मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ९७ * | ३३५ |
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| नन्दिकेश्वर उवाच | नन्दिकेश्वर बोले— |
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| यत् तद् विश्वात्मनो धाम परं ब्रह्म सनातनम्।<br>सूर्याग्निचन्द्ररूपेण तत् त्रिधा जगति स्थितम्॥ २<br>तदाराध्य पुमान् विप्र प्राप्नोति कुशलं सदा।<br>तस्मादादित्यवारेण सदा नक्ताशनो भवेत्॥ ३<br>यदा हस्तेन संयुक्तमादित्यस्य च वासरम्।<br>तदा शनिदिने कुर्यादेकभक्तं विमत्सरः॥ ४<br>नक्तमादित्यवारेण भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>पत्रैर्द्वादशसंयुक्तं रक्तचन्दनपङ्कजम्॥ ५<br>विलिख्य विन्यसेत् सूर्यं नमस्कारेण पूर्वतः।<br>दिवाकरं तथाग्नेये विवस्वन्तमतः परम्॥ ६<br>भगं तु नैर्ऋते देवं वरुणं पश्चिमे दले।<br>महेन्द्रमनिले तद्वदादित्यं च तथोत्तरे॥ ७<br>शान्तमीशानभागे तु नमस्कारेण विन्यसेत्।<br>कर्णिकापूर्वपत्रे तु सूर्यस्य तुरगान् न्यसेत्॥ ८<br>दक्षिणेऽर्यमनामानं मार्तण्डं पश्चिमे दले।<br>उत्तरे तु रविं देवं कर्णिकायां च भास्करम्॥ ९<br>रक्तपुष्पोदकेनार्घ्यं सतिलारुणचन्दनम्।<br>तस्मिन् पद्मे ततो दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ १०<br>कालात्मा सर्वभूतात्मा वेदात्मा विश्वतोमुखः।<br>यस्मादग्नीन्द्ररूपस्त्वमतः पाहि दिवाकर॥ ११<br>अग्निमीले नमस्तुभ्यमिषे त्वोर्जे च भास्कर।<br>अग्न आयाहि वरद नमस्ते ज्योतिषाम्पते॥ १२ | नारदजी! विश्वात्मा भगवान्का जो परब्रह्मस्वरूप सनातन तेज है, वह जगत्में सूर्य, अग्नि और चन्द्ररूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर स्थित है। विप्रवर! उनकी आराधना करके मनुष्य सदा कुशलताका भागी हो जाता है। इसलिये रविवारको रात्रिमें एक बार भोजन करना चाहिये। जब रविवार हस्त नक्षत्रसे युक्त हो तो शनिवारको मत्सररहित हो एक ही बार भोजन करना चाहिये। रविवारको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर नक्तभोजन (रात्रिमें एक बार भोजन करने)-का विधान है। तदनन्तर लाल चन्दनसे द्वादश दलोंसे युक्त कमलकी रचना कर उसके पूर्वदलपर सूर्यकी, अग्निकोणवाले दलपर दिवाकरकी, दक्षिणदलपर विवस्वान्की, नैर्ऋत्यकोणस्थित दलपर भगकी, पश्चिमदलपर वरुणदेवकी, वायव्यकोणवाले दलपर महेन्द्रकी, उत्तरदलपर आदित्यकी और ईशानकोणस्थित दलपर शान्तकी नमस्कारपूर्वक स्थापना करे। पुनः कर्णिकाके पूर्वदलपर सूर्यके घोड़ोंको, दक्षिणदलपर अर्यमाको, पश्चिमदलपर मार्तण्डको, उत्तरदलपर रविदेवको और कर्णिकाके मध्यभागमें भास्करको स्थित कर दे। तदनन्तर लाल पुष्प, लाल चन्दन और तिलमिश्रित जलसे उस कमलपर अर्घ्य प्रदान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—'दिवाकर! काल आपका ही स्वरूप है, आप समस्त प्राणियोंके आत्मा और वेदस्वरूप हैं, आपका मुख चारों दिशाओंमें है अर्थात् आप सर्वद्रष्टा हैं तथा अग्नि और इन्द्रके रूपमें आप ही वर्तमान हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर! ऋग्वेदके प्रथम मन्त्र 'अग्निमीले०', यजुर्वेदके 'इषे त्वोर्जे०' तथा सामवेदके प्रथम मन्त्र 'अग्न आयाहि०' के रूपमें आप ही वर्तमान हैं, आपको नमस्कार है। वरदायक! आप ज्योतिःपुञ्जोंके अधीश्वर हैं, आपको प्रणाम है॥ २—१२॥ |
| अर्घ्यं दत्त्वा विसृज्याथ निशि तैलविवर्जितम्।<br>भुञ्जीत वत्सरान्ते तु काञ्चनं कमलोत्तमम्।<br>पुरुषं च यथाशक्त्या कारयेद् द्विभुजं तथा॥ १३<br>सुवर्णशृङ्गीं कपिलां महार्घां<br>रौप्यैः खुरैः कांस्यदोहां सवत्साम्।<br>पूर्णे गुडस्योपरि ताम्रपात्रे<br>निधाय पद्मं पुरुषं च दद्यात्॥ १४ | इस प्रकार अर्घ्य देकर विसर्जन कर रातमें तैलरहित भोजन करना चाहिये। एक वर्ष पूरा होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे एक उत्तम कमल और एक दो भुजाधारी पुरुषकी मूर्ति बनवाये। फिर गुड़के ऊपर स्थित ताँबेके पूर्णपात्रपर उस कमल और पुरुषको रख दे। उस समय एक सवत्सा कपिला गौ भी प्रस्तुत करे, जो अधिक मूल्यवाली हो, जिसके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा जिसके निकट कांसदोहनी भी रखी हो। |