मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय ९७ * | ३३५ |
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| नन्दिकेश्वर उवाच | नन्दिकेश्वर बोले— |
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| यत् तद् विश्वात्मनो धाम परं ब्रह्म सनातनम्।<br>सूर्याग्निचन्द्ररूपेण तत् त्रिधा जगति स्थितम्॥ २<br>तदाराध्य पुमान् विप्र प्राप्नोति कुशलं सदा।<br>तस्मादादित्यवारेण सदा नक्ताशनो भवेत्॥ ३<br>यदा हस्तेन संयुक्तमादित्यस्य च वासरम्।<br>तदा शनिदिने कुर्यादेकभक्तं विमत्सरः॥ ४<br>नक्तमादित्यवारेण भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>पत्रैर्द्वादशसंयुक्तं रक्तचन्दनपङ्कजम्॥ ५<br>विलिख्य विन्यसेत् सूर्यं नमस्कारेण पूर्वतः।<br>दिवाकरं तथाग्नेये विवस्वन्तमतः परम्॥ ६<br>भगं तु नैर्ऋते देवं वरुणं पश्चिमे दले।<br>महेन्द्रमनिले तद्वदादित्यं च तथोत्तरे॥ ७<br>शान्तमीशानभागे तु नमस्कारेण विन्यसेत्।<br>कर्णिकापूर्वपत्रे तु सूर्यस्य तुरगान् न्यसेत्॥ ८<br>दक्षिणेऽर्यमनामानं मार्तण्डं पश्चिमे दले।<br>उत्तरे तु रविं देवं कर्णिकायां च भास्करम्॥ ९<br>रक्तपुष्पोदकेनार्घ्यं सतिलारुणचन्दनम्।<br>तस्मिन् पद्मे ततो दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ १०<br>कालात्मा सर्वभूतात्मा वेदात्मा विश्वतोमुखः।<br>यस्मादग्नीन्द्ररूपस्त्वमतः पाहि दिवाकर॥ ११<br>अग्निमीले नमस्तुभ्यमिषे त्वोर्जे च भास्कर।<br>अग्न आयाहि वरद नमस्ते ज्योतिषाम्पते॥ १२ | नारदजी! विश्वात्मा भगवान्का जो परब्रह्मस्वरूप सनातन तेज है, वह जगत्में सूर्य, अग्नि और चन्द्ररूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर स्थित है। विप्रवर! उनकी आराधना करके मनुष्य सदा कुशलताका भागी हो जाता है। इसलिये रविवारको रात्रिमें एक बार भोजन करना चाहिये। जब रविवार हस्त नक्षत्रसे युक्त हो तो शनिवारको मत्सररहित हो एक ही बार भोजन करना चाहिये। रविवारको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर नक्तभोजन (रात्रिमें एक बार भोजन करने)-का विधान है। तदनन्तर लाल चन्दनसे द्वादश दलोंसे युक्त कमलकी रचना कर उसके पूर्वदलपर सूर्यकी, अग्निकोणवाले दलपर दिवाकरकी, दक्षिणदलपर विवस्वान्की, नैर्ऋत्यकोणस्थित दलपर भगकी, पश्चिमदलपर वरुणदेवकी, वायव्यकोणवाले दलपर महेन्द्रकी, उत्तरदलपर आदित्यकी और ईशानकोणस्थित दलपर शान्तकी नमस्कारपूर्वक स्थापना करे। पुनः कर्णिकाके पूर्वदलपर सूर्यके घोड़ोंको, दक्षिणदलपर अर्यमाको, पश्चिमदलपर मार्तण्डको, उत्तरदलपर रविदेवको और कर्णिकाके मध्यभागमें भास्करको स्थित कर दे। तदनन्तर लाल पुष्प, लाल चन्दन और तिलमिश्रित जलसे उस कमलपर अर्घ्य प्रदान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—'दिवाकर! काल आपका ही स्वरूप है, आप समस्त प्राणियोंके आत्मा और वेदस्वरूप हैं, आपका मुख चारों दिशाओंमें है अर्थात् आप सर्वद्रष्टा हैं तथा अग्नि और इन्द्रके रूपमें आप ही वर्तमान हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर! ऋग्वेदके प्रथम मन्त्र 'अग्निमीले०', यजुर्वेदके 'इषे त्वोर्जे०' तथा सामवेदके प्रथम मन्त्र 'अग्न आयाहि०' के रूपमें आप ही वर्तमान हैं, आपको नमस्कार है। वरदायक! आप ज्योतिःपुञ्जोंके अधीश्वर हैं, आपको प्रणाम है॥ २—१२॥ |
| अर्घ्यं दत्त्वा विसृज्याथ निशि तैलविवर्जितम्।<br>भुञ्जीत वत्सरान्ते तु काञ्चनं कमलोत्तमम्।<br>पुरुषं च यथाशक्त्या कारयेद् द्विभुजं तथा॥ १३<br>सुवर्णशृङ्गीं कपिलां महार्घां<br>रौप्यैः खुरैः कांस्यदोहां सवत्साम्।<br>पूर्णे गुडस्योपरि ताम्रपात्रे<br>निधाय पद्मं पुरुषं च दद्यात्॥ १४ | इस प्रकार अर्घ्य देकर विसर्जन कर रातमें तैलरहित भोजन करना चाहिये। एक वर्ष पूरा होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे एक उत्तम कमल और एक दो भुजाधारी पुरुषकी मूर्ति बनवाये। फिर गुड़के ऊपर स्थित ताँबेके पूर्णपात्रपर उस कमल और पुरुषको रख दे। उस समय एक सवत्सा कपिला गौ भी प्रस्तुत करे, जो अधिक मूल्यवाली हो, जिसके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा जिसके निकट कांसदोहनी भी रखी हो। |
१०१- साठ व्रतोंका विधान और माहात्म्य
| ३३६ | * मत्स्यपुराण * |
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| सम्पूज्य रक्ताम्बरमाल्यधूपै-<br>र्द्विजं च रक्तैरथ हेमशृङ्गैः।<br>संकल्पयित्वा पुरुषं सपद्मं<br>दद्यादनेकव्रतदानकाय ।<br>अव्यङ्गरूपाय जितेन्द्रियाय<br>कुटुम्बिने देयमनुद्धताय ॥ १५<br><br>नमो नमः पापविनाशनाय<br>विश्वात्मने सप्ततुरंगमाय।<br>सामर्ग्यजुर्धामनिधे विधात्रे<br>भवाब्धिपोताय जगत्सवित्रे ॥ १६<br><br>इत्यनेन विधिना समाचरे-<br>दब्दमेकमिह यस्तु मानवः।<br>सोऽधिरोहति विनष्टकल्मषः<br>सूर्यधाम धुतचामरावलिः ॥ १७<br><br>धर्मसंक्षयमवाप्य भूपतिः<br>शोकदुःखभयरोगवर्जितः ।<br>द्वीपसप्तकपतिः पुनः पुन-<br>र्धर्ममूर्तिरमितौजसा युतः ॥ १८<br><br>या च भर्तृगुरुदेवतत्परा<br>वेदमूर्तिदिननक्तमाचरेत् ।<br>सापि लोकममरेशवन्दिता<br>याति नारद रवेर्न संशयः ॥ १९<br><br>यः पठेद्रपि शृणोति मानवः<br>पठ्यमानमथ वानुमोदते।<br>सोऽपि शक्रभुवनस्थितोऽमरैः<br>पूज्यते वसति चाक्षयं दिवि ॥ २० | तत्पश्चात् लाल रंगके स्वर्णनिर्मित सिंघा बाजाके साथ लाल वस्त्र, पुष्पमाला और धूपसे ब्राह्मणकी पूजा करके संकल्पपूर्वक गौ एवं कमलसहित उस पुरुष-मूर्तिको ऐसे ब्राह्मणको दान कर दे, जो अनेकों श्रेष्ठ व्रतोंमें दान लेनेका अधिकारी, सुडौल रूपसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, शान्त-स्वभाव और विशाल कुटुम्बवाला हो। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) 'जो पापके विनाशक, विश्वके आत्मस्वरूप, सात घोड़ोंसे जुते रथपर आरूढ़ होनेवाले, ऋक्, यजुः, साम—तीनों वेदोंके तेजकी निधि, विधाता, भवसागरके लिये नौकास्वरूप और जगत्स्रष्टा हैं, उन सूर्यदेवको बारंबार नमस्कार है।' जो मानव इस लोकमें उपर्युक्त विधिके अनुसार एक वर्षतक इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित होकर सूर्यलोकको चला जाता है। उस समय उसके ऊपर चँवर डुलाये जाते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह इस लोकमें शोक, दुःख, भय और रोगसे रहित होकर बारंबार अमित ओजस्वी एवं धर्मात्मा भूपाल होता है, उस समय सातों द्वीप उसके अधिकारमें रहते हैं। नारदजी! पति, गुरुजन और देवताओंकी शुश्रूषामें तत्पर रहनेवाली जो नारी रविवारको इस नक्तव्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी इन्द्रद्वारा पूजित होकर निस्संदेह सूर्यलोकको चली जाती है। जो मानव इस व्रतको पढ़ता या सुनता है अथवा पढ़नेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी इन्द्रलोकमें स्थित होकर देवताओंद्वारा पूजित होता है और अक्षय कालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है॥ १३—२०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदित्यवारकल्पो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आदित्यवार-कल्प नामक सत्तानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९७॥
- अध्याय ९८ * | ३३७ ---|---
अट्ठानबेवाँ अध्याय
संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>अथान्यदपि वक्ष्यामि संक्रान्त्युद्यापने फलम्।<br>यदक्षयं परे लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br><br>अयने विषुवे वापि संक्रान्तिव्रतमाचरेत्।<br>पूर्वेद्युरेकभक्तेन दन्तधावनपूर्वकम्।<br>संक्रान्तिवासरे प्रातस्तिलैः स्नानं विधीयते॥ २<br><br>रविसंक्रमणे भूमौ चन्दनेनाष्टपत्रकम्।<br>पद्मं सकर्णिकं कुर्यात् तस्मिन्नावाहयेद् रविम्॥ ३<br><br>कणिकायां न्यसेत् सूर्यमादित्यं पूर्वतस्ततः।<br>नम उष्णार् चिषे याम्ये नमो ऋङ्मण्डलाय च॥ ४<br><br>नमः सवित्रे नैर्ऋत्ये वारुणे तपनं पुनः।<br>वायव्ये तु भगं न्यस्य पुनः पुनरर्थार्चयेत्॥ ५<br><br>मार्तण्डमुत्तरे विष्णुमीशाने विन्यसेत् सदा।<br>गन्धमाल्यफलैर्भक्ष्यैः स्थण्डिले पूजयेत् ततः॥ ६<br><br>द्विजाय सोदकुम्भं च घृतपात्रं हिरण्मयम्।<br>कमलं च यथाशक्त्या कारयित्वा निवेदयेत्॥ ७<br><br>चन्दनोदकपुष्पैश्च देवायार्घ्यं न्यसेद् भुवि।<br>विश्वाय विश्वरूपाय विश्वधाम्ने स्वयम्भुवे।<br>नमोऽनन्त नमो धात्रे ऋक्सामयजुषाम्पते॥ ८<br><br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>वत्सरान्तेऽथवा कुर्यात् सर्वं द्वादशधा नरः॥ ९ | नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! अब मैं संक्रान्तिके समय किये जानेवाले उद्यापन-रूप अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो इस लोकमें समस्त कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। सूर्यके उत्तरायण या दक्षिणायनके दिन अथवा विषुवयोगमें इस संक्रान्तिव्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। इस व्रतमें संक्रान्तिके पहले दिन एक बार भोजन करके (रात्रिमें शयन करे।) संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल दाँतुन करनेके पश्चात् तिलमिश्रित जलसे स्नान करनेका विधान है। सूर्य-संक्रान्तिके दिन भूमिपर चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल कमलकी रचना करे और उसपर सूर्यका आवाहन करे। कर्णिकामें 'सूर्याय नमः', पूर्वदलपर 'आदित्याय नमः', अग्निकोणस्थित दलपर 'उष्णार् चिषे नमः', दक्षिणदलपर 'ऋङ्मण्डलाय नमः', नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर 'सवित्रे नमः', पश्चिमदलपर 'तपनाय नमः', वायव्यकोणस्थित दलपर 'भग्याय नमः', उत्तरदलपर 'मार्तण्डाय नमः' और ईशानकोणवाले दलपर 'विष्णवे नमः' से सूर्यदेवको स्थापित कर उनकी बारंबार अर्चना करे। तत्पश्चात् वेदीपर भी चन्दन, पुष्पमाला, फल और खाद्य पदार्थोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमल बनवाकर उसे घृतपूर्ण पात्र और कलशके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पयुक्त जलसे भूमिपर सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करे। (अर्घ्यका मन्त्रार्थ इस प्रकार है—) 'अनन्त! आप ही विश्व हैं, विश्व आपका स्वरूप है, आप विश्वमें सर्वाधिक तेजस्वी, स्वयं उत्पन्न होनेवाले, धाता और ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेदके स्वामी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।' इसी विधिसे मनुष्यको प्रत्येक मासमें सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये अथवा (यदि ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो) वर्षकी समाप्तिके दिन यह सारा कार्य बारह बार करे (दोनोंका फल समान ही है)॥ १—९॥ |
