br>नवग्रहमखात् सर्वं लक्षहोमे दशोत्तरम्।<br>भक्ष्यान् दद्यान्मुनिश्रेष्ठ भूषणान्यपि शक्तितः ॥ १०७<br><br>शयनानि सवस्त्राणि हैमानि कटकानि च।<br>कर्णाङ्गुलिपवित्राणि कण्ठसूत्राणि शक्तिमान् ॥ १०८<br><br>न कुर्याद् दक्षिणाहीनं वित्तशाठ्येन मानवः।<br>अददन् लोभतो मोहात् कुलक्षयमवाप्नुते ॥ १०९<br><br>अन्नदानं यथाशक्त्या कर्तव्यं भूतिमिच्छता।<br>अन्नहीनः कृतो यस्माद् दुर्भिक्षफलदो भवेत् ॥ ११०<br><br>अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः।<br>यष्टारं दक्षिणाहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥ १११<br><br>न वाप्यल्पधनः कुर्याल्लक्षहोमं नरः क्वचित्।<br>यस्मात् पीडाकरो नित्यं यज्ञे भवति विग्रहः ॥ ११२उसी प्रकार लक्षहोममें अपनी सामर्थ्यके अनुकूल मत्सररहित होकर दस, आठ अथवा चार ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! सम्पत्तिशाली यजमानको यथाशक्ति भक्ष्य पदार्थ, आभूषण, वस्त्रोंसहित शय्या, स्वर्णनिर्मित कड़े, कुण्डल, अँगूठी और कण्ठसूत्र (हार) आदि सभी वस्तुएँ लक्षहोममें नवग्रह-यज्ञसे दस गुनी अधिक देनी चाहिये। मनुष्यको कृपणतावश दक्षिणारहित यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो लोभ अथवा अज्ञानसे भरपूर दक्षिणा नहीं देता, उसका कुल नष्ट हो जाता है। समृद्धिकामी मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार अन्नका दान करना चाहिये; क्योंकि अन्नदानरहित किया हुआ यज्ञ दुर्भिक्षरूप फलका दाता हो जाता है। अन्नहीन यज्ञ राष्ट्रको, मन्त्रहीन ऋत्विज्‌को और दक्षिणारहित यज्ञकर्ताको जलाकर नष्ट कर देता है। इस प्रकार (विधिहीन) यज्ञके समान अन्य कोई शत्रु नहीं है। अल्प धनवाले मनुष्यको कभी लक्षहोम नहीं करना चाहिये; क्योंकि यज्ञमें (दक्षिणा आदिके लिये) प्रकट हुआ विग्रह सदाके लिये कष्टकारक हो जाता है।

९६- सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य

३२४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तमेव पूजयेद् भक्त्या द्वौ वा त्रीन् वा यथाविधि ।<br>एकमप्यर्चयेद् भक्त्या ब्राह्मणं वेदपारगम् ।<br>दक्षिणाभिः प्रयत्नेन न बहूनल्पवित्तवान् ॥ ११३<br>लक्षहोमस्तु कर्तव्यो यदा वित्तं भवेद् बहु ।<br>यतः सर्वानवाप्नोति कुर्वन् कामान् विधानतः ॥ ११४<br>पूज्यते शिवलोके च वस्वादित्यमरुद्गणैः ।<br>यावत् कल्पशतान्यष्टावथ मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ११५<br>सकामो यस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथाविधि ।<br>स तं काममवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते ॥ ११६<br>पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम् ।<br>भार्यार्थी शोभनां भार्यां कुमारी च शुभं पतिम् ॥ ११७<br>भ्रष्टराज्यस्तथा राज्यं श्रीकामः श्रियमाप्नुयात् ।<br>यं यं प्रार्थयते कामं स वै भवति पुष्कलः ।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ ११८<br>अस्माच्छतगुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयम्भुवा ।<br>आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिः फलेन च ॥ ११९स्वल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य केवल पुरोहितकी अथवा दो या तीन ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ विधिपूर्वक पूजा करे अथवा एक ही वेदज्ञ ब्राह्मणकी भक्तिके साथ दक्षिणा आदिसे प्रयत्नपूर्वक अर्चना करे, बहुतोंके चक्करमें न पड़े। अधिक सम्पत्ति होनेपर लक्षहोम करना चाहिये; क्योंकि यह अधिक लाभदायक है। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। वह आठ सौ कल्पोंतक शिवलोकमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गणोंद्वारा पूजित होता है तथा अन्तमें मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य किसी विशेष कामनासे इस लक्षहोमको विधिपूर्वक सम्पन्न करता है, उसे उस कामनाकी प्राप्ति तो हो ही जाती है, साथ ही वह अविनाशी पदको भी प्राप्त कर लेता है। इसका अनुष्ठान करनेसे पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है, धनार्थी धन लाभ करता है, भार्यार्थी सुन्दरी पत्नी, कुमारी कन्या सुन्दर पति, राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा राज्य और लक्ष्मीका अभिलाषी लक्ष्मी प्राप्त करता है। इस प्रकार मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ १०६-११८॥
पूर्ववद् ग्रहदेवानामावाहनविसर्जनैः ।<br>होममन्त्रास्त एवोक्ताः स्नाने दाने तथैव च ।<br>कुण्डमण्डपवेदीनां विशेषोऽयं निबोध मे ॥ १२०<br>कोटिहोमे चतुर्हस्तं चतुरस्रं तु सर्वतः ।<br>योनिवक्त्रद्वयोपेतं तदप्याहुस्त्रिमेखलम् ॥ १२१<br>द्व्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता कार्या प्रथमा मेखला बुधैः ।<br>त्र्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता तद्वद् द्वितीया परिकीर्तिता ॥ १२२<br>उच्छ्रायविस्तराभ्यां च तृतीया चतुरङ्गुला ।<br>द्व्यङ्गुलश्चेति विस्तारः पूर्वयोरेव शस्यते ॥ १२३<br>वितस्तिमात्रा योनिःस्यात् षट्सप्ताङ्गुलविस्तृता ।<br>कूर्मपृष्ठोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चाङ्गुलोच्छ्रिता ॥ १२४<br>गजोष्ठसदृशी तद्वदायता छिद्रसंयुता ।<br>एतत् सर्वेषु कुण्डेषु योनिलक्षणमुच्यते ॥ १२५मुने! प्रयत्नपूर्वक दी गयी आहुतियों, दक्षिणाओं और फलकी दृष्टिसे ब्रह्माने कोटिहोमको इस लक्षहोमसे सौ गुना अधिक फलदायक बतलाया है। इसमें भी ग्रहों एवं देवोंके आवाहन, विसर्जन, स्नान तथा दानमें प्रयुक्त होनेवाले होममन्त्र पहलेके ही हैं। केवल कुण्ड, मण्डप और वेदीमें कुछ विशेषता है, वह मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। इस कोटिहोममें सब ओरसे चौकोर चार हाथके परिमाणवाला कुण्ड बनाना चाहिये। वह दो योनिमुखों और तीन मेखलाओंसे युक्त हो। विद्वानोंको पहली मेखला दो अङ्गुल ऊँची बनानी चाहिये। उसी प्रकार दूसरी मेखला तीन अङ्गुल ऊँची बतलायी गयी है और तीसरी मेखला ऊँचाई और चौड़ाईमें चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। पहली दोनों मेखलाओंकी चौड़ाई तो दो अङ्गुलकी ही ठीक मानी गयी है। इनके ऊपर एक बित्ता लम्बी और छः-सात अङ्गुल चौड़ी योनि होनी चाहिये। उसका मध्य-भाग कछुवेकी पीठकी तरह ऊँचा और दोनों पार्श्वभाग एक अङ्गुल ऊँचा हो। वह हाथीके होंठके समान लम्बी और छिद्र (घी गिरनेका मार्ग) युक्त हो। सभी कुण्डोंमें यही योनिका लक्षण बतलाया जाता है।
  • अध्याय ९३ * ३२५
मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसंनिभम्।<br>वेदी च कोटिहोमे स्याद् वितस्तीनां चतुष्टयम्॥ १२६<br>चतुरस्त्रा समन्ताच्य त्रिभिर्वप्रैस्तु संयुता।<br>वप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनां च तथोच्छ्रयः॥ १२७<br>तथा षोडशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।<br>पूर्वद्वारे च संस्थाप्य बह्वृचं वेदपारगम्॥ १२८<br>यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम्।<br>अथर्ववेदिनं तद्वदुत्तरे स्थापयेद् बुधः॥ १२९<br>अष्टौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः।<br>एवं द्वादश विप्राः स्युर्वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूर्ववत् पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १३०<br>रात्रिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं सुमङ्गलम्।<br>पूर्वेतो बह्वृचः शान्तिं पठन्नास्ते ह्युदङ्मुखः॥ १३१<br>शाक्तं शाक्रं च सौम्यं च कौष्माण्डं शान्तिमेव च।<br>पाठयेद् दक्षिणद्वारि यजुर्वेदिनमुत्तमम्॥ १३२<br>सुपर्णमथ वैराजमाग्रेयं रुद्रसंहिताम्।<br>ज्येष्ठसाम तथा शान्तिं छन्दोगः पश्चिमे जपेत्॥ १३३<br>शान्तिसूक्तं च सौरं च तथा शाकुनकं शुभम्।<br>पौष्टिकं च महाराज्यमुत्तरेणाप्यथर्ववित्॥ १३४<br>पञ्चभिः सप्तभिर्वापि होमः कार्योऽत्र पूर्ववत्।<br>स्नाने दाने च मन्त्राः स्युस्त एव मुनिसत्तम॥ १३५<br>वसोर्धाराविधानं च लक्षहोमे विशिष्यते।<br>अनेन विधिना यस्तु कोटिहोमं समाचरेत्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं व्रजेत्॥ १३६<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि ग्रहयज्ञत्रयं नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा पदमिन्द्रस्य गच्छति॥ १३७<br>अश्वमेधसहस्त्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित्।<br>कृत्वा यत् फलमाप्नोति कोटिहोमात् तदश्नुते॥ १३८योनि सभी मेखलाओंके ऊपर पीपलके पत्तेके सदृश होनी चाहिये। कोटिहोममें चार बित्ता लम्बी, चारों ओरसे चौकोर और तीन परिधियोंसे युक्त एक वेदी होनी चाहिये। परिधियोंका प्रमाण तथा वेदियोंकी ऊँचाई पहले कही जा चुकी है। पुनः सोलह हाथ लम्बे-चौड़े मण्डपकी स्थापना करे, जिसमें चारों दिशाओंमें दरवाजे हों। बुद्धिसम्पन्न यजमान उसके पूर्वद्वारपर ऋग्वेदके पारगामी ब्राह्मणको, दक्षिण द्वारपर यजुर्वेदके ज्ञाताको, पश्चिमद्वारपर सामवेदीको और उत्तरद्वारपर अथर्ववेदीको नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त वेद एवं वेदाङ्गोंके ज्ञाता आठ ब्राह्मणोंको हवन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये। इस प्रकार इस कार्यमें बारह ब्राह्मणोंको नियुक्त करनेका विधान है। इन सभी ब्राह्मणोंका वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला, चन्दन आदि सामग्रियोंद्वारा पूर्ववत् भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये॥ ११९—१३०॥<br><br>(कार्यारम्भ होनेपर) पूर्वद्वारपर स्थित ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तराभिमुख हो परम माङ्गलिक रात्रिसूक्त, रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त तथा अन्यान्य शान्ति-सूक्तोंका पाठ करता रहे। दक्षिणद्वारपर स्थित श्रेष्ठ यजुर्वेदी ब्राह्मणसे शक्तिसूक्त, शक्रसूक्त, सोमसूक्त, कूष्माण्डसूक्त तथा शान्ति-सूक्तका पाठ करवाना चाहिये। पश्चिमद्वारपर स्थित सामवेदी ब्राह्मण सुपर्ण, वैराज, आग्नेय—इन ऋचाओं, रुद्रसंहिता, ज्येष्ठसाम तथा शान्तिपाठोंका गान करे। उत्तरद्वारपर नियुक्त अथर्ववेदी ब्राह्मण शान्ति (शांतातीय १९)-सूक्त, सूर्यसूक्त, माङ्गलिक शकुनिसूक्त, पौष्टिक एवं महाराज्य (सूक्त)-का पाठ करे। मुनिश्रेष्ठ ! इसमें भी पूर्ववत् पाँच अथवा सात ब्राह्मणोंद्वारा हवन कराना चाहिये। स्नान और दानके लिये वे ही पूर्वकथित मन्त्र इसमें भी हैं। लक्षहोममें केवल वसोर्धाराका विधान विशेष होता है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे कोटिहोमका विधान करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और मरनेपर विष्णुलोकमें चला जाता है। जो मनुष्य तीनों प्रकारके ग्रहयज्ञोंका पाठ अथवा श्रवण करता है उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और अन्तमें वह इन्द्रलोकमें चला जाता है। धर्मज्ञ मनुष्य अठारह हजार अश्वमेधयज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त करता है, वह फल कोटिहोम नामक यज्ञसे प्राप्त हो जाता

