मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| मुनिरभ्यधादथ भवान्तरितं समीक्ष्य <br> पृथवीपतेः प्रसभमद्भुतहेतुवृत्तम्। <br> जन्माभवत् तव तु लुब्धकुलेऽतिघोरे <br> जातस्त्वमप्यनुदिनं किल पापकारी॥ ११ <br> वपुरप्यभूत् तव पुनः परुषाङ्गसंधि- <br> दुर्गन्धसत्त्वकुनखाभरणं समन्तात्। <br> न च ते सुहृन्न सुतबन्धुजनो न तात- <br> स्वादृक् स्वसा न जननी च तदाभिशस्ता॥ १२ <br> अतिसम्मता परमभीष्टमताभिमुखी <br> जाता महीश तव योषिदिदं सुरूपा। <br> अभूदनावृष्टिरतीव रौद्रा <br> कदाचिदाहारनिमित्तमस्मिन्। <br> क्षुत्पीडितेनाथ तदा न किञ्चि- <br> दासादितं वन्यफलादि खाद्यम्॥ १३ <br> अथाभिदृष्टं महदम्बुजाढ्यं <br> सरोवरं पङ्कजषण्डमण्डितम्। <br> पद्मान्यथादाय ततो बहूनि <br> गतः पुरं वैदिशनामधेयम्॥ १४ <br> तन्मूल्यलाभाय पुरं समस्तं <br> भ्रान्तं त्वयाशेषमहस्तदासीत्। <br> क्रेता न कश्चित् कमलेषु जातः <br> क्लान्तो भृशं क्षुत्परिपीडितश्च॥ १५ <br> उपविष्टस्त्वमेकस्मिन् सभार्यो भवनाङ्गणे। <br> अथ मङ्गलशब्दश्च त्वया रात्रौ महाञ्श्रुतः॥ १६ <br> सभार्यस्तत्र गतवान् यत्रासौ मङ्गलध्वनिः। <br> तत्र मण्डपमध्यस्था विष्णोरर्चा विलोकिता॥ १७ <br> वेश्यानङ्गवती नाम विभूतिद्वादशीव्रतम्। <br> समाप्तौ माघमासस्य लवणाचलमुत्तमम्॥ १८ <br> निवेदयन्ती गुरवे शय्यां चोपस्करान्विताम्। <br> अलङ्कृत्य हृषीकेशं सौवर्णामरपादपम्॥ १९ <br> तां तु दृष्ट्वा ततस्ताभ्यामिदं च परिचिन्तितम्। <br> किमेभिः कमलैः कार्यं वरं विष्णुरलङ्कृतः॥ २० | तदनन्तर महर्षि वाल्मीकि राजाके इस आकस्मिक एवं अद्भुत प्रभावपूर्ण वृत्तान्तको जन्मान्तरसे सम्बन्धित जानकर इस प्रकार कहने लगे—राजन्! तुम्हारा पूर्वजन्म अत्यन्त भीषण व्याधके कुलमें हुआ था। एक तो तुम उस कुलमें पैदा हुए, फिर दिन-रात पापकर्ममें भी निरत रहते थे। तुम्हारा शरीर भी कठोर अङ्गसंधियुक्त तथा बेडौल था। तुम्हारी त्वचा दुर्गन्धयुक्त और नख बहुत बढ़े हुए थे। उससे दुर्गन्ध निकलती थी और वह बड़ा कुरूप था। उस जन्ममें न तो तुम्हारा कोई हितैषी मित्र था, न पुत्र और भाई-बन्धु ही थे, न पिता-माता और बहन ही थी। भूपाल! केवल तुम्हारी यह परम प्रियतमा पत्नी ही तुम्हारी अभीष्ट परमानुकूल संगिनी थी। एक बार कभी बड़ी भयंकर अनावृष्टि हुई, जिसके कारण अकाल पड़ गया। उस समय भूखसे पीड़ित होकर तुम आहारकी खोजमें निकले, परंतु तुम्हें कोई जंगली (कन्दमूल) फल आदि कुछ भी खाद्य वस्तु प्राप्त न हुई। इतनेमें ही तुम्हारी दृष्टि एक सरोवरपर पड़ी, जो कमलसमूहसे मण्डित था। उसमें बड़े-बड़े कमल खिले हुए थे। तब तुम उसमें प्रविष्ट होकर बहुसंख्यक कमल-पुष्पोंको लेकर वैदिश* नामक नगर (विदिशा नगरी)-में चले गये॥११—१४॥ <br><br> वहाँ तुमने उन कमल-पुष्पोंको बेचकर मूल्य-प्राप्तिके हेतु पूरे नगरमें चक्कर लगाया। सारा दिन बीत गया, पर उन कमल-पुष्पोंका कोई खरीद्दार न मिला। उस समय तुम भूखसे अत्यन्त व्याकुल और थकावटसे अतिशय क्लान्त चूर होकर पत्नीसहित एक महलके प्राङ्गणमें बैठ गये। वहाँ रात्रिमें तुम्हें महान् मङ्गल शब्द सुनायी पड़ा। उसे सुनकर तुम पत्नीसहित उस स्थानपर गये, जहाँ वह मङ्गल शब्द हो रहा था। वहाँ मण्डपके मध्यभागमें भगवान् विष्णुकी पूजा हो रही थी। तुमने उसका अवलोकन किया। वहाँ अनङ्गवती नामकी वेश्या माघमासकी विभूतिद्वादशी-व्रतकी समाप्ति कर अपने गुरुको भगवान् हृषीकेशका विधिवत् श्रृङ्गार कर स्वर्णमय कल्पवृक्ष, श्रेष्ठ लवणाचल और समस्त उपकरणोंसहित शय्याका दान कर रही थी। इस प्रकार पूजा करती हुई अनङ्गवतीको देखकर तुम दोनोंके मनमें यह विचार जाग्रत् हुआ कि इन कमलपुष्पोंसे क्या लेना है। अच्छा तो यह होता कि इनसे भगवान् विष्णुका श्रृङ्गार किया जाता। |
* यह इतिहास-पुराणादिमें अति प्रसिद्ध विदिशा नामकी नदीके तटपर बसा मध्यप्रदेशके मध्यकालीन इतिहासका बेसनगर, आजकलका भेलसा नगर है। इसपर कनिंघमका (Bhelsa-Topes) ग्रन्थ प्रसिद्ध है।