| संवत्सरान्ते घृतपायसेन<br>संतर्प्य वह्निं द्विजपुङ्गवांश्च।<br>कुम्भान् पुनर्द्वादशधेनुयुक्तान्<br>सरत्नहैरण्मयपद्मयुक्तान् ॥ १० | एक वर्ष व्यतीत होनेपर घृतमिश्रित खीरसे अग्नि और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भलीभाँति संतुष्ट करे और बारह गौ एवं रत्नसहित स्वर्णमय कमलके साथ कलशोंको दान कर दे। |
३३८
- मत्स्यपुराण * पयस्विनीः शीलवतीश्च दद्या- हैमैः शृङ्गै रौप्यखुरैश्च युक्ताः। गावोऽष्ट वा सप्त सकांश्यदोहा माल्याम्बरा वा चतुरोऽप्यशक्तः। दौर्गत्ययुक्तः कपिलामथैकां निवेदयेद् ब्राह्मणपुङ्गवाय ॥११ हैमीं च दद्यात् पृथिवीं सशेषा- माकार्यरूप्यामथ वा च ताम्रीम्। पेष्टीमशक्तः प्रतिमां विधाय सौवर्णसूर्येण समं प्रदद्यात्। न वित्तशाठ्यं पुरुषोऽत्र कुर्यात् कुर्वन्नधो याति न संशयोऽत्र ॥ १२ यावन्महेन्द्रप्रमुखैर्नगेन्द्रैः पृथ्वी च सप्ताब्धियुतेह तिष्ठेत्। तावत् स गन्धर्वगणैरशेषैः सम्पूज्यते नारद नाकपृष्ठे ॥ १३ ततस्तु कर्मक्षयमाप्य सप्त- द्वीपाधिपः स्यात् कुलशीलयुक्तः। सृष्टेर्मुखेऽव्यङ्गवपुः सभार्यः प्रभूतपुत्रान्वयवन्दिताङ्घ्रिः ॥ १४ इति पठति शृणोति वाथ भक्त्या विधिमखिलं रविसंक्रमस्य पुण्यम्। मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै- रमरपतेर्भवने प्रपूज्यते च ॥ १५ वे गौएँ दूध देनेवाली, सीधी-सादी एवं पुष्प-माला और वस्त्रसे सुसज्जित हों, उनके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा उनके साथ काँसेकी दोहनी भी हो। जो इस प्रकारकी बारह गौओंका दान करनेमें असमर्थ हो, उसके लिये आठ, सात अथवा चार ही गौ दान करनेका विधान है। जो दुर्गतिमें पड़ा हुआ निर्धन हो, वह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक ही कपिला गौका दान कर सकता है। इसी प्रकार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी शेषनागसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनवाकर दान करना चाहिये। जो ऐसा करनेमें असमर्थ हो, वह आटेकी शेषसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनाकर स्वर्णनिर्मित सूर्यके साथ दान कर सकता है। पुरुषको इस दानमें कंजूसी नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसका अधःपतन हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। नारदजी! जबतक इस मृत्युलोकमें महेन्द्र आदि देवगणों, हिमालय आदि पर्वतों और सातों समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीका अस्तित्व है, तबतक स्वर्गलोकमें अखिल गन्धर्वसमूह उस व्रतीकी भलीभाँति पूजा करते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह सृष्टिके आदिमें उत्तम कुल और शीलसे सम्पन्न होकर भूतलपर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। वह सुन्दर रूप और सुन्दरी पत्नीसे युक्त होता है, बहुत-से पुत्र और भाई-बन्धु उसके चरणोंकी वन्दना करते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सूर्य-संक्रान्तिकी इस पुण्यमयी अखिल विधिको भक्तिपूर्वक पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करनेकी सम्मति देता है, वह भी इन्द्रलोकमें देवताओंद्वारा पूजित होता है॥ १०-१५॥ इति श्रीमात्स्ये महापुराणे संक्रान्त्युद्यापनविधिर्नामाष्टनवतिमतोऽध्यायः ॥ ९८ ॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें संक्रान्त्युद्यापनविधि नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥ निन्यानबेवाँ अध्याय विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य नन्दिकेश्वर उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि विष्णोर्व्रतमनुत्तमम्। विभूतिद्वादशीनाम सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ १ नन्दिकेश्वर बोले- नारदजी ! सुनिये, अब मैं भगवान् विष्णुके विभूतिद्वादशी नामक सर्वोत्तम व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो सम्पूर्ण देवगणोंद्वारा अभिवन्दित है।
* अध्याय ९९ * ३३९
| कार्तिके चैत्रवैशाखे मार्गशीर्षे च फाल्गुने।<br>आषाढे वा दशम्यां तु शुक्लायां लघुभुङ्नरः।<br>कृत्वा सायन्तनीं संध्यां गृह्णीयान्नियमं बुधः ॥ २<br>एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।<br>द्वादश्यां द्विजसंयुक्तः करिष्ये भोजनं विभो ॥ ३<br>तदविघ्नेन मे यातु सफलं स्याच्च केशव।<br>नमो नारायणायेति वाच्यं च स्वपता निशि ॥ ४<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>पूजयेत् पुण्डरीकाक्षं शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ५<br>विभूतये नमः पादावशोकय च जानुनी।<br>नमः शिवायेट्यूरू च विश्वमूर्ते नमः कटिम् ॥ ६<br>कंदर्पाय नमो मेढ्रमादित्याय नमः करौ।<br>दामोदरायेत्युदरं वासुदेवाय च स्तनौ ॥ ७<br>माधवायेत्युरो विष्णोः कण्ठमुत्कण्ठिने नमः।<br>श्रीधराय मुखं केशान् केशवायेति नारद ॥ ८<br>पृष्ठं शार्ङ्गधरायेति श्रवणौ वरदाय वै।<br>स्वनाम्ना शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये।<br>शिरः सर्वात्मने ब्रह्मन् नम इत्यभिपूजयेत् ॥ ९<br>मत्स्यमुत्पलसंयुक्तं हैमं कृत्वा तु शक्तितः।<br>उदकुम्भसमायुक्तमग्रतः स्थापयेद् बुधः ॥ १०<br>गुडपात्रं तिलैर्युक्तं सितवस्त्राभिवेष्टितम्।<br>रात्रौ जागरणं कुर्यादितिहासकथादिना ॥ ११ | बुद्धिमान् मनुष्य कार्तिक, चैत्र, वैशाख, मार्गशीर्ष, फाल्गुन अथवा आषाढमासमें शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको स्वल्पाहार कर सायंकालिक संध्योपासनासे निवृत्त होकर इस प्रकारका नियम ग्रहण करे—‘प्रभो! मैं एकादशीको निराहार रहकर भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति अर्चना करूँगा और द्वादशीके दिन ब्राह्मणके साथ बैठकर भोजन करूँगा। केशव! मेरा यह नियम निर्विघ्नतापूर्वक निभ जाय और फलदायक हो।' फिर रातमें 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप करते हुए सो जाय। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि करके पवित्र हो जाय और श्वेत पुष्पोंकी माला एवं चन्दन आदिसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका पूजन करे। (पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—) 'विभूतये नमः' से दोनों चरणोंकी, 'अशोकाय नमः' से जानुओंकी, 'शिवाय नमः' से ऊरुओंकी, 'विश्वमूर्ते नमः' से कटिकी, 'कंदर्पाय नमः' से जननेन्द्रियकी, 'आदित्याय नमः' से हाथोंकी, 'दामोदराय नमः' से उदरकी, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'माधवाय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलकी, 'उत्कण्ठिने नमः' से कण्ठकी, 'श्रीधराय नमः' से मुखकी, 'केशवाय नमः' से केशोंकी, 'शार्ङ्गधराय नमः' से पीठकी, 'वरदाय नमः' से दोनों कानोंकी और 'सर्वात्मने नमः' से सिरकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण देवता नारदजी! तत्पश्चात् 'शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये नमः' कहकर अपने नामका उच्चारण करते हुए चरणोंमें प्रणिपात करे। तदुपरान्त बुद्धिमान् व्रती मूर्तिके अग्रभागमें एक जलपूर्ण कलश स्थापित करे। उसपर तिलसे युक्त गुड़से भरा हुआ पात्र, जो श्वेत वस्त्रसे परिवेष्टित हो, रख दे। उसके ऊपर अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमलसहित मत्स्य बनवाकर स्थापित करे और रात्रिमें इतिहास-पुराण आदिकी कथाओंको सुनते हुए जागरण करे ॥ १—११॥ | | प्रभातायां तु शर्वर्यां ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>सकाञ्चनोत्पलं देवं सोदकुम्भं निवेदयेत् ॥ १२<br>यथा न मुच्यसे देव सदा सर्वविभूतिभिः।<br>तथा मामुद्धराशेषदुःखसंसारकर्दमात् ॥ १३<br>दशावताररूपाणि प्रतिमासं क्रमान्मुने।<br>दत्तात्रेयं तथा व्यासमुत्पलेन समन्वितम्।<br>दद्याद्देवं समा यावत् पाषण्डानभिवर्जयेत् ॥ १४ | रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल स्वर्णमय कमल और कलशके साथ वह देव-मूर्ति कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर देनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'देव! जिस प्रकार आप सदा सम्पूर्ण विभूतियोंसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार इस निखिल कष्टोंसे परिपूर्ण संसाररूपी कीचड़से मेरा उद्धार कीजिये।' मुने! इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास क्रमशः भगवान्के दस अवतारों तथा दत्तात्रेय और व्यासकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्वर्णनिर्मित कमलके साथ दान करनी चाहिये। उस समय छल, कपट, पाखण्ड आदिसे दूर रहना चाहिये। |
३४० * मत्स्यपुराण *
| समाप्यैवं यथाशक्त्या द्वादश द्वादशीः पुनः।<br>संवत्सरान्ते लवणपर्वतेन समन्वितम्।<br>शय्यां दद्यान्मुनिश्रेष्ठ गुरवे धेनुसंयुताम्॥ १५<br><br>ग्रामं च शक्तिमान् दद्यात् क्षेत्रं वा भवनान्वितम्।<br>गुरुं सम्पूज्य विधिवद् वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १६<br><br>अन्यान्पि यथाशक्त्या भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेद् वस्त्रगोदानै रत्नौघधनसंचयैः।<br>अल्पवित्तो यथाशक्त्या स्तोकं स्तोकं समाचरेत्॥ १७<br><br>यश्चाप्यतीव निःस्वः स्याद् भक्तिमान्माधवं प्रति।<br>पुष्पार्चनविधानेन स कुर्याद् वत्सरद्वयम्॥ १८<br><br>अनेन विधिना यस्तु विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>कुर्यात् पापविनिर्मुक्तः पितॄणां तारयेच्छतम्॥ १९<br><br>जन्मनां शतसाहस्रं न शोकफलभाग् भवेत्।<br>न च व्याधिर्भवेत् तस्य न दारिद्र्यं न बन्धनम्।<br>वैष्णवो वाथ शैवो वा भजेज्जन्मनि जन्मनि॥ २०<br><br>यावद् युगसहस्राणां शतमष्टोत्तरं भवेत्।<br>तावत् स्वर्गे वसेद् ब्रह्मन् भूपतिश्च पुनर्हवेत्॥ २१ | मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार यथाशक्ति बारह द्वादशी-व्रतोंको समाप्त कर वर्षके अन्तमें गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या दान करनी चाहिये। व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ खेतका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करनेका विधान है। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुकूल थोड़ा-थोड़ा ही दान कर सकता है तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे दो वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। ब्रह्मन्! जबतक एक सौ आठ सहस्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है॥ १२—२१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विष्णुव्रतं नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-सम्बन्धी विष्णु-व्रत नामक निन्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९९॥