९७- आदित्यवार-कल्पका विधान और माहात्म्य

३२६ * मत्स्यपुराण *

| ब्रह्महत्यासहस्त्राणि भ्रूणहत्यार्बुदानि च।<br>कोटिहोमेन नश्यन्ति यथावच्छिवभाषितम्॥ १३९<br><br>वश्यकर्माभिचारादि तथैवोच्चाटनादिकम्।<br>नवग्रहमखं कृत्वा ततः काम्यं समाचरेत्॥ १४०<br><br>अन्यथा फलदं पुंसां न काम्यं जायते क्वचित्।<br>तस्मादयुतहोमस्य विधानं पूर्वमाचरेत्॥ १४१<br><br>वृत्तं चोच्चाटने कुण्डं तथा च वशकर्मणि।<br>त्रिमेखलैश्कवक्त्रमरत्निर्विस्तरेण तु॥ १४२<br><br>पलाशसमिधः शस्ता मधुगोरोचनान्विताः।<br>चन्दनागुरुणा तद्वत् कुङ्कुमेनाभिषिञ्चिताः॥ १४३<br><br>होमयेन्मधुसर्पिर्भ्यां बिल्वानि कमलानि च।<br>सहस्राणि दशैवोक्तं सर्वदैव स्वयम्भुवा॥ १४४<br><br>वश्यकर्मणि बिल्वानां पद्मानां चैव धर्मवित्।<br>सुमित्रिया न आप ओषधय इति होमयेत्॥ १४५<br><br>न चात्र स्थापनं कार्यं न च कुम्भाभिषेचनम्।<br>स्नानं सर्वौषधैः कृत्वा शुक्लपुष्पाम्बरो गृही॥ १४६<br><br>कण्ठसूत्रैः सकनकैर्विप्रान् समभिपूजयेत्।<br>सूक्ष्मवस्त्राणि देयानि शुक्ला गावः सकाञ्चनाः॥ १४७<br><br>अवशानि वशीकुर्यात् सर्वशत्रुबलान्यपि।<br>अमित्राण्यपि मित्राणि होमोऽयं पापनाशनः॥ १४८<br><br>विद्वेषणेऽभिचारे च त्रिकोणं कुण्डमिष्यते।<br>त्रिमेखलं कोणमुखं हस्तमात्रं च सर्वशः॥ १४९<br><br>होमं कुर्युस्ततो विप्रा रक्तमाल्यानुलेपनाः।<br>निवीतलोहितोष्णीषा लोहिताम्बरधारिणः॥ १५०<br><br>नववायसरक्ताढ्यपात्रत्रयसमन्विताः ।<br>समिधो वामहस्तेन श्येनास्थिबलसंयुताः।<br>होतव्या मुक्तकेशैस्तु ध्यायद्भिर्भिरशिवं रिपौ॥ १५१<br><br>दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु तथा हुंफडितीति च।<br>श्येनाभिचारमन्त्रेण क्षुरं समभिमन्त्र्य च॥ १५२ | है। शिवजीने यथार्थरूपसे कहा है कि कोटिहोमके अनुष्ठानसे हजारों ब्रह्महत्या और अरबों भ्रूणहत्या-जैसे महापातक नष्ट हो जाते हैं॥१३१-१३९॥<br><br>नारद! यदि वशीकरण, अभिचार तथा उच्चाटन आदि काम्य कर्मोंका अनुष्ठान करना हो तो पहले नवग्रह-यज्ञ सम्पन्न कर तत्पश्चात् काम्य कर्म करना चाहिये, अन्यथा वह काम्य कर्म मनुष्योंको कहीं भी फलदायक नहीं हो सकता। अतः पहले अयुतहोमका सम्पादन कर लेना उचित है। उच्चाटन और वशीकरण कर्मोंमें कुण्डको गोलाकार बनाना चाहिये। उसका विस्तार अर्थात् व्यास एक अरत्नि हो। वह तीन मेखलाओं और एक मुखसे युक्त हो। इन कार्योंमें मधु, गोरोचन, चन्दन, अगुरु और कुङ्कुमसे अभिषिक्त की हुई पलाशकी समिधाएँ प्रशस्त मानी गयी हैं। मधु और घीसे चुपड़े हुए बेल और कमल-पुष्पके हवनका विधान है। ब्रह्माने सदा दस हजार आहुतियोंका ही विधान बतलाया है। धर्मज्ञ यजमानको वशीकरण-कर्ममें 'सुमित्रिया न आप ओषधयः'—इस मन्त्रसे हवन करना चाहिये। इस कार्यमें कलशका स्थापन और अभिषेचन नहीं किया जाता। गृहस्थ यजमान सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान करके श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण कर ले और स्वर्णनिर्मित कण्ठहारोंसे ब्राह्मणोंकी पूजा करे तथा उन्हें महीन वस्त्र एवं स्वर्णसे विभूषित श्वेत रंगकी गौएँ प्रदान करे। (इस प्रकार विधिपूर्वक सम्पन्न किया गया) यह पापनाशक हवन वशमें न आनेवाली शत्रुओंकी सारी सेनाओंको वशीभूत कर देता है और शत्रुओंको मित्र बना देता है॥ १४०-१४८॥<br><br>समृद्धिकामी पुरुषको इन कर्मोंमेंसे केवल शान्तिकर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये। जो मानव निष्कामभावसे इन तीनों ग्रहयज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस ग्रहयज्ञको नित्य सुनता अथवा दूसरेको सुनाता है, उसे न तो ग्रहजनित पीडा होती है और न उसके बन्धुजनोंका विनाश ही होता है। जिस घरमें ये तीनों (ग्रह, लक्ष एवं कोटि होम) |

* अध्याय ९३ *३२७

| प्रतिरूपं रिपोः कृत्वा क्षुरेण परिकर्तयेत्।<br>रिपुरूपस्य शकलान्यथैवाग्नौ विनिःक्षिपेत्॥ १५३<br>ग्रहयज्ञविधानान्ते सदैवाभिचरन् पुनः।<br>विद्वेषणं तथा कुर्वन्नेतदेव समाचरेत्॥ १५४<br>इहैव फलदं पुंसामेतन्नामुत्र शोभनम्।<br>तस्माच्छान्तिकमेवात्र कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥ १५५<br>ग्रहयज्ञत्रयं कुर्याद् यस्त्वकाम्येन मानवः।<br>स विष्णोः पदमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५६<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>न तस्य ग्रहपीडा स्यान्न च बन्धुजनक्षयः॥ १५७<br>ग्रहयज्ञत्रयं गेहे लिखितं यत्र तिष्ठति।<br>न पीडा तत्र बालानां न रोगो न च बन्धनम्॥ १५८<br>अशेषयज्ञफलदं निःशेषाघविनाशनम्।<br>कोटिहोमं विदुः प्राज्ञा भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ १५९<br>अश्वमेधफलं प्राहुर्लक्षहोमं सुरोत्तमाः।<br>द्वादशाहमखस्तद्वन्नवग्रहमखः स्मृतः॥ १६०<br>इति कथितमिदानीमुत्सवानन्दहेतोः<br>सकलकलुषहारी देवयज्ञाभिषेकः।<br>परिपठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-<br>दभिभवति स शत्रूनायुरारोग्ययुक्तः॥ १६१ | यज्ञ-विधान लिखकर रखे रहते हैं, वहाँ न तो बालकोंको कोई कष्ट होता है, न रोग तथा बन्धन भी नहीं होता। विद्वानोंका कहना है कि कोटिहोम सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता, अखिल पापोंका विनाशक और भोग एवं मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला है। श्रेष्ठ देवगण लक्षहोमको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाते हैं। उसी प्रकार नवग्रह-यज्ञ, द्वादशाह-यज्ञके सदृश फलकारक बतलाया जाता है। इस प्रकार मैंने इस समय उत्सवके आनन्दकी प्राप्तिके लिये सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले इस देवयज्ञाभिषेकका वर्णन कर दिया। जो मनुष्य प्रसङ्गवश इसका इसी रूपमें पाठ अथवा श्रवण करता है, वह दीर्घायु एवं नीरोगतासे युक्त होकर अपने शत्रुओंको पराजित कर देता है॥ १४९-१६१॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नवग्रहहोमशान्तिविधानं नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नवग्रहहोमशान्तिविधान नामक तिरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९३॥

