मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय १०१ * | ३४५ |
|---|---|
| श्लोक | अर्थ |
| यस्तु नीलोत्पलं हैमं शर्करापात्रसंयुक्तम्।<br>एकान्तरितनक्ताशी समान्ते वृषसंयुतम्।<br>स वैष्णवं पदं याति नीलव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५<br>आषाढादिचतुर्मासमभ्यङ्गं वर्जयेन्नरः।<br>भोजनोपस्करं दद्यात् स याति भवनं हरेः।<br>जनप्रीतिकरं नृणां प्रीतिव्रतमिहोच्यते॥ ६<br>वर्जयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षीरघृतैक्षवम्।<br>दद्याद् वस्त्राणि सूक्ष्माणि रसपात्रैश्च संयुतम्॥ ७<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं गौरी मे प्रीयतामिति।<br>एतद् गौरीव्रतं नाम भवानीलोकदायकम्॥ ८ | जो मनुष्य एक दिनके अन्तरसे रातमें एक बार भोजन करके वर्षकी समाप्तिके अवसरपर शक्करसे पूर्ण पात्रसहित स्वर्णनिर्मित नील कमलको वृषभके साथ दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है; यह 'नीलव्रत' कहा जाता है। जो मनुष्य आषाढ़से लेकर चार मासतक शरीरमें तेल नहीं लगाता और भोजनकी सामग्री दान करता है वह श्रीहरिके लोकको जाता है। इस लोकमें यह मनुष्योंमें प्रत्येक व्यक्तिको प्रिय लगनेवाला 'प्रीतिव्रत' नामसे कहा जाता है। जो मनुष्य चैत्रमासमें दही, दूध, घी और शक्करका त्याग कर देता है और 'गौरी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे ब्राह्मण-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके रसपूर्ण पात्रोंके साथ महीन वस्त्रोंका दान करता है (वह गौरीलोकमें जाता है)। गौरीलोककी प्राप्ति करानेवाला यह 'गौरीव्रत' है॥ १—८॥ |
| पुष्यादौ यत्रयोदश्यां कृत्वा नक्तमथो पुनः।<br>अशोकं काञ्चनं दद्यादिक्षुयुक्तं दशाङ्गुलम्॥ ९<br>विप्राय वस्त्रसंयुक्तं प्रद्युम्नः प्रीयतामिति।<br>कल्पं विष्णुपदे स्थित्वा विशोकः स्यात् पुनर्नरः।<br>एतत् कामव्रतं नाम सदा शोकविनाशनम्॥ १० | पुनः जो मनुष्य पुष्यनक्षत्रसे युक्त त्रयोदशी तिथिको रातमें एक बार भोजन कर (दूसरे दिन) दस अङ्गुल लम्बा सोनेका अशोक-वृक्ष बनवाकर उसे वस्त्र और गन्नेके साथ 'प्रद्युम्न मुझपर प्रसन्न हों' इस भावनासे ब्राह्मणको दान करता है, वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके पुनः शोकरहित हो जाता है। सदा शोकका विनाश करनेवाला यह 'कामव्रत' है। |
| आषाढादिव्रतं यस्तु वर्जयेन्नखकर्तनम्।<br>वार्त्ताकं च चतुर्मासं मधुसर्पिर्घटान्वितम्॥ ११<br>कार्तिक्यां तत्पुनर्हेमं ब्राह्मणाय निवेदयेत्।<br>स रुद्रलोकमाप्नोति शिवव्रतमिदं स्मृतम्॥ १२ | जो मनुष्य चौमासेमें—आषाढ़ पूर्णिमासे लेकर कार्तिकतक नख (बाल) नहीं कटवाता और भाँटा नहीं खाता, पुनः कार्तिकी पूर्णिमाको मधु और घीसे भरे हुए घड़ेके साथ स्वर्णनिर्मित भाँटा ब्राह्मणको दान करता है वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। इसे 'शिवव्रत' कहा जाता है। |
| वर्जयेद् यस्तु पुष्पाणि हेमन्तशिशिरावृतू।<br>पुष्पत्रयं च फाल्गुन्यां कृत्वा शक्त्या च काञ्चनम्॥ १३<br>दद्याद् विकालवेलायां प्रीयेतां शिवकेशवौ।<br>दत्त्वा परं पदं याति सौम्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ १४ | जो मनुष्य हेमन्त और शिशिर-ऋतुओंमें पुष्पोंको काममें नहीं लेता और फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको अपनी शक्तिके अनुकूल सोनेके तीन पुष्प बनवाकर उन्हें सायंकालमें 'भगवान् शिव और केशव मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे दान करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। यह 'सौम्यव्रत' कहलाता है। |
| फाल्गुन्यादितृतीयायां लवणं यस्तु वर्जयेत्।<br>समान्ते शयनं दद्याद् गृहं चोपस्करान्वितम्॥ १५<br>सम्पूज्य विप्रमिथुनं भवानी प्रीयतामिति।<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं सौभाग्यव्रतमुच्यते॥ १६ | जो मनुष्य फाल्गुनमासकी आदि तृतीया तिथिको नमक खाना छोड़ देता है तथा वर्षान्तके दिन 'भवानी मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे द्विज-दम्पतिकी भलीभाँति पूजा करके गृहस्थीके उपकरणोंसे युक्त गृह और शय्या दान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है। इसे 'सौभाग्यव्रत' कहा जाता है। |
| संध्यामौनं नरः कृत्वा समान्ते घृतकुम्भकम्।<br>वस्त्रयुग्मं तिलान् घण्टां ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १७<br>सारस्वतं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>एतत् सारस्वतं नाम रूपविद्याप्रदं व्रतम्॥ १८ | जो मनुष्य संध्याकी वेलामें मौन रहनेका नियम पालन कर वर्षकी समाप्तिमें घृतपूर्ण घट, दो वस्त्र, तिल और घंटा ब्राह्मणको दान करता है, वह पुनरागमनरहित सारस्वत-पदको प्राप्त होता है। सौन्दर्य और विद्या प्रदान करनेवाला यह |
१०३- युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम
३४६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लक्ष्मीमभ्यर्च्य पञ्चम्यामुपवासी भवेन्नरः।<br>समान्ते हेमकमलं दद्याद् धेनुसमन्वितम्॥ १९<br>स वैष्णवं पदं याति लक्ष्मीवान् जन्मजन्मनि।<br>एतत् सम्पद्व्रतं नाम दुःखशोकविनाशनम्॥ २०<br>कृत्वोपलेपनं शम्भोरग्रतः केशवस्य च।<br>यावदब्दं पुनर्दद्याद् धेनुं जलघटान्विताम्॥ २१<br>जन्मायुतं स राजा स्यात् ततः शिवपुरं व्रजेत्।<br>एतदाययुर्व्रतं नाम सर्वकामप्रदायकम्॥ २२<br>अश्वत्थं भास्करं गङ्गां प्रणम्यैकत्र वाग्यतः।<br>एकभक्तं नरः कुर्यादब्दमेकं विमत्सरः॥ २३<br>व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूज्यं धेनुत्रयान्वितम्।<br>वृक्षं हिरण्मयं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>एतत् कीर्तिव्रतं नाम भूतिकीर्तिफलप्रदम्॥ २४<br>घृतेन स्नपनं कुर्याच्छम्भोर्वा केशवस्य च।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः कृत्वा गोमयमण्डलम्॥ २५<br>तिलधेनुसमोपेतं समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>शुद्धमष्टाङ्गुलं दद्याच्छिवलोके महीयते।<br>सामगाय ततश्चैतत् सामव्रतमिहोच्यते॥ २६ | 'सारस्वत' नामक व्रत है ॥ ९—१८ ॥<br><br>जो मनुष्य पञ्चमी तिथिको निराहार रहकर लक्ष्मीकी पूजा करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन गौके साथ स्वर्ण-निर्मित कमलका दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और प्रत्येक जन्ममें लक्ष्मीसे सम्पन्न रहता है। यह 'सम्पद्व्रत' है, जो दुःख और शोकका विनाश करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक भगवान् शिव और केशवकी मूर्तिके सामनेकी भूमिको लीपकर वहाँ जलपूर्ण घटसहित गौका दान करता है, वह दस हजार वर्षोतक राजा होता है और मरणोपरान्त शिवलोकमें जाता है। यह 'आयुव्रत' है, जो सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक मत्सररहित हो दिनमें एक बार भोजन कर मौन-धारणपूर्वक एक ही स्थानपर पीपल, सूर्य और गङ्गाको प्रणाम करता है तथा व्रतकी समाप्तिमें पूजनीय ब्राह्मण-दम्पतिको तीन गौओंके साथ स्वर्णनिर्मित वृक्षका दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। यह 'कीर्तिव्रत' है, जो वैभव और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। जो मनुष्य एक वर्षतक गोबरसे मण्डल बनाकर वहाँ भगवान् शिव अथवा केशवको घीसे स्नान कराकर पुष्प, अक्षत आदिसे पूजा करता है और वर्षान्तमें तिल-धेनुसहित आठ अङ्गुल लम्बा शुद्ध स्वर्णनिर्मित कमल सामवेदी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे इस लोकमें 'सामव्रत' कहा जाता है ॥ १९—२६ ॥ |
| नवम्यामेकभक्तं तु कृत्वा कन्याश्च शक्तितः।<br>भोजयित्वाऽऽसनं दद्याद्धेमकञ्चुकवाससी॥ २७<br>हैमं सिंहं च विप्राय दत्त्वा शिवपदं व्रजेत्।<br>जन्मार्बुदं सुरूपः स्याच्छत्रुभिश्चापराजितः।<br>एतद् वीरव्रतं नाम नारीणां च सुखप्रदम्॥ २८ | जो मनुष्य नवमी तिथिको दिनमें एक बार भोजन करके अपनी शक्तिके अनुसार कन्याओंको भोजन कराकर उन्हें आसन और सोनेके तारोंसे खचित चोली एवं साड़ी तथा ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित सिंह दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक अरब जन्मोंतक सौन्दर्यसम्पन्न एवं शत्रुओंके लिये अजेय हो जाता है। यह 'वीरव्रत' है, जो नारियोंके लिये सुखदायक है। |