सौवाँ अध्याय
विभूतिद्वादशी* के प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त
| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>पुरा रथन्तरे कल्पे राजाऽऽसीत् पुष्पवाहनः।<br>नाम्ना लोकेषु विख्यातस्तेजसा सूर्यसंनिभः॥ १<br><br>तपसा तस्य तुष्टेन चतुर्वक्त्रेण नारद।<br>कमलं काञ्चनं दत्तं यथाकामगमं मुने॥ २ | नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! बहुत पहले रथन्तरकल्पमें पुष्पवाहन नामका एक राजा हुआ था जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात तथा तेजमें सूर्यके समान था। मुने! उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे एक सोनेका कमल (रूप विमान) प्रदान किया था, जो इच्छानुसार जहाँ-कहीं भी आ-जा सकता था। |
* इस व्रतका वर्णन पद्म० सृष्टि० २०१।—४२, भविष्योत्तर, व्रतरत्न, व्रतराज, व्रतकल्पद्रुम आदिमें भी यों ही प्राप्त होता है। पाद्मीय कथामें तीर्थगुरु पुष्करक्षेत्रका भी सम्बन्ध प्रदृष्ट है।
| * अध्याय १०० * | ३४१ |
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| लोकैः समस्तैर्नगरवासिभिः सहितो नृपः।<br>द्वीपानि सुरलोकं च यथेष्टं व्यचरत् तदा॥ ३<br>कल्पादौ सप्तमं द्वीपं तस्य पुष्करवासिनः।<br>लोकेन पूजितं यस्मात् पुष्करद्वीपमुच्यते॥ ४<br>देवेन ब्रह्मणा दत्तं यानमस्य यतोऽम्बुजम्।<br>पुष्पवाहनमित्याहुस्तस्मात् तं देवदानवाः॥ ५<br>नागम्यमस्यास्ति जगतत्रयेऽपि<br>ब्रह्माम्बुजस्थस्य तपोऽनुभावात्।<br>पत्नी च तस्याप्रतिमा मुनीन्द्र<br>नारीसहस्रैरभितोऽभिनन्द्या।<br>नाम्ना च लावण्यवती बभूव<br>सा पार्वतीवेष्टतमा भवस्य॥ ६<br>तस्यात्मजानामयुतं बभूव<br>धर्मात्मनामग्र्यधनुर्धराणाम्।<br>तदात्मनः सर्वमवेक्ष्य राजा<br>मुहुर्मुहुर्विस्मयमाससाद।<br>सोऽभ्यागतं वीक्ष्य मुनिप्रवीरं<br>प्राचेतसं वाक्यमिदं बभाषे॥ ७ | उसे पाकर उस समय राजा पुष्पवाहन अपने नगर एवं जनपदवासियोंके साथ उसपर आरूढ़ होकर स्वेच्छानुसार देवलोकों तथा सातों द्वीपोंमें विचरण किया करता था। कल्पके आदिमें पुष्करनिवासी उस पुष्पवाहनका सातवें द्वीपपर अधिकार था, इसीलिये लोकमें उसकी प्रतिष्ठा थी और आगे चलकर वह द्वीप पुष्करद्वीप नामसे कहा जाने लगा। चूँकि देवेश्वर ब्रह्माने इसे कमलरूप विमान प्रदान किया था, इसलिये देवता एवं दानव उसे पुष्पवाहन कहा करते थे। तपस्याके प्रभावसे ब्रह्माद्वारा प्रदत्त कमलरूप विमानपर आरूढ़ होनेपर उसके लिये त्रिलोकीमें भी कोई स्थान अगम्य न था। मुनीन्द्र! उसकी पत्नीका नाम लावण्यवती था। वह अनुपम सुन्दरी थी तथा हजारों नारियोंद्वारा चारों ओरसे समादृत होती रहती थी। वह राजाको उसी प्रकार अत्यन्त प्यारी थी, जैसे शंकरजीको पार्वती परम प्रिय हैं। उसके दस हजार पुत्र थे, जो परम धार्मिक और धनुर्धारियोंमें अग्रगण्य थे। अपनी इन सारी विभूतियोंपर बारम्बार विचारकर राजा पुष्पवाहन विस्मयविमुग्ध हो जाता था। एक बार (प्रचेताके पुत्र) मुनिवर वाल्मीकि* राजाके यहाँ पधारे। उन्हें आया देख राजाने उनसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–७॥ | | राजोवाच<br>कस्माद् विभूतिरमलामरमर्त्यपूज्या<br>जाता च सर्वविजितामरसुन्दरीणाम्।<br>भार्या ममाल्पतपसा परितोषितेन<br>दत्तं ममाम्बुजगृहं च मुनीन्द्र धात्रा॥ ८<br>यस्मिन् प्रविष्टमपि कोटिशतं नृपाणां<br>सामात्यकुञ्जररथौघजनावृतानाम्।<br>नो लभ्यते क्व गतमम्बरगामिभिश्च<br>तारागणेन्दुरविरश्मिभिरप्यगम्यम्॥ ९<br>तस्मात् किमन्यजननीजठरोद्भवैन<br>धर्मादिकं कृतमशेषफलासिहेतुः।<br>भगवन् मयाथ तनयैरथवान्यापि<br>भद्रं यदेतदखिलं कथय प्रचेतः॥ १० | राजाने पूछा— मुनीन्द्र! किस कारणसे मुझे यह देवों तथा मानवोंद्वारा पूजनीय निर्मल विभूति तथा अपने सौन्दर्यसे समस्त देवाङ्गनाओंको पराजित कर देनेवाली सुन्दरी भार्या प्राप्त हुई है? मेरे थोड़े-से तपसे संतुष्ट होकर ब्रह्माने मुझे ऐसा कमल-गृह क्यों प्रदान किया, जिसमें अमात्य, हाथी, रथसमूह और जनपदवासियोंसहित यदि सौ करोड़ राजा बैठ जायँ तो वे जान नहीं पड़ते कि कहाँ चले गये। वह विमान भी आकाशगामी देवताओंद्वारा केवल चमकीले ताराओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति दीख पड़ता है। इसलिये इस सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये अन्य माताके उदरसे उत्पन्न होकर अर्थात् पूर्वजन्ममें मैंने अथवा मेरे पुत्रोंने या मेरी इस पत्नीने कौन-सा ऐसा शुभ धर्म आदि कार्य किया है? प्रचेतः! यह सारा-का-सारा विषय मुझे बतलाइये॥ ८–१०॥ |
* वाल्मीकिरामायण, उत्तरकाण्ड ९३। १७, ९६। १९ तथा अध्यात्मरामायण ७। ७। ३१, बालरामायण, उत्तर-रामचरित आदिके अनुसार 'प्राचेतस' शब्द महर्षि वाल्मीकिका ही वाचक है।
३४२ * मत्स्यपुराण *
| मुनिरभ्यधादथ भवान्तरितं समीक्ष्य <br> पृथवीपतेः प्रसभमद्भुतहेतुवृत्तम्। <br> जन्माभवत् तव तु लुब्धकुलेऽतिघोरे <br> जातस्त्वमप्यनुदिनं किल पापकारी॥ ११ <br> वपुरप्यभूत् तव पुनः परुषाङ्गसंधि- <br> दुर्गन्धसत्त्वकुनखाभरणं समन्तात्। <br> न च ते सुहृन्न सुतबन्धुजनो न तात- <br> स्वादृक् स्वसा न जननी च तदाभिशस्ता॥ १२ <br> अतिसम्मता परमभीष्टमताभिमुखी <br> जाता महीश तव योषिदिदं सुरूपा। <br> अभूदनावृष्टिरतीव रौद्रा <br> कदाचिदाहारनिमित्तमस्मिन्। <br> क्षुत्पीडितेनाथ तदा न किञ्चि- <br> दासादितं वन्यफलादि खाद्यम्॥ १३ <br> अथाभिदृष्टं महदम्बुजाढ्यं <br> सरोवरं पङ्कजषण्डमण्डितम्। <br> पद्मान्यथादाय ततो बहूनि <br> गतः पुरं वैदिशनामधेयम्॥ १४ <br> तन्मूल्यलाभाय पुरं समस्तं <br> भ्रान्तं त्वयाशेषमहस्तदासीत्। <br> क्रेता न कश्चित् कमलेषु जातः <br> क्लान्तो भृशं क्षुत्परिपीडितश्च॥ १५ <br> उपविष्टस्त्वमेकस्मिन् सभार्यो भवनाङ्गणे। <br> अथ मङ्गलशब्दश्च त्वया रात्रौ महाञ्श्रुतः॥ १६ <br> सभार्यस्तत्र गतवान् यत्रासौ मङ्गलध्वनिः। <br> तत्र मण्डपमध्यस्था विष्णोरर्चा विलोकिता॥ १७ <br> वेश्यानङ्गवती नाम विभूतिद्वादशीव्रतम्। <br> समाप्तौ माघमासस्य लवणाचलमुत्तमम्॥ १८ <br> निवेदयन्ती गुरवे शय्यां चोपस्करान्विताम्। <br> अलङ्कृत्य हृषीकेशं सौवर्णामरपादपम्॥ १९ <br> तां तु दृष्ट्वा ततस्ताभ्यामिदं च परिचिन्तितम्। <br> किमेभिः कमलैः कार्यं वरं विष्णुरलङ्कृतः॥ २० | तदनन्तर महर्षि वाल्मीकि राजाके इस आकस्मिक एवं अद्भुत प्रभावपूर्ण वृत्तान्तको जन्मान्तरसे सम्बन्धित जानकर इस प्रकार कहने लगे—राजन्! तुम्हारा पूर्वजन्म अत्यन्त भीषण व्याधके कुलमें हुआ था। एक तो तुम उस कुलमें पैदा हुए, फिर दिन-रात पापकर्ममें भी निरत रहते थे। तुम्हारा शरीर भी कठोर अङ्गसंधियुक्त तथा बेडौल था। तुम्हारी त्वचा दुर्गन्धयुक्त और नख बहुत बढ़े हुए थे। उससे दुर्गन्ध निकलती थी और वह बड़ा कुरूप था। उस जन्ममें न तो तुम्हारा कोई हितैषी मित्र था, न पुत्र और भाई-बन्धु ही थे, न पिता-माता और बहन ही थी। भूपाल! केवल तुम्हारी यह परम प्रियतमा पत्नी ही तुम्हारी अभीष्ट परमानुकूल संगिनी थी। एक बार कभी बड़ी भयंकर अनावृष्टि हुई, जिसके कारण अकाल पड़ गया। उस समय भूखसे पीड़ित होकर तुम आहारकी खोजमें निकले, परंतु तुम्हें कोई जंगली (कन्दमूल) फल आदि कुछ भी खाद्य वस्तु प्राप्त न हुई। इतनेमें ही तुम्हारी दृष्टि एक सरोवरपर पड़ी, जो कमलसमूहसे मण्डित था। उसमें बड़े-बड़े कमल खिले हुए थे। तब तुम उसमें प्रविष्ट होकर बहुसंख्यक कमल-पुष्पोंको लेकर वैदिश* नामक नगर (विदिशा नगरी)-में चले गये॥११—१४॥ <br><br> वहाँ तुमने उन कमल-पुष्पोंको बेचकर मूल्य-प्राप्तिके हेतु पूरे नगरमें चक्कर लगाया। सारा दिन बीत गया, पर उन कमल-पुष्पोंका कोई खरीद्दार न मिला। उस समय तुम भूखसे अत्यन्त व्याकुल और थकावटसे अतिशय क्लान्त चूर होकर पत्नीसहित एक महलके प्राङ्गणमें बैठ गये। वहाँ रात्रिमें तुम्हें महान् मङ्गल शब्द सुनायी पड़ा। उसे सुनकर तुम पत्नीसहित उस स्थानपर गये, जहाँ वह मङ्गल शब्द हो रहा था। वहाँ मण्डपके मध्यभागमें भगवान् विष्णुकी पूजा हो रही थी। तुमने उसका अवलोकन किया। वहाँ अनङ्गवती नामकी वेश्या माघमासकी विभूतिद्वादशी-व्रतकी समाप्ति कर अपने गुरुको भगवान् हृषीकेशका विधिवत् श्रृङ्गार कर स्वर्णमय कल्पवृक्ष, श्रेष्ठ लवणाचल और समस्त उपकरणोंसहित शय्याका दान कर रही थी। इस प्रकार पूजा करती हुई अनङ्गवतीको देखकर तुम दोनोंके मनमें यह विचार जाग्रत् हुआ कि इन कमलपुष्पोंसे क्या लेना है। अच्छा तो यह होता कि इनसे भगवान् विष्णुका श्रृङ्गार किया जाता। |
* यह इतिहास-पुराणादिमें अति प्रसिद्ध विदिशा नामकी नदीके तटपर बसा मध्यप्रदेशके मध्यकालीन इतिहासका बेसनगर, आजकलका भेलसा नगर है। इसपर कनिंघमका (Bhelsa-Topes) ग्रन्थ प्रसिद्ध है।
१०२- स्नान और तर्पणकी विधि
| * अध्याय १०० * | ३४३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति भक्तिस्तदा जाता दम्पत्योस्तु नराधिप।<br>तत्प्रसङ्गात् समभ्यर्च्य केशवं लवणाचलम्।<br>शय्या च पुष्पप्रकरैः पूजिताभूच्च सर्वतः ॥ २१ | नरेश्वर! उस समय तुम दोनों पति-पत्नीके मनमें ऐसी भक्ति उत्पन्न हुई और इसी अर्चाके प्रसङ्गमें तुम्हारे उन पुष्पोंसे भगवान् केशव और लवणाचलकी अर्चना सम्पन्न हुई तथा शेष पुष्प-समूहोंसे तुम दोनोंद्वारा शय्याको भी सब ओरसे सुसज्जित किया गया॥ १५—२१॥ |