३२८* मत्स्यपुराण *

चौरानबेवाँ अध्याय

नवग्रहोंके स्वरूपका वर्णन

शिव उवाचशिवजीने कहा— नारद! (चित्र-प्रतिमादिमें) सूर्यदेवकी दो भुजाएँ निर्दिष्ट हैं, वे कमलके आसनपर विराजमान रहते हैं, उनके दोनों हाथोंमें कमल सुशोभित रहते हैं। उनकी कान्ति कमलके भीतरी भागकी-सी है और वे सात घोड़ों तथा सात रस्सियोंसे जुते रथपर आरूढ़ रहते हैं। चन्द्रमा गौरवर्ण, श्वेतवस्त्र और श्वेत अश्वयुक्त हैं। उनका वाहन—श्वेत अश्वयुक्त रथ है। उनके दोनों हाथ गदा और वरदमुद्रासे युक्त बनाना चाहिये। धरणीनन्दन मंगलके चार भुजाएँ हैं। उनके शरीरके रोएँ लाल हैं, वे लाल रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं और उनके चारों हाथ क्रमशः शक्ति, त्रिशूल, गदा एवं वरमुद्रासे सुशोभित रहते हैं। बुध पीले रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। उनकी शरीर-कान्ति कनेरके पुष्प-सरीखी है। वे भी चारों हाथोंमें क्रमशः तलवार, ढाल, गदा और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं तथा सिंहपर सवार होते हैं। देवताओं और दैत्योंके गुरु बृहस्पति और शुक्रकी प्रतिमाएँ क्रमशः पीत और श्वेत वर्णकी करनी चाहिये। उनके चार भुजाएँ हैं, जिनमें वे दण्ड, रुद्राक्षकी माला, कमण्डलु और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। शनैश्चरकी शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणिकी-सी है। वे गीधपर सवार होते हैं और हाथमें धनुष-बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। राहुका मुख भयंकर है। उनके हाथोंमें तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा शोभा पाती हैं तथा वे नील रंगके सिंहासनपर आसीन होते हैं। ध्यान (प्रतिमा)-में ऐसे ही राहु प्रशस्त माने गये हैं। केतु बहुतेरे हैं। उन सबोंके दो भुजाएँ हैं। उनके शरीर आदि धूम्रवर्णके हैं। उनके मुख विकृत हैं। वे दोनों हाथोंमें गदा एवं वरमुद्रा धारण किये हैं और नित्य गीधपर समासीन रहते हैं। इन सभी लोक-हितकारी ग्रहोंको किरीटसे सुशोभित कर देना चाहिये तथा इन सबकी ऊँचाई एक सौ आठ अङ्गुल (४॥ हाथ)-की होनी चाहिये॥ १—९॥
पद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भसमद्युतिः।<br>सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च द्विभुजः स्यात् सदा रविः॥ १<br><br>श्वेतः श्वेताम्बरधरः श्वेताश्वः श्वेतवाहनः।<br>गदापाणिर्द्विबाहुश्च कर्तव्यो वरदः शशी॥ २<br><br>रक्तमाल्याम्बरधरः शक्तिशूलगदाधरः।<br>चतुर्भुजः रक्तरोमा वरदः स्याद् धरासुतः॥ ३<br><br>पीतमाल्याम्बरधरः कर्णिकारसमद्युतिः।<br>खड्गचर्मगदापाणिः सिंहस्थो वरदो बुधः॥ ४<br><br>देवदैत्यगुरू तद्वत् पीतश्वेतौ चतुर्भुजौ।<br>दण्डिनौ वरदौ कार्यौ साक्षसूत्रकमण्डलू॥ ५<br><br>इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।<br>बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा॥ ६<br><br>करालवदनः खड्गचर्मशूली वरप्रदः।<br>नीलसिंहासनस्थश्च राहुरत्र प्रशस्यते॥ ७<br><br>धूम्रा द्विबाहवः सर्वे गदिनो विकृताननाः।<br>गृध्रासनगता नित्यं केतवः स्युर्वरप्रदाः॥ ८<br><br>सर्वे किरीटिनः कार्या ग्रहा लोकहितावहाः।<br>ह्यङ्गुलेनोच्छ्रिताः सर्वे शतमष्टोत्तरं सदा॥ ९

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ग्रहरूपाख्यानं नाम चतुर्णवतितमोऽध्यायः॥ ९४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ग्रहरूपाख्यान नामक चौरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९४॥

९८- संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि

* अध्याय ९५ *३२९

पंचानबेवाँ अध्याय

माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृतहिन्दी
नारद उवाच<br><br>भगवन् भूतभव्येश तथान्यदपि यच्छ्रुतम्।<br>भुक्तिमुक्तिफलायालं तत् पुनर्वक्तुमर्हसि॥ १<br>एवमुक्तोऽब्रवीच्छम्भुरयं वाङ्मयपारगः।<br>मत्समस्तपसा ब्रह्मन् पुराणश्रुतिविस्तरैः॥ २<br>धर्मोऽयं वृषरूपेण नन्दी नाम गणाधिपः।<br>धर्मान् माहेश्वरान् वक्ष्यत्यतः प्रभृति नारद॥ ३नारदजीने पूछा— भूत और भविष्यके स्वामी भगवन्! इनके अतिरिक्त भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेमें समर्थ यदि कोई अन्य व्रत सुना गया हो तो उसे पुनः कहनेकी कृपा करें। ऐसा पूछे जानेपर भगवान् शम्भुने कहा—‘ब्रह्मन्! यह नन्दी शब्दशास्त्रका पारगामी विद्वान् और तपस्या तथा पुराणों एवं श्रुतियोंकी विस्तृत जानकारीमें मेरे समान है। यह वृषरूपसे साक्षात् धर्म और गणका अधीश्वर है। नारद! अब यही इससे आगे माहेश्वर-धर्मोंका वर्णन करेगा॥’ १-३॥
मत्स्य उवाच<br><br>इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>नारदोऽपि हि शुश्रूषुरपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्।<br>आदिष्टस्त्वं शिवेनेह वद माहेश्वरं व्रतम्॥ ४मत्स्यभगवान्ने कहा— ऐसा कहकर देवाधिदेव शम्भु वहीं अन्तर्हित हो गये। तब श्रवण करनेकी उत्कट इच्छावाले नारदने नन्दिकेश्वरसे पूछा—‘नन्दी! शिवजीने आपको इसके लिये जैसा आदेश दिया है, आप उस प्रकार माहेश्वर-व्रतका वर्णन कीजिये'॥ ४॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् वक्ष्ये माहेश्वरं व्रतम्।<br>त्रिषु लोकेषु विख्याता नाम्ना शिवचतुर्दशी॥ ५<br>मार्गशीर्षत्रयोदश्यां सितायामेकभोजनः।<br>प्रार्थयेद् देवदेवेशं त्वामहं शरणं गतः॥ ६<br>चतुर्दश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य शंकरम्।<br>सुवर्णवृषभं दत्त्वा भोक्ष्यामि च परेऽहनि॥ ७<br>एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>कृतस्नानजपः पश्चादुमया सह शंकरम्।<br>पूजयेत् कमलैः शुभ्रैर्गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ ८<br>पादौ नमः शिवायति शिरः सर्वात्मने नमः।<br>त्रिनेत्रायेति नेत्राणि ललाटं हरये नमः॥ ९<br>मुखमिन्दुमुखायेति श्रीकण्ठायेति कन्थराम्।<br>सद्योजाताय कर्णौ तु वामदेवाय वै भुजौ॥ १०<br>अघोरहृदयायेति हृदयं चाभिपूजयेत्।<br>स्तनौ तत्पुरुषायेति तथेशानाय चोदरम्॥ ११नन्दिकेश्वर बोले— ब्रह्मन्! मैं माहेश्वर-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, आप समाहितचित्तसे श्रवण कीजिये। वह व्रत तीनों लोकोंमें शिवचतुर्दशीके नामसे विख्यात है। (इस व्रतके आरम्भमें) व्रती मानव मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको एक बार भोजन कर देवाधिदेव शंकरजीसे इस प्रकार प्रार्थना करे—‘भगवन्! मैं आपके शरणागत हूँ। मैं चतुर्दशी तिथिको निराहार रहकर भगवान् शंकरकी भलीभाँति अर्चना करनेके पश्चात् स्वर्ण-निर्मित वृषभका दान करके दूसरे दिन भोजन करूँगा।' इस प्रकारका नियम ग्रहण कर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर सुन्दर कमल-पुष्पों, सुगन्धित पुष्पमालाओं और चन्दन आदिसे पार्वतीसहित शंकरजीकी वक्ष्यमाण रीतिसे पूजा करे—‘शिवाय नमः' से दोनों चरणोंका, ‘सर्वात्मने नमः' से सिरका, ‘त्रिनेत्राय नमः' से नेत्रोंका, ‘हरये नमः' से ललाटका, ‘इन्दुमुखाय नमः' से मुखका, ‘श्रीकण्ठाय नमः' से कंधोंका, ‘सद्योजाताय नमः' से कानोंका, ‘वामदेवाय नमः' से भुजाओंका और ‘अघोरहृदाय नमः' से हृदयका पूजन करे। ‘तत्पुरुषाय नमः' से स्तनोंकी, ‘ईशानाय नमः' से उदरकी,

