भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 356

३४६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लक्ष्मीमभ्यर्च्य पञ्चम्यामुपवासी भवेन्नरः।<br>समान्ते हेमकमलं दद्याद् धेनुसमन्वितम्॥ १९<br>स वैष्णवं पदं याति लक्ष्मीवान् जन्मजन्मनि।<br>एतत् सम्पद्व्रतं नाम दुःखशोकविनाशनम्॥ २०<br>कृत्वोपलेपनं शम्भोरग्रतः केशवस्य च।<br>यावदब्दं पुनर्दद्याद् धेनुं जलघटान्विताम्॥ २१<br>जन्मायुतं स राजा स्यात् ततः शिवपुरं व्रजेत्।<br>एतदाययुर्व्रतं नाम सर्वकामप्रदायकम्॥ २२<br>अश्वत्थं भास्करं गङ्गां प्रणम्यैकत्र वाग्यतः।<br>एकभक्तं नरः कुर्यादब्दमेकं विमत्सरः॥ २३<br>व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूज्यं धेनुत्रयान्वितम्।<br>वृक्षं हिरण्मयं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>एतत् कीर्तिव्रतं नाम भूतिकीर्तिफलप्रदम्॥ २४<br>घृतेन स्नपनं कुर्याच्छम्भोर्वा केशवस्य च।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः कृत्वा गोमयमण्डलम्॥ २५<br>तिलधेनुसमोपेतं समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>शुद्धमष्टाङ्गुलं दद्याच्छिवलोके महीयते।<br>सामगाय ततश्चैतत् सामव्रतमिहोच्यते॥ २६'सारस्वत' नामक व्रत है ॥ ९—१८ ॥<br><br>जो मनुष्य पञ्चमी तिथिको निराहार रहकर लक्ष्मीकी पूजा करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन गौके साथ स्वर्ण-निर्मित कमलका दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और प्रत्येक जन्ममें लक्ष्मीसे सम्पन्न रहता है। यह 'सम्पद्व्रत' है, जो दुःख और शोकका विनाश करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक भगवान् शिव और केशवकी मूर्तिके सामनेकी भूमिको लीपकर वहाँ जलपूर्ण घटसहित गौका दान करता है, वह दस हजार वर्षोतक राजा होता है और मरणोपरान्त शिवलोकमें जाता है। यह 'आयुव्रत' है, जो सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक मत्सररहित हो दिनमें एक बार भोजन कर मौन-धारणपूर्वक एक ही स्थानपर पीपल, सूर्य और गङ्गाको प्रणाम करता है तथा व्रतकी समाप्तिमें पूजनीय ब्राह्मण-दम्पतिको तीन गौओंके साथ स्वर्णनिर्मित वृक्षका दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। यह 'कीर्तिव्रत' है, जो वैभव और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। जो मनुष्य एक वर्षतक गोबरसे मण्डल बनाकर वहाँ भगवान् शिव अथवा केशवको घीसे स्नान कराकर पुष्प, अक्षत आदिसे पूजा करता है और वर्षान्तमें तिल-धेनुसहित आठ अङ्गुल लम्बा शुद्ध स्वर्णनिर्मित कमल सामवेदी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे इस लोकमें 'सामव्रत' कहा जाता है ॥ १९—२६ ॥
नवम्यामेकभक्तं तु कृत्वा कन्याश्च शक्तितः।<br>भोजयित्वाऽऽसनं दद्याद्धेमकञ्चुकवाससी॥ २७<br>हैमं सिंहं च विप्राय दत्त्वा शिवपदं व्रजेत्।<br>जन्मार्बुदं सुरूपः स्याच्छत्रुभिश्चापराजितः।<br>एतद् वीरव्रतं नाम नारीणां च सुखप्रदम्॥ २८जो मनुष्य नवमी तिथिको दिनमें एक बार भोजन करके अपनी शक्तिके अनुसार कन्याओंको भोजन कराकर उन्हें आसन और सोनेके तारोंसे खचित चोली एवं साड़ी तथा ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित सिंह दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक अरब जन्मोंतक सौन्दर्यसम्पन्न एवं शत्रुओंके लिये अजेय हो जाता है। यह 'वीरव्रत' है, जो नारियोंके लिये सुखदायक है।
यावत्समा भवेद् यस्तु पञ्चदश्यां पयोव्रतः।<br>समान्ते श्राद्धकृद् दद्यात् पञ्च गास्तु पयस्विनीः॥ २९<br>वासांसि च पिशङ्गानि जलकुम्भयुतानि च।<br>स याति वैष्णवं लोकं पितॄणां तारयेच्छतम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् पितृव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३०जो मनुष्य एक वर्षतक पूर्णिमा तिथिको केवल दूध पीकर व्रत करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन श्राद्ध करके लालिमायुक्त भूरे रंगके वस्त्र और जलपूर्ण घटोंके साथ पाँच दुधारू गायें दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और अपने सौ पीढ़ीतकके पितरोंको तार देता है। पुनः एक कल्प व्यतीत होनेपर वह भूतलपर राजराजेश्वर होता है। यह 'पितृव्रत' कहलाता है।
चैत्रादिचतुरो मासान् जलं दद्यादयाचितम्।<br>व्रतान्ते माणिकं दद्यादन्नवस्त्रसमन्वितम्॥ ३१जो मनुष्य चैत्रसे आरम्भ कर चार मासतक बिना याचना किये जलका दान देता है अर्थात् पौसला चलाता है तथा व्रतके अन्तमें अन्न एवं