| अथानङ्गवती तुष्टा तयोर्धनशतत्रयम्।<br>दीयतामादिदेशाथ कलधौतशतत्रयम् ॥ २२<br>न गृहीतं ततस्ताभ्यां महासत्त्वावलम्बनात्।<br>अनङ्गवत्या च पुनस्तयोरन्नं चतुर्विधम्।<br>आनीय व्याहृतं चात्र भुज्यतामिति भूपते ॥ २३<br>ताभ्यां तु तदपि त्यक्तं भोक्ष्यावः श्वो वरानने।<br>प्रसङ्गादुपवासेन तवाद्य सुखमावयोः ॥ २४<br>जन्मप्रभृति पापिष्ठौ कुकर्माणौ दृढव्रते।<br>प्रसङ्गात् तव सुश्रोणि धर्मलेशोस्तु नाविह ॥ २५<br>इति जागरणं ताभ्यां तत्प्रसङ्गादनुष्ठितम्।<br>प्रभाते च तया दत्ता शय्या सलवणाचला ॥ २६<br>ग्रामांश्च गुरवे भक्त्या विप्रेभ्यो द्वादशैव तु।<br>वस्त्रालङ्कारसंयुक्ता गावश्च कनकान्विताः ॥ २७<br>भोजनं च सुहृन्मित्रदीनान्धकृपणैः समम्।<br>तच्च लुब्धकदाम्पत्यं पूजयित्वा विसर्जितम् ॥ २८ | तुम्हारी इस क्रियासे अनङ्गवती बहुत प्रसन्न हुई। उस समय उसने तुम दोनोंको इसके बदले तीन सौ अशर्फियाँ देनेका आदेश दिया, पर तुम दोनोंने बड़ी दृढ़तासे उस धन-राशिको अस्वीकार कर दिया—नहीं लिया। भूपते! तब अनङ्गवतीने तुम्हें (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) चार प्रकारका अन्न लाकर दिया और कहा—'इसे भोजन कीजिये', किंतु तुम दोनोंने उसका भी त्याग कर दिया और कहा—'वरानने! हमलोग कल भोजन कर लेंगे। दृढ़व्रते! हम दोनों जन्मसे ही पापपरायण और कुकर्म करनेवाले हैं; पर इस समय तुम्हारे उपवासके प्रसङ्गसे हम दोनोंको भी विशेष आनन्द प्राप्त हो रहा है।' उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंको धर्मका लेशांश प्राप्त हुआ था और उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंने रातभर जागरण भी किया। (दूसरे दिन) प्रातःकाल अनङ्गवतीने भक्तिपूर्वक अपने गुरुको लवणाचलसहित शय्या और अनेकों गाँव प्रदान किये। उसी प्रकार उसने अन्य बारह ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण, वस्त्र, अलंकारादि सहित बारह गायें प्रदान कीं। तदनन्तर सुहृद्, मित्र, दीन, अन्धे और दरिद्रोंके साथ तुम लुब्धक-दम्पतिको भोजन कराया और विशेष आदर-सत्कारके साथ तुम्हें विदा किया॥ २२—२८॥ |
| स भवाँल्लुब्धको जातः सपत्नीको नृपेश्वरः।<br>पुष्करप्रकरात् तस्मात् केशवस्य च पूजनात् ॥ २९<br>विनष्टाशेषपापस्य तव पुष्करमन्दिरम्।<br>तस्य सत्त्वस्य माहात्म्यादलोभतपसा नृप ॥ ३०<br>प्रादात्तु कामगं यानं लोकनाथश्चतुर्मुखः।<br>संतुष्टस्तव राजेन्द्र ब्रह्मरूपी जनार्दनः ॥ ३१ | राजेन्द्र! वह सपत्नीक लुब्धक तुम्हीं थे, जो इस समय राजराजेश्वरके रूपमें उत्पन्न हुए हो। उस कमल-समूहसे भगवान् केशवका पूजन होनेके कारण तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो गये तथा दृढ़ त्याग, तप एवं निर्लोभिताके कारण तुम्हें इस कमलमन्दिरकी भी प्राप्ति हुई है। राजन्! तुम्हारी उसी सात्त्विक भावनाके माहात्म्यसे, तुम्हारे थोड़े-से ही तपसे ब्रह्मरूपी भगवान् जनार्दन तथा लोकेश्वर ब्रह्मा भी संतुष्ट हुए हैं। इसीसे तुम्हारा पुष्कर-मन्दिर स्वेच्छानुसार जहाँ-कहीं भी जानेकी शक्तिसे युक्त है। |
| साप्यनङ्गवती वेश्या कामदेवस्य साम्प्रतम्।<br>पत्नी सपत्नी संजाता रत्याः प्रीतिरिति श्रुता।<br>लोकेष्वानन्दजननी सकलामर्पूजिता ॥ ३२ | वह अनङ्गवती वेश्या भी इस समय कामदेवकी पत्नी रति* के सौतरूपमें उत्पन्न हुई है। यह इस समय प्रीति नामसे विख्यात है और समस्त लोकोंमें सबको आनन्द प्रदान करती तथा सम्पूर्ण |
* हरिवंश, अन्य पुराणों तथा कथासरित्सागरादिमें भी रति और प्रीति—ये कामदेवकी दो पत्नियाँ कही गयी हैं। किंतु उसकी दूसरी पत्नी प्रीतिकी उत्पत्तिकी पूरी कथा यहीं है।
३४४ * मत्स्यपुराण *
| तस्मादुत्सृज्य राजेन्द्र पुष्करं तन्महीतले।<br>गङ्गातटं समाश्रित्य विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>कुरु राजेन्द्र निर्वाणमवश्यं समवाप्स्यसि॥ ३३ | देवताओंद्वारा सत्कृत है। इसलिये राजराजेश्वर! तुम उस पुष्कर-गृहको भूतलपर छोड़ दो और गङ्गातटका आश्रय लेकर विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करो। उससे तुम्हें निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी॥ २९–३३॥ |
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>इत्युक्त्वा स मुनिर्ब्रह्मंस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>राजा यथोक्तं च पुनरकरोत् पुष्पवाहनः॥ ३४<br>इदमाचरतो ब्रह्मन्नखण्डव्रतमाचरेत्।<br>यथाकथञ्चित् कमलैर्द्वादश द्वादशीर्मुने॥ ३५<br>कर्तव्याः शक्तितो देया विप्रेभ्यो दक्षिणाऽनघ।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत भक्त्या तुष्यति केशवः॥ ३६<br>इति कलुषविदारणं जनाना-<br>मपि पठतीह शृणोति चाथ भक्त्या।<br>मतिमपि च ददाति देवलोके<br>वसति स कोटिशतानि वत्सराणाम्॥ ३७ | **नन्दिकेश्वर बोले—**ब्रह्मन्! ऐसा कहकर प्रचेता मुनि वहीं अन्तर्हित हो गये। तब राजा पुष्पवाहनने मुनिके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। ब्रह्मन्! इस विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करते समय अखण्ड व्रतका पालन करना आवश्यक है। मुने! जिस किसी भी प्रकारसे हो सके, बारहों द्वादशियोंका व्रत कमलपुष्पोंद्वारा सम्पन्न करना चाहिये। अनघ! अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी देनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि भक्तिसे ही भगवान् केशव प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य लोगोंके पापोंको विदीर्ण करनेवाले इस व्रतको पढ़ता या श्रवण करता है, अथवा इसे करनेके लिये सम्मति प्रदान करता है वह भी सौ करोड़ वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है॥ ३४–३७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विभूतिद्वादशीव्रतं नाम शततमोऽध्यायः॥ १००॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-व्रत नामक सौवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १००॥
एक सौ एकवाँ अध्याय
साठ व्रतोंका विधान और माहात्म्य
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।<br>रुद्रेणाभिहितां दिव्यां महापातकनाशिनीम्॥ १<br>नक्तमब्दं चरित्वा तु गवा सार्धं कुटुम्बिने।<br>हैमं चक्रं त्रिशूलं च दद्याद् विप्राय वाससी॥ २<br>शिवरूपस्ततोऽस्माभिः शिवलोके स मोदते।<br>एतद्देवव्रतं नाम महापातकनाशनम्॥ ३<br>यस्त्वेकभक्तेन क्षिपेत् समो हैमवृषान्वितम्।<br>धेनुं तिलमयीं दद्यात् स पदं याति शाङ्करम्।<br>एतद् रुद्रव्रतं नाम पापशोकविनाशनम्॥ ४ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! अब मैं उन साठ सर्वोत्तम व्रतोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो साक्षात् शंकरजीद्वारा कथित, दिव्य एवं महापातकोंके विनाशक हैं। जो मनुष्य एक वर्षतक रात्रिमें एक बार भोजन कर स्वर्णनिर्मित चक्र और त्रिशूल तथा दो वस्त्र गौके साथ कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवस्वरूप होकर शिवलोकमें हमलोगोंके साथ आनन्द मनाता है। यह महापातकोंका विनाश करनेवाला 'देवव्रत' है। जो मनुष्य एक वर्षतक दिनमें एक बार भोजन कर स्वर्णनिर्मित वृषसहित तिलमयी धेनुका दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह पाप एवं शोकका क्षयकारक 'रुद्रव्रत' है। |
| * अध्याय १०१ * | ३४५ |
|---|---|
| श्लोक | अर्थ |
| यस्तु नीलोत्पलं हैमं शर्करापात्रसंयुक्तम्।<br>एकान्तरितनक्ताशी समान्ते वृषसंयुतम्।<br>स वैष्णवं पदं याति नीलव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५<br>आषाढादिचतुर्मासमभ्यङ्गं वर्जयेन्नरः।<br>भोजनोपस्करं दद्यात् स याति भवनं हरेः।<br>जनप्रीतिकरं नृणां प्रीतिव्रतमिहोच्यते॥ ६<br>वर्जयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षीरघृतैक्षवम्।<br>दद्याद् वस्त्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रैश्च संयुतम्॥ ७<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति।<br>एतद् गौरीव्रतं नाम भवानीलोकदायकम्॥ ८ | जो मनुष्य एक दिनके अन्तरसे रातमें एक बार भोजन करके वर्षकी समाप्तिके अवसरपर शक्करसे पूर्ण पात्रसहित स्वर्णनिर्मित नील कमलको वृषभके साथ दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है; यह 'नीलव्रत' कहा जाता है। जो मनुष्य आषाढ़से लेकर चार मासतक शरीरमें तेल नहीं लगाता और भोजनकी सामग्री दान करता है वह श्रीहरिके लोकको जाता है। इस लोकमें यह मनुष्योंमें प्रत्येक व्यक्तिको प्रिय लगनेवाला 'प्रीतिव्रत' नामसे कहा जाता है। जो मनुष्य चैत्रमासमें दही, दूध, घी और शक्करका त्याग कर देता है और 'गौरी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे ब्राह्मण-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके रसपूर्ण पात्रोंके साथ महीन वस्त्रोंका दान करता है (वह गौरीलोकमें जाता है)। गौरीलोककी प्राप्ति करानेवाला यह 'गौरीव्रत' है॥ १—८॥ |
| पुष्यादौ यत्रयोदश्यां कृत्वा नक्तमथो पुनः।<br>अशोकं काञ्चनं दद्यादिक्षुयुक्तं दशाङ्गुलम्॥ ९<br>विप्राय वस्त्रसंयुक्तं प्रद्युम्नः प्रीयतामिति।<br>कल्पं विष्णुपदे स्थित्वा विशोकः स्यात् पुनर्नरः।<br>एतत् कामव्रतं नाम सदा शोकविनाशनम्॥ १० | पुनः जो मनुष्य पुष्यनक्षत्रसे युक्त त्रयोदशी तिथिको रातमें एक बार भोजन कर (दूसरे दिन) दस अङ्गुल लम्बा सोनेका अशोक-वृक्ष बनवाकर उसे वस्त्र और गन्नेके साथ 'प्रद्युम्न मुझपर प्रसन्न हों' इस भावनासे ब्राह्मणको दान करता है, वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके पुनः शोकरहित हो जाता है। सदा शोकका विनाश करनेवाला यह 'कामव्रत' है। |
| आषाढादिव्रतं यस्तु वर्जयेन्नखकर्तनम्।<br>वार्त्ताकं च चतुर्मासं मधुसर्पिर्घटान्वितम्॥ ११<br>कार्तिक्यां तत्पुनर्हेमं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।<br>स रुद्रलोकमाप्नोति शिवव्रतमिदं स्मृतम्॥ १२ | जो मनुष्य चौमासेमें—आषाढ़ पूर्णिमासे लेकर कार्तिकतक नख (बाल) नहीं कटवाता और भाँटा नहीं खाता, पुनः कार्तिकी पूर्णिमाको मधु और घीसे भरे हुए घड़ेके साथ स्वर्णनिर्मित भाँटा ब्राह्मणको दान करता है वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। इसे 'शिवव्रत' कहा जाता है। |
| वर्जयेद् यस्तु पुष्पाणि हेमन्तशिशिरावृतू।<br>पुष्पत्रयं च फाल्गुन्यां कृत्वा शक्त्या च काञ्चनम्॥ १३<br>दद्याद् विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशवौ।<br>दत्त्वा परं पदं याति सौम्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ १४ | जो मनुष्य हेमन्त और शिशिर-ऋतुओंमें पुष्पोंको काममें नहीं लेता और फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको अपनी शक्तिके अनुकूल सोनेके तीन पुष्प बनवाकर उन्हें सायंकालमें 'भगवान् शिव और केशव मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे दान करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। यह 'सौम्यव्रत' कहलाता है। |