९९- विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

३३०* मत्स्यपुराण *

| पार्श्वौ चानन्तधर्माय ज्ञानभूताय वै कटिम्।<br>ऊरू चानन्तवैराग्यसिंहायेत्यभिपूजयेत् ॥ १२<br>अनन्तैश्वर्यनाथाय जानुनी चार्चयेद् बुधः।<br>प्रधानाय नमो जङ्घे गुल्फौ व्योमात्मने नमः ॥ १३<br>व्योमकेशात्मरूपाय केशान् पृष्ठं च पूजयेत्।<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै पार्वतीं चापि पूजयेत् ॥ १४<br>ततस्तु वृषभं हैममुदकुम्भसमन्वितम्।<br>शुक्लमाल्याम्बरधरं पञ्चरत्नसमन्वितम्।<br>भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ १५<br>प्रीयतां देवदेवोऽत्र सद्योजातः पिनाकधृक्।<br>ततो विप्रान् समाहूय तर्पयेद् भक्तितः शुभान्।<br>पृषदाज्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावुदङ्मुखः ॥ १६<br>पञ्चदश्यां च सम्पूज्य विप्रान् भुञ्जीत वाग्यतः।<br>तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामेतत् सर्वं समाचरेत् ॥ १७<br>चतुर्दशीषु सर्वासु कुर्यात् पूर्ववदर्चनम्।<br>ये तु मासे विशेषाः स्युस्तान् निबोध क्रमादिह ॥ १८<br>मार्गशीर्षादिमासेषु क्रमादेतदुदीरयेत्।<br>शंकराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते करवीरक ॥ १९<br>त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमतः परम्।<br>नमस्तेऽस्तु महादेव स्थाणवे च ततः परम् ॥ २०<br>नमः पशुपते नाथ नमस्ते शाम्भवे पुनः।<br>नमस्ते परमानन्द नमः सोमार्धधारिणे ॥ २१<br>नमो भीमाय इत्येवं त्वामहं शरणं गतः।<br>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ॥ २२<br>पञ्चगव्यं ततो बिल्वं कर्पूरचागुरुं यवाः।<br>तिलाः कृष्णाश्च विधिवत् प्राशनं क्रमशः स्मृतम्।<br>प्रतिमासं चतुर्दश्योरेकैकं प्राशनं स्मृतम् ॥ २३ | ‘अनन्तधर्माय नमः’ से दोनों पार्श्वभागोंकी, ‘ज्ञानभूताय नमः’ से कटिकी और ‘अनन्तवैराग्यसिंहाय नमः’ से ऊरुओंकी अर्चना करे। बुद्धिमान् व्रतीको ‘अनन्तैश्वर्यनाथाय नमः’ से जानुओंका, ‘प्रधानाय नमः’ से जङ्घाओंका और ‘व्योमात्मने नमः’ से गुल्फोंका पूजन करना चाहिये। फिर ‘व्योमकेशात्मरूपाय नमः’ से बालों और पीठकी अर्चना करे। ‘पुष्ट्यै नमः’ एवं ‘तुष्ट्यै नमः’ से पार्वतीका भी पूजन करे। तत्पश्चात् जलपूर्ण कलशसहित, श्वेत पुष्पमाला और वस्त्रसे सुशोभित, पञ्चरत्नयुक्त स्वर्णमय वृषभको नाना प्रकारके खाद्य पदार्थोंके साथ ब्राह्मणको दान कर दे और यों प्रार्थना करे—‘पिनाकधारी देवाधिदेव सद्योजात मेरे व्रतमें प्रसन्न हों।’ तदनन्तर माङ्गलिक ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भक्तिपूर्वक भोजन एवं दक्षिणा आदि देकर तृप्त करे और स्वयं दधिमिश्रित घी खाकर रात्रिमें उत्तराभिमुख हो भूमिपर शयन करे। पूर्णिमा तिथिको प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके पश्चात् मौन होकर भोजन करे। उसी प्रकार कृष्णपक्षकी चतुर्दशीमें भी यह सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये॥ ५—१७॥<br><br>इसी प्रकार सभी चतुर्दशी तिथियोंमें पूर्ववत् शिवपार्वतीका पूजन करना चाहिये। अब प्रत्येक मासमें जो विशेषताएँ हैं, उन्हें क्रमशः (बतला रहा हूँ,) सुनिये। मार्गशीर्ष आदि प्रत्येक मासमें क्रमशः इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—‘शंकराय नमस्तेऽस्तु’— आप शंकरके लिये मेरा नमस्कार प्राप्त हो। ‘नमस्ते करवीरक’—करवीरक! आपको नमस्कार है। ‘त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु’—आप त्र्यम्बकके लिये प्रणाम है। इसके बाद ‘महेश्वराय नमः’—महेश्वरको अभिवादन है। ‘महादेव नमस्तेऽस्तु’—महादेव! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। उसके बाद ‘स्थाणवे नमः’—स्थाणुको प्रणाम है। ‘पशुपतये नमः’—पशुपतिको अभिवादन है। ‘नाथ नमस्ते’—नाथ! आपको नमस्कार है। पुनः ‘शाम्भवे नमः’—शम्भुको प्रणाम है। ‘परमानन्द नमस्ते’—परमानन्द! आपको अभिवादन है। ‘सोमार्थधारिणे नमः’—ललाटमें अर्धचन्द्र धारण करनेवालेको नमस्कार है। ‘भीमाय नमः’—भयंकर रूपधारीको प्रणाम है। ऐसा कहकर अन्तमें कहे कि ‘मैं आपके शरणागत हूँ।’ प्रत्येक मासकी दोनों चतुर्दशी तिथियोंमें गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, पञ्चगव्य, बेल, कर्पूर, अगुरु, यव और काला तिल—इनमेंसे क्रमशः एक-एक पदार्थका प्राशन बतलाया गया है। इसी प्रकार प्रत्येक मासकी दोनों |

* अध्याय ९५ *३३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मन्दारमालतीभिश्च तथा धत्तूरकैरपि।<br>सिन्धुवारैरशोकैश्च मल्लिकाभिश्च पाटलैः॥ २४<br>अर्कपुष्पैः कदम्बैश्च शतपत्न्या तथोत्पलैः।<br>एकैकेन चतुर्दश्योरर्चयेत् पार्वतीपतिम्॥ २५चतुर्दशी तिथियोंमें मन्दार (पारिभद्र), मालती, धतूरा, सिन्दुवार, अशोक, मल्लिका, पाटल (पाँढर पुष्प या लाल गुलाब), मन्दार-पुष्प (सूर्यमुखी), कदम्ब, शतपत्री (श्वेत कमल या गुलाब) और कमल—इनमेंसे क्रमशः एक-एकके द्वारा पार्वतीपति शंकरकी अर्चना करनी चाहिये॥ १८–२५॥
पुनश्च कार्तिके मासे प्राप्ते संतर्पयेद् द्विजान्।<br>अन्नैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्वस्त्रमाल्यविभूषणैः ॥ २६<br>कृत्वा नीलवृषोत्सर्गं श्रुत्युक्तविधिना नरः।<br>उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवा सह॥ २७<br>मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृताम्।<br>सर्वोपस्करसंयुक्तां शय्यां दद्यात् सकुम्भकाम्॥ २८<br>ताम्रपात्रोपरि पुनः शालितण्डुलसंयुतम्।<br>स्थाप्य विप्राय शान्ताय वेदव्रतपराय च॥ २९<br>ज्येष्ठसामविदे देयं न वकव्रतिने क्वचित्।<br>गुणज्ञे श्रोत्रिये दद्यादाचार्ये तत्त्ववेदिनि॥ ३०<br>अव्यङ्गाङ्गाय सौम्याय सदा कल्याणकारिणे।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः॥ ३१<br>गुरौ सति गुरोर्देयं तदभावे द्विजातये।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषात् पतत्यधः॥ ३२पुनः कार्तिकमास आनेपर अन्न, नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ, वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंको पूर्णरूपसे तृप्त करे। व्रती मनुष्यको वेदोक्त विधिके अनुसार नील वृषका भी उत्सर्ग करनेका विधान है। तत्पश्चात् अगहनीके चावलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रपर स्वर्णनिर्मित उमा, महेश्वर और वृषभकी मूर्तिको स्थापित कर दे और उसके निकट आठ मोती रख दे, फिर उसे गौके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। साथ ही दो श्वेत चादरोंसे आच्छादित तथा समस्त उपकरणोंसे युक्त घटसहित एक शय्या भी दान करनी चाहिये। यह दान ऐसे ब्राह्मणको देना चाहिये, जो शान्तस्वभाव, वेदव्रत-परायण और ज्येष्ठसामका ज्ञाता हो। बगुलाव्रती (कपटी) ब्राह्मणको कभी भी दान नहीं देना चाहिये। वस्तुतस्तु गुणज्ञ, वेदपाठी, तत्त्ववेत्ता, सुडौल अङ्गोंवाले, सौम्यस्वभाव, कल्याणकारक एवं सपत्नीक आचार्यकी वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे भलीभाँति पूजा करके यह दान उन्हींको देना चाहिये। यदि गुरु (आचार्य) उस समय उपस्थित हों तो उन्हींको दान देनेका विधान है। उनकी अनुपस्थितिमें अन्य ब्राह्मणको दान दिया जा सकता है। इस दानमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसके दोषसे कर्ताका अधःपतन हो जाता है॥ २६–३२॥
अनेन विधिना यस्तु कुर्याच्छिवचतुर्दशीम्।<br>सोऽश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३३<br>ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>पितृभिर्भ्रातृभिर्वापि तत् सर्वं नाशमाप्नुयात्॥ ३४<br>दीर्घायुरारोग्यकुलान्नवृद्धि-<br>रत्राक्षयामुत्र चतुर्भुजत्वम् ।<br>गणाधिपत्यं दिवि कल्पकोटि-<br>शतान्युषित्वा पदमेति शम्भोः॥ ३५जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शिवचतुर्दशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। उसके द्वारा अथवा उसके पिता या भाईद्वारा इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें जो कुछ ब्रह्महत्या आदि पाप घटित हुए रहते हैं, वे सभी नष्ट हो जाते हैं। इस लोकमें वह दीर्घायु, नीरोगता, कुल और अन्नकी समृद्धिसे युक्त होता है और मरणोपरान्त स्वर्गलोकमें चार भुजाधारी होकर गणाधिप हो जाता है। वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक निवास कर शम्भु-पद—शिवलोकको चला जाता है।

१००- विभूतिद्वादशीके प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त

३३२* मत्स्यपुराण *

| न बृहस्पतिरप्यनन्तमस्याः<br>फलमिन्द्रो न पितामहोऽपि वक्तुम्।<br>न च सिद्धगणोऽप्यलं न चाहं<br>यदि जिह्वायुतकोटयोऽपि वक्त्रे॥ ३६<br><br>भवत्यमरवल्लभः पठति यः स्मरेद् वा सदा<br>शृणोत्यपि विमत्सरः सकलपापनिर्मोचनीम्।<br>इमां शिवचतुर्दशीममरकामिनीकोटयः<br>स्तुवन्ति तमनिन्दितं किमु समाचरेद् यः सदा॥ ३७<br><br>या वाथ नारी कुरुतेऽतिभक्त्या<br>भर्तारमापृच्छ्य सुतान् गुरून् वा।<br>सापि प्रसादात् परमेश्वरस्य<br>परं पदं याति पिनाकपाणेः॥ ३८ | यदि मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हो जायँ तो भी इस चतुर्दशीके अनन्त फलका वर्णन करनेमें न तो बृहस्पति समर्थ हैं न इन्द्र, न ब्रह्मा समर्थ हैं न सिद्धगण तथा मैं भी इसका वर्णन नहीं कर सकता। जो मनुष्य मत्सररहित हो सम्पूर्ण पापोंसे विमुक्त करनेवाली इस शिवचतुर्दशीके माहात्म्यको सदा पढ़ता, स्मरण करता अथवा श्रवण करता है, उस पुण्यात्माका करोड़ों देवाङ्गनाएँ स्तवन करती हैं, फिर जो सदा इसका अनुष्ठान करता है, उसकी तो बात ही क्या है? स्त्री भी यदि अपने पति, पुत्र और गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी परमेश्वरकी कृपासे पिनाकपाणि भगवान् शंकरके परमपदको प्राप्त हो जाती है*॥ ३३—३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शिवचतुर्दशीव्रतं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शिवचतुर्दशी-व्रत नामक पंचानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९५॥


छानबेवाँ अध्याय

सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य

| नन्दिकेश्वर उवाच<br>फलत्यागस्य माहात्म्यं यद् भवेच्छृणु नारद।<br>यदक्षयं परं लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br>मार्गशीर्षे शुभे मासि तृतीयायां मुने व्रतम्।<br>द्वादश्यामथवाष्टम्यां चतुर्दश्यामथापि वा।<br>आरभेच्छुक्लपक्षस्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्॥ २<br>अन्येष्वपि हि मासेषु पुण्येषु मुनिसत्तम।<br>सदक्षिणं पायसेन भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! अब कर्म-'फलत्याग' नामक व्रतका जो महत्त्व है, उसे सुनिये। वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। मुने! मङ्गलमय मार्गशीर्षमासमें शुक्लपक्षकी तृतीया, अष्टमी, द्वादशी अथवा चतुर्दशी तिथिको ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। मुनिसत्तम! इसी प्रकार यह व्रत अन्य पुण्यप्रद महीनोंमें भी किया जा सकता है। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। |