| यावत्समा भवेद् यस्तु पञ्चदश्यां पयोव्रतः।<br>समान्ते श्राद्धकृद् दद्यात् पञ्च गास्तु पयस्विनीः॥ २९<br>वासांसि च पिशङ्गानि जलकुम्भयुतानि च।<br>स याति वैष्णवं लोकं पितॄणां तारयेच्छतम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् पितृव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३० | जो मनुष्य एक वर्षतक पूर्णिमा तिथिको केवल दूध पीकर व्रत करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन श्राद्ध करके लालिमायुक्त भूरे रंगके वस्त्र और जलपूर्ण घटोंके साथ पाँच दुधारू गायें दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और अपने सौ पीढ़ीतकके पितरोंको तार देता है। पुनः एक कल्प व्यतीत होनेपर वह भूतलपर राजराजेश्वर होता है। यह 'पितृव्रत' कहलाता है। |
| चैत्रादिचतुरो मासान् जलं दद्यादयाचितम्।<br>व्रतान्ते माणिकं दद्यादन्नवस्त्रसमन्वितम्॥ ३१ | जो मनुष्य चैत्रसे आरम्भ कर चार मासतक बिना याचना किये जलका दान देता है अर्थात् पौसला चलाता है तथा व्रतके अन्तमें अन्न एवं |
| * अध्याय १०१ * | ३४७ |
|---|---|
| तिलपात्रं हिरण्यं च ब्रह्मलोके महीयते।<br>कल्पान्ते भूपतिर्नूनमानन्दव्रतमुच्यते॥ ३२ | वस्त्रसे युक्त मिट्टीका घड़ा, तिलसे भरा पात्र और सुवर्णका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। एक कल्पके व्यतीत होनेपर वह निश्चय ही भूपाल होता है। यह 'आनन्दव्रत' कहा जाता है॥ २७—३२॥ |
| पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वा संवत्सरं विभोः।<br>वत्सरान्ते पुनर्दद्याद् धेनुं पञ्चामृतेन हि॥ ३३<br>विप्राय दद्याच्छङ्खं च स पदं याति शाङ्करम्।<br>राजा भवति कल्पान्ते धृतिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३४ | जो एक वर्षतक पञ्चामृत (दूध, दही, घी, मधु, शक्कर)-से भगवान्की मूर्तिको स्नान कराता है, पुनः वर्षान्तमें पञ्चामृतसहित गौ और शङ्ख ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक कल्पके बाद भूतलपर राजा होता है। यह 'धृतिव्रत' कहा जाता है। |
| वर्जयित्वा पुमान् मांसमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>तद्वद्धेममृगं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>अहिंसाव्रतमित्युक्तं कल्पान्ते भूपतिर्भवेत्॥ ३५ | जो मनुष्य एक वर्षतक मांस खाना छोड़कर वर्षान्तमें गौ दान करता है तथा उसके साथ स्वर्णनिर्मित मृग भी देता है, वह अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है और कल्पान्तमें राजा होता है। यह 'अहिंसाव्रत' कहलाता है। |
| माघमास्युषसि स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत्।<br>भोजयित्वा यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>सूर्यलोके वसेत् कल्पं सूर्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३६ | जो मनुष्य माघमासमें ब्राह्मवेलामें स्नान कर अपनी शक्तिके अनुसार एक द्विज-दम्पतिको भोजन कराकर पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे उनकी पूजा करता है, वह एक कल्पतक सूर्यलोकमें निवास करता है। यह 'सूर्यव्रत' कहा जाता है। |
| आषाढादि चतुर्मासं प्रातःस्नायी भवेन्नरः।<br>विप्रेभ्यो भोजनं दद्यात् कार्तिक्त्यां गोप्रदो भवेत्।<br>स वैष्णवं पदं याति विष्णुव्रतमिदं शुभम्॥ ३७ | जो मनुष्य आषाढ़से आरम्भकर चार महीनेतक नित्य प्रातःकाल स्नान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन देता है तथा कार्तिकी पूर्णिमाको गो-दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। यह मङ्गलमय 'विष्णुव्रत' है। |
| अयनादयनं यावद् वर्जयेत् पुष्पसर्पिषी।<br>तदन्ते पुष्पदामानि घृतधेन्वा सहैव तु॥ ३८<br>दत्त्वा शिवपदं गच्छेद्विप्राय घृतपायसम्।<br>एतच्छीलव्रतं नाम शीलारोग्यफलप्रदम्॥ ३९ | जो मनुष्य एक अयनसे दूसरे अयनतक (उत्तरायणसे दक्षिणायन अथवा दक्षिणायनसे उत्तरायणतक) पुष्प और घीका त्याग कर देता है और व्रतान्तके दिन घृत, धेनुसहित पुष्पोंकी मालाएँ एवं घी और दूधसे बने हुए खाद्य पदार्थ ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'शीलव्रत' है, जो सुशीलता एवं नीरोगतारूप फल प्रदान करता है। |
| संध्यादीपप्रदो यस्तु घृतं तैलं विवर्जयेत्।<br>समान्ते दीपिकां दद्याच्चक्रशूले च काञ्चने॥ ४०<br>वस्त्रयुग्मं च विप्राय तेजस्वी स भवेदिह।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति दीप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४१ | जो एक वर्षतक नित्य सायंकाल दीप-दान करता है और तेल-घी खाना छोड़ देता है, पुनः वर्षान्तमें ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित चक्र, त्रिशूल और दो वस्त्रके साथ दीपकका दान देता है, वह इस लोकमें तेजस्वी होता है और मरणोपरान्त रुद्रलोकको प्राप्त होता है। यह 'दीप्तिव्रत' कहलाता है॥ ३३—४१॥ |
| कार्तिक्यादितृतीयायां प्राश्य गोमूत्रयावकम्।<br>नक्तं चरेदब्दमेकमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्॥ ४२<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं ततो राजा भवेदिह।<br>एतद् रुद्रव्रतं नाम सदा कल्याणकारकम्॥ ४३ | जो एक वर्षतक कार्तिकमाससे प्रारम्भ कर तृतीया तिथिको गोमूत्र एवं जौसे बने हुए खाद्य पदार्थोंको खाकर नक्तव्रतका पालन करता है और वर्षान्तमें गोदान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है और (पुण्य क्षीण होनेपर) भूतलपर राजा होता है। यह 'रुद्रव्रत' है जो सदाके लिये कल्याणकारी है। |
३४८ | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वर्जयेच्चैत्रमासे च यश्च गन्धानुलेपनम्।<br>शुक्तिं गन्धभृतां दत्त्वा विप्राय सितवाससी।<br>वारुणं पदमाप्नोति दृढव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४४ | जो चैत्रमासमें सुगन्धित वस्तुओंका अनुलेपन छोड़ देता है अर्थात् शरीरमें सुगन्धित पदार्थ नहीं लगाता और व्रतान्तमें ब्राह्मणको दो श्वेत वस्त्रोंके साथ गन्धधारियोंकी शुक्ति (गन्धद्रव्यविशेष)-का दान करता है वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। यह 'दृढव्रत' कहलाता है। |
| वैशाखे पुष्पलवणं वर्जयित्वाथ गोप्रदः।<br>भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजा भवेदिह।<br>एतत् कान्तिव्रतं नाम कान्तिकीर्तिफलप्रदम्॥ ४५ | जो वैशाख-मासमें पुष्प और नमकका परित्याग कर व्रतान्तमें गोदान करता है वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके (पुण्य क्षीण होनेपर) इस लोकमें राजा होता है। यह 'कान्तिव्रत' है, जो कान्ति और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। |
| ब्रह्माण्डं काञ्चनं कृत्वा तिलराशिसमन्वितम्।<br>त्र्यहं तिलप्रदो भूत्वा वह्निं संतर्प्य सद्धिजम्॥ ४६<br>सम्पूज्य विप्रदाम्पत्यं माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति॥ ४७<br>पुण्येऽह्नि दद्यात् स परं ब्रह्म यात्यपुनर्भवम्।<br>एतद् ब्रह्मव्रतं नाम निर्वाणपददायकम्॥ ४८ | जो किसी पुण्यप्रद दिनमें अपनी शक्तिके अनुसार तीन पलसे अधिक सोनेका ब्रह्माण्ड बनवाकर तिलकी राशिपर स्थापित कर देता है और तीन दिनतक ब्राह्मणसहित अग्निको संतुष्ट करके तिलका दान देता रहता है, पुनः चौथे दिन एक विप्र-दम्पतिकी पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे विधिपूर्वक पूजा करके 'विश्वात्मा मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे वह ब्रह्माण्ड दान कर देता है, वह पुनर्जन्मरहित परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। यह 'ब्रह्मव्रत' है, जो मोक्षपदका दाता है। |
| यश्चोभयमुखीं दद्यात् प्रभूतकनकान्विताम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेत् स याति परमं पदम्।<br>एतद् धेनुव्रतं नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ४९ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन (दूधका आहार) करके अधिक-से-अधिक सोनेकी बनी हुई उभयमुखी (दो मुखवाली अथवा सवत्सा) गौका दान करता है, वह पुनरागमनरहित परमपदको प्राप्त हो जाता है। यह 'धेनुव्रत' है। |
| त्र्यहं पयोव्रते स्थित्वा काञ्चनं कल्पपादपम्।<br>पलादूर्ध्वं यथाशक्त्या तण्डुलैस्तूपसंयुतम्।<br>दत्त्वा ब्रह्मपदं याति कल्पव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५० | जो तीन दिनतक पयोव्रतका पालन करके अपनी शक्तिके अनुसार एक पलसे अधिक सोनेका कल्पवृक्ष बनवाकर उसे चावलकी राशिपर स्थापित करके दान कर देता है वह ब्रह्मपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'कल्पव्रत' कहा जाता है। |