| फाल्गुन्यादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत्।<br>समान्ते शयनं दद्याद् गृहं चोपस्करान्वितम्॥ १५<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति।<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं सौभाग्यव्रतमुच्यते॥ १६ | जो मनुष्य फाल्गुनमासकी आदि तृतीया तिथिको नमक खाना छोड़ देता है तथा वर्षान्तके दिन 'भवानी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे द्विज-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके गृहस्थीके उपकरणोंसे युक्त गृह और शय्या दान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है। इसे 'सौभाग्यव्रत' कहा जाता है। |
| संध्यामौनं नरः कृत्वा समान्ते घृतकुम्भकम्।<br>वस्त्रयुग्मं तिलान् घण्टां ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १७<br>सारस्वतं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>एतत् सारस्वतं नाम रूपविद्याप्रदं व्रतम्॥ १८ | जो मनुष्य संध्याकी वेलामें मौन रहनेका नियम पालन कर वर्षकी समाप्तिमें घृतपूर्ण घट, दो वस्त्र, तिल और घंटा ब्राह्मणको दान करता है, वह पुनरागमनरहित सारस्वत-पदको प्राप्त होता है। सौन्दर्य और विद्या प्रदान करनेवाला यह |
१०३- युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम
३४६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लक्ष्मीमभ्यर्च्य पञ्चम्यामुपवासी भवेन्नरः।<br>समान्ते हेमकमलं दद्याद् धेनुसमन्वितम्॥ १९<br>स वैष्णवं पदं याति लक्ष्मीवान् जन्मजन्मनि।<br>एतत् सम्पद्व्रतं नाम दुःखशोकविनाशनम्॥ २०<br>कृत्वोपलेपनं शम्भोरग्रतः केशवस्य च।<br>यावदब्दं पुनर्दद्याद् धेनुं जलघटान्विताम्॥ २१<br>जन्मायुतं स राजा स्यात् ततः शिवपुरं व्रजेत्।<br>एतदाययुर्व्रतं नाम सर्वकामप्रदायकम्॥ २२<br>अश्वत्थं भास्करं गङ्गां प्रणम्यैकत्र वाग्यतः।<br>एकभक्तं नरः कुर्यादब्दमेकं विमत्सरः॥ २३<br>व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूज्यं धेनुत्रयान्वितम्।<br>वृक्षं हिरण्मयं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>एतत् कीर्तिव्रतं नाम भूतिकीर्तिफलप्रदम्॥ २४<br>घृतेन स्नपनं कुर्याच्छम्भोर्वा केशवस्य च।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः कृत्वा गोमयमण्डलम्॥ २५<br>तिलधेनुसमोपेतं समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>शुद्धमष्टाङ्गुलं दद्याच्छिवलोके महीयते।<br>सामगाय ततश्चैतत् सामव्रतमिहोच्यते॥ २६ | 'सारस्वत' नामक व्रत है ॥ ९—१८ ॥<br><br>जो मनुष्य पञ्चमी तिथिको निराहार रहकर लक्ष्मीकी पूजा करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन गौके साथ स्वर्ण-निर्मित कमलका दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और प्रत्येक जन्ममें लक्ष्मीसे सम्पन्न रहता है। यह 'सम्पद्व्रत' है, जो दुःख और शोकका विनाश करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक भगवान् शिव और केशवकी मूर्तिके सामनेकी भूमिको लीपकर वहाँ जलपूर्ण घटसहित गौका दान करता है, वह दस हजार वर्षोतक राजा होता है और मरणोपरान्त शिवलोकमें जाता है। यह 'आयुव्रत' है, जो सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक मत्सररहित हो दिनमें एक बार भोजन कर मौन-धारणपूर्वक एक ही स्थानपर पीपल, सूर्य और गङ्गाको प्रणाम करता है तथा व्रतकी समाप्तिमें पूजनीय ब्राह्मण-दम्पतिको तीन गौओंके साथ स्वर्णनिर्मित वृक्षका दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। यह 'कीर्तिव्रत' है, जो वैभव और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। जो मनुष्य एक वर्षतक गोबरसे मण्डल बनाकर वहाँ भगवान् शिव अथवा केशवको घीसे स्नान कराकर पुष्प, अक्षत आदिसे पूजा करता है और वर्षान्तमें तिल-धेनुसहित आठ अङ्गुल लम्बा शुद्ध स्वर्णनिर्मित कमल सामवेदी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे इस लोकमें 'सामव्रत' कहा जाता है ॥ १९—२६ ॥ |
| नवम्यामेकभक्तं तु कृत्वा कन्याश्च शक्तितः।<br>भोजयित्वाऽऽसनं दद्याद्धेमकञ्चुकवाससी॥ २७<br>हैमं सिंहं च विप्राय दत्त्वा शिवपदं व्रजेत्।<br>जन्मार्बुदं सुरूपः स्याच्छत्रुभिश्चापराजितः।<br>एतद् वीरव्रतं नाम नारीणां च सुखप्रदम्॥ २८ | जो मनुष्य नवमी तिथिको दिनमें एक बार भोजन करके अपनी शक्तिके अनुसार कन्याओंको भोजन कराकर उन्हें आसन और सोनेके तारोंसे खचित चोली एवं साड़ी तथा ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित सिंह दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक अरब जन्मोंतक सौन्दर्यसम्पन्न एवं शत्रुओंके लिये अजेय हो जाता है। यह 'वीरव्रत' है, जो नारियोंके लिये सुखदायक है। |
| यावत्समा भवेद् यस्तु पञ्चदश्यां पयोव्रतः।<br>समान्ते श्राद्धकृद् दद्यात् पञ्च गास्तु पयस्विनीः॥ २९<br>वासांसि च पिशङ्गानि जलकुम्भयुतानि च।<br>स याति वैष्णवं लोकं पितॄणां तारयेच्छतम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् पितृव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३० | जो मनुष्य एक वर्षतक पूर्णिमा तिथिको केवल दूध पीकर व्रत करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन श्राद्ध करके लालिमायुक्त भूरे रंगके वस्त्र और जलपूर्ण घटोंके साथ पाँच दुधारू गायें दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और अपने सौ पीढ़ीतकके पितरोंको तार देता है। पुनः एक कल्प व्यतीत होनेपर वह भूतलपर राजराजेश्वर होता है। यह 'पितृव्रत' कहलाता है। |
| चैत्रादिचतुरो मासान् जलं दद्यादयाचितम्।<br>व्रतान्ते माणिकं दद्यादन्नवस्त्रसमन्वितम्॥ ३१ | जो मनुष्य चैत्रसे आरम्भ कर चार मासतक बिना याचना किये जलका दान देता है अर्थात् पौसला चलाता है तथा व्रतके अन्तमें अन्न एवं |
| * अध्याय १०१ * | ३४७ |
|---|---|
| तिलपात्रं हिरण्यं च ब्रह्मलोके महीयते।<br>कल्पान्ते भूपतिर्नूनमानन्दव्रतमुच्यते॥ ३२ | वस्त्रसे युक्त मिट्टीका घड़ा, तिलसे भरा पात्र और सुवर्णका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। एक कल्पके व्यतीत होनेपर वह निश्चय ही भूपाल होता है। यह 'आनन्दव्रत' कहा जाता है॥ २७—३२॥ |
| पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वा संवत्सरं विभोः।<br>वत्सरान्ते पुनर्दद्याद् धेनुं पञ्चामृतेन हि॥ ३३<br>विप्राय दद्याच्छङ्खं च स पदं याति शाङ्करम्।<br>राजा भवति कल्पान्ते धृतिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३४ | जो एक वर्षतक पञ्चामृत (दूध, दही, घी, मधु, शक्कर)-से भगवान्की मूर्तिको स्नान कराता है, पुनः वर्षान्तमें पञ्चामृतसहित गौ और शङ्ख ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक कल्पके बाद भूतलपर राजा होता है। यह 'धृतिव्रत' कहा जाता है। |
| वर्जयित्वा पुमान् मांसमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>तद्वद्धेममृगं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>अहिंसाव्रतमित्युक्तं कल्पान्ते भूपतिर्भवेत्॥ ३५ | जो मनुष्य एक वर्षतक मांस खाना छोड़कर वर्षान्तमें गौ दान करता है तथा उसके साथ स्वर्णनिर्मित मृग भी देता है, वह अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है और कल्पान्तमें राजा होता है। यह 'अहिंसाव्रत' कहलाता है। |
| माघमास्युषसि स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत्।<br>भोजयित्वा यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>सूर्यलोके वसेत् कल्पं सूर्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३६ | जो मनुष्य माघमासमें ब्राह्मवेलामें स्नान कर अपनी शक्तिके अनुसार एक द्विज-दम्पतिको भोजन कराकर पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे उनकी पूजा करता है, वह एक कल्पतक सूर्यलोकमें निवास करता है। यह 'सूर्यव्रत' कहा जाता है। |
| आषाढादि चतुर्मासं प्रातःस्नायी भवेन्नरः।<br>विप्रेभ्यो भोजनं दद्यात् कार्तिक्त्यां गोप्रदो भवेत्।<br>स वैष्णवं पदं याति विष्णुव्रतमिदं शुभम्॥ ३७ | जो मनुष्य आषाढ़से आरम्भकर चार महीनेतक नित्य प्रातःकाल स्नान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन देता है तथा कार्तिकी पूर्णिमाको गो-दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। यह मङ्गलमय 'विष्णुव्रत' है। |
| अयनादयनं यावद् वर्जयेत् पुष्पसर्पिषी।<br>तदन्ते पुष्पदामानि घृतधेन्वा सहैव तु॥ ३८<br>दत्त्वा शिवपदं गच्छेद्विप्राय घृतपायसम्।<br>एतच्छीलव्रतं नाम शीलारोग्यफलप्रदम्॥ ३९ | जो मनुष्य एक अयनसे दूसरे अयनतक (उत्तरायणसे दक्षिणायन अथवा दक्षिणायनसे उत्तरायणतक) पुष्प और घीका त्याग कर देता है और व्रतान्तके दिन घृत, धेनुसहित पुष्पोंकी मालाएँ एवं घी और दूधसे बने हुए खाद्य पदार्थ ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'शीलव्रत' है, जो सुशीलता एवं नीरोगतारूप फल प्रदान करता है। |
| संध्यादीपप्रदो यस्तु घृतं तैलं विवर्जयेत्।<br>समान्ते दीपिकां दद्याच्चक्रशूले च काञ्चने॥ ४०<br>वस्त्रयुग्मं च विप्राय तेजस्वी स भवेदिह।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति दीप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४१ | जो एक वर्षतक नित्य सायंकाल दीप-दान करता है और तेल-घी खाना छोड़ देता है, पुनः वर्षान्तमें ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित चक्र, त्रिशूल और दो वस्त्रके साथ दीपकका दान देता है, वह इस लोकमें तेजस्वी होता है और मरणोपरान्त रुद्रलोकको प्राप्त होता है। यह 'दीप्तिव्रत' कहलाता है॥ ३३—४१॥ |
| कार्तिक्यादितृतीयायां प्राश्य गोमूत्रयावकम्।<br>नक्तं चरेदब्दमेकमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्॥ ४२<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं ततो राजा भवेदिह।<br>एतद् रुद्रव्रतं नाम सदा कल्याणकारकम्॥ ४३ | जो एक वर्षतक कार्तिकमाससे प्रारम्भ कर तृतीया तिथिको गोमूत्र एवं जौसे बने हुए खाद्य पदार्थोंको खाकर नक्तव्रतका पालन करता है और वर्षान्तमें गोदान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है और (पुण्य क्षीण होनेपर) भूतलपर राजा होता है। यह 'रुद्रव्रत' है जो सदाके लिये कल्याणकारी है। |