* मन्वादिके अनुसार पति आदिकी आज्ञाके बिना स्त्रीको व्रत करनेका अधिकार नहीं है।

* अध्याय ९६ *३३३
संस्कृतहिन्दी
अष्टादशानां धान्यानामवद्यं फलमूलकैः।<br>वर्जयेदब्दमेकं तु ऋते औषधकारणम्।<br>सवृषं काञ्चनं रुद्रं धर्मराजं च कारयेत्॥ ४<br>कूष्माण्डं मातुलुङ्गं च वार्त्ताकं पनसं तथा।<br>आम्राम्रातककपित्थानि कलिङ्गमथ वालुकम्॥ ५<br>श्रीफलाश्र्वत्थबदरं जम्बीरं कदलीफलम्।<br>काश्मरं दाडिमं शक्त्या कलधौतानि षोडश॥ ६<br>मूलकामलकं जम्बूतिन्तिडी करमर्दकम्।<br>कङ्कोलैलाकतूण्डीरकरीरकुटजं शमी॥ ७<br>औदुम्बरं नारिकेलं द्राक्षाथ बृहतीद्वयम्।<br>रौप्याणि कारयेच्छक्त्या फलानीमानि षोडश॥ ८इस व्रतमें औषधके अतिरिक्त सामान्यरूपसे निन्द्य फल और मूलके साथ अठारह* प्रकारके धान्य त्याज्य—वर्जनीय माने गये हैं, अतः उन्हें एक वर्षतक त्याग देना चाहिये। पुनः रुद्र, धर्मराज और वृषभकी स्वर्णमयी मूर्ति बनवायी जाय। इसी प्रकार यथाशक्ति कूष्माण्ड, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), वार्त्ताक (भाँटा), पनस (कटहल), आम, आम्रातक (आमड़ा), कपित्थ (कैथ), कलिङ्ग (तरबूज), बालुक (पनियाला), बेल, पीपल, बेर, जम्बीर (जमीरी नींबू), केला, काश्मर (गम्भारी) और दाडिम (अनार)—ये सोलह प्रकारके फल भी सोनेके बनवाये जायें। मूली, आँवला, जामुन, इमली, करमर्दक (करौंदा), कङ्कोल (शीतलचीनीकी जातिके एक वृक्षका फल), इलायची, तुण्डीर (कुँदरू), करीर (करील), कुटज (इन्द्रयव), शमी, गूलर, नारियल, अंगूर और दोनों बृहती (बनभंटा, भटकटैया)—इन सोलहोंको अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीका बनवाना चाहिये॥ १—८॥
ताम्रं तालफलं कुर्यादगस्तिफलमेव च।<br>पिण्डारकाश्मर्यफलं तथा सूरणकन्दकम्॥ ९<br>रक्ताल्लुकाकन्दकं च कनकाह्वं च चिर्भिटम्।<br>चित्रवल्लीफलं तद्वत् कूटशाल्मलिजं फलम्॥ १०<br>आम्रनिष्पावमधुकवटमुद्गपटोलकम् ।<br>ताम्राणि षोडशैतानि कारयेच्छक्तितो नरः॥ ११<br>उदकुम्भद्वयं कुर्याद् धान्योपरि सवस्त्रकम्।<br>ततश्र्व कारयेच्छय्यां यथोपरि सुवाससी॥ १२<br>भक्ष्यपात्रत्रयोपेतं यमरुद्रवृषान्वितम्।<br>धेन्वा सहैव शान्ताय विप्रायाथ कुटुम्बिने।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य पुण्येऽह्नि विनिवेदयेत्॥ १३<br>यथा फलेषु सर्वेषु वसन्त्यमरकोटयः।<br>तथा सर्वफलत्यागव्रताद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे॥ १४<br>यथा शिवश्र्व धर्मश्र्व सदानन्तफलप्रदौ।<br>तद्युक्तफलदानेन तौ स्यातां मे वरप्रदौ॥ १५<br>यथा फलान्यनन्तानि शिवभक्तेषु सर्वदा।<br>तथानन्तफलावाप्तिरस्तु जन्मनि जन्मनि॥ १६<br>यथा भेदं न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्।<br>तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकरः शंकरः सदा॥ १७व्रती मनुष्य सम्पत्तिके अनुकूल ताड़-फल, अगस्तफल, पिण्डारक (विकंकत या पिड़ार), काश्मर्य (गम्भारी)-फल, सूरणकन्द (जमीकन्द), रतालू, धतूरा, चिर्भिट (ककड़ी या पिहटिया), चित्रवल्ली (तेजपात)-फल, काले सेमलका फल, आम, निष्पाव (सेम या मटर), महुआ, बरगद, मूँग और परवल—इन सोलहोंका ताँबेसे निर्माण कराये। तत्पश्चात् वस्त्रसे सुशोभित दो कलश सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। वह तीन भोजन-पात्रोंसे युक्त हो और उसपर धर्मराज, रुद्र और वृषकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। साथ ही दो सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित एक शय्या भी प्रस्तुत करे। फिर उस पुण्यप्रद दिनमें यह सारा उपकरण एक गौके साथ किसी शान्त स्वभाववाले एवं कुटुम्बी सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उसे दान कर दे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'जिस प्रकार सभी फलोंमें करोड़ों देवता निवास करते हैं, उसी प्रकार सर्वफलत्याग-व्रतके अनुष्ठानसे शिवजीमें मेरी भक्ति हो। जैसे शिव और धर्म—दोनों सदा अनन्त फलके दाता कहे गये हैं, अतः उनसे युक्त फलका दान करनेसे वे दोनों मेरे लिये भी वरदायक हों। जिस प्रकार शिवभक्तोंको सदा अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहती है, उसी तरह मुझे प्रत्येक जन्ममें अनन्त फलकी प्राप्ति हो। जैसे मैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और सूर्यमें कोई भेद नहीं मानता, वैसे ही विश्वात्मा भगवान् शंकर सदा मेरे लिये कल्याणकारक हों'॥ ९—१७॥

* अठारह प्रकारके धान्योंकी बात यहाँके अतिरिक्त मत्स्यपुराणके अगले दानप्रकरणमें (विशेषकर २७६।७, २७७।११ आदिमें) भी आयी है, पर इसमें उनका पूर्ण विवरण कहीं नहीं आया है। ये अठारह धान्य—याज्ञवल्क्य-स्मृ० १।२०८ की अपरार्क व्याख्या, व्याकरणमहाभाष्य ५।२।४, वाजसने० संहिता १८।१२, दानमयूख तथा विधानपारिजात आदिके अनुसार इस प्रकार हैं—सावाँ, धान, जौ, मूँग, तिल, अणु (कँगनी), उड़द, गेहूँ, कोदो, कुलथी, सतीन (छोटी मटर), सेम, आढ़की (अरहर) या मयुष्ट (उजली मटर), चना, कलाय, मटर, प्रियङ्गु (सरसों, राई या टाँगुन) और मसूर। अन्य मतसे मयुष्टादिककी जगह अतसी और नीवार ग्राह्य हैं।

३३४* मत्स्यपुराण *

| इति दत्त्वा च तत् सर्वमलङ्कृत्य च भूषणैः।<br>शक्तिश्चेच्छयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १८<br>अशक्तस्तु फलान्येव यथोक्तानि विधानतः।<br>तथोदकुम्भसंयुक्तौ शिवधर्मौ च काञ्चनौ॥ १९<br>विप्राय दत्त्वा भुञ्जीत वाग्यतस्तैलवर्जितम्।<br>अन्यान्नपि यथाशक्त्या भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ २०<br>एतद् भागवतानां तु सौरवैष्णवयोगिनाम्।<br>शुभं सर्वफलत्यागव्रतं वेदविदो विदुः॥ २१<br>नारीभिश्च यथाशक्त्या कर्तव्यं द्विजपुङ्गव।<br>एतस्मान्नापरं किञ्चिदिह लोके परत्र च।<br>व्रतमस्ति मुनिश्रेष्ठ यदनन्तफलप्रदम्॥ २२<br>सौवर्णरौप्यताम्रेषु यावन्तः परमाणवः।<br>भवन्ति चूर्ण्यमानेषु फलेषु मुनिसत्तम।<br>तावद् युगसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ २३<br>एतत् समस्तकलुषापहरं जनाना-<br>माजीवनाय मनुजेषु च सर्वदा स्यात्।<br>जन्मान्तरेष्वपि न पुत्रवियोगदुःख-<br>माप्नोति धाम च पुरंदरलोकजुष्टम्॥ २४<br>यो वा शृणोति पुरुषोऽल्पधनः पठेद् वा<br>देवालयेषु भवनेषु च धार्मिकाणाम्।<br>पापैर्विमुक्तवपुरत्र पुरं मुरारे-<br>रानन्दकृत् पदमुपैति मुनीन्द्र सोऽपि॥ २५ | इस प्रकार आभूषणोंसे अलंकृत कर वह सारा सामान ब्राह्मणको दान कर दे। यदि सम्पत्तिरूपी शक्ति हो तो समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्या भी देनी चाहिये। यदि असमर्थ हो तो पूर्वोक्त फलोंका ही विधिपूर्वक दान करे। तत्पश्चात् शिव और धर्मराजकी स्वर्णमयी मूर्तिको दोनों कलशोंके साथ ब्राह्मणको दान करके स्वयं मौन होकर तैलरहित पदार्थोंका भोजन करे। इसके बाद यथाशक्ति अन्य ब्राह्मणोंको भी भोजन करानेका विधान है। वेदवेत्तालोग सूर्य, विष्णु और शिवके उपासक भक्तोंके लिये इस मङ्गलमय सर्वफल-त्यागव्रतको बतलाते हैं। द्विजपुंगव! स्त्रियोंको भी यथाशक्ति इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! इस लोक या परलोकमें इससे बढ़कर कोई दूसरा ऐसा व्रत नहीं है, जो अनन्त फलका प्रदायक हो। मुनिसत्तम! फलोंको चूर्ण कर देनेपर उनमें लगे हुए सोने, चाँदी और ताँबेके जितने परमाणु होते हैं, उतने सहस्र युगोंतक व्रती रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस व्रतका जीवनपर्यन्त अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंको यह विनष्ट कर देता है, उन्हें जन्मान्तरमें भी पुत्रवियोगका कष्ट नहीं भोगना पड़ता और मरणोपरान्त वे इन्द्रलोकमें चले जाते हैं। मुनीश्वर! जो निर्धन पुरुष देव-मन्दिरों अथवा धर्मात्मा पुरुषोंके गृहोंमें इस व्रत-माहात्म्यको सुनता अथवा पढ़ता है, उसका शरीर इस लोकमें पापसे मुक्त हो जाता है और मरणोपरान्त वह विष्णुलोकमें आनन्ददायक स्थान प्राप्त कर लेता है॥ १८-२५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सर्वफलत्यागमाहात्म्यं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः॥ ९६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सर्वफलत्याग-माहात्म्य नामक छानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९६॥


