मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १०१ * | ३४७ |
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| तिलपात्रं हिरण्यं च ब्रह्मलोके महीयते।<br>कल्पान्ते भूपतिर्नूनमानन्दव्रतमुच्यते॥ ३२ | वस्त्रसे युक्त मिट्टीका घड़ा, तिलसे भरा पात्र और सुवर्णका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। एक कल्पके व्यतीत होनेपर वह निश्चय ही भूपाल होता है। यह 'आनन्दव्रत' कहा जाता है॥ २७—३२॥ |
| पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वा संवत्सरं विभोः।<br>वत्सरान्ते पुनर्दद्याद् धेनुं पञ्चामृतेन हि॥ ३३<br>विप्राय दद्याच्छङ्खं च स पदं याति शाङ्करम्।<br>राजा भवति कल्पान्ते धृतिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३४ | जो एक वर्षतक पञ्चामृत (दूध, दही, घी, मधु, शक्कर)-से भगवान्की मूर्तिको स्नान कराता है, पुनः वर्षान्तमें पञ्चामृतसहित गौ और शङ्ख ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक कल्पके बाद भूतलपर राजा होता है। यह 'धृतिव्रत' कहा जाता है। |
| वर्जयित्वा पुमान् मांसमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>तद्वद्धेममृगं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>अहिंसाव्रतमित्युक्तं कल्पान्ते भूपतिर्भवेत्॥ ३५ | जो मनुष्य एक वर्षतक मांस खाना छोड़कर वर्षान्तमें गौ दान करता है तथा उसके साथ स्वर्णनिर्मित मृग भी देता है, वह अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है और कल्पान्तमें राजा होता है। यह 'अहिंसाव्रत' कहलाता है। |
| माघमास्युषसि स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत्।<br>भोजयित्वा यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>सूर्यलोके वसेत् कल्पं सूर्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३६ | जो मनुष्य माघमासमें ब्राह्मवेलामें स्नान कर अपनी शक्तिके अनुसार एक द्विज-दम्पतिको भोजन कराकर पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे उनकी पूजा करता है, वह एक कल्पतक सूर्यलोकमें निवास करता है। यह 'सूर्यव्रत' कहा जाता है। |
| आषाढादि चतुर्मासं प्रातःस्नायी भवेन्नरः।<br>विप्रेभ्यो भोजनं दद्यात् कार्तिक्त्यां गोप्रदो भवेत्।<br>स वैष्णवं पदं याति विष्णुव्रतमिदं शुभम्॥ ३७ | जो मनुष्य आषाढ़से आरम्भकर चार महीनेतक नित्य प्रातःकाल स्नान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन देता है तथा कार्तिकी पूर्णिमाको गो-दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। यह मङ्गलमय 'विष्णुव्रत' है। |
| अयनादयनं यावद् वर्जयेत् पुष्पसर्पिषी।<br>तदन्ते पुष्पदामानि घृतधेन्वा सहैव तु॥ ३८<br>दत्त्वा शिवपदं गच्छेद्विप्राय घृतपायसम्।<br>एतच्छीलव्रतं नाम शीलारोग्यफलप्रदम्॥ ३९ | जो मनुष्य एक अयनसे दूसरे अयनतक (उत्तरायणसे दक्षिणायन अथवा दक्षिणायनसे उत्तरायणतक) पुष्प और घीका त्याग कर देता है और व्रतान्तके दिन घृत, धेनुसहित पुष्पोंकी मालाएँ एवं घी और दूधसे बने हुए खाद्य पदार्थ ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'शीलव्रत' है, जो सुशीलता एवं नीरोगतारूप फल प्रदान करता है। |
| संध्यादीपप्रदो यस्तु घृतं तैलं विवर्जयेत्।<br>समान्ते दीपिकां दद्याच्चक्रशूले च काञ्चने॥ ४०<br>वस्त्रयुग्मं च विप्राय तेजस्वी स भवेदिह।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति दीप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४१ | जो एक वर्षतक नित्य सायंकाल दीप-दान करता है और तेल-घी खाना छोड़ देता है, पुनः वर्षान्तमें ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित चक्र, त्रिशूल और दो वस्त्रके साथ दीपकका दान देता है, वह इस लोकमें तेजस्वी होता है और मरणोपरान्त रुद्रलोकको प्राप्त होता है। यह 'दीप्तिव्रत' कहलाता है॥ ३३—४१॥ |
| कार्तिक्यादितृतीयायां प्राश्य गोमूत्रयावकम्।<br>नक्तं चरेदब्दमेकमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्॥ ४२<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं ततो राजा भवेदिह।<br>एतद् रुद्रव्रतं नाम सदा कल्याणकारकम्॥ ४३ | जो एक वर्षतक कार्तिकमाससे प्रारम्भ कर तृतीया तिथिको गोमूत्र एवं जौसे बने हुए खाद्य पदार्थोंको खाकर नक्तव्रतका पालन करता है और वर्षान्तमें गोदान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है और (पुण्य क्षीण होनेपर) भूतलपर राजा होता है। यह 'रुद्रव्रत' है जो सदाके लिये कल्याणकारी है। |