३४८ | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वर्जयेच्चैत्रमासे च यश्च गन्धानुलेपनम्।<br>शुक्तिं गन्धभृतां दत्त्वा विप्राय सितवाससी।<br>वारुणं पदमाप्नोति दृढव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४४ | जो चैत्रमासमें सुगन्धित वस्तुओंका अनुलेपन छोड़ देता है अर्थात् शरीरमें सुगन्धित पदार्थ नहीं लगाता और व्रतान्तमें ब्राह्मणको दो श्वेत वस्त्रोंके साथ गन्धधारियोंकी शुक्ति (गन्धद्रव्यविशेष)-का दान करता है वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। यह 'दृढव्रत' कहलाता है। |
| वैशाखे पुष्पलवणं वर्जयित्वाथ गोप्रदः।<br>भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजा भवेदिह।<br>एतत् कान्तिव्रतं नाम कान्तिकीर्तिफलप्रदम्॥ ४५ | जो वैशाख-मासमें पुष्प और नमकका परित्याग कर व्रतान्तमें गोदान करता है वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके (पुण्य क्षीण होनेपर) इस लोकमें राजा होता है। यह 'कान्तिव्रत' है, जो कान्ति और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। |
| ब्रह्माण्डं काञ्चनं कृत्वा तिलराशिसमन्वितम्।<br>त्र्यहं तिलप्रदो भूत्वा वह्निं संतर्प्य सद्धिजम्॥ ४६<br>सम्पूज्य विप्रदाम्पत्यं माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति॥ ४७<br>पुण्येऽह्नि दद्यात् स परं ब्रह्म यात्यपुनर्भवम्।<br>एतद् ब्रह्मव्रतं नाम निर्वाणपददायकम्॥ ४८ | जो किसी पुण्यप्रद दिनमें अपनी शक्तिके अनुसार तीन पलसे अधिक सोनेका ब्रह्माण्ड बनवाकर तिलकी राशिपर स्थापित कर देता है और तीन दिनतक ब्राह्मणसहित अग्निको संतुष्ट करके तिलका दान देता रहता है, पुनः चौथे दिन एक विप्र-दम्पतिकी पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे विधिपूर्वक पूजा करके 'विश्वात्मा मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे वह ब्रह्माण्ड दान कर देता है, वह पुनर्जन्मरहित परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। यह 'ब्रह्मव्रत' है, जो मोक्षपदका दाता है। |
| यश्चोभयमुखीं दद्यात् प्रभूतकनकान्विताम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेत् स याति परमं पदम्।<br>एतद् धेनुव्रतं नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ४९ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन (दूधका आहार) करके अधिक-से-अधिक सोनेकी बनी हुई उभयमुखी (दो मुखवाली अथवा सवत्सा) गौका दान करता है, वह पुनरागमनरहित परमपदको प्राप्त हो जाता है। यह 'धेनुव्रत' है। |
| त्र्यहं पयोव्रते स्थित्वा काञ्चनं कल्पपादपम्।<br>पलादूर्ध्वं यथाशक्त्या तण्डुलैस्तूपसंयुतम्।<br>दत्त्वा ब्रह्मपदं याति कल्पव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५० | जो तीन दिनतक पयोव्रतका पालन करके अपनी शक्तिके अनुसार एक पलसे अधिक सोनेका कल्पवृक्ष बनवाकर उसे चावलकी राशिपर स्थापित करके दान कर देता है वह ब्रह्मपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'कल्पव्रत' कहा जाता है। |
| मासोपवासी यो दद्याद् धेनुं विप्राय शोभनाम्।<br>स वैष्णवं पदं याति भीमव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५१ | जो एक मासतक निराहार रहकर ब्राह्मणको सुन्दर गौका दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है। यह 'भीमव्रत' कहलाता है॥ ४२—५१॥ |
| दद्याद् विंशत्पलादूर्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेद् रुद्रलोके महीयते।<br>धराव्रतमिदं प्रोक्तं सप्तकल्पशतानुगम्॥ ५२ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन कर बीस पलसे अधिक सोनेसे पृथ्वीकी मूर्ति बनवाकर दान करता है, वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे 'धराव्रत' कहते हैं, जो सात सौ कल्पोंतक दाताका अनुगमन करता रहता है। |
| माघे मासेऽथवा चैत्रे गुडधेनुप्रदो भवेत्।<br>गुडव्रतस्तृतीयायां गौरीलोके महीयते।<br>महाव्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम्॥ ५३ | जो माघ अथवा चैत्रमासमें तृतीया तिथिको गुडव्रतका पालन कर गुडधेनुका दान करता है वह गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह परमानन्द प्रदान करनेवाला 'महाव्रत' है। |
| पक्षोपवासी यो दद्याद् विप्राय कपिलाद्वयम्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति देवासुरसुपूजितम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् प्रभाव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५४ | जो एक पक्षतक निराहार रहकर ब्राह्मणको दो कपिला गौका दान करता है वह देवताओं एवं असुरोंद्वारा सुपूजित ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है और एक कल्प बीतनेपर भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'प्रभाव्रत' कहते हैं। |
१०४- प्रयाग-माहात्म्य-प्रसङ्गमें प्रयाग-क्षेत्रके विविध तीर्थस्थानोंका वर्णन
| * अध्याय १०१ * | ३४९ |
|---|---|
| वत्सरं त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुम्भदः ।<br>शिवलोके वसेत् कल्पं प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५५ | जो एक वर्षतक दिनमें एक ही बार भोजन करके व्रतान्तमें खाद्य पदार्थोंसहित जलपूर्ण घटका दान करता है, वह एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। इसे 'प्राप्तिव्रत' कहा जाता है। |
| नक्ताशी चाष्टमीषु स्याद् वत्सरान्ते च धेनुदः ।<br>पौरन्दरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते॥ ५६ | जो प्रत्येक मासकी अष्टमी तिथियोंमें रातमें एक बार भोजन करता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। इसे 'सुगतिव्रत' कहा जाता है। |
| विप्रायेन्धनदो यस्तु वर्षादिचतुरो ऋतून्।<br>घृतधेनुप्रदोऽन्ते च स परं ब्रह्म गच्छति।<br>वैश्वानरव्रतं नाम सर्वपापविनाशनम्॥ ५७ | जो वर्षा-ऋतुसे लेकर चार ऋतुओंतक ब्राह्मणको ईंधनका दान देता है और व्रतान्तमें घृत-धेनु प्रदान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला यह 'वैश्वानरव्रत' है। |
| एकादश्यां च नक्ताशी यश्चक्रं विनिवेदयेत् ।<br>समान्ते वैष्णवं हैमं स विष्णोः पदमाप्नुयात्।<br>एतत् कृष्णव्रतं नाम कल्पान्ते राज्यभाग् भवेत्॥ ५८ | जो एकादशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें सोनेका विष्णु-चक्र बनवाकर दान करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है और एक कल्पके बीतनेपर भूतलपर राज्यका भागी होता है। यह 'कृष्णव्रत' है। |
| पायसाशी समान्ते तु दद्याद् विप्राय गोयुगम्।<br>लक्ष्मीलोकमवाप्नोति ह्येतद् देवीव्रतं स्मृतम्॥ ५९ | जो खीरका भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें ब्राह्मणको दो गौ दान करता है, वह लक्ष्मीलोकको प्राप्त होता है। इसे 'देवीव्रत' कहा जाता है। |
| सप्तम्यां नक्तभुग् दद्यात् समान्ते गां पयस्विनीम्।<br>सूर्यलोकमवाप्नोति भानुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६० | जो सप्तमी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिमें दुधारू गौका दान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। यह 'भानुव्रत' कहलाता है। |
| चतुर्थ्यां नक्तभुग्दद्यादब्दान्ते हेमवारणम्।<br>व्रतं वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम्॥ ६१ | जो चतुर्थी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिके अवसरपर सोनेका हाथी दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। शिवलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'विनायकव्रत' है। |
| महाफलानि यस्त्यक्त्वा चतुर्मासं द्विजातये।<br>हैमानि कार्तिके दद्याद् गोयुगेन समन्वितम्।<br>एतत् फलव्रतं नाम विष्णुलोकफलप्रदम्॥ ६२ | जो चौमासेमें (बेल, जामुन, बेर, कैथ और बीजपुर नीबू) इन पाँच महाफलोंका परित्याग कर कार्तिकमासमें सोनेसे इन फलोंका निर्माण कराकर दो गौओंके साथ दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। विष्णुलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'फलव्रत' है। |
| यश्चोपवासी सप्तम्यां समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>गाश्च वै शक्तितो दद्याद्धेमान्नघटसंयुताः।<br>एतत् सौरव्रतं नाम सूर्यलोकफलप्रदम्॥ ६३ | जो सप्तमी तिथिको निराहार रहते हुए वर्षके अन्तमें अपनी शक्तिके अनुसार स्वर्णनिर्मित कमल तथा सुवर्ण, अन्न और घटसहित गौओंका दान करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। सूर्यलोकरूप फलका प्रदाता यह 'सौरव्रत' है॥ ५२—६३॥ |
| द्वादश द्वादशीर्यस्तु समाप्योपोषणेन च।<br>गोवस्त्रकाञ्चनैर्विप्रान् पूजयेच्छक्तितो नरः।<br>परमं पदमाप्नोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६४ | जो मनुष्य बारह द्वादशियोंको उपवास करके यथाशक्ति गौ, वस्त्र और सुवर्णसे ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'विष्णुव्रत' कहा जाता है। |
| कार्तिक्यां च वृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत् ।<br>शैवं पदमवाप्नोति वार्षव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६५ | जो कार्तिककी पूर्णिमा तिथिको वृषोत्सर्ग करके नक्तव्रतका पालन करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'वार्षव्रत' कहलाता है। |
३५० | * मत्स्यपुराण *
