मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १०० * | ३४३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति भक्तिस्तदा जाता दम्पत्योस्तु नराधिप।<br>तत्प्रसङ्गात् समभ्यर्च्य केशवं लवणाचलम्।<br>शय्या च पुष्पप्रकरैः पूजिताभूच्च सर्वतः ॥ २१ | नरेश्वर! उस समय तुम दोनों पति-पत्नीके मनमें ऐसी भक्ति उत्पन्न हुई और इसी अर्चाके प्रसङ्गमें तुम्हारे उन पुष्पोंसे भगवान् केशव और लवणाचलकी अर्चना सम्पन्न हुई तथा शेष पुष्प-समूहोंसे तुम दोनोंद्वारा शय्याको भी सब ओरसे सुसज्जित किया गया॥ १५—२१॥ |
| अथानङ्गवती तुष्टा तयोर्धनशतत्रयम्।<br>दीयतामादिदेशाथ कलधौतशतत्रयम् ॥ २२<br>न गृहीतं ततस्ताभ्यां महासत्त्वावलम्बनात्।<br>अनङ्गवत्या च पुनस्तयोरन्नं चतुर्विधम्।<br>आनीय व्याहृतं चात्र भुज्यतामिति भूपते ॥ २३<br>ताभ्यां तु तदपि त्यक्तं भोक्ष्यावः श्वो वरानने।<br>प्रसङ्गादुपवासेन तवाद्य सुखमावयोः ॥ २४<br>जन्मप्रभृति पापिष्ठौ कुकर्माणौ दृढव्रते।<br>प्रसङ्गात् तव सुश्रोणि धर्मलेशोस्तु नाविह ॥ २५<br>इति जागरणं ताभ्यां तत्प्रसङ्गादनुष्ठितम्।<br>प्रभाते च तया दत्ता शय्या सलवणाचला ॥ २६<br>ग्रामांश्च गुरवे भक्त्या विप्रेभ्यो द्वादशैव तु।<br>वस्त्रालङ्कारसंयुक्ता गावश्च कनकान्विताः ॥ २७<br>भोजनं च सुहृन्मित्रदीनान्धकृपणैः समम्।<br>तच्च लुब्धकदाम्पत्यं पूजयित्वा विसर्जितम् ॥ २८ | तुम्हारी इस क्रियासे अनङ्गवती बहुत प्रसन्न हुई। उस समय उसने तुम दोनोंको इसके बदले तीन सौ अशर्फियाँ देनेका आदेश दिया, पर तुम दोनोंने बड़ी दृढ़तासे उस धन-राशिको अस्वीकार कर दिया—नहीं लिया। भूपते! तब अनङ्गवतीने तुम्हें (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) चार प्रकारका अन्न लाकर दिया और कहा—'इसे भोजन कीजिये', किंतु तुम दोनोंने उसका भी त्याग कर दिया और कहा—'वरानने! हमलोग कल भोजन कर लेंगे। दृढ़व्रते! हम दोनों जन्मसे ही पापपरायण और कुकर्म करनेवाले हैं; पर इस समय तुम्हारे उपवासके प्रसङ्गसे हम दोनोंको भी विशेष आनन्द प्राप्त हो रहा है।' उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंको धर्मका लेशांश प्राप्त हुआ था और उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंने रातभर जागरण भी किया। (दूसरे दिन) प्रातःकाल अनङ्गवतीने भक्तिपूर्वक अपने गुरुको लवणाचलसहित शय्या और अनेकों गाँव प्रदान किये। उसी प्रकार उसने अन्य बारह ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण, वस्त्र, अलंकारादि सहित बारह गायें प्रदान कीं। तदनन्तर सुहृद्, मित्र, दीन, अन्धे और दरिद्रोंके साथ तुम लुब्धक-दम्पतिको भोजन कराया और विशेष आदर-सत्कारके साथ तुम्हें विदा किया॥ २२—२८॥ |
| स भवाँल्लुब्धको जातः सपत्नीको नृपेश्वरः।<br>पुष्करप्रकरात् तस्मात् केशवस्य च पूजनात् ॥ २९<br>विनष्टाशेषपापस्य तव पुष्करमन्दिरम्।<br>तस्य सत्त्वस्य माहात्म्यादलोभतपसा नृप ॥ ३०<br>प्रादात्तु कामगं यानं लोकनाथश्चतुर्मुखः।<br>संतुष्टस्तव राजेन्द्र ब्रह्मरूपी जनार्दनः ॥ ३१ | राजेन्द्र! वह सपत्नीक लुब्धक तुम्हीं थे, जो इस समय राजराजेश्वरके रूपमें उत्पन्न हुए हो। उस कमल-समूहसे भगवान् केशवका पूजन होनेके कारण तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो गये तथा दृढ़ त्याग, तप एवं निर्लोभिताके कारण तुम्हें इस कमलमन्दिरकी भी प्राप्ति हुई है। राजन्! तुम्हारी उसी सात्त्विक भावनाके माहात्म्यसे, तुम्हारे थोड़े-से ही तपसे ब्रह्मरूपी भगवान् जनार्दन तथा लोकेश्वर ब्रह्मा भी संतुष्ट हुए हैं। इसीसे तुम्हारा पुष्कर-मन्दिर स्वेच्छानुसार जहाँ-कहीं भी जानेकी शक्तिसे युक्त है। |
| साप्यनङ्गवती वेश्या कामदेवस्य साम्प्रतम्।<br>पत्नी सपत्नी संजाता रत्याः प्रीतिरिति श्रुता।<br>लोकेष्वानन्दजननी सकलामर्पूजिता ॥ ३२ | वह अनङ्गवती वेश्या भी इस समय कामदेवकी पत्नी रति* के सौतरूपमें उत्पन्न हुई है। यह इस समय प्रीति नामसे विख्यात है और समस्त लोकोंमें सबको आनन्द प्रदान करती तथा सम्पूर्ण |
* हरिवंश, अन्य पुराणों तथा कथासरित्सागरादिमें भी रति और प्रीति—ये कामदेवकी दो पत्नियाँ कही गयी हैं। किंतु उसकी दूसरी पत्नी प्रीतिकी उत्पत्तिकी पूरी कथा यहीं है।