भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४४ * मत्स्यपुराण *


तस्मादुत्सृज्य राजेन्द्र पुष्करं तन्महीतले।<br>गङ्गातटं समाश्रित्य विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>कुरु राजेन्द्र निर्वाणमवश्यं समवाप्स्यसि॥ ३३देवताओंद्वारा सत्कृत है। इसलिये राजराजेश्वर! तुम उस पुष्कर-गृहको भूतलपर छोड़ दो और गङ्गातटका आश्रय लेकर विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करो। उससे तुम्हें निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी॥ २९–३३॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>इत्युक्त्वा स मुनिर्ब्रह्मंस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>राजा यथोक्तं च पुनरकरोत् पुष्पवाहनः॥ ३४<br>इदमाचरतो ब्रह्मन्नखण्डव्रतमाचरेत्।<br>यथाकथञ्चित् कमलैर्द्वादश द्वादशीर्मुने॥ ३५<br>कर्तव्याः शक्तितो देया विप्रेभ्यो दक्षिणाऽनघ।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत भक्त्या तुष्यति केशवः॥ ३६<br>इति कलुषविदारणं जनाना-<br>मपि पठतीह शृणोति चाथ भक्त्या।<br>मतिमपि च ददाति देवलोके<br>वसति स कोटिशतानि वत्सराणाम्॥ ३७**नन्दिकेश्वर बोले—**ब्रह्मन्! ऐसा कहकर प्रचेता मुनि वहीं अन्तर्हित हो गये। तब राजा पुष्पवाहनने मुनिके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। ब्रह्मन्! इस विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करते समय अखण्ड व्रतका पालन करना आवश्यक है। मुने! जिस किसी भी प्रकारसे हो सके, बारहों द्वादशियोंका व्रत कमलपुष्पोंद्वारा सम्पन्न करना चाहिये। अनघ! अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी देनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि भक्तिसे ही भगवान् केशव प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य लोगोंके पापोंको विदीर्ण करनेवाले इस व्रतको पढ़ता या श्रवण करता है, अथवा इसे करनेके लिये सम्मति प्रदान करता है वह भी सौ करोड़ वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है॥ ३४–३७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विभूतिद्वादशीव्रतं नाम शततमोऽध्यायः॥ १००॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-व्रत नामक सौवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १००॥


एक सौ एकवाँ अध्याय

साठ व्रतोंका विधान और माहात्म्य

नन्दिकेश्वर उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।<br>रुद्रेणाभिहितां दिव्यां महापातकनाशिनीम्॥ १<br>नक्तमब्दं चरित्वा तु गवा सार्धं कुटुम्बिने।<br>हैमं चक्रं त्रिशूलं च दद्याद् विप्राय वाससी॥ २<br>शिवरूपस्ततोऽस्माभिः शिवलोके स मोदते।<br>एतद्देवव्रतं नाम महापातकनाशनम्॥ ३<br>यस्त्वेकभक्तेन क्षिपेत् समो हैमवृषान्वितम्।<br>धेनुं तिलमयीं दद्यात् स पदं याति शाङ्करम्।<br>एतद् रुद्रव्रतं नाम पापशोकविनाशनम्॥ ४**नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! अब मैं उन साठ सर्वोत्तम व्रतोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो साक्षात् शंकरजीद्वारा कथित, दिव्य एवं महापातकोंके विनाशक हैं। जो मनुष्य एक वर्षतक रात्रिमें एक बार भोजन कर स्वर्णनिर्मित चक्र और त्रिशूल तथा दो वस्त्र गौके साथ कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवस्वरूप होकर शिवलोकमें हमलोगोंके साथ आनन्द मनाता है। यह महापातकोंका विनाश करनेवाला 'देवव्रत' है। जो मनुष्य एक वर्षतक दिनमें एक बार भोजन कर स्वर्णनिर्मित वृषसहित तिलमयी धेनुका दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह पाप एवं शोकका क्षयकारक 'रुद्रव्रत' है।