| कृच्छ्रान्ते गोप्रदः कुर्याद् भोजनं शक्तितः पदम्।<br>विप्राणां शाङ्करं याति प्राजापत्यमिदं व्रतम्॥ ६६<br>चतुर्दश्यां तु नक्ताशी समान्ते गोधनप्रदः।<br>शैव पदमवाप्नोति त्रैयम्बकमिदं व्रतम्॥ ६७<br>समरात्रोषितो दद्याद् घृतकुम्भं द्विजातये।<br>घृतव्रतमिदं प्राहुर्ब्रह्मलोकफलप्रदम्॥ ६८<br>आकाशशायी वर्षासु धेनुमन्ते पयस्विनीम्।<br>शक्रलोके वसेन्नित्यमिन्द्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६९<br>अनग्निपक्वमश्नाति तृतीयायां तु यो नरः।<br>गां दत्त्वा शिवमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>इह चानन्दकृत् पुंसां श्रेयोव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७०<br>हैमं पलद्वयादूर्ध्वं रथमश्वयुगान्वितम्।<br>ददन् कृतोपवासः स्याद् दिवि कल्पशतं वसेत्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यादश्वव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७१<br>तद्वद्धेमरथं दद्यात् करिभ्यां संयुतं नरः।<br>सत्यलोके वसेत् कल्पं सहस्रमथ भूपतिः।<br>भवेदुपोषितो भूत्वा करिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७२<br>उपवासं परित्यज्य समान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>यक्षाधिपत्यमाप्नोति सुखव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७३<br>निशि कृत्वा जले वासं प्रभाते गोप्रदो भवेत्।<br>वारुणं लोकमाप्नोति वरुणव्रतमुच्यते॥ ७४<br>चान्द्रायणं च यः कुर्याद्धेमचन्द्रं निवेदयेत्।<br>चन्द्रव्रतमिदं प्रोक्तं चन्द्रलोकफलप्रदम्॥ ७५<br>ज्येष्ठे पञ्चतपाः सायं हेमधेनुप्रदो दिवम्।<br>यात्यष्टमीचतुर्दश्यो रुद्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७६ | जो कृच्छ्र-चान्द्रायण-व्रतकी समाप्तिपर गोदान करके यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'प्राजापत्यव्रत' है। जो चतुर्दशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करता है और वर्ष समाप्त होनेपर गोधनका दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'त्रैयम्बकव्रत' है। जो सात राततक उपवास कर ब्राह्मणको घृतपूर्ण घटका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। यह ब्रह्मलोकरूप फल प्रदान करनेवाला 'घृतव्रत' है। जो वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे (खुले मैदानमें) शयन करता हैं और व्रतान्तमें दुधारू गौका दान करता है, वह सदाके लिये इन्द्रलोकमें निवास करता है। इसे 'इन्द्रव्रत' कहा जाता हैं। जो मनुष्य तृतीया तिथिको बिना अग्निमें पकाया हुआ पदार्थ भोजन करता है और व्रतान्तमें गौ-दान देता है, वह पुनरागमनरहित शिवलोकको प्राप्त होता है। मनुष्योंको इस लोकमें आनन्द प्रदान करनेवाला यह 'श्रेयोव्रत' कहलाता है। जो निराहार रहकर दो पलसे अधिक सोनेसे दो घोड़ोंसे जुता हुआ रथ बनवाकर दान करता है, वह सौ कल्पोंतक स्वर्गलोकमें वास करता है और कल्पान्तमें भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'अश्वव्रत' कहते हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य निराहार रहकर दो हाथियोंसे जुता हुआ सोनेका रथ दान करता है, वह एक हजार कल्पोंतक सत्यलोकमें निवास करता है और (पुण्य-क्षीण होनेपर भूतलपर) राजा होता है। यह 'करिव्रत' कहलाता है। इसी प्रकार जो मनुष्य वर्षके अन्तमें उपवासका परित्याग कर गोदान करता है, वह यक्षोंका अधीश्वर होता है। इसे 'सुखव्रत' कहा जाता है। जो रातभर जलमें निवास कर प्रातःकाल गोदान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त करता है। इसे 'वरुणव्रत' कहते हैं। जो मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान कर स्वर्णनिर्मित चन्द्रमाका दान करता है, वह चन्द्रलोकको जाता है। चन्द्रलोकरूप फलका प्रदाता यह 'चन्द्रव्रत' कहलाता है। जो ज्येष्ठमासकी अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथियोंमें पञ्चाग्नि तपकर सायंकाल स्वर्णनिर्मित गौका दान करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। यह 'रुद्रव्रत' नामसे विख्यात है॥ ६४—७६॥ | | सकृद् वितानकं कुर्यात् तृतीयायां शिवालये।<br>समान्ते धेनुदो याति भवानीव्रतमुच्यते॥ ७७<br>माघे निश्यार्द्रवासाः स्यात् सप्तम्यां गोप्रदो भवेत्।<br>दिवि कल्पमुषित्वेह राजा स्यात् पवनं व्रतम्॥ ७८ | जो तृतीया तिथिको शिवालयमें एक बार चंदोवा या चाँदनी लगा देता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह भवानीलोकको जाता है। इसे 'भवानीव्रत' कहते हैं। जो माघमासमें सप्तमी तिथिको रातभर गीला वस्त्र धारण किये रहता है और प्रातःकाल गौका दान करता है, वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास करके भूतलपर |
१०५- प्रयागमें मरनेवालोंकी गति और गो-दानका महत्त्व
| * अध्याय १०२ * | ३५१ |
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| त्रिरात्रोपोषितो दद्यात् फाल्गुन्यां भवनं शुभम्।<br>आदित्यलोकमाप्नोति धामव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७९<br><br>त्रिसंध्यं पूज्य दाम्पत्यमुपवासी विभूषणैः।<br>अन्नं गाश्च समाप्नोति मोक्षममिन्द्रव्रतादिह॥ ८०<br><br>दत्त्वा सितद्वितीयायामिन्दोर्लवणभाजनम्।<br>समान्ते गोप्रदो याति विप्राय शिवमन्दिरम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् सोमव्रतमिदं स्मृतम्॥ ८१<br><br>प्रतिपद्येकभक्ताशी समान्ते कपिलाप्रदः।<br>वैश्वानरपदं याति शिवव्रतमिदं स्मृतम्॥ ८२<br><br>दशम्यामेकभक्ताशी समान्ते दशधेनुदः।<br>दिशश्च काञ्चनैर्दद्याद् ब्रह्माण्डाधिपतिर्भवेत्।<br>एतद् विश्वव्रतं नाम महापातकनाशनम्॥ ८३<br><br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।<br>मन्वन्तरशतं सोऽपि गन्धर्वाधिपतिर्भवेत्॥ ८४<br><br>षष्टिव्रतं नारद पुण्यमेतत्<br>तवोदितं विश्वजनीनमन्यत्।<br>श्रोतुं तवेच्छा तदुदीरयामि<br>प्रियेषु किं वाकथनीयमस्ति॥ ८५ | राजा होता है। 'यह पवनव्रत' है। जो तीन राततक उपवास करके फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको सुन्दर गृह दान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। यह 'धामव्रत' नामसे प्रसिद्ध है। जो निराहार रहकर तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) संध्याओंमें आभूषणोंद्वारा ब्राह्मण-दम्पत्तिकी पूजा करता है, उसे इस लोकमें इन्द्रव्रतसे भी बढ़कर अधिक मात्रामें अन्न एवं गोधनकी प्राप्ति होती है तथा अन्तमें वह मोक्षलाभ करता है। जो शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिको चन्द्रमाके उद्देश्यसे नमकसे परिपूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान करता है और वर्षकी समाप्तिमें गोदान देता है, वह शिवलोकको जाता है और एक कल्प व्यतीत होनेपर भूतलपर राजराजेश्वर होता है। यह 'सोमव्रत' नामसे विख्यात है। जो प्रतिपदा तिथिको दिनमें एक बार भोजन करता है और वर्षान्तमें कपिला गौका दान देता है, वह वैश्वानरलोकको जाता है। इसे 'शिवव्रत' कहते हैं। जो दशमी तिथिको दिनमें एक बार भोजन करता है और वर्षकी समाप्तिके अवसरपर स्वर्णनिर्मित दसों दिशाओंकी प्रतिमाके साथ दस गायें दान करता है वह ब्रह्माण्डका अधीश्वर होता है। यह 'विश्वव्रत' है जो महापातकोंका विनाशक है। जो इस सर्वोत्तम 'षष्टिव्रत' (६० व्रतोंकी चर्चा)-को पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी सौ मन्वन्तरतक गन्धर्वलोकका अधिपति होता है। नारद! यह षष्टिव्रत परम पुण्यप्रद और सभी जीवोंके लिये लाभदायक है, मैंने आपसे इसका वर्णन कर दिया। अब यदि आपकी और भी कुछ सुननेकी इच्छा हो तो मैं उसका वर्णन करूँगा; क्योंकि प्रियजनोंके प्रति भला कौन-सी वस्तु अकथनीय हो सकती है॥ ७७–८५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे षष्टिव्रतमाहात्म्यं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें षष्टिव्रतमाहात्म्य नामक एक सौ एकवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०१॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
स्नान² और तर्पणकी विधि
| नन्दिकेश्वर उवाच | नन्दिकेश्वर बोले— |
|---|---|
| नैर्मल्यं भावशुद्धिश्च विना स्नानं न विद्यते।<br>तस्मान्मनोविशुद्ध्यर्थं स्नानमादौ विधीयते॥ १ | नारदजी! स्नान किये बिना शरीरकी निर्मलता और भाव-शुद्धि नहीं प्राप्त होती, अतः मनकी विशुद्धिके लिये (सभी व्रतोंमें) सर्वप्रथम स्नानका |
१. स्वल्पान्तरसे ये सभी व्रत पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, अ० २०, श्लोक ४५ से १४४ तकमें तथा भविष्योत्तरपुराणके १२०वें अध्यायमें भी निर्दिष्ट हैं।
२. स्नानविधिकी विस्तृत चर्चा 'स्नानव्यास' में है। यह सुन्दर प्रकरण बृहद्व्यासादि स्मृतियोंमें भी संगृहीत है।
३५२ | * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shlokas | Hindi Translation |
|---|---|
| अनुद्धतैरुरुद्धतैर्वा जलैः स्नानं समाचरेत्।<br>तीर्थं प्रकल्पयेद् विद्वान् मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्।<br>नमो नारायणायेति मन्त्र एष उदाहृतः॥ २<br><br>दर्भपाणिस्तु विधिना आचान्तः प्रयततः शुचिः।<br>चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समन्ततः।<br>प्रकल्प्यावाहयेद् गङ्गामेभिर्मन्त्रैर्विचक्षणः॥ ३<br><br>विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता।<br>त्राहि नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणात्तिकात्॥ ४<br><br>तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्।<br>दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्ति जाह्नवि॥ ५<br><br>नन्दिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च।<br>दक्षा पृथ्वी च विहगा विश्वकायामृता शिवा॥ ६<br><br>विद्याधरी सुप्रसन्ना तथा विश्वप्रसादिनी।<br>क्षेमा च जाह्नवी चैव शान्ता शान्तिप्रदायिनी॥ ७<br><br>एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत्।<br>भवेत् संनिहिता तत्र गङ्गा त्रिपथगामिनी॥ ८ | विधान है। कुएँ आदिसे निकाले हुए अथवा बिना निकाले हुए नदी-तालाब आदिके जलसे स्नान करना चाहिये। मन्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुषको मूलमन्त्रद्वारा उस जलमें तीर्थकी कल्पना करनी चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय'—यह मूलमन्त्र कहा गया है। मनुष्य पहले हाथमें कुश लिये हुए विधिपूर्वक आचमन कर ले, फिर जितेन्द्रिय एवं शुद्ध भावसे अपने चारों ओर चार हाथका चौकोर मण्डल बनाकर उसमें तीर्थकी कल्पना कर इन (वक्ष्यमाण) मन्त्रोंद्वारा गङ्गाजीका आवाहन करे—'देवि! तुम भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हो, वैष्णवी कही जाती हो और विष्णु ही तुम्हारे देवता हैं, अतः तुम जन्मसे लेकर मरणान्तक होनेवाले पापसे हमारी रक्षा करो। जह्ननन्दिनी! वायुदेवने स्वर्गलोक, मृत्युलोक और अन्तरिक्षलोक—इन तीनों लोकोंमें जिन साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंको बतलाया है, वे सभी तुम्हारे भीतर निवास करते हैं। देवोंमें तुम नन्दिनी और नलिनी नामसे प्रसिद्ध हो। इसके अतिरिक्त दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, विश्वप्रसादिनी, क्षेमा, जाह्नवी, शान्ता और शान्तिप्रदायिनी—ये भी तुम्हारे ही नाम हैं।' स्नानके समय इन पुण्यमय नामोंका कीर्तन करना चाहिये, इससे त्रिपथगामिनी गङ्गा वहाँ उपस्थित हो जाती हैं॥ १—८॥ |