सत्तानबेवाँ अध्याय

आदित्यवार-कल्पका विधान और माहात्म्य

| नारद उवाच<br>यदारोग्यकरं पुंसां यदनन्तफलप्रदम्।<br>यच्छान्त्यै च मर्त्यानां वद नन्दीश तद् व्रतम्॥ १ | नारदजीने पूछा— नन्दीश्वर! अब जो व्रत मृत्युलोकवासी पुरुषोंके लिये आरोग्यकारी, अनन्त फलका प्रदाता और शान्तिकारक हो, उसका वर्णन कीजिये॥ १॥ |

* अध्याय ९७ *३३५
नन्दिकेश्वर उवाचनन्दिकेश्वर बोले—
यत् तद् विश्वात्मनो धाम परं ब्रह्म सनातनम्।<br>सूर्याग्निचन्द्ररूपेण तत् त्रिधा जगति स्थितम्॥ २<br>तदाराध्य पुमान् विप्र प्राप्नोति कुशलं सदा।<br>तस्मादादित्यवारेण सदा नक्ताशनो भवेत्॥ ३<br>यदा हस्तेन संयुक्तमादित्यस्य च वासरम्।<br>तदा शनिदिने कुर्यादेकभक्तं विमत्सरः॥ ४<br>नक्तमादित्यवारेण भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>पत्रैर्द्वादशसंयुक्तं रक्तचन्दनपङ्कजम्॥ ५<br>विलिख्य विन्यसेत् सूर्यं नमस्कारेण पूर्वतः।<br>दिवाकरं तथाग्नेये विवस्वन्तमतः परम्॥ ६<br>भगं तु नैर्ऋते देवं वरुणं पश्चिमे दले।<br>महेन्द्रमनिले तद्वदादित्यं च तथोत्तरे॥ ७<br>शान्तमीशानभागे तु नमस्कारेण विन्यसेत्।<br>कर्णिकापूर्वपत्रे तु सूर्यस्य तुरगान् न्यसेत्॥ ८<br>दक्षिणेऽर्यमनामानं मार्तण्डं पश्चिमे दले।<br>उत्तरे तु रविं देवं कर्णिकायां च भास्करम्॥ ९<br>रक्तपुष्पोदकेनार्घ्यं सतिलारुणचन्दनम्।<br>तस्मिन् पद्मे ततो दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ १०<br>कालात्मा सर्वभूतात्मा वेदात्मा विश्वतोमुखः।<br>यस्मादग्नीन्द्ररूपस्त्वमतः पाहि दिवाकर॥ ११<br>अग्निमीले नमस्तुभ्यमिषे त्वोर्जे च भास्कर।<br>अग्न आयाहि वरद नमस्ते ज्योतिषाम्पते॥ १२नारदजी! विश्वात्मा भगवान्‌का जो परब्रह्मस्वरूप सनातन तेज है, वह जगत्‌में सूर्य, अग्नि और चन्द्ररूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर स्थित है। विप्रवर! उनकी आराधना करके मनुष्य सदा कुशलताका भागी हो जाता है। इसलिये रविवारको रात्रिमें एक बार भोजन करना चाहिये। जब रविवार हस्त नक्षत्रसे युक्त हो तो शनिवारको मत्सररहित हो एक ही बार भोजन करना चाहिये। रविवारको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर नक्तभोजन (रात्रिमें एक बार भोजन करने)-का विधान है। तदनन्तर लाल चन्दनसे द्वादश दलोंसे युक्त कमलकी रचना कर उसके पूर्वदलपर सूर्यकी, अग्निकोणवाले दलपर दिवाकरकी, दक्षिणदलपर विवस्वान्‌की, नैर्ऋत्यकोणस्थित दलपर भगकी, पश्चिमदलपर वरुणदेवकी, वायव्यकोणवाले दलपर महेन्द्रकी, उत्तरदलपर आदित्यकी और ईशानकोणस्थित दलपर शान्तकी नमस्कारपूर्वक स्थापना करे। पुनः कर्णिकाके पूर्वदलपर सूर्यके घोड़ोंको, दक्षिणदलपर अर्यमाको, पश्चिमदलपर मार्तण्डको, उत्तरदलपर रविदेवको और कर्णिकाके मध्यभागमें भास्करको स्थित कर दे। तदनन्तर लाल पुष्प, लाल चन्दन और तिलमिश्रित जलसे उस कमलपर अर्घ्य प्रदान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—'दिवाकर! काल आपका ही स्वरूप है, आप समस्त प्राणियोंके आत्मा और वेदस्वरूप हैं, आपका मुख चारों दिशाओंमें है अर्थात् आप सर्वद्रष्टा हैं तथा अग्नि और इन्द्रके रूपमें आप ही वर्तमान हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर! ऋग्वेदके प्रथम मन्त्र 'अग्निमीले०', यजुर्वेदके 'इषे त्वोर्जे०' तथा सामवेदके प्रथम मन्त्र 'अग्न आयाहि०' के रूपमें आप ही वर्तमान हैं, आपको नमस्कार है। वरदायक! आप ज्योतिःपुञ्जोंके अधीश्वर हैं, आपको प्रणाम है॥ २—१२॥
अर्घ्यं दत्त्वा विसृज्याथ निशि तैलविवर्जितम्।<br>भुञ्जीत वत्सरान्ते तु काञ्चनं कमलोत्तमम्।<br>पुरुषं च यथाशक्त्या कारयेद् द्विभुजं तथा॥ १३<br>सुवर्णशृङ्गीं कपिलां महार्घां<br>रौप्यैः खुरैः कांस्यदोहां सवत्साम्।<br>पूर्णे गुडस्योपरि ताम्रपात्रे<br>निधाय पद्मं पुरुषं च दद्यात्॥ १४इस प्रकार अर्घ्य देकर विसर्जन कर रातमें तैलरहित भोजन करना चाहिये। एक वर्ष पूरा होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे एक उत्तम कमल और एक दो भुजाधारी पुरुषकी मूर्ति बनवाये। फिर गुड़के ऊपर स्थित ताँबेके पूर्णपात्रपर उस कमल और पुरुषको रख दे। उस समय एक सवत्सा कपिला गौ भी प्रस्तुत करे, जो अधिक मूल्यवाली हो, जिसके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा जिसके निकट कांसदोहनी भी रखी हो।

१०१- साठ व्रतोंका विधान और माहात्म्य

३३६* मत्स्यपुराण *

| सम्पूज्य रक्ताम्बरमाल्यधूपै-<br>र्द्विजं च रक्तैरथ हेमशृङ्गैः।<br>संकल्पयित्वा पुरुषं सपद्मं<br>दद्यादनेकव्रतदानकाय ।<br>अव्यङ्गरूपाय जितेन्द्रियाय<br>कुटुम्बिने देयमनुद्धताय ॥ १५<br><br>नमो नमः पापविनाशनाय<br>विश्वात्मने सप्ततुरंगमाय।<br>सामर्ग्यजुर्धामनिधे विधात्रे<br>भवाब्धिपोताय जगत्सवित्रे ॥ १६<br><br>इत्यनेन विधिना समाचरे-<br>दब्दमेकमिह यस्तु मानवः।<br>सोऽधिरोहति विनष्टकल्मषः<br>सूर्यधाम धुतचामरावलिः ॥ १७<br><br>धर्मसंक्षयमवाप्य भूपतिः<br>शोकदुःखभयरोगवर्जितः ।<br>द्वीपसप्तकपतिः पुनः पुन-<br>र्धर्ममूर्तिरमितौजसा युतः ॥ १८<br><br>या च भर्तृगुरुदेवतत्परा<br>वेदमूर्तिदिननक्तमाचरेत् ।<br>सापि लोकममरेशवन्दिता<br>याति नारद रवेर्न संशयः ॥ १९<br><br>यः पठेद्रपि शृणोति मानवः<br>पठ्यमानमथ वानुमोदते।<br>सोऽपि शक्रभुवनस्थितोऽमरैः<br>पूज्यते वसति चाक्षयं दिवि ॥ २० | तत्पश्चात् लाल रंगके स्वर्णनिर्मित सिंघा बाजाके साथ लाल वस्त्र, पुष्पमाला और धूपसे ब्राह्मणकी पूजा करके संकल्पपूर्वक गौ एवं कमलसहित उस पुरुष-मूर्तिको ऐसे ब्राह्मणको दान कर दे, जो अनेकों श्रेष्ठ व्रतोंमें दान लेनेका अधिकारी, सुडौल रूपसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, शान्त-स्वभाव और विशाल कुटुम्बवाला हो। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) 'जो पापके विनाशक, विश्वके आत्मस्वरूप, सात घोड़ोंसे जुते रथपर आरूढ़ होनेवाले, ऋक्, यजुः, साम—तीनों वेदोंके तेजकी निधि, विधाता, भवसागरके लिये नौकास्वरूप और जगत्स्रष्टा हैं, उन सूर्यदेवको बारंबार नमस्कार है।' जो मानव इस लोकमें उपर्युक्त विधिके अनुसार एक वर्षतक इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित होकर सूर्यलोकको चला जाता है। उस समय उसके ऊपर चँवर डुलाये जाते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह इस लोकमें शोक, दुःख, भय और रोगसे रहित होकर बारंबार अमित ओजस्वी एवं धर्मात्मा भूपाल होता है, उस समय सातों द्वीप उसके अधिकारमें रहते हैं। नारदजी! पति, गुरुजन और देवताओंकी शुश्रूषामें तत्पर रहनेवाली जो नारी रविवारको इस नक्तव्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी इन्द्रद्वारा पूजित होकर निस्संदेह सूर्यलोकको चली जाती है। जो मानव इस व्रतको पढ़ता या सुनता है अथवा पढ़नेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी इन्द्रलोकमें स्थित होकर देवताओंद्वारा पूजित होता है और अक्षय कालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है॥ १३—२०॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदित्यवारकल्पो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आदित्यवार-कल्प नामक सत्तानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९७॥


