भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • मत्स्यपुराण * पयस्विनीः शीलवतीश्च दद्या- हैमैः शृङ्गै रौप्यखुरैश्च युक्ताः। गावोऽष्ट वा सप्त सकांश्यदोहा माल्याम्बरा वा चतुरोऽप्यशक्तः। दौर्गत्ययुक्तः कपिलामथैकां निवेदयेद् ब्राह्मणपुङ्गवाय ॥११ हैमीं च दद्यात् पृथिवीं सशेषा- माकार्यरूप्यामथ वा च ताम्रीम्। पेष्टीमशक्तः प्रतिमां विधाय सौवर्णसूर्येण समं प्रदद्यात्। न वित्तशाठ्यं पुरुषोऽत्र कुर्यात् कुर्वन्नधो याति न संशयोऽत्र ॥ १२ यावन्महेन्द्रप्रमुखैर्नगेन्द्रैः पृथ्वी च सप्ताब्धियुतेह तिष्ठेत्। तावत् स गन्धर्वगणैरशेषैः सम्पूज्यते नारद नाकपृष्ठे ॥ १३ ततस्तु कर्मक्षयमाप्य सप्त- द्वीपाधिपः स्यात् कुलशीलयुक्तः। सृष्टेर्मुखेऽव्यङ्गवपुः सभार्यः प्रभूतपुत्रान्वयवन्दिताङ्घ्रिः ॥ १४ इति पठति शृणोति वाथ भक्त्या विधिमखिलं रविसंक्रमस्य पुण्यम्। मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै- रमरपतेर्भवने प्रपूज्यते च ॥ १५ वे गौएँ दूध देनेवाली, सीधी-सादी एवं पुष्प-माला और वस्त्रसे सुसज्जित हों, उनके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा उनके साथ काँसेकी दोहनी भी हो। जो इस प्रकारकी बारह गौओंका दान करनेमें असमर्थ हो, उसके लिये आठ, सात अथवा चार ही गौ दान करनेका विधान है। जो दुर्गतिमें पड़ा हुआ निर्धन हो, वह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक ही कपिला गौका दान कर सकता है। इसी प्रकार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी शेषनागसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनवाकर दान करना चाहिये। जो ऐसा करनेमें असमर्थ हो, वह आटेकी शेषसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनाकर स्वर्णनिर्मित सूर्यके साथ दान कर सकता है। पुरुषको इस दानमें कंजूसी नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसका अधःपतन हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। नारदजी! जबतक इस मृत्युलोकमें महेन्द्र आदि देवगणों, हिमालय आदि पर्वतों और सातों समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीका अस्तित्व है, तबतक स्वर्गलोकमें अखिल गन्धर्वसमूह उस व्रतीकी भलीभाँति पूजा करते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह सृष्टिके आदिमें उत्तम कुल और शीलसे सम्पन्न होकर भूतलपर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। वह सुन्दर रूप और सुन्दरी पत्नीसे युक्त होता है, बहुत-से पुत्र और भाई-बन्धु उसके चरणोंकी वन्दना करते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सूर्य-संक्रान्तिकी इस पुण्यमयी अखिल विधिको भक्तिपूर्वक पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करनेकी सम्मति देता है, वह भी इन्द्रलोकमें देवताओंद्वारा पूजित होता है॥ १०-१५॥ इति श्रीमात्स्ये महापुराणे संक्रान्त्युद्यापनविधिर्नामाष्टनवतिमतोऽध्यायः ॥ ९८ ॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें संक्रान्त्युद्यापनविधि नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥ निन्यानबेवाँ अध्याय विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य नन्दिकेश्वर उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि विष्णोर्व्रतमनुत्तमम्। विभूतिद्वादशीनाम सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ १ नन्दिकेश्वर बोले- नारदजी ! सुनिये, अब मैं भगवान् विष्णुके विभूतिद्वादशी नामक सर्वोत्तम व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो सम्पूर्ण देवगणोंद्वारा अभिवन्दित है।