मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ९८ * | ३३७ ---|---
अट्ठानबेवाँ अध्याय
संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>अथान्यदपि वक्ष्यामि संक्रान्त्युद्यापने फलम्।<br>यदक्षयं परे लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br><br>अयने विषुवे वापि संक्रान्तिव्रतमाचरेत्।<br>पूर्वेद्युरेकभक्तेन दन्तधावनपूर्वकम्।<br>संक्रान्तिवासरे प्रातस्तिलैः स्नानं विधीयते॥ २<br><br>रविसंक्रमणे भूमौ चन्दनेनाष्टपत्रकम्।<br>पद्मं सकर्णिकं कुर्यात् तस्मिन्नावाहयेद् रविम्॥ ३<br><br>कणिकायां न्यसेत् सूर्यमादित्यं पूर्वतस्ततः।<br>नम उष्णार् चिषे याम्ये नमो ऋङ्मण्डलाय च॥ ४<br><br>नमः सवित्रे नैर्ऋत्ये वारुणे तपनं पुनः।<br>वायव्ये तु भगं न्यस्य पुनः पुनरर्थार्चयेत्॥ ५<br><br>मार्तण्डमुत्तरे विष्णुमीशाने विन्यसेत् सदा।<br>गन्धमाल्यफलैर्भक्ष्यैः स्थण्डिले पूजयेत् ततः॥ ६<br><br>द्विजाय सोदकुम्भं च घृतपात्रं हिरण्मयम्।<br>कमलं च यथाशक्त्या कारयित्वा निवेदयेत्॥ ७<br><br>चन्दनोदकपुष्पैश्च देवायार्घ्यं न्यसेद् भुवि।<br>विश्वाय विश्वरूपाय विश्वधाम्ने स्वयम्भुवे।<br>नमोऽनन्त नमो धात्रे ऋक्सामयजुषाम्पते॥ ८<br><br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>वत्सरान्तेऽथवा कुर्यात् सर्वं द्वादशधा नरः॥ ९ | नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! अब मैं संक्रान्तिके समय किये जानेवाले उद्यापन-रूप अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो इस लोकमें समस्त कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। सूर्यके उत्तरायण या दक्षिणायनके दिन अथवा विषुवयोगमें इस संक्रान्तिव्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। इस व्रतमें संक्रान्तिके पहले दिन एक बार भोजन करके (रात्रिमें शयन करे।) संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल दाँतुन करनेके पश्चात् तिलमिश्रित जलसे स्नान करनेका विधान है। सूर्य-संक्रान्तिके दिन भूमिपर चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल कमलकी रचना करे और उसपर सूर्यका आवाहन करे। कर्णिकामें 'सूर्याय नमः', पूर्वदलपर 'आदित्याय नमः', अग्निकोणस्थित दलपर 'उष्णार् चिषे नमः', दक्षिणदलपर 'ऋङ्मण्डलाय नमः', नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर 'सवित्रे नमः', पश्चिमदलपर 'तपनाय नमः', वायव्यकोणस्थित दलपर 'भग्याय नमः', उत्तरदलपर 'मार्तण्डाय नमः' और ईशानकोणवाले दलपर 'विष्णवे नमः' से सूर्यदेवको स्थापित कर उनकी बारंबार अर्चना करे। तत्पश्चात् वेदीपर भी चन्दन, पुष्पमाला, फल और खाद्य पदार्थोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमल बनवाकर उसे घृतपूर्ण पात्र और कलशके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पयुक्त जलसे भूमिपर सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करे। (अर्घ्यका मन्त्रार्थ इस प्रकार है—) 'अनन्त! आप ही विश्व हैं, विश्व आपका स्वरूप है, आप विश्वमें सर्वाधिक तेजस्वी, स्वयं उत्पन्न होनेवाले, धाता और ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेदके स्वामी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।' इसी विधिसे मनुष्यको प्रत्येक मासमें सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये अथवा (यदि ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो) वर्षकी समाप्तिके दिन यह सारा कार्य बारह बार करे (दोनोंका फल समान ही है)॥ १—९॥ |
| संवत्सरान्ते घृतपायसेन<br>संतर्प्य वह्निं द्विजपुङ्गवांश्च।<br>कुम्भान् पुनर्द्वादशधेनुयुक्तान्<br>सरत्नहैरण्मयपद्मयुक्तान् ॥ १० | एक वर्ष व्यतीत होनेपर घृतमिश्रित खीरसे अग्नि और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भलीभाँति संतुष्ट करे और बारह गौ एवं रत्नसहित स्वर्णमय कमलके साथ कलशोंको दान कर दे। |