मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १०० * | ३४१ |
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| लोकैः समस्तैर्नगरवासिभिः सहितो नृपः।<br>द्वीपानि सुरलोकं च यथेष्टं व्यचरत् तदा॥ ३<br>कल्पादौ सप्तमं द्वीपं तस्य पुष्करवासिनः।<br>लोकेन पूजितं यस्मात् पुष्करद्वीपमुच्यते॥ ४<br>देवेन ब्रह्मणा दत्तं यानमस्य यतोऽम्बुजम्।<br>पुष्पवाहनमित्याहुस्तस्मात् तं देवदानवाः॥ ५<br>नागम्यमस्यास्ति जगतत्रयेऽपि<br>ब्रह्माम्बुजस्थस्य तपोऽनुभावात्।<br>पत्नी च तस्याप्रतिमा मुनीन्द्र<br>नारीसहस्रैरभितोऽभिनन्द्या।<br>नाम्ना च लावण्यवती बभूव<br>सा पार्वतीवेष्टतमा भवस्य॥ ६<br>तस्यात्मजानामयुतं बभूव<br>धर्मात्मनामग्र्यधनुर्धराणाम्।<br>तदात्मनः सर्वमवेक्ष्य राजा<br>मुहुर्मुहुर्विस्मयमाससाद।<br>सोऽभ्यागतं वीक्ष्य मुनिप्रवीरं<br>प्राचेतसं वाक्यमिदं बभाषे॥ ७ | उसे पाकर उस समय राजा पुष्पवाहन अपने नगर एवं जनपदवासियोंके साथ उसपर आरूढ़ होकर स्वेच्छानुसार देवलोकों तथा सातों द्वीपोंमें विचरण किया करता था। कल्पके आदिमें पुष्करनिवासी उस पुष्पवाहनका सातवें द्वीपपर अधिकार था, इसीलिये लोकमें उसकी प्रतिष्ठा थी और आगे चलकर वह द्वीप पुष्करद्वीप नामसे कहा जाने लगा। चूँकि देवेश्वर ब्रह्माने इसे कमलरूप विमान प्रदान किया था, इसलिये देवता एवं दानव उसे पुष्पवाहन कहा करते थे। तपस्याके प्रभावसे ब्रह्माद्वारा प्रदत्त कमलरूप विमानपर आरूढ़ होनेपर उसके लिये त्रिलोकीमें भी कोई स्थान अगम्य न था। मुनीन्द्र! उसकी पत्नीका नाम लावण्यवती था। वह अनुपम सुन्दरी थी तथा हजारों नारियोंद्वारा चारों ओरसे समादृत होती रहती थी। वह राजाको उसी प्रकार अत्यन्त प्यारी थी, जैसे शंकरजीको पार्वती परम प्रिय हैं। उसके दस हजार पुत्र थे, जो परम धार्मिक और धनुर्धारियोंमें अग्रगण्य थे। अपनी इन सारी विभूतियोंपर बारम्बार विचारकर राजा पुष्पवाहन विस्मयविमुग्ध हो जाता था। एक बार (प्रचेताके पुत्र) मुनिवर वाल्मीकि* राजाके यहाँ पधारे। उन्हें आया देख राजाने उनसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–७॥ | | राजोवाच<br>कस्माद् विभूतिरमलामरमर्त्यपूज्या<br>जाता च सर्वविजितामरसुन्दरीणाम्।<br>भार्या ममाल्पतपसा परितोषितेन<br>दत्तं ममाम्बुजगृहं च मुनीन्द्र धात्रा॥ ८<br>यस्मिन् प्रविष्टमपि कोटिशतं नृपाणां<br>सामात्यकुञ्जररथौघजनावृतानाम्।<br>नो लभ्यते क्व गतमम्बरगामिभिश्च<br>तारागणेन्दुरविरश्मिभिरप्यगम्यम्॥ ९<br>तस्मात् किमन्यजननीजठरोद्भवैन<br>धर्मादिकं कृतमशेषफलासिहेतुः।<br>भगवन् मयाथ तनयैरथवान्यापि<br>भद्रं यदेतदखिलं कथय प्रचेतः॥ १० | राजाने पूछा— मुनीन्द्र! किस कारणसे मुझे यह देवों तथा मानवोंद्वारा पूजनीय निर्मल विभूति तथा अपने सौन्दर्यसे समस्त देवाङ्गनाओंको पराजित कर देनेवाली सुन्दरी भार्या प्राप्त हुई है? मेरे थोड़े-से तपसे संतुष्ट होकर ब्रह्माने मुझे ऐसा कमल-गृह क्यों प्रदान किया, जिसमें अमात्य, हाथी, रथसमूह और जनपदवासियोंसहित यदि सौ करोड़ राजा बैठ जायँ तो वे जान नहीं पड़ते कि कहाँ चले गये। वह विमान भी आकाशगामी देवताओंद्वारा केवल चमकीले ताराओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति दीख पड़ता है। इसलिये इस सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये अन्य माताके उदरसे उत्पन्न होकर अर्थात् पूर्वजन्ममें मैंने अथवा मेरे पुत्रोंने या मेरी इस पत्नीने कौन-सा ऐसा शुभ धर्म आदि कार्य किया है? प्रचेतः! यह सारा-का-सारा विषय मुझे बतलाइये॥ ८–१०॥ |
* वाल्मीकिरामायण, उत्तरकाण्ड ९३। १७, ९६। १९ तथा अध्यात्मरामायण ७। ७। ३१, बालरामायण, उत्तर-रामचरित आदिके अनुसार 'प्राचेतस' शब्द महर्षि वाल्मीकिका ही वाचक है।