भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 349

* अध्याय ९९ * ३३९

| कार्तिके चैत्रवैशाखे मार्गशीर्षे च फाल्गुने।<br>आषाढे वा दशम्यां तु शुक्लायां लघुभुङ्नरः।<br>कृत्वा सायन्तनीं संध्यां गृह्णीयान्नियमं बुधः ॥ २<br>एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।<br>द्वादश्यां द्विजसंयुक्तः करिष्ये भोजनं विभो ॥ ३<br>तदविघ्नेन मे यातु सफलं स्याच्च केशव।<br>नमो नारायणायेति वाच्यं च स्वपता निशि ॥ ४<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>पूजयेत् पुण्डरीकाक्षं शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ५<br>विभूतये नमः पादावशोकय च जानुनी।<br>नमः शिवायेट्यूरू च विश्वमूर्ते नमः कटिम् ॥ ६<br>कंदर्पाय नमो मेढ्रमादित्याय नमः करौ।<br>दामोदरायेत्युदरं वासुदेवाय च स्तनौ ॥ ७<br>माधवायेत्युरो विष्णोः कण्ठमुत्कण्ठिने नमः।<br>श्रीधराय मुखं केशान् केशवायेति नारद ॥ ८<br>पृष्ठं शार्ङ्गधरायेति श्रवणौ वरदाय वै।<br>स्वनाम्ना शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये।<br>शिरः सर्वात्मने ब्रह्मन् नम इत्यभिपूजयेत् ॥ ९<br>मत्स्यमुत्पलसंयुक्तं हैमं कृत्वा तु शक्तितः।<br>उदकुम्भसमायुक्तमग्रतः स्थापयेद् बुधः ॥ १०<br>गुडपात्रं तिलैर्युक्तं सितवस्त्राभिवेष्टितम्।<br>रात्रौ जागरणं कुर्यादितिहासकथादिना ॥ ११ | बुद्धिमान् मनुष्य कार्तिक, चैत्र, वैशाख, मार्गशीर्ष, फाल्गुन अथवा आषाढमासमें शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको स्वल्पाहार कर सायंकालिक संध्योपासनासे निवृत्त होकर इस प्रकारका नियम ग्रहण करे—‘प्रभो! मैं एकादशीको निराहार रहकर भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति अर्चना करूँगा और द्वादशीके दिन ब्राह्मणके साथ बैठकर भोजन करूँगा। केशव! मेरा यह नियम निर्विघ्नतापूर्वक निभ जाय और फलदायक हो।' फिर रातमें 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप करते हुए सो जाय। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि करके पवित्र हो जाय और श्वेत पुष्पोंकी माला एवं चन्दन आदिसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका पूजन करे। (पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—) 'विभूतये नमः' से दोनों चरणोंकी, 'अशोकाय नमः' से जानुओंकी, 'शिवाय नमः' से ऊरुओंकी, 'विश्वमूर्ते नमः' से कटिकी, 'कंदर्पाय नमः' से जननेन्द्रियकी, 'आदित्याय नमः' से हाथोंकी, 'दामोदराय नमः' से उदरकी, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'माधवाय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलकी, 'उत्कण्ठिने नमः' से कण्ठकी, 'श्रीधराय नमः' से मुखकी, 'केशवाय नमः' से केशोंकी, 'शार्ङ्गधराय नमः' से पीठकी, 'वरदाय नमः' से दोनों कानोंकी और 'सर्वात्मने नमः' से सिरकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण देवता नारदजी! तत्पश्चात् 'शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये नमः' कहकर अपने नामका उच्चारण करते हुए चरणोंमें प्रणिपात करे। तदुपरान्त बुद्धिमान् व्रती मूर्तिके अग्रभागमें एक जलपूर्ण कलश स्थापित करे। उसपर तिलसे युक्त गुड़से भरा हुआ पात्र, जो श्वेत वस्त्रसे परिवेष्टित हो, रख दे। उसके ऊपर अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमलसहित मत्स्य बनवाकर स्थापित करे और रात्रिमें इतिहास-पुराण आदिकी कथाओंको सुनते हुए जागरण करे ॥ १—११॥ | | प्रभातायां तु शर्वर्यां ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>सकाञ्चनोत्पलं देवं सोदकुम्भं निवेदयेत् ॥ १२<br>यथा न मुच्यसे देव सदा सर्वविभूतिभिः।<br>तथा मामुद्धराशेषदुःखसंसारकर्दमात् ॥ १३<br>दशावताररूपाणि प्रतिमासं क्रमान्मुने।<br>दत्तात्रेयं तथा व्यासमुत्पलेन समन्वितम्।<br>दद्याद्देवं समा यावत् पाषण्डानभिवर्जयेत् ॥ १४ | रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल स्वर्णमय कमल और कलशके साथ वह देव-मूर्ति कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर देनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'देव! जिस प्रकार आप सदा सम्पूर्ण विभूतियोंसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार इस निखिल कष्टोंसे परिपूर्ण संसाररूपी कीचड़से मेरा उद्धार कीजिये।' मुने! इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास क्रमशः भगवान्के दस अवतारों तथा दत्तात्रेय और व्यासकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्वर्णनिर्मित कमलके साथ दान करनी चाहिये। उस समय छल, कपट, पाखण्ड आदिसे दूर रहना चाहिये। |