मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| सम्पूज्य रक्ताम्बरमाल्यधूपै-<br>र्द्विजं च रक्तैरथ हेमशृङ्गैः।<br>संकल्पयित्वा पुरुषं सपद्मं<br>दद्यादनेकव्रतदानकाय ।<br>अव्यङ्गरूपाय जितेन्द्रियाय<br>कुटुम्बिने देयमनुद्धताय ॥ १५<br><br>नमो नमः पापविनाशनाय<br>विश्वात्मने सप्ततुरंगमाय।<br>सामर्ग्यजुर्धामनिधे विधात्रे<br>भवाब्धिपोताय जगत्सवित्रे ॥ १६<br><br>इत्यनेन विधिना समाचरे-<br>दब्दमेकमिह यस्तु मानवः।<br>सोऽधिरोहति विनष्टकल्मषः<br>सूर्यधाम धुतचामरावलिः ॥ १७<br><br>धर्मसंक्षयमवाप्य भूपतिः<br>शोकदुःखभयरोगवर्जितः ।<br>द्वीपसप्तकपतिः पुनः पुन-<br>र्धर्ममूर्तिरमितौजसा युतः ॥ १८<br><br>या च भर्तृगुरुदेवतत्परा<br>वेदमूर्तिदिननक्तमाचरेत् ।<br>सापि लोकममरेशवन्दिता<br>याति नारद रवेर्न संशयः ॥ १९<br><br>यः पठेद्रपि शृणोति मानवः<br>पठ्यमानमथ वानुमोदते।<br>सोऽपि शक्रभुवनस्थितोऽमरैः<br>पूज्यते वसति चाक्षयं दिवि ॥ २० | तत्पश्चात् लाल रंगके स्वर्णनिर्मित सिंघा बाजाके साथ लाल वस्त्र, पुष्पमाला और धूपसे ब्राह्मणकी पूजा करके संकल्पपूर्वक गौ एवं कमलसहित उस पुरुष-मूर्तिको ऐसे ब्राह्मणको दान कर दे, जो अनेकों श्रेष्ठ व्रतोंमें दान लेनेका अधिकारी, सुडौल रूपसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, शान्त-स्वभाव और विशाल कुटुम्बवाला हो। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) 'जो पापके विनाशक, विश्वके आत्मस्वरूप, सात घोड़ोंसे जुते रथपर आरूढ़ होनेवाले, ऋक्, यजुः, साम—तीनों वेदोंके तेजकी निधि, विधाता, भवसागरके लिये नौकास्वरूप और जगत्स्रष्टा हैं, उन सूर्यदेवको बारंबार नमस्कार है।' जो मानव इस लोकमें उपर्युक्त विधिके अनुसार एक वर्षतक इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित होकर सूर्यलोकको चला जाता है। उस समय उसके ऊपर चँवर डुलाये जाते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह इस लोकमें शोक, दुःख, भय और रोगसे रहित होकर बारंबार अमित ओजस्वी एवं धर्मात्मा भूपाल होता है, उस समय सातों द्वीप उसके अधिकारमें रहते हैं। नारदजी! पति, गुरुजन और देवताओंकी शुश्रूषामें तत्पर रहनेवाली जो नारी रविवारको इस नक्तव्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी इन्द्रद्वारा पूजित होकर निस्संदेह सूर्यलोकको चली जाती है। जो मानव इस व्रतको पढ़ता या सुनता है अथवा पढ़नेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी इन्द्रलोकमें स्थित होकर देवताओंद्वारा पूजित होता है और अक्षय कालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है॥ १३—२०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदित्यवारकल्पो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आदित्यवार-कल्प नामक सत्तानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९७॥