  • अध्याय ९८ * | ३३७ ---|---

अट्ठानबेवाँ अध्याय

संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>अथान्यदपि वक्ष्यामि संक्रान्त्युद्यापने फलम्।<br>यदक्षयं परे लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br><br>अयने विषुवे वापि संक्रान्तिव्रतमाचरेत्।<br>पूर्वेद्युरेकभक्तेन दन्तधावनपूर्वकम्।<br>संक्रान्तिवासरे प्रातस्तिलैः स्नानं विधीयते॥ २<br><br>रविसंक्रमणे भूमौ चन्दनेनाष्टपत्रकम्।<br>पद्मं सकर्णिकं कुर्यात् तस्मिन्नावाहयेद् रविम्॥ ३<br><br>कणिकायां न्यसेत् सूर्यमादित्यं पूर्वतस्ततः।<br>नम उष्णार् चिषे याम्ये नमो ऋङ्मण्डलाय च॥ ४<br><br>नमः सवित्रे नैर्ऋत्ये वारुणे तपनं पुनः।<br>वायव्ये तु भगं न्यस्य पुनः पुनरर्थार्चयेत्॥ ५<br><br>मार्तण्डमुत्तरे विष्णुमीशाने विन्यसेत् सदा।<br>गन्धमाल्यफलैर्भक्ष्यैः स्थण्डिले पूजयेत् ततः॥ ६<br><br>द्विजाय सोदकुम्भं च घृतपात्रं हिरण्मयम्।<br>कमलं च यथाशक्त्या कारयित्वा निवेदयेत्॥ ७<br><br>चन्दनोदकपुष्पैश्च देवायार्घ्यं न्यसेद् भुवि।<br>विश्वाय विश्वरूपाय विश्वधाम्ने स्वयम्भुवे।<br>नमोऽनन्त नमो धात्रे ऋक्सामयजुषाम्पते॥ ८<br><br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>वत्सरान्तेऽथवा कुर्यात् सर्वं द्वादशधा नरः॥ ९नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! अब मैं संक्रान्तिके समय किये जानेवाले उद्यापन-रूप अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो इस लोकमें समस्त कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। सूर्यके उत्तरायण या दक्षिणायनके दिन अथवा विषुवयोगमें इस संक्रान्तिव्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। इस व्रतमें संक्रान्तिके पहले दिन एक बार भोजन करके (रात्रिमें शयन करे।) संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल दाँतुन करनेके पश्चात् तिलमिश्रित जलसे स्नान करनेका विधान है। सूर्य-संक्रान्तिके दिन भूमिपर चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल कमलकी रचना करे और उसपर सूर्यका आवाहन करे। कर्णिकामें 'सूर्याय नमः', पूर्वदलपर 'आदित्याय नमः', अग्निकोणस्थित दलपर 'उष्णार् चिषे नमः', दक्षिणदलपर 'ऋङ्मण्डलाय नमः', नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर 'सवित्रे नमः', पश्चिमदलपर 'तपनाय नमः', वायव्यकोणस्थित दलपर 'भग्याय नमः', उत्तरदलपर 'मार्तण्डाय नमः' और ईशानकोणवाले दलपर 'विष्णवे नमः' से सूर्यदेवको स्थापित कर उनकी बारंबार अर्चना करे। तत्पश्चात् वेदीपर भी चन्दन, पुष्पमाला, फल और खाद्य पदार्थोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमल बनवाकर उसे घृतपूर्ण पात्र और कलशके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पयुक्त जलसे भूमिपर सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करे। (अर्घ्यका मन्त्रार्थ इस प्रकार है—) 'अनन्त! आप ही विश्व हैं, विश्व आपका स्वरूप है, आप विश्वमें सर्वाधिक तेजस्वी, स्वयं उत्पन्न होनेवाले, धाता और ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेदके स्वामी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।' इसी विधिसे मनुष्यको प्रत्येक मासमें सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये अथवा (यदि ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो) वर्षकी समाप्तिके दिन यह सारा कार्य बारह बार करे (दोनोंका फल समान ही है)॥ १—९॥
संवत्सरान्ते घृतपायसेन<br>संतर्प्य वह्निं द्विजपुङ्गवांश्च।<br>कुम्भान् पुनर्द्वादशधेनुयुक्तान्<br>सरत्नहैरण्मयपद्मयुक्तान् ॥ १०एक वर्ष व्यतीत होनेपर घृतमिश्रित खीरसे अग्नि और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भलीभाँति संतुष्ट करे और बारह गौ एवं रत्नसहित स्वर्णमय कमलके साथ कलशोंको दान कर दे।

३३८

  • मत्स्यपुराण * पयस्विनीः शीलवतीश्च दद्या- हैमैः शृङ्गै रौप्यखुरैश्च युक्ताः। गावोऽष्ट वा सप्त सकांश्यदोहा माल्याम्बरा वा चतुरोऽप्यशक्तः। दौर्गत्ययुक्तः कपिलामथैकां निवेदयेद् ब्राह्मणपुङ्गवाय ॥११ हैमीं च दद्यात् पृथिवीं सशेषा- माकार्यरूप्यामथ वा च ताम्रीम्। पेष्टीमशक्तः प्रतिमां विधाय सौवर्णसूर्येण समं प्रदद्यात्। न वित्तशाठ्यं पुरुषोऽत्र कुर्यात् कुर्वन्नधो याति न संशयोऽत्र ॥ १२ यावन्महेन्द्रप्रमुखैर्नगेन्द्रैः पृथ्वी च सप्ताब्धियुतेह तिष्ठेत्। तावत् स गन्धर्वगणैरशेषैः सम्पूज्यते नारद नाकपृष्ठे ॥ १३ ततस्तु कर्मक्षयमाप्य सप्त- द्वीपाधिपः स्यात् कुलशीलयुक्तः। सृष्टेर्मुखेऽव्यङ्गवपुः सभार्यः प्रभूतपुत्रान्वयवन्दिताङ्घ्रिः ॥ १४ इति पठति शृणोति वाथ भक्त्या विधिमखिलं रविसंक्रमस्य पुण्यम्। मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै- रमरपतेर्भवने प्रपूज्यते च ॥ १५ वे गौएँ दूध देनेवाली, सीधी-सादी एवं पुष्प-माला और वस्त्रसे सुसज्जित हों, उनके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा उनके साथ काँसेकी दोहनी भी हो। जो इस प्रकारकी बारह गौओंका दान करनेमें असमर्थ हो, उसके लिये आठ, सात अथवा चार ही गौ दान करनेका विधान है। जो दुर्गतिमें पड़ा हुआ निर्धन हो, वह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक ही कपिला गौका दान कर सकता है। इसी प्रकार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी शेषनागसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनवाकर दान करना चाहिये। जो ऐसा करनेमें असमर्थ हो, वह आटेकी शेषसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनाकर स्वर्णनिर्मित सूर्यके साथ दान कर सकता है। पुरुषको इस दानमें कंजूसी नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसका अधःपतन हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। नारदजी! जबतक इस मृत्युलोकमें महेन्द्र आदि देवगणों, हिमालय आदि पर्वतों और सातों समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीका अस्तित्व है, तबतक स्वर्गलोकमें अखिल गन्धर्वसमूह उस व्रतीकी भलीभाँति पूजा करते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह सृष्टिके आदिमें उत्तम कुल और शीलसे सम्पन्न होकर भूतलपर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। वह सुन्दर रूप और सुन्दरी पत्नीसे युक्त होता है, बहुत-से पुत्र और भाई-बन्धु उसके चरणोंकी वन्दना करते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सूर्य-संक्रान्तिकी इस पुण्यमयी अखिल विधिको भक्तिपूर्वक पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करनेकी सम्मति देता है, वह भी इन्द्रलोकमें देवताओंद्वारा पूजित होता है॥ १०-१५॥ इति श्रीमात्स्ये महापुराणे संक्रान्त्युद्यापनविधिर्नामाष्टनवतिमतोऽध्यायः ॥ ९८ ॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें संक्रान्त्युद्यापनविधि नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥ निन्यानबेवाँ अध्याय विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य नन्दिकेश्वर उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि विष्णोर्व्रतमनुत्तमम्। विभूतिद्वादशीनाम सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ १ नन्दिकेश्वर बोले- नारदजी ! सुनिये, अब मैं भगवान् विष्णुके विभूतिद्वादशी नामक सर्वोत्तम व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो सम्पूर्ण देवगणोंद्वारा अभिवन्दित है।

* अध्याय ९९ * ३३९

| कार्तिके चैत्रवैशाखे मार्गशीर्षे च फाल्गुने।<br>आषाढे वा दशम्यां तु शुक्लायां लघुभुङ्नरः।<br>कृत्वा सायन्तनीं संध्यां गृह्णीयान्नियमं बुधः ॥ २<br>एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।<br>द्वादश्यां द्विजसंयुक्तः करिष्ये भोजनं विभो ॥ ३<br>तदविघ्नेन मे यातु सफलं स्याच्च केशव।<br>नमो नारायणायेति वाच्यं च स्वपता निशि ॥ ४<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>पूजयेत् पुण्डरीकाक्षं शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ५<br>विभूतये नमः पादावशोकय च जानुनी।<br>नमः शिवायेट्यूरू च विश्वमूर्ते नमः कटिम् ॥ ६<br>कंदर्पाय नमो मेढ्रमादित्याय नमः करौ।<br>दामोदरायेत्युदरं वासुदेवाय च स्तनौ ॥ ७<br>माधवायेत्युरो विष्णोः कण्ठमुत्कण्ठिने नमः।<br>श्रीधराय मुखं केशान् केशवायेति नारद ॥ ८<br>पृष्ठं शार्ङ्गधरायेति श्रवणौ वरदाय वै।<br>स्वनाम्ना शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये।<br>शिरः सर्वात्मने ब्रह्मन् नम इत्यभिपूजयेत् ॥ ९<br>मत्स्यमुत्पलसंयुक्तं हैमं कृत्वा तु शक्तितः।<br>उदकुम्भसमायुक्तमग्रतः स्थापयेद् बुधः ॥ १०<br>गुडपात्रं तिलैर्युक्तं सितवस्त्राभिवेष्टितम्।<br>रात्रौ जागरणं कुर्यादितिहासकथादिना ॥ ११ | बुद्धिमान् मनुष्य कार्तिक, चैत्र, वैशाख, मार्गशीर्ष, फाल्गुन अथवा आषाढमासमें शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको स्वल्पाहार कर सायंकालिक संध्योपासनासे निवृत्त होकर इस प्रकारका नियम ग्रहण करे—‘प्रभो! मैं एकादशीको निराहार रहकर भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति अर्चना करूँगा और द्वादशीके दिन ब्राह्मणके साथ बैठकर भोजन करूँगा। केशव! मेरा यह नियम निर्विघ्नतापूर्वक निभ जाय और फलदायक हो।' फिर रातमें 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप करते हुए सो जाय। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि करके पवित्र हो जाय और श्वेत पुष्पोंकी माला एवं चन्दन आदिसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका पूजन करे। (पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—) 'विभूतये नमः' से दोनों चरणोंकी, 'अशोकाय नमः' से जानुओंकी, 'शिवाय नमः' से ऊरुओंकी, 'विश्वमूर्ते नमः' से कटिकी, 'कंदर्पाय नमः' से जननेन्द्रियकी, 'आदित्याय नमः' से हाथोंकी, 'दामोदराय नमः' से उदरकी, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'माधवाय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलकी, 'उत्कण्ठिने नमः' से कण्ठकी, 'श्रीधराय नमः' से मुखकी, 'केशवाय नमः' से केशोंकी, 'शार्ङ्गधराय नमः' से पीठकी, 'वरदाय नमः' से दोनों कानोंकी और 'सर्वात्मने नमः' से सिरकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण देवता नारदजी! तत्पश्चात् 'शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये नमः' कहकर अपने नामका उच्चारण करते हुए चरणोंमें प्रणिपात करे। तदुपरान्त बुद्धिमान् व्रती मूर्तिके अग्रभागमें एक जलपूर्ण कलश स्थापित करे। उसपर तिलसे युक्त गुड़से भरा हुआ पात्र, जो श्वेत वस्त्रसे परिवेष्टित हो, रख दे। उसके ऊपर अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमलसहित मत्स्य बनवाकर स्थापित करे और रात्रिमें इतिहास-पुराण आदिकी कथाओंको सुनते हुए जागरण करे ॥ १—११॥ | | प्रभातायां तु शर्वर्यां ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>सकाञ्चनोत्पलं देवं सोदकुम्भं निवेदयेत् ॥ १२<br>यथा न मुच्यसे देव सदा सर्वविभूतिभिः।<br>तथा मामुद्धराशेषदुःखसंसारकर्दमात् ॥ १३<br>दशावताररूपाणि प्रतिमासं क्रमान्मुने।<br>दत्तात्रेयं तथा व्यासमुत्पलेन समन्वितम्।<br>दद्याद्देवं समा यावत् पाषण्डानभिवर्जयेत् ॥ १४ | रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल स्वर्णमय कमल और कलशके साथ वह देव-मूर्ति कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर देनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'देव! जिस प्रकार आप सदा सम्पूर्ण विभूतियोंसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार इस निखिल कष्टोंसे परिपूर्ण संसाररूपी कीचड़से मेरा उद्धार कीजिये।' मुने! इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास क्रमशः भगवान्के दस अवतारों तथा दत्तात्रेय और व्यासकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्वर्णनिर्मित कमलके साथ दान करनी चाहिये। उस समय छल, कपट, पाखण्ड आदिसे दूर रहना चाहिये। |

३४० * मत्स्यपुराण *


| समाप्यैवं यथाशक्त्या द्वादश द्वादशीः पुनः।<br>संवत्सरान्ते लवणपर्वतेन समन्वितम्।<br>शय्यां दद्यान्मुनिश्रेष्ठ गुरवे धेनुसंयुताम्॥ १५<br><br>ग्रामं च शक्तिमान् दद्यात् क्षेत्रं वा भवनान्वितम्।<br>गुरुं सम्पूज्य विधिवद् वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १६<br><br>अन्यान्पि यथाशक्त्या भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेद् वस्त्रगोदानै रत्नौघधनसंचयैः।<br>अल्पवित्तो यथाशक्त्या स्तोकं स्तोकं समाचरेत्॥ १७<br><br>यश्चाप्यतीव निःस्वः स्याद् भक्तिमान्माधवं प्रति।<br>पुष्पार्चनविधानेन स कुर्याद् वत्सरद्वयम्॥ १८<br><br>अनेन विधिना यस्तु विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>कुर्यात् पापविनिर्मुक्तः पितॄणां तारयेच्छतम्॥ १९<br><br>जन्मनां शतसाहस्रं न शोकफलभाग् भवेत्।<br>न च व्याधिर्भवेत् तस्य न दारिद्र्यं न बन्धनम्।<br>वैष्णवो वाथ शैवो वा भजेज्जन्मनि जन्मनि॥ २०<br><br>यावद् युगसहस्राणां शतमष्टोत्तरं भवेत्।<br>तावत् स्वर्गे वसेद् ब्रह्मन् भूपतिश्च पुनर्हवेत्॥ २१ | मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार यथाशक्ति बारह द्वादशी-व्रतोंको समाप्त कर वर्षके अन्तमें गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या दान करनी चाहिये। व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ खेतका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करनेका विधान है। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुकूल थोड़ा-थोड़ा ही दान कर सकता है तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे दो वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। ब्रह्मन्! जबतक एक सौ आठ सहस्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है॥ १२—२१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विष्णुव्रतं नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-सम्बन्धी विष्णु-व्रत नामक निन्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९९॥


सौवाँ अध्याय

विभूतिद्वादशी* के प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त

| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>पुरा रथन्तरे कल्पे राजाऽऽसीत् पुष्पवाहनः।<br>नाम्ना लोकेषु विख्यातस्तेजसा सूर्यसंनिभः॥ १<br><br>तपसा तस्य तुष्टेन चतुर्वक्त्रेण नारद।<br>कमलं काञ्चनं दत्तं यथाकामगमं मुने॥ २ | नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! बहुत पहले रथन्तरकल्पमें पुष्पवाहन नामका एक राजा हुआ था जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात तथा तेजमें सूर्यके समान था। मुने! उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे एक सोनेका कमल (रूप विमान) प्रदान किया था, जो इच्छानुसार जहाँ-कहीं भी आ-जा सकता था। |


* इस व्रतका वर्णन पद्म० सृष्टि० २०१।—४२, भविष्योत्तर, व्रतरत्न, व्रतराज, व्रतकल्पद्रुम आदिमें भी यों ही प्राप्त होता है। पाद्मीय कथामें तीर्थगुरु पुष्करक्षेत्रका भी सम्बन्ध प्रदृष्ट है।

* अध्याय १०० *३४१

| लोकैः समस्तैर्नगरवासिभिः सहितो नृपः।<br>द्वीपानि सुरलोकं च यथेष्टं व्यचरत् तदा॥ ३<br>कल्पादौ सप्तमं द्वीपं तस्य पुष्करवासिनः।<br>लोकेन पूजितं यस्मात् पुष्करद्वीपमुच्यते॥ ४<br>देवेन ब्रह्मणा दत्तं यानमस्य यतोऽम्बुजम्।<br>पुष्पवाहनमित्याहुस्तस्मात् तं देवदानवाः॥ ५<br>नागम्यमस्यास्ति जगतत्रयेऽपि<br>ब्रह्माम्बुजस्थस्य तपोऽनुभावात्।<br>पत्नी च तस्याप्रतिमा मुनीन्द्र<br>नारीसहस्रैरभितोऽभिनन्द्या।<br>नाम्ना च लावण्यवती बभूव<br>सा पार्वतीवेष्टतमा भवस्य॥ ६<br>तस्यात्मजानामयुतं बभूव<br>धर्मात्मनामग्र्यधनुर्धराणाम्।<br>तदात्मनः सर्वमवेक्ष्य राजा<br>मुहुर्मुहुर्विस्मयमाससाद।<br>सोऽभ्यागतं वीक्ष्य मुनिप्रवीरं<br>प्राचेतसं वाक्यमिदं बभाषे॥ ७ | उसे पाकर उस समय राजा पुष्पवाहन अपने नगर एवं जनपदवासियोंके साथ उसपर आरूढ़ होकर स्वेच्छानुसार देवलोकों तथा सातों द्वीपोंमें विचरण किया करता था। कल्पके आदिमें पुष्करनिवासी उस पुष्पवाहनका सातवें द्वीपपर अधिकार था, इसीलिये लोकमें उसकी प्रतिष्ठा थी और आगे चलकर वह द्वीप पुष्करद्वीप नामसे कहा जाने लगा। चूँकि देवेश्वर ब्रह्माने इसे कमलरूप विमान प्रदान किया था, इसलिये देवता एवं दानव उसे पुष्पवाहन कहा करते थे। तपस्याके प्रभावसे ब्रह्माद्वारा प्रदत्त कमलरूप विमानपर आरूढ़ होनेपर उसके लिये त्रिलोकीमें भी कोई स्थान अगम्य न था। मुनीन्द्र! उसकी पत्नीका नाम लावण्यवती था। वह अनुपम सुन्दरी थी तथा हजारों नारियोंद्वारा चारों ओरसे समादृत होती रहती थी। वह राजाको उसी प्रकार अत्यन्त प्यारी थी, जैसे शंकरजीको पार्वती परम प्रिय हैं। उसके दस हजार पुत्र थे, जो परम धार्मिक और धनुर्धारियोंमें अग्रगण्य थे। अपनी इन सारी विभूतियोंपर बारम्बार विचारकर राजा पुष्पवाहन विस्मयविमुग्ध हो जाता था। एक बार (प्रचेताके पुत्र) मुनिवर वाल्मीकि* राजाके यहाँ पधारे। उन्हें आया देख राजाने उनसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–७॥ | | राजोवाच<br>कस्माद् विभूतिरमलामरमर्त्यपूज्या<br>जाता च सर्वविजितामरसुन्दरीणाम्।<br>भार्या ममाल्पतपसा परितोषितेन<br>दत्तं ममाम्बुजगृहं च मुनीन्द्र धात्रा॥ ८<br>यस्मिन् प्रविष्टमपि कोटिशतं नृपाणां<br>सामात्यकुञ्जररथौघजनावृतानाम्।<br>नो लभ्यते क्व गतमम्बरगामिभिश्च<br>तारागणेन्दुरविरश्मिभिरप्यगम्यम्॥ ९<br>तस्मात् किमन्यजननीजठरोद्भवैन<br>धर्मादिकं कृतमशेषफलासिहेतुः।<br>भगवन् मयाथ तनयैरथवान्यापि<br>भद्रं यदेतदखिलं कथय प्रचेतः॥ १० | राजाने पूछा— मुनीन्द्र! किस कारणसे मुझे यह देवों तथा मानवोंद्वारा पूजनीय निर्मल विभूति तथा अपने सौन्दर्यसे समस्त देवाङ्गनाओंको पराजित कर देनेवाली सुन्दरी भार्या प्राप्त हुई है? मेरे थोड़े-से तपसे संतुष्ट होकर ब्रह्माने मुझे ऐसा कमल-गृह क्यों प्रदान किया, जिसमें अमात्य, हाथी, रथसमूह और जनपदवासियोंसहित यदि सौ करोड़ राजा बैठ जायँ तो वे जान नहीं पड़ते कि कहाँ चले गये। वह विमान भी आकाशगामी देवताओंद्वारा केवल चमकीले ताराओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति दीख पड़ता है। इसलिये इस सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये अन्य माताके उदरसे उत्पन्न होकर अर्थात् पूर्वजन्ममें मैंने अथवा मेरे पुत्रोंने या मेरी इस पत्नीने कौन-सा ऐसा शुभ धर्म आदि कार्य किया है? प्रचेतः! यह सारा-का-सारा विषय मुझे बतलाइये॥ ८–१०॥ |


* वाल्मीकिरामायण, उत्तरकाण्ड ९३। १७, ९६। १९ तथा अध्यात्मरामायण ७। ७। ३१, बालरामायण, उत्तर-रामचरित आदिके अनुसार 'प्राचेतस' शब्द महर्षि वाल्मीकिका ही वाचक है।