| सप्तवाराभिजप्तेन करसम्पुटयोजितम्।<br>मूर्ध्नि कुर्याज्जलं भूयस्त्रिचतुःपञ्चसप्तकम्।<br>स्नानं कुर्यान्मृदा तद्वदामन्त्र्य तु विधानतः॥ ९ | हाथोंको सम्पुटित करके सात बार इन नामोंका जप करनेके पश्चात् तीन, चार, पाँच अथवा सात बार जलको अपने मस्तकपर छिड़क ले। तत्पश्चात् विधिपूर्वक पृथ्वीको आमन्त्रित करके पहले शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करना चाहिये। (आमन्त्रण-मन्त्र इस प्रकार है)— |
| अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।<br>मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥ १० | 'मृत्तिके! तुम अग्निचयन, उख संभरणादिके समय अश्वके द्वारा शुद्ध की जाती हो, तुम (शिवके) रथ और वामन-अवतारमें भगवान् विष्णुके पैरद्वारा भी आक्रान्त होकर शुद्ध हुई हो, सारा धन तुम्हारे ही भीतर वर्तमान है, इसलिये मेरे द्वारा जो कुछ भी पाप घटित हुए हैं, उन सभीको हर लो। |
| उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।<br>मृत्तिके ब्रह्मदत्तासि कश्यपेनाभिमन्त्रिता।<br>आरुह्य मम गात्राणि सर्वं पापं प्रचोदय॥ ११* | मृत्तिके! शतबाहु भगवान् विष्णुने श्यामवर्णका वराहरूप धारण कर तुम्हारा पातालसे उद्धार किया है, पुनः महर्षि कश्यपद्वारा आमन्त्रित होकर तुम ब्राह्मणोंको प्रदान की गयी हो, अतः मेरे अङ्गोंपर आरूढ़ होकर मेरे सारे पापोंको दूर कर दो। |
| मृत्तिके देहि नः पुष्टिं सर्वं त्वयि प्रतिष्ठितम्।<br>नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते॥ १२ | मृत्तिके! विश्वके सारे पदार्थ तो तुम्हारे भीतर ही स्थित हैं, अतः तुम हमें पुष्टि प्रदान करो। सुव्रते! तुम समस्त जीवोंकी उत्पत्तिके लिये अरणिरस्वरूपा हो, |
* ये दो मन्त्र तैत्तिरीयारण्यक १०।१।३—२४ में भी प्राप्त हैं। उनपर सायणका भाष्य बहुत सुन्दर है।
१०६- प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन
- अध्याय १०२ * | ३५३ ---|---:
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य च विधानतः।<br>उत्थाय वाससी शुक्ले शुद्धे तु परिधाय वै॥ १३<br><br>ततस्तु तर्पणं कुर्यात् त्रैलोक्याप्यायनाय वै।<br>ब्रह्माणं तर्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम्॥ १४<br><br>देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः।<br>क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्बुकाः खगाः॥ १५<br><br>वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिनः।<br>निराधाराश्च ये जीवाः पापे धर्मे रताश्च ये॥ १६<br><br>तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया।<br>कृतोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत् ततः॥ १७ | तुम्हें नमस्कार है।' इस प्रकार मिट्टी लगाकर स्नान करनेके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। पुनः जलसे बाहर निकलकर दो श्वेत रंगके शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये इस प्रकार तर्पण करना चाहिये। उस समय उपवीती होकर (जनेऊको जैसे पहनते हैं, बायें कंधेपर तथा दाहिने हाथके नीचे कर) सर्वप्रथम देवतर्पण करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'देव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, क्रूर सर्प, गरुड आदि पक्षी, वृक्ष, शृगाल, अन्य पक्षिगण तथा जो जीव वायु एवं जलके आधारपर जीवित रहनेवाले हैं, आकाशचारी हैं, निराधार हैं और जो जीव पाप एवं धर्ममें लगे हुए हैं, उन सबकी तृप्तिके लिये मैं यह जल दे रहा हूँ।' तदनन्तर निवीती हो जाय (जनेऊको मालाकार कर लें)॥९—१७॥ |
| मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा।<br>सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः॥ १८<br><br>कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा।<br>सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥ १९<br><br>मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>प्रचेतं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च।<br>देवब्रह्मर्षीन् सर्वांस्तर्पयेदक्षतोदकैः॥ २०<br><br>अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जान्वाच्य भूतले।<br>अग्निष्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोषमपाः॥ २१<br><br>सुकालिनो बर्हिषदस्तथा चैवाज्यपाः पुनः।<br>संतर्प्याः पितरो भक्त्या सतिलोदकचन्दनैः॥ २२<br><br>यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।<br>वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥ २३<br><br>औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।<br>वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः।<br>दर्भपाणिस्तु विधिना पितॄन् संतर्पयेद् बुधः॥ २४<br><br>पित्रादीन् नामगोत्रेण तथा मातामहानपि।<br>संतर्प्य विधिना भक्त्या इमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ २५<br><br>येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।<br>ते तृप्तिमखिलां यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥ २६ | फिर भक्तिपूर्वक मनुष्यों तथा ब्रह्मपुत्र ऋषियोंके तर्पणका विधान है—'सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु तथा पञ्चशिख—ये सभी मेरे द्वारा दिये हुए जलसे सदा तृप्त हो जायँ।' तत्पश्चात् मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद—इन सभी देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंका अक्षत और जलसे तर्पण करनेका विधान है। तदनन्तर अपसव्य होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर) और बायें घुटनेको भूमिपर टेककर अग्निष्वात्त, सौम्य, हविष्मान्, ऊष्मप, सुकाली, बर्हिषद तथा अन्य आज्यप नामक पितरोंको भक्तिपूर्वक तिल, जल, चन्दन आदिसे तृप्त करना चाहिये। पुनः बुद्धिमान् मनुष्य हाथमें कुश लेकर यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त—इन चौदह दिव्य पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करके इन्हें नमस्कार करे। तत्पश्चात् अपने पिता आदि तथा नाना आदिके नाम और गोत्रका उच्चारण कर भक्तिपूर्वक विधानके साथ तर्पण करनेके पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो लोग इस जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों या इनके अतिरिक्त कुटुम्बमें पैदा हुए हों अथवा जन्मान्तरमें भाई-बन्धु रहे हों तथा जो कोई भी मुझसे जलकी इच्छा रखते हों, वे सभी पूर्णतया तृप्त हो जायँ'॥१८—२६॥ |
| ३५४ | * मत्स्यपुराण * |
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| ततश्चाचम्य विधिवदालिखेत् पद्ममग्रतः।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः सजलारुणचन्दनम्।<br>अर्घ्यं दद्यात् प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत्॥ २७<br>नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुखाय वै।<br>सहस्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे॥ २८<br>नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते सर्ववत्सल।<br>जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित॥ २९<br>पद्मासन नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूषित।<br>नमस्ते सर्वलोकेश जगत् सर्वं विबोधसे॥ ३०<br>सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वग।<br>सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्कर॥ ३१<br>दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>एवं सूर्य नमस्कृत्य त्रिःकृत्वाथ प्रदक्षिणम्।<br>द्विजं गां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततश्च स्वगृहं व्रजेत्॥ ३२ | तदुपरान्त विधिपूर्वक आचमनकर अपने सामनेकी भूमिपर कमलका चित्र बनाकर अक्षत, पुष्प आदिसे सूर्यकी पूजा करे और प्रयत्नपूर्वक सूर्यके नामोंका कीर्तन करते हुए लाल चन्दनमिश्रित जलसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे—'सूर्यदेव! आप विष्णुरूप हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुके मुखस्वरूप आपको प्रणाम है। सहस्रकिरणधारी एवं समस्त तेजोंके धामको नित्य अभिवादन है। सर्वेश्वर! दिव्य चन्दनसे विभूषित देव! आप रुद्र (शिव)-रूप हैं। आप सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणकारक तथा उनके प्रति पुत्रवत् प्रेमभाव रखनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। पद्मासन! आप सदा कुण्डल और बाजूबंदसे सुसज्जित रहते हैं, आपको अभिवादन है। समस्त लोकोंके अधीश्वर! आप सारे जगत्को उद्बुद्ध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वत्र गमन करनेवाले सत्यदेव! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके सारे पुण्यों एवं पापोंको देखते रहते हैं, आपको प्रणाम है। भास्कर! मुझपर प्रसन्न हो जाइये। दिवाकर! आपको अभिवादन है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद तीन बार प्रदक्षिणा कर सूर्यको नमस्कार करे। पुनः ब्राह्मण, गौ और सुवर्णका स्पर्श करनेके पश्चात् अपने घर जाना चाहिये॥ २७—३२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे स्नानविधिर्नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १०२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें स्नानविधि नामक एक सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०२॥
एक सौ तीनवाँ अध्याय
युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रयागस्योपवर्णनम्।<br>मार्कण्डेयेन कथितं यत् पुरा पाण्डुसूनवे॥ १<br>भारते तु यदा वृत्ते प्राप्तराज्ये पृथासुते।<br>एतस्मिन्नन्तरे राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः॥ २<br>भ्रातृशोकेन संतप्तश्चिन्तयन् स पुनः पुनः।<br>आसीत् सुयोधनो राजा एकादशचमूपतिः॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! इसके बाद मैं प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहा हूँ जिसे पूर्वकालमें महर्षि मार्कण्डेयने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा था। जब महाभारत-युद्ध समाप्त हो गया और कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिरको राज्य प्राप्त हो गया, इसी बीच कुन्ती-नन्दन महाराज युधिष्ठिर भाइयोंके शोकसे अत्यन्त दुःखी होकर बारम्बार इस प्रकार चिन्तन करने लगे—'हाय! जो राजा दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था, |