भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 355
* अध्याय १०१ *३४५
श्लोकअर्थ
यस्तु नीलोत्पलं हैमं शर्करापात्रसंयुक्तम्।<br>एकान्तरितनक्ताशी समान्ते वृषसंयुतम्।<br>स वैष्णवं पदं याति नीलव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५<br>आषाढादिचतुर्मासमभ्यङ्गं वर्जयेन्नरः।<br>भोजनोपस्करं दद्यात् स याति भवनं हरेः।<br>जनप्रीतिकरं नृणां प्रीतिव्रतमिहोच्यते॥ ६<br>वर्जयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षीरघृतैक्षवम्।<br>दद्याद् वस्त्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रैश्च संयुतम्॥ ७<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति।<br>एतद् गौरीव्रतं नाम भवानीलोकदायकम्॥ ८जो मनुष्य एक दिनके अन्तरसे रातमें एक बार भोजन करके वर्षकी समाप्तिके अवसरपर शक्करसे पूर्ण पात्रसहित स्वर्णनिर्मित नील कमलको वृषभके साथ दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है; यह 'नीलव्रत' कहा जाता है। जो मनुष्य आषाढ़से लेकर चार मासतक शरीरमें तेल नहीं लगाता और भोजनकी सामग्री दान करता है वह श्रीहरिके लोकको जाता है। इस लोकमें यह मनुष्योंमें प्रत्येक व्यक्तिको प्रिय लगनेवाला 'प्रीतिव्रत' नामसे कहा जाता है। जो मनुष्य चैत्रमासमें दही, दूध, घी और शक्करका त्याग कर देता है और 'गौरी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे ब्राह्मण-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके रसपूर्ण पात्रोंके साथ महीन वस्त्रोंका दान करता है (वह गौरीलोकमें जाता है)। गौरीलोककी प्राप्ति करानेवाला यह 'गौरीव्रत' है॥ १—८॥
पुष्यादौ यत्रयोदश्यां कृत्वा नक्तमथो पुनः।<br>अशोकं काञ्चनं दद्यादिक्षुयुक्तं दशाङ्गुलम्॥ ९<br>विप्राय वस्त्रसंयुक्तं प्रद्युम्नः प्रीयतामिति।<br>कल्पं विष्णुपदे स्थित्वा विशोकः स्यात् पुनर्नरः।<br>एतत् कामव्रतं नाम सदा शोकविनाशनम्॥ १०पुनः जो मनुष्य पुष्यनक्षत्रसे युक्त त्रयोदशी तिथिको रातमें एक बार भोजन कर (दूसरे दिन) दस अङ्गुल लम्बा सोनेका अशोक-वृक्ष बनवाकर उसे वस्त्र और गन्नेके साथ 'प्रद्युम्न मुझपर प्रसन्न हों' इस भावनासे ब्राह्मणको दान करता है, वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके पुनः शोकरहित हो जाता है। सदा शोकका विनाश करनेवाला यह 'कामव्रत' है।
आषाढादिव्रतं यस्तु वर्जयेन्नखकर्तनम्।<br>वार्त्ताकं च चतुर्मासं मधुसर्पिर्घटान्वितम्॥ ११<br>कार्तिक्यां तत्पुनर्हेमं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।<br>स रुद्रलोकमाप्नोति शिवव्रतमिदं स्मृतम्॥ १२जो मनुष्य चौमासेमें—आषाढ़ पूर्णिमासे लेकर कार्तिकतक नख (बाल) नहीं कटवाता और भाँटा नहीं खाता, पुनः कार्तिकी पूर्णिमाको मधु और घीसे भरे हुए घड़ेके साथ स्वर्णनिर्मित भाँटा ब्राह्मणको दान करता है वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। इसे 'शिवव्रत' कहा जाता है।
वर्जयेद् यस्तु पुष्पाणि हेमन्तशिशिरावृतू।<br>पुष्पत्रयं च फाल्गुन्यां कृत्वा शक्त्या च काञ्चनम्॥ १३<br>दद्याद् विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशवौ।<br>दत्त्वा परं पदं याति सौम्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ १४जो मनुष्य हेमन्त और शिशिर-ऋतुओंमें पुष्पोंको काममें नहीं लेता और फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको अपनी शक्तिके अनुकूल सोनेके तीन पुष्प बनवाकर उन्हें सायंकालमें 'भगवान् शिव और केशव मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे दान करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। यह 'सौम्यव्रत' कहलाता है।
फाल्गुन्यादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत्।<br>समान्ते शयनं दद्याद् गृहं चोपस्करान्वितम्॥ १५<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति।<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं सौभाग्यव्रतमुच्यते॥ १६जो मनुष्य फाल्गुनमासकी आदि तृतीया तिथिको नमक खाना छोड़ देता है तथा वर्षान्तके दिन 'भवानी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे द्विज-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके गृहस्थीके उपकरणोंसे युक्त गृह और शय्या दान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है। इसे 'सौभाग्यव्रत' कहा जाता है।
संध्यामौनं नरः कृत्वा समान्ते घृतकुम्भकम्।<br>वस्त्रयुग्मं तिलान् घण्टां ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १७<br>सारस्वतं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>एतत् सारस्वतं नाम रूपविद्याप्रदं व्रतम्॥ १८जो मनुष्य संध्याकी वेलामें मौन रहनेका नियम पालन कर वर्षकी समाप्तिमें घृतपूर्ण घट, दो वस्त्र, तिल और घंटा ब्राह्मणको दान करता है, वह पुनरागमनरहित सारस्वत-पदको प्राप्त होता है। सौन्दर्य और विद्या प्रदान करनेवाला यह