भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४० * मत्स्यपुराण *


| समाप्यैवं यथाशक्त्या द्वादश द्वादशीः पुनः।<br>संवत्सरान्ते लवणपर्वतेन समन्वितम्।<br>शय्यां दद्यान्मुनिश्रेष्ठ गुरवे धेनुसंयुताम्॥ १५<br><br>ग्रामं च शक्तिमान् दद्यात् क्षेत्रं वा भवनान्वितम्।<br>गुरुं सम्पूज्य विधिवद् वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १६<br><br>अन्यान्पि यथाशक्त्या भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेद् वस्त्रगोदानै रत्नौघधनसंचयैः।<br>अल्पवित्तो यथाशक्त्या स्तोकं स्तोकं समाचरेत्॥ १७<br><br>यश्चाप्यतीव निःस्वः स्याद् भक्तिमान्माधवं प्रति।<br>पुष्पार्चनविधानेन स कुर्याद् वत्सरद्वयम्॥ १८<br><br>अनेन विधिना यस्तु विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>कुर्यात् पापविनिर्मुक्तः पितॄणां तारयेच्छतम्॥ १९<br><br>जन्मनां शतसाहस्रं न शोकफलभाग् भवेत्।<br>न च व्याधिर्भवेत् तस्य न दारिद्र्यं न बन्धनम्।<br>वैष्णवो वाथ शैवो वा भजेज्जन्मनि जन्मनि॥ २०<br><br>यावद् युगसहस्राणां शतमष्टोत्तरं भवेत्।<br>तावत् स्वर्गे वसेद् ब्रह्मन् भूपतिश्च पुनर्हवेत्॥ २१ | मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार यथाशक्ति बारह द्वादशी-व्रतोंको समाप्त कर वर्षके अन्तमें गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या दान करनी चाहिये। व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ खेतका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करनेका विधान है। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुकूल थोड़ा-थोड़ा ही दान कर सकता है तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे दो वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। ब्रह्मन्! जबतक एक सौ आठ सहस्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है॥ १२—२१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विष्णुव्रतं नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-सम्बन्धी विष्णु-व्रत नामक निन्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९९॥


सौवाँ अध्याय

विभूतिद्वादशी* के प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त

| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>पुरा रथन्तरे कल्पे राजाऽऽसीत् पुष्पवाहनः।<br>नाम्ना लोकेषु विख्यातस्तेजसा सूर्यसंनिभः॥ १<br><br>तपसा तस्य तुष्टेन चतुर्वक्त्रेण नारद।<br>कमलं काञ्चनं दत्तं यथाकामगमं मुने॥ २ | नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! बहुत पहले रथन्तरकल्पमें पुष्पवाहन नामका एक राजा हुआ था जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात तथा तेजमें सूर्यके समान था। मुने! उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे एक सोनेका कमल (रूप विमान) प्रदान किया था, जो इच्छानुसार जहाँ-कहीं भी आ-जा सकता था। |


* इस व्रतका वर्णन पद्म० सृष्टि० २०१।—४२, भविष्योत्तर, व्रतरत्न, व्रतराज, व्रतकल्पद्रुम आदिमें भी यों ही प्राप्त होता है। पाद्मीय कथामें तीर्थगुरु पुष्करक्षेत्रका भी सम्बन्ध प्रदृष्ट है।