| मासोपवासी यो दद्याद् धेनुं विप्राय शोभनाम्।<br>स वैष्णवं पदं याति भीमव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५१ | जो एक मासतक निराहार रहकर ब्राह्मणको सुन्दर गौका दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है। यह 'भीमव्रत' कहलाता है॥ ४२—५१॥ |
| दद्याद् विंशत्पलादूर्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेद् रुद्रलोके महीयते।<br>धराव्रतमिदं प्रोक्तं सप्तकल्पशतानुगम्॥ ५२ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन कर बीस पलसे अधिक सोनेसे पृथ्वीकी मूर्ति बनवाकर दान करता है, वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे 'धराव्रत' कहते हैं, जो सात सौ कल्पोंतक दाताका अनुगमन करता रहता है। |
| माघे मासेऽथवा चैत्रे गुडधेनुप्रदो भवेत्।<br>गुडव्रतस्तृतीयायां गौरीलोके महीयते।<br>महाव्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम्॥ ५३ | जो माघ अथवा चैत्रमासमें तृतीया तिथिको गुडव्रतका पालन कर गुडधेनुका दान करता है वह गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह परमानन्द प्रदान करनेवाला 'महाव्रत' है। |
| पक्षोपवासी यो दद्याद् विप्राय कपिलाद्वयम्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति देवासुरसुपूजितम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् प्रभाव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५४ | जो एक पक्षतक निराहार रहकर ब्राह्मणको दो कपिला गौका दान करता है वह देवताओं एवं असुरोंद्वारा सुपूजित ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है और एक कल्प बीतनेपर भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'प्रभाव्रत' कहते हैं। |
१०४- प्रयाग-माहात्म्य-प्रसङ्गमें प्रयाग-क्षेत्रके विविध तीर्थस्थानोंका वर्णन
| * अध्याय १०१ * | ३४९ |
|---|---|
| वत्सरं त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुम्भदः ।<br>शिवलोके वसेत् कल्पं प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५५ | जो एक वर्षतक दिनमें एक ही बार भोजन करके व्रतान्तमें खाद्य पदार्थोंसहित जलपूर्ण घटका दान करता है, वह एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। इसे 'प्राप्तिव्रत' कहा जाता है। |
| नक्ताशी चाष्टमीषु स्याद् वत्सरान्ते च धेनुदः ।<br>पौरन्दरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते॥ ५६ | जो प्रत्येक मासकी अष्टमी तिथियोंमें रातमें एक बार भोजन करता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। इसे 'सुगतिव्रत' कहा जाता है। |
| विप्रायेन्धनदो यस्तु वर्षादिचतुरो ऋतून्।<br>घृतधेनुप्रदोऽन्ते च स परं ब्रह्म गच्छति।<br>वैश्वानरव्रतं नाम सर्वपापविनाशनम्॥ ५७ | जो वर्षा-ऋतुसे लेकर चार ऋतुओंतक ब्राह्मणको ईंधनका दान देता है और व्रतान्तमें घृत-धेनु प्रदान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला यह 'वैश्वानरव्रत' है। |
| एकादश्यां च नक्ताशी यश्चक्रं विनिवेदयेत् ।<br>समान्ते वैष्णवं हैमं स विष्णोः पदमाप्नुयात्।<br>एतत् कृष्णव्रतं नाम कल्पान्ते राज्यभाग् भवेत्॥ ५८ | जो एकादशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें सोनेका विष्णु-चक्र बनवाकर दान करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है और एक कल्पके बीतनेपर भूतलपर राज्यका भागी होता है। यह 'कृष्णव्रत' है। |
| पायसाशी समान्ते तु दद्याद् विप्राय गोयुगम्।<br>लक्ष्मीलोकमवाप्नोति ह्येतद् देवीव्रतं स्मृतम्॥ ५९ | जो खीरका भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें ब्राह्मणको दो गौ दान करता है, वह लक्ष्मीलोकको प्राप्त होता है। इसे 'देवीव्रत' कहा जाता है। |
| सप्तम्यां नक्तभुग् दद्यात् समान्ते गां पयस्विनीम्।<br>सूर्यलोकमवाप्नोति भानुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६० | जो सप्तमी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिमें दुधारू गौका दान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। यह 'भानुव्रत' कहलाता है। |
| चतुर्थ्यां नक्तभुग्दद्यादब्दान्ते हेमवारणम्।<br>व्रतं वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम्॥ ६१ | जो चतुर्थी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिके अवसरपर सोनेका हाथी दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। शिवलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'विनायकव्रत' है। |
| महाफलानि यस्त्यक्त्वा चतुर्मासं द्विजातये।<br>हैमानि कार्तिके दद्याद् गोयुगेन समन्वितम्।<br>एतत् फलव्रतं नाम विष्णुलोकफलप्रदम्॥ ६२ | जो चौमासेमें (बेल, जामुन, बेर, कैथ और बीजपुर नीबू) इन पाँच महाफलोंका परित्याग कर कार्तिकमासमें सोनेसे इन फलोंका निर्माण कराकर दो गौओंके साथ दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। विष्णुलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'फलव्रत' है। |
| यश्चोपवासी सप्तम्यां समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>गाश्च वै शक्तितो दद्याद्धेमान्नघटसंयुताः।<br>एतत् सौरव्रतं नाम सूर्यलोकफलप्रदम्॥ ६३ | जो सप्तमी तिथिको निराहार रहते हुए वर्षके अन्तमें अपनी शक्तिके अनुसार स्वर्णनिर्मित कमल तथा सुवर्ण, अन्न और घटसहित गौओंका दान करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। सूर्यलोकरूप फलका प्रदाता यह 'सौरव्रत' है॥ ५२—६३॥ |
| द्वादश द्वादशीर्यस्तु समाप्योपोषणेन च।<br>गोवस्त्रकाञ्चनैर्विप्रान् पूजयेच्छक्तितो नरः।<br>परमं पदमाप्नोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६४ | जो मनुष्य बारह द्वादशियोंको उपवास करके यथाशक्ति गौ, वस्त्र और सुवर्णसे ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'विष्णुव्रत' कहा जाता है। |
| कार्तिक्यां च वृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत् ।<br>शैवं पदमवाप्नोति वार्षव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६५ | जो कार्तिककी पूर्णिमा तिथिको वृषोत्सर्ग करके नक्तव्रतका पालन करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'वार्षव्रत' कहलाता है। |
३५० | * मत्स्यपुराण *
| कृच्छ्रान्ते गोप्रदः कुर्याद् भोजनं शक्तितः पदम्।<br>विप्राणां शाङ्करं याति प्राजापत्यमिदं व्रतम्॥ ६६<br>चतुर्दश्यां तु नक्ताशी समान्ते गोधनप्रदः।<br>शैव पदमवाप्नोति त्रैयम्बकमिदं व्रतम्॥ ६७<br>समरात्रोषितो दद्याद् घृतकुम्भं द्विजातये।<br>घृतव्रतमिदं प्राहुर्ब्रह्मलोकफलप्रदम्॥ ६८<br>आकाशशायी वर्षासु धेनुमन्ते पयस्विनीम्।<br>शक्रलोके वसेन्नित्यमिन्द्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६९<br>अनग्निपक्वमश्नाति तृतीयायां तु यो नरः।<br>गां दत्त्वा शिवमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>इह चानन्दकृत् पुंसां श्रेयोव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७०<br>हैमं पलद्वयादूर्ध्वं रथमश्वयुगान्वितम्।<br>ददन् कृतोपवासः स्याद् दिवि कल्पशतं वसेत्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यादश्वव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७१<br>तद्वद्धेमरथं दद्यात् करिभ्यां संयुतं नरः।<br>सत्यलोके वसेत् कल्पं सहस्रमथ भूपतिः।<br>भवेदुपोषितो भूत्वा करिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७२<br>उपवासं परित्यज्य समान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>यक्षाधिपत्यमाप्नोति सुखव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७३<br>निशि कृत्वा जले वासं प्रभाते गोप्रदो भवेत्।<br>वारुणं लोकमाप्नोति वरुणव्रतमुच्यते॥ ७४<br>चान्द्रायणं च यः कुर्याद्धेमचन्द्रं निवेदयेत्।<br>चन्द्रव्रतमिदं प्रोक्तं चन्द्रलोकफलप्रदम्॥ ७५<br>ज्येष्ठे पञ्चतपाः सायं हेमधेनुप्रदो दिवम्।<br>यात्यष्टमीचतुर्दश्यो रुद्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७६ | जो कृच्छ्र-चान्द्रायण-व्रतकी समाप्तिपर गोदान करके यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'प्राजापत्यव्रत' है। जो चतुर्दशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करता है और वर्ष समाप्त होनेपर गोधनका दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'त्रैयम्बकव्रत' है। जो सात राततक उपवास कर ब्राह्मणको घृतपूर्ण घटका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। यह ब्रह्मलोकरूप फल प्रदान करनेवाला 'घृतव्रत' है। जो वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे (खुले मैदानमें) शयन करता हैं और व्रतान्तमें दुधारू गौका दान करता है, वह सदाके लिये इन्द्रलोकमें निवास करता है। इसे 'इन्द्रव्रत' कहा जाता हैं। जो मनुष्य तृतीया तिथिको बिना अग्निमें पकाया हुआ पदार्थ भोजन करता है और व्रतान्तमें गौ-दान देता है, वह पुनरागमनरहित शिवलोकको प्राप्त होता है। मनुष्योंको इस लोकमें आनन्द प्रदान करनेवाला यह 'श्रेयोव्रत' कहलाता है। जो निराहार रहकर दो पलसे अधिक सोनेसे दो घोड़ोंसे जुता हुआ रथ बनवाकर दान करता है, वह सौ कल्पोंतक स्वर्गलोकमें वास करता है और कल्पान्तमें भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'अश्वव्रत' कहते हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य निराहार रहकर दो हाथियोंसे जुता हुआ सोनेका रथ दान करता है, वह एक हजार कल्पोंतक सत्यलोकमें निवास करता है और (पुण्य-क्षीण होनेपर भूतलपर) राजा होता है। यह 'करिव्रत' कहलाता है। इसी प्रकार जो मनुष्य वर्षके अन्तमें उपवासका परित्याग कर गोदान करता है, वह यक्षोंका अधीश्वर होता है। इसे 'सुखव्रत' कहा जाता है। जो रातभर जलमें निवास कर प्रातःकाल गोदान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त करता है। इसे 'वरुणव्रत' कहते हैं। जो मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान कर स्वर्णनिर्मित चन्द्रमाका दान करता है, वह चन्द्रलोकको जाता है। चन्द्रलोकरूप फलका प्रदाता यह 'चन्द्रव्रत' कहलाता है। जो ज्येष्ठमासकी अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथियोंमें पञ्चाग्नि तपकर सायंकाल स्वर्णनिर्मित गौका दान करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। यह 'रुद्रव्रत' नामसे विख्यात है॥ ६४—७६॥ | | सकृद् वितानकं कुर्यात् तृतीयायां शिवालये।<br>समान्ते धेनुदो याति भवानीव्रतमुच्यते॥ ७७<br>माघे निश्यार्द्रवासाः स्यात् सप्तम्यां गोप्रदो भवेत्।<br>दिवि कल्पमुषित्वेह राजा स्यात् पवनं व्रतम्॥ ७८ | जो तृतीया तिथिको शिवालयमें एक बार चंदोवा या चाँदनी लगा देता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह भवानीलोकको जाता है। इसे 'भवानीव्रत' कहते हैं। जो माघमासमें सप्तमी तिथिको रातभर गीला वस्त्र धारण किये रहता है और प्रातःकाल गौका दान करता है, वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास करके भूतलपर |
१०५- प्रयागमें मरनेवालोंकी गति और गो-दानका महत्त्व
| * अध्याय १०२ * | ३५१ |
|---|
| त्रिरात्रोपोषितो दद्यात् फाल्गुन्यां भवनं शुभम्।<br>आदित्यलोकमाप्नोति धामव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७९<br><br>त्रिसंध्यं पूज्य दाम्पत्यमुपवासी विभूषणैः।<br>अन्नं गाश्च समाप्नोति मोक्षममिन्द्रव्रतादिह॥ ८०<br><br>दत्त्वा सितद्वितीयायामिन्दोर्लवणभाजनम्।<br>समान्ते गोप्रदो याति विप्राय शिवमन्दिरम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् सोमव्रतमिदं स्मृतम्॥ ८१<br><br>प्रतिपद्येकभक्ताशी समान्ते कपिलाप्रदः।<br>वैश्वानरपदं याति शिवव्रतमिदं स्मृतम्॥ ८२<br><br>दशम्यामेकभक्ताशी समान्ते दशधेनुदः।<br>दिशश्च काञ्चनैर्दद्याद् ब्रह्माण्डाधिपतिर्भवेत्।<br>एतद् विश्वव्रतं नाम महापातकनाशनम्॥ ८३<br><br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।<br>मन्वन्तरशतं सोऽपि गन्धर्वाधिपतिर्भवेत्॥ ८४<br><br>षष्टिव्रतं नारद पुण्यमेतत्<br>तवोदितं विश्वजनीनमन्यत्।<br>श्रोतुं तवेच्छा तदुदीरयामि<br>प्रियेषु किं वाकथनीयमस्ति॥ ८५ | राजा होता है। 'यह पवनव्रत' है। जो तीन राततक उपवास करके फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको सुन्दर गृह दान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। यह 'धामव्रत' नामसे प्रसिद्ध है। जो निराहार रहकर तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) संध्याओंमें आभूषणोंद्वारा ब्राह्मण-दम्पत्तिकी पूजा करता है, उसे इस लोकमें इन्द्रव्रतसे भी बढ़कर अधिक मात्रामें अन्न एवं गोधनकी प्राप्ति होती है तथा अन्तमें वह मोक्षलाभ करता है। जो शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिको चन्द्रमाके उद्देश्यसे नमकसे परिपूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान करता है और वर्षकी समाप्तिमें गोदान देता है, वह शिवलोकको जाता है और एक कल्प व्यतीत होनेपर भूतलपर राजराजेश्वर होता है। यह 'सोमव्रत' नामसे विख्यात है। जो प्रतिपदा तिथिको दिनमें एक बार भोजन करता है और वर्षान्तमें कपिला गौका दान देता है, वह वैश्वानरलोकको जाता है। इसे 'शिवव्रत' कहते हैं। जो दशमी तिथिको दिनमें एक बार भोजन करता है और वर्षकी समाप्तिके अवसरपर स्वर्णनिर्मित दसों दिशाओंकी प्रतिमाके साथ दस गायें दान करता है वह ब्रह्माण्डका अधीश्वर होता है। यह 'विश्वव्रत' है जो महापातकोंका विनाशक है। जो इस सर्वोत्तम 'षष्टिव्रत' (६० व्रतोंकी चर्चा)-को पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी सौ मन्वन्तरतक गन्धर्वलोकका अधिपति होता है। नारद! यह षष्टिव्रत परम पुण्यप्रद और सभी जीवोंके लिये लाभदायक है, मैंने आपसे इसका वर्णन कर दिया। अब यदि आपकी और भी कुछ सुननेकी इच्छा हो तो मैं उसका वर्णन करूँगा; क्योंकि प्रियजनोंके प्रति भला कौन-सी वस्तु अकथनीय हो सकती है॥ ७७–८५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे षष्टिव्रतमाहात्म्यं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें षष्टिव्रतमाहात्म्य नामक एक सौ एकवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०१॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
स्नान² और तर्पणकी विधि
| नन्दिकेश्वर उवाच | नन्दिकेश्वर बोले— |
|---|---|
| नैर्मल्यं भावशुद्धिश्च विना स्नानं न विद्यते।<br>तस्मान्मनोविशुद्ध्यर्थं स्नानमादौ विधीयते॥ १ | नारदजी! स्नान किये बिना शरीरकी निर्मलता और भाव-शुद्धि नहीं प्राप्त होती, अतः मनकी विशुद्धिके लिये (सभी व्रतोंमें) सर्वप्रथम स्नानका |
१. स्वल्पान्तरसे ये सभी व्रत पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, अ० २०, श्लोक ४५ से १४४ तकमें तथा भविष्योत्तरपुराणके १२०वें अध्यायमें भी निर्दिष्ट हैं।
२. स्नानविधिकी विस्तृत चर्चा 'स्नानव्यास' में है। यह सुन्दर प्रकरण बृहद्व्यासादि स्मृतियोंमें भी संगृहीत है।
३५२ | * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shlokas | Hindi Translation |
|---|---|
| अनुद्धतैरुरुद्धतैर्वा जलैः स्नानं समाचरेत्।<br>तीर्थं प्रकल्पयेद् विद्वान् मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्।<br>नमो नारायणायेति मन्त्र एष उदाहृतः॥ २<br><br>दर्भपाणिस्तु विधिना आचान्तः प्रयततः शुचिः।<br>चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समन्ततः।<br>प्रकल्प्यावाहयेद् गङ्गामेभिर्मन्त्रैर्विचक्षणः॥ ३<br><br>विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता।<br>त्राहि नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणात्तिकात्॥ ४<br><br>तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्।<br>दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्ति जाह्नवि॥ ५<br><br>नन्दिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च।<br>दक्षा पृथ्वी च विहगा विश्वकायामृता शिवा॥ ६<br><br>विद्याधरी सुप्रसन्ना तथा विश्वप्रसादिनी।<br>क्षेमा च जाह्नवी चैव शान्ता शान्तिप्रदायिनी॥ ७<br><br>एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत्।<br>भवेत् संनिहिता तत्र गङ्गा त्रिपथगामिनी॥ ८ | विधान है। कुएँ आदिसे निकाले हुए अथवा बिना निकाले हुए नदी-तालाब आदिके जलसे स्नान करना चाहिये। मन्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुषको मूलमन्त्रद्वारा उस जलमें तीर्थकी कल्पना करनी चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय'—यह मूलमन्त्र कहा गया है। मनुष्य पहले हाथमें कुश लिये हुए विधिपूर्वक आचमन कर ले, फिर जितेन्द्रिय एवं शुद्ध भावसे अपने चारों ओर चार हाथका चौकोर मण्डल बनाकर उसमें तीर्थकी कल्पना कर इन (वक्ष्यमाण) मन्त्रोंद्वारा गङ्गाजीका आवाहन करे—'देवि! तुम भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हो, वैष्णवी कही जाती हो और विष्णु ही तुम्हारे देवता हैं, अतः तुम जन्मसे लेकर मरणान्तक होनेवाले पापसे हमारी रक्षा करो। जह्ननन्दिनी! वायुदेवने स्वर्गलोक, मृत्युलोक और अन्तरिक्षलोक—इन तीनों लोकोंमें जिन साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंको बतलाया है, वे सभी तुम्हारे भीतर निवास करते हैं। देवोंमें तुम नन्दिनी और नलिनी नामसे प्रसिद्ध हो। इसके अतिरिक्त दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, विश्वप्रसादिनी, क्षेमा, जाह्नवी, शान्ता और शान्तिप्रदायिनी—ये भी तुम्हारे ही नाम हैं।' स्नानके समय इन पुण्यमय नामोंका कीर्तन करना चाहिये, इससे त्रिपथगामिनी गङ्गा वहाँ उपस्थित हो जाती हैं॥ १—८॥ |
| सप्तवाराभिजप्तेन करसम्पुटयोजितम्।<br>मूर्ध्नि कुर्याज्जलं भूयस्त्रिचतुःपञ्चसप्तकम्।<br>स्नानं कुर्यान्मृदा तद्वदामन्त्र्य तु विधानतः॥ ९ | हाथोंको सम्पुटित करके सात बार इन नामोंका जप करनेके पश्चात् तीन, चार, पाँच अथवा सात बार जलको अपने मस्तकपर छिड़क ले। तत्पश्चात् विधिपूर्वक पृथ्वीको आमन्त्रित करके पहले शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करना चाहिये। (आमन्त्रण-मन्त्र इस प्रकार है)— |
| अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।<br>मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥ १० | 'मृत्तिके! तुम अग्निचयन, उख संभरणादिके समय अश्वके द्वारा शुद्ध की जाती हो, तुम (शिवके) रथ और वामन-अवतारमें भगवान् विष्णुके पैरद्वारा भी आक्रान्त होकर शुद्ध हुई हो, सारा धन तुम्हारे ही भीतर वर्तमान है, इसलिये मेरे द्वारा जो कुछ भी पाप घटित हुए हैं, उन सभीको हर लो। |
| उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।<br>मृत्तिके ब्रह्मदत्तासि कश्यपेनाभिमन्त्रिता।<br>आरुह्य मम गात्राणि सर्वं पापं प्रचोदय॥ ११* | मृत्तिके! शतबाहु भगवान् विष्णुने श्यामवर्णका वराहरूप धारण कर तुम्हारा पातालसे उद्धार किया है, पुनः महर्षि कश्यपद्वारा आमन्त्रित होकर तुम ब्राह्मणोंको प्रदान की गयी हो, अतः मेरे अङ्गोंपर आरूढ़ होकर मेरे सारे पापोंको दूर कर दो। |
| मृत्तिके देहि नः पुष्टिं सर्वं त्वयि प्रतिष्ठितम्।<br>नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते॥ १२ | मृत्तिके! विश्वके सारे पदार्थ तो तुम्हारे भीतर ही स्थित हैं, अतः तुम हमें पुष्टि प्रदान करो। सुव्रते! तुम समस्त जीवोंकी उत्पत्तिके लिये अरणिरस्वरूपा हो, |
* ये दो मन्त्र तैत्तिरीयारण्यक १०।१।३—२४ में भी प्राप्त हैं। उनपर सायणका भाष्य बहुत सुन्दर है।
१०६- प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन
- अध्याय १०२ * | ३५३ ---|---:
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य च विधानतः।<br>उत्थाय वाससी शुक्ले शुद्धे तु परिधाय वै॥ १३<br><br>ततस्तु तर्पणं कुर्यात् त्रैलोक्याप्यायनाय वै।<br>ब्रह्माणं तर्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम्॥ १४<br><br>देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः।<br>क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्बुकाः खगाः॥ १५<br><br>वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिनः।<br>निराधाराश्च ये जीवाः पापे धर्मे रताश्च ये॥ १६<br><br>तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया।<br>कृतोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत् ततः॥ १७ | तुम्हें नमस्कार है।' इस प्रकार मिट्टी लगाकर स्नान करनेके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। पुनः जलसे बाहर निकलकर दो श्वेत रंगके शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये इस प्रकार तर्पण करना चाहिये। उस समय उपवीती होकर (जनेऊको जैसे पहनते हैं, बायें कंधेपर तथा दाहिने हाथके नीचे कर) सर्वप्रथम देवतर्पण करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'देव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, क्रूर सर्प, गरुड आदि पक्षी, वृक्ष, शृगाल, अन्य पक्षिगण तथा जो जीव वायु एवं जलके आधारपर जीवित रहनेवाले हैं, आकाशचारी हैं, निराधार हैं और जो जीव पाप एवं धर्ममें लगे हुए हैं, उन सबकी तृप्तिके लिये मैं यह जल दे रहा हूँ।' तदनन्तर निवीती हो जाय (जनेऊको मालाकार कर लें)॥९—१७॥ |
| मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा।<br>सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः॥ १८<br><br>कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा।<br>सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥ १९<br><br>मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>प्रचेतं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च।<br>देवब्रह्मर्षीन् सर्वांस्तर्पयेदक्षतोदकैः॥ २०<br><br>अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जान्वाच्य भूतले।<br>अग्निष्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोषमपाः॥ २१<br><br>सुकालिनो बर्हिषदस्तथा चैवाज्यपाः पुनः।<br>संतर्प्याः पितरो भक्त्या सतिलोदकचन्दनैः॥ २२<br><br>यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।<br>वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥ २३<br><br>औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।<br>वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः।<br>दर्भपाणिस्तु विधिना पितॄन् संतर्पयेद् बुधः॥ २४<br><br>पित्रादीन् नामगोत्रेण तथा मातामहानपि।<br>संतर्प्य विधिना भक्त्या इमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ २५<br><br>येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।<br>ते तृप्तिमखिलां यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥ २६ | फिर भक्तिपूर्वक मनुष्यों तथा ब्रह्मपुत्र ऋषियोंके तर्पणका विधान है—'सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु तथा पञ्चशिख—ये सभी मेरे द्वारा दिये हुए जलसे सदा तृप्त हो जायँ।' तत्पश्चात् मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद—इन सभी देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंका अक्षत और जलसे तर्पण करनेका विधान है। तदनन्तर अपसव्य होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर) और बायें घुटनेको भूमिपर टेककर अग्निष्वात्त, सौम्य, हविष्मान्, ऊष्मप, सुकाली, बर्हिषद तथा अन्य आज्यप नामक पितरोंको भक्तिपूर्वक तिल, जल, चन्दन आदिसे तृप्त करना चाहिये। पुनः बुद्धिमान् मनुष्य हाथमें कुश लेकर यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त—इन चौदह दिव्य पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करके इन्हें नमस्कार करे। तत्पश्चात् अपने पिता आदि तथा नाना आदिके नाम और गोत्रका उच्चारण कर भक्तिपूर्वक विधानके साथ तर्पण करनेके पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो लोग इस जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों या इनके अतिरिक्त कुटुम्बमें पैदा हुए हों अथवा जन्मान्तरमें भाई-बन्धु रहे हों तथा जो कोई भी मुझसे जलकी इच्छा रखते हों, वे सभी पूर्णतया तृप्त हो जायँ'॥१८—२६॥ |
| ३५४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| ततश्चाचम्य विधिवदालिखेत् पद्ममग्रतः।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः सजलारुणचन्दनम्।<br>अर्घ्यं दद्यात् प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत्॥ २७<br>नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुखाय वै।<br>सहस्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे॥ २८<br>नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते सर्ववत्सल।<br>जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित॥ २९<br>पद्मासन नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूषित।<br>नमस्ते सर्वलोकेश जगत् सर्वं विबोधसे॥ ३०<br>सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वग।<br>सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्कर॥ ३१<br>दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>एवं सूर्य नमस्कृत्य त्रिःकृत्वाथ प्रदक्षिणम्।<br>द्विजं गां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततश्च स्वगृहं व्रजेत्॥ ३२ | तदुपरान्त विधिपूर्वक आचमनकर अपने सामनेकी भूमिपर कमलका चित्र बनाकर अक्षत, पुष्प आदिसे सूर्यकी पूजा करे और प्रयत्नपूर्वक सूर्यके नामोंका कीर्तन करते हुए लाल चन्दनमिश्रित जलसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे—'सूर्यदेव! आप विष्णुरूप हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुके मुखस्वरूप आपको प्रणाम है। सहस्रकिरणधारी एवं समस्त तेजोंके धामको नित्य अभिवादन है। सर्वेश्वर! दिव्य चन्दनसे विभूषित देव! आप रुद्र (शिव)-रूप हैं। आप सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणकारक तथा उनके प्रति पुत्रवत् प्रेमभाव रखनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। पद्मासन! आप सदा कुण्डल और बाजूबंदसे सुसज्जित रहते हैं, आपको अभिवादन है। समस्त लोकोंके अधीश्वर! आप सारे जगत्को उद्बुद्ध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वत्र गमन करनेवाले सत्यदेव! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके सारे पुण्यों एवं पापोंको देखते रहते हैं, आपको प्रणाम है। भास्कर! मुझपर प्रसन्न हो जाइये। दिवाकर! आपको अभिवादन है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद तीन बार प्रदक्षिणा कर सूर्यको नमस्कार करे। पुनः ब्राह्मण, गौ और सुवर्णका स्पर्श करनेके पश्चात् अपने घर जाना चाहिये॥ २७—३२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे स्नानविधिर्नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १०२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें स्नानविधि नामक एक सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०२॥
एक सौ तीनवाँ अध्याय
युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रयागस्योपवर्णनम्।<br>मार्कण्डेयेन कथितं यत् पुरा पाण्डुसूनवे॥ १<br>भारते तु यदा वृत्ते प्राप्तराज्ये पृथासुते।<br>एतस्मिन्नन्तरे राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः॥ २<br>भ्रातृशोकेन संतप्तश्चिन्तयन् स पुनः पुनः।<br>आसीत् सुयोधनो राजा एकादशचमूपतिः॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! इसके बाद मैं प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहा हूँ जिसे पूर्वकालमें महर्षि मार्कण्डेयने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा था। जब महाभारत-युद्ध समाप्त हो गया और कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिरको राज्य प्राप्त हो गया, इसी बीच कुन्ती-नन्दन महाराज युधिष्ठिर भाइयोंके शोकसे अत्यन्त दुःखी होकर बारम्बार इस प्रकार चिन्तन करने लगे—'हाय! जो राजा दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था, |
- अध्याय १०३ * <p align="right">३५५</p>
| अस्मान् संताप्य बहुशः सर्वे ते निधनं गताः।<br>वासुदेवं समाश्रित्य पञ्च शेषास्तु पाण्डवाः॥ ४<br>हत्वा भीष्मं च द्रोणं च कर्णं चैव महाबलम्।<br>दुर्योधनं च राजानं पुत्रभ्रातृसमन्वितम्॥ ५<br>राजानो निहताः सर्वे ये चान्ये शूरमानिनः।<br>किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥ ६<br>धिक् कष्टमिति संचिन्त्य राजा वैक्लव्यमागतः।<br>निार्विचेष्टो निरुत्साहः किञ्चित् तिष्ठत्यधोमुखः॥ ७<br>लब्धसंज्ञो यदा राजा चिन्तयन् स पुनः पुनः।<br>कतमो विनियोगो वा नियमं तीर्थमेव च॥ ८<br>येनाहं शीघ्रमामुञ्चे महापातककिल्बिषात्।<br>यत्र स्थित्वा नरो याति विष्णुलोकमनुत्तमम्॥ ९<br>कथं पृच्छामि वै कृष्णं येनेदं कारितोऽस्म्यहम्।<br>धृतराष्ट्रं कथं पृच्छे यस्य पुत्रशतं हतम्॥ १०<br>एवं वैक्लव्यमापन्ने धर्मराजे युधिष्ठिरे।<br>रुदन्ति पाण्डवाः सर्वे भ्रातृशोकपरप्लिुताः॥ ११<br>ये च तत्र महात्मानः समेताः पाण्डवाः स्मृताः।<br>कुन्ती च द्रौपदी चैव ये च तत्र समागताः।<br>भूमौ निपतिताः सर्वे रुदन्तस्तु समंततः॥ १२ | वह हमलोगोंको अनेकों बार कष्टमें डालकर अपने सभी सहायकोंके साथ कालके गालमें चला गया। श्रीकृष्णका आश्रय लेनेके कारण केवल हम पाँच पाण्डव ही शेष रह गये हैं। गोविन्द! हमलोगोंने भीष्म, द्रोण, महाबली कर्ण और पुत्रों एवं भाइयोंसमेत राजा दुर्योधनको मारकर जो अन्य शूर, मानी नरेश थे उन सबका भी संहार कर डाला, ऐसी परिस्थितिमें हमें राज्यसे क्या लेना है, अथवा भोगों एवं जीवनसे ही क्या प्रयोजन है? 'हाय! धिक्कार है, महान् कष्ट आ पड़ा'—ऐसा सोचकर राजा युधिष्ठिर व्याकुल हो गये और निश्चेष्ट एवं उत्साहरहित हो कुछ देरतक नीचे मुख किये बैठे ही रह गये। जब राजा युधिष्ठिरको पुनः चेतना प्राप्त हुई तब वे इस प्रकार सोचने लगे—'ऐसा कौन-सा विनियोग (प्रायश्चित्त), नियम (व्रतोपवास) अथवा तीर्थ है, जिसका सेवन करनेसे मैं शीघ्र ही इस महापातकके पापसे मुक्त हो सकूँगा, अथवा जहाँ निवास कर मनुष्य सर्वोत्तम विष्णुलोकको प्राप्त कर सकता है। इसके लिये मैं श्रीकृष्णसे कैसे पूछूँ; क्योंकि उन्होंने ही तो मुझसे ऐसा कर्म करवाया है। दादा धृतराष्ट्रसे भी किसी प्रकार नहीं पूछ सकता; क्योंकि उनके सौ पुत्र मार डाले गये हैं।' ऐसा सोचकर धर्मराज युधिष्ठिर व्याकुल हो गये। उस समय सभी पाण्डव भ्रातृ-शोकमें निमग्न होकर रुदन कर रहे थे। उस समय राजा युधिष्ठिरके समीप जो अन्य महात्मा पुरुष आये थे तथा कुन्ती, द्रौपदी एवं अन्यान्य जो लोग आ गये थे, वे सभी रोते हुए युधिष्ठिरको घेरकर पृथ्वीपर पड़ गये॥ १—१२॥ | | वाराणस्यां मार्कण्डेयस्तेन ज्ञातो युधिष्ठिरः।<br>यथा वैक्लव्यमापन्नो रोदमानस्तु दुःखितः॥ १३<br>अचिरेणैव कालेन मार्कण्डेयो महातपाः।<br>सम्प्राप्तो हास्तिनपुरं राजद्वारे ह्यतिष्ठत॥ १४<br>द्वारपालोऽपि तं दृष्ट्वा राज्ञः कथितवान् द्रुतम्।<br>त्वां द्रष्टुकामो मार्कण्डो द्वारि तिष्ठत्यसौ मुनिः।<br>त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमागादतः परम्॥ १५ | उस समय महर्षि मार्कण्डेय वाराणसीमें निवास कर रहे थे। उन्हें जिस प्रकार युधिष्ठिर दुःखी और व्याकुल हो रो रहे थे, ये सारी बातें (योगबलसे) ज्ञात हो गयीं। तब महातपस्वी मार्कण्डेय थोड़े ही समयमें हस्तिनापुर जा पहुँचे और राजद्वारपर उपस्थित हुए। उन्हें आया हुआ देखकर द्वारपालने तुरंत राजाको सूचना देते हुए कहा—'महाराज! ये महामुनि मार्कण्डेय आपसे मिलनेके लिये दरवाजेपर खड़े हैं।' यह सुनते ही धर्म-पुत्र युधिष्ठिर शीघ्रतापूर्वक दरवाजेपर आ पहुँचे॥ १३—१५॥ | | युधिष्ठिर उवाच<br>स्वागतं ते महाभाग स्वागतं ते महामुने।<br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्॥ १६<br>अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि दृष्टे महामुने।<br>अद्याहं पूतदेहोऽस्मि यत् त्वया सह दर्शनम्॥ १७ | युधिष्ठिरने कहा— महाभाग! आपका स्वागत है। महामुने! आपका स्वागत है। महामुने! आपका दर्शन करके आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया तथा आज मेरे पितर संतुष्ट हो गये। आपका जो यह (आकस्मिक) दर्शन प्राप्त हुआ, इससे आज मेरा शरीर पवित्र हो गया॥ १६-१७॥ |
३५६ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>सिंहासने समास्थाप्य पादशौचार्चनादिभिः ।<br>युधिष्ठिरो महात्मा वै पूजयामास तं मुनिम् ॥ १८<br>ततः स तुष्टो मार्कण्डः पूजितश्चाह तं नृपम् ।<br>आख्याहि त्वरितं राजन् किमर्थं रुदितं त्वया ।<br>केन वा विक्लवीभूतः का बाधा ते किमप्रियम् ॥ १९ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! तत्पश्चात् महात्मा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिको सिंहासनपर बैठाकर पादप्रक्षालन आदि अर्चाविधिके अनुसार उनकी पूजा की। तब पूजनसे संतुष्ट हुए मुनिवर मार्कण्डेयने राजा युधिष्ठिरसे पूछा—'राजन्! तुम किसलिये रो रहे थे? किसने तुम्हें व्याकुल कर दिया? तुम्हें कौन-सी बाधा सता रही है? तुम्हारा कौन-सा अमङ्गल हो गया? यह सब हमें शीघ्र बतलाओ'॥ १८-१९॥ |
| युधिष्ठिर उवाच<br>अस्माकं चैव यद् वृत्तं राज्यस्यार्थे महामुने ।<br>एतत् सर्वं विदित्वा तु चिन्तावशमुपागतः ॥ २० | **युधिष्ठिरने कहा—**महामुने! राज्यकी प्राप्तिके लिये हमलोगोंने जैसा-जैसा व्यवहार किया है, वही सब सोचकर मैं चिन्ताके वशीभूत हो गया हूँ॥ २०॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाबाहो क्षात्रधर्मव्यवस्थितिम् ।<br>नैव दृष्टं रणे पापं युध्यमानस्य धीमतः ॥ २१<br>किं पुना राजधर्मेण क्षत्रियस्य विशेषतः ।<br>तदेवं हृदयं कृत्वा तस्मात् पापं न चिन्तयेत् ॥ २२<br>ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्य शिरसा मुनिम् ।<br>पप्रच्छ विनयोपेतः सर्वपातकनाशनम् ॥ २३ | **मार्कण्डेयजी बोले—**महाबाहु राजन्! क्षात्रधर्मकी व्यवस्था तो सुनो। इसके अनुसार रणस्थलमें युद्ध करते हुए बुद्धिमान्के लिये पाप नहीं बतलाया गया है, तब फिर राजधर्मके अनुसार विशेषरूपसे युद्ध करनेवाले क्षत्रियके लिये तो पापकी बात ही क्या है। हृदयमें ऐसा विचारकर युद्धसे उत्पन्न हुए पापकी भावनाको छोड़ दो। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयको सिर झुकाकर प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक समस्त पापोंका विनाश करनेवाले साधनके विषयमें प्रश्न किया॥ २१—२३॥ |
| युधिष्ठिर उवाच<br>पृच्छामि त्वां महाप्राज्ञ नित्यं त्रैलोक्यदर्शिनम् ।<br>कथय त्वं समासेन येन मुच्येत किल्बिषात् ॥ २४ | **युधिष्ठिरने पूछा—**महाप्राज्ञ! आप तो नित्य त्रैलोक्यदर्शी हैं, अतः मैं आपसे पूछ रहा हूँ। आप संक्षेपमें कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसका पालन करनेसे पापसे छुटकारा मिल सके॥ २४॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाबाहो सर्वपातकनाशनम् ।<br>प्रयागगमनं श्रेष्ठं नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥ २५ | **मार्कण्डेयजी बोले—**महाबाहु राजन्! सुनो, पुण्यकर्मा मनुष्योंके लिये प्रयाग-गमन ही सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला सर्वश्रेष्ठ साधन है॥ २५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०३ ॥
१०७- प्रयाग-स्थित विविध तीर्थोंका वर्णन
| * अध्याय १०४ * | ३५७ |
|---|
एक सौ चारवाँ अध्याय
प्रयाग¹-माहात्म्य-प्रसङ्गमें प्रयाग-क्षेत्रके विविध तीर्थस्थानोंका वर्णन
| युधिष्ठिर उवाच | युधिष्ठिरने पूछा— ऐश्वर्यशाली मुने! प्राचीन कल्पमें प्रयाग-क्षेत्रकी जैसी स्थिति थी तथा देवश्रेष्ठ ब्रह्माने जिस प्रकार इसका वर्णन किया था, वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। मुने! प्रयागकी यात्रा किस प्रकार करनी चाहिये? वहाँ मनुष्योंको कैसा आचार-व्यवहार करनेका विधान है? वहाँ मरनेवालेको कौन-सी गति प्राप्त होती है? वहाँ स्नान करनेसे क्या फल मिलता है? जो लोग सदा प्रयागमें निवास करते हैं, उन्हें किस फलकी प्राप्ति होती है? यह सब मुझे बतलाइये; क्योंकि इसे जाननेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है॥ १—३॥ | | भगवञ्श्रोतुमिच्छामि पुरा कल्पे यथास्थितम्।<br>ब्रह्मणा देवमुख्येन यथावत् कथितं मुने॥ १<br>कथं प्रयागे गमनं नराणां तत्र कीदृशम्।<br>मृतानां का गतिस्तत्र स्नातानां तत्र किं फलम्॥ २<br>ये वसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेषां च किं फलम्।<br>एतन्मे सर्वमाख्याहि परं कौतूहलं हि मे॥ ३ | | | मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— वत्स! पूर्वकालमें प्रयागक्षेत्रमें जो श्रेष्ठ स्थान हैं तथा वहाँकी यात्रासे जो फल प्राप्त होता है, इस विषयमें ऋषियों एवं ब्राह्मणोंके मुखसे मैंने जो कुछ सुना है, वह सब तुम्हें बतला रहा हूँ। प्रयागके प्रतिष्ठानपुर² (झूँसी)-से वासुकिह्रदतकका भाग, जहाँ कम्बल, अश्वतर और बहुमूलक नामवाले नाग निवास करते हैं, तीनों लोकोंमें प्रजापति-क्षेत्रके नामसे विख्यात है, वहाँ स्नान करनेसे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं और जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। ब्रह्मा आदि देवता संगठित होकर (वहाँ रहनेवालोंकी) रक्षा करते हैं। राजन्! इसके अतिरिक्त इस क्षेत्रमें मङ्गलमय एवं समस्त पापोंका विनाश करनेवाले और भी बहुत-से तीर्थ हैं, जिनका वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता, अतः मैं संक्षेपमें प्रयागका वर्णन कर रहा हूँ। यहाँ साठ हजार धनुर्धर वीर गङ्गाकी रक्षा करते हैं तथा सात घोड़ोंसे जुते हुए रथपर चलनेवाले सूर्य सदा यमुनाकी देखभाल करते रहते हैं। इन्द्र विशेषरूपसे सदा प्रयागकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। श्रीहरि देवताओंको साथ लेकर पूरे प्रयाग-मण्डलकी रखवाली करते हैं। | | कथयिष्यामि ते वत्स यच्छ्रेष्ठं तत्र यत् फलम्।<br>पुरा ऋषीणां विप्राणां कथ्यमानं मया श्रुतम्॥ ४<br>आप्रयागं प्रतिष्ठानादापुराद् वासुकेर्ह्रदात्।<br>कम्बलाश्वतरौ नागौ नागाच्च बहुमूलकात्।<br>एतत् प्रजापतेः क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ५<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः।<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वन्ति संगताः॥ ६<br>अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापहराः शुभाः।<br>न शक्याः कथितुं राजन् बहुवर्षशतैरपि।<br>संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्य तु कीर्तनम्॥ ७<br>षष्टिर्धनुःसहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम्।<br>यमुनां रक्षति सदा सविता सप्तवाहनः॥ ८<br>प्रयागं तु विशेषेण सदा रक्षति वासवः।<br>मण्डलं रक्षति हरिर्देवैः सह संगतः॥ ९ | |
१. भारतमें देव, रुद्र, कर्ण, नंदादि पञ्चप्रयाग प्रसिद्ध हैं। यह तीर्थराज उनमें भी सर्वश्रेष्ठ हैं। इसकी महिमापर प्रयागशताध्यायीके अतिरिक्त महाभारत, वनपर्व ८५।७, अग्नि, गरुड, नारद, कूर्म ३५, पद्म-स्कन्दसौरादि पुराणोंमें भी कई अध्याय हैं। इसके अतिरिक्त 'त्रिस्थलीसेतु', 'तीर्थकल्पतरु', 'तीर्थ-चिन्तामणि' आदिमें भी इनकी महिमा वर्णित है।
२. प्रतिष्ठानपुर दो हैं—एक गोदावरी-तटका पैठन तथा दूसरा यह झूँसी। प्रयागमाहात्म्यमें सर्वत्र यही अभिप्रेत है।
३५८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं वटं रक्षति सदा शूलपाणिर्महेश्वरः।<br>स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम्॥ १०<br>अधर्मेणावृतो लोको नैव गच्छति तत्पदम्।<br>अल्पमल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप।<br>प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम्॥ ११<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते॥ १२<br>पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी।<br>प्रयागस्य प्रवेशे तु पापं नश्यति तत्क्षणात्॥ १३<br>योजनानां सहस्रेषु गङ्गायाः स्मरणान्नरः।<br>अपि दुष्कृतकर्मा तु लभते परमां गतिम्॥ १४<br>कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति।<br>अवगाह्य च पीत्वा तु पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ १५<br>सत्यवादी जितक्रोधो ह्यहिंसायां व्यवस्थितः।<br>धर्मानुसारी तत्त्वज्ञो गोब्राह्मणहिते रतः॥ १६<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नातो मुच्येत किल्बिषात्।<br>मनसा चिन्तयन् कामानवाप्नोति सुपुष्कलान्॥ १७<br>ततो गत्वा प्रयागं तु सर्वदेवाभिरक्षितम्।<br>ब्रह्मचारी वसेन्मासं पितॄन् देवांश्च तर्पयेत्।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् यत्र यत्राभिजायते॥ १८<br>तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>समागता महाभागा यमुना तत्र निम्नगा।<br>तत्र संनिहितो नित्यं साक्षाद् देवो महेश्वरः॥ १९<br>दुष्प्राप्यं मानुषैः पुण्यं प्रयागं तु युधिष्ठिर।<br>देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>तदुपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोकमुपासते॥ २० | महेश्वर हाथमें त्रिशूल लेकर सदा वट-वृक्षकी रक्षा करते रहते हैं। देवगण इस सर्वपापहारी मङ्गलमय स्थानकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। इसलिये इस लोकमें अधर्मसे घिरा हुआ मनुष्य प्रयागक्षेत्रमें प्रवेश नहीं कर सकता। नरेश्वर! यदि किसीका स्वल्प अथवा उससे भी थोड़ा पाप होगा तो वह सारा-का-सारा प्रयागका स्मरण करनेसे नष्ट हो जायगा; क्योंकि (ऐसा विधान है कि) प्रयागतीर्थके दर्शन, नाम-संकीर्तन अथवा मृत्तिकाका स्पर्श करनेसे मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है ॥४—१२॥<br><br>राजेन्द्र! प्रयागक्षेत्रमें पाँच कुण्ड हैं, उन्हींके मध्यमें गङ्गा बहती हैं, इसलिये प्रयागमें प्रवेश करते ही उसी क्षण पाप नष्ट हो जाता है। मनुष्य कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, यदि वह हजारों योजन दूरसे भी गङ्गाका स्मरण करता है तो उसे परम गतिकी प्राप्ति होती है। गङ्गाका नाम लेनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है, दर्शन करनेसे उसे जीवनमें माङ्गलिक अवसर देखनेको मिलते हैं तथा स्नान और जलपान करके तो वह अपनी सात पीढ़ियोंको पावन बना देता है। जो मनुष्य सत्यवादी, क्रोधरहित, अहिंसापरायण, धर्मानुगामी, तत्त्वज्ञ और गौ एवं ब्राह्मणके हितमें तत्पर रहकर गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है तथा जो मनसे चिन्तनमात्र करता है, वह अपने अधिक-से-अधिक मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। इसलिये समस्त देवताओंद्धारा सुरक्षित प्रयाग-क्षेत्रमें जाकर वहाँ एक मासतक ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करते हुए देवों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। वहाँ रहते हुए मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ उसे अभिलषित पदार्थोंकी प्राप्ति होती है। वहाँ सूर्य-कन्या महाभागा यमुना देवी, जो तीनों लोकोंमें विख्यात हैं, नदीरूपमें आयी हुई हैं और साक्षात् भगवान् शंकर वहाँ नित्य निवास करते हैं। इसलिये युधिष्ठिर! यह पुण्यप्रद प्रयाग मनुष्योंके लिये दुर्लभ है। राजेन्द्र! देव, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध, चारण आदि गङ्गा-जलका स्पर्श कर स्वर्गलोकमें विराजमान होते हैं ॥ १३—२० ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये चतुरधिकशततमोऽध्यायः॥ १०४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रयागमाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०४॥
१०८- प्रयागमें अनशन-व्रत तथा एक मासतकके निवास (कल्पवास)-का महत्त्व
| * अध्याय १०५ * | ३५९ |
|---|
एक सौ पाँचवाँ अध्याय
प्रयागमें मरनेवालोंकी गति और गो-दानका महत्त्व
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव च।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १<br>आर्त्तानां हि दरिद्राणां निश्चितव्यवसायिनाम्।<br>स्थानमुक्तं प्रयागं तु नाख्येयं तु कदाचन॥ २<br>व्याधितो यदि वा दीनो वृद्धो वापि भवेन्नरः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ ३<br>दीप्तकाञ्चनवर्णाभैर्विमानैः सूर्यवर्चसैः।<br>गन्धर्वाप्सरसां मध्ये स्वर्गे मोदति मानवः।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ४<br>सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः ।<br>वराङ्गनासमाकीर्णैर्मोदते शुभलक्षणैः॥ ५<br>गीतवाद्यविनिर्घोषैः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते।<br>यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते॥ ६<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>हिरण्यरत्नसम्पूर्णे समृद्धे जायते कुले।<br>तदेव स्मरते तीर्थं स्मरणात् तत्र गच्छति॥ ७<br>देशस्थो यदि वारण्ये विदेशस्थोऽथवा गृहे।<br>प्रयागं स्मरमाणोऽपि यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ८ | **मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! पुनः प्रयागके माहात्म्यका ही वर्णन सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। दुःखियों, दरिद्रों और निश्चित व्यवसाय करनेवालोंके कल्याणके लिये प्रयागक्षेत्र ही प्रशस्त कहा गया है। इसे कभी (कहीं) प्रकट नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ ऋषियोंका कथन है कि जो मनुष्य रोगग्रस्त, दीन अथवा वृद्ध होकर गङ्गा और यमुनाके संगममें प्राणोंका त्याग करता है, वह तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले एवं सूर्यसदृश तेजस्वी विमानोंद्वारा स्वर्गमें जाकर गन्धर्वों और अप्सराओंके मध्यमें आनन्दका उपभोग करता है और अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। वहाँ वह सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित, अनेकों रंगोंकी ध्वजाओंसे मण्डित, अप्सराओंसे खचाखच भरे हुए शुभ लक्षणसम्पन्न दिव्य विमानोंमें बैठकर आनन्द मनाता है तथा माङ्गलिक गीतों और बाजोंके शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार जबतक वह अपने जन्मका स्मरण नहीं करता, तबतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर उसका स्वर्गसे पतन हो जाता है। इस प्रकार स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ वह जीव सुवर्ण-रत्नसे परिपूर्ण एवं समृद्ध कुलमें जन्म धारण करता है और समयानुसार पुनः उसी तीर्थका स्मरण करता है तथा स्मरण आनेसे पुनः उस प्रयागक्षेत्रकी यात्रा करता है। ऋषिवरोंका कथन है कि मनुष्य चाहे देशमें हो अथवा विदेशमें, घरमें हो अथवा वनमें, यदि वह प्रयागका स्मरण करते हुए प्राणोंका परित्यग करता है तो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ १-८॥ |
| सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी।<br>ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोके स गच्छति॥ ९<br>स्त्रीसहस्रावृते रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।<br>मोदते ऋषिभिः सार्धं सुकृतेनेह कर्मणा॥ १०<br>सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि दैवतैः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्॥ ११ | वह ऐसे लोकमें जाता है, जहाँकी भूमि स्वर्णमयी है, जहाँके वृक्ष इच्छानुसार फल देनेवाले हैं और जहाँ ऋषि, मुनि तथा सिद्धलोग निवास करते हैं। वहाँ वह अपने इस जन्ममें किये हुए पुण्यकर्मोंके प्रभावसे सहस्रों स्त्रियोंसे युक्त, मङ्गलमय एवं रमणीय मन्दाकिनीके तटपर ऋषियोंके साथ सुख भोगता है। स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ सिद्ध, चारण और गन्धर्व उसकी पूजा करते हैं। तत्पश्चात् (पुण्य क्षीण होनेपर) वह स्वर्गसे च्युत होकर |
३६० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनः पुनः।<br>गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह न संशयः॥ १२<br>कर्मणा मनसा वाचा सत्यधर्मप्रतिष्ठितः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु गां सम्प्रयच्छति।<br>स गोरोमसमाब्दानि लभते स्वर्गमुत्तमम्॥ १३<br>स्वकार्ये पितृकार्ये वा देवताभ्यर्चनेऽपि वा।<br>यस्तु गां प्रतिगृह्णाति गङ्गायमुनसङ्गमे॥ १४<br>सुवर्णमणिमुक्ताश्च यदि वान्यत् परिग्रहम्।<br>विफलं तस्य तत्तीर्थं यावत् तद्धनमश्नुते॥ १५<br>एवं तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येष्व्यायनेषु च।<br>निमित्तेषु च सर्वेषु ह्यप्रमत्तो भवेद् द्विजः॥ १६ | भूतलपर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है। इस जन्ममें उसे बारंबार अपने शुभकर्मोंका स्मरण होता है, जिससे वह निस्संदेह गुणवान् और धनसम्पन्न होता है तथा वह मनुष्य मन-वचन-कर्मसे सत्यधर्ममें स्थित रहता है। जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके संगमपर कार्योंमें अपने मङ्गलके निमित्त या पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले अथवा देवपूजन आदि कार्योंमें गोदान करता है, वह उस गौके रोमतुल्य वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। यदि कोई वहाँ गोदान लेता है या स्वर्ण, मणि, मोती अथवा अन्य जो कुछ सामग्री दानरूपमें ग्रहण करता है, तो जबतक वह धन उसके पास रहता है, तबतक उसका वह तीर्थ विफल होता है। इस प्रकार (तीर्थयात्रीको) तीर्थमें, पुण्यमय देव-मन्दिरोंमें तथा सभी निमित्तों (दानपर्वों)-में दान लेना कदापि उचित नहीं है। इसके लिये ब्राह्मणको विशेषरूपसे सावधान रहना चाहिये॥ ९-१६॥ |
| कपिलां पाटलावर्णां यस्तु धेनुं प्रयच्छति।<br>स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां कांस्यदोहां पयस्विनीम्॥ १७<br>प्रयागे श्रोत्रियं सन्तं ग्राहयित्वा यथाविधि।<br>शुक्लाम्बरधरं शान्तं धर्मज्ञं वेदपारगम्॥ १८<br>सा गौस्तस्मै प्रदातव्या गङ्गायमुनसङ्गमे।<br>वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च॥ १९<br>यावद् रोमाणि तस्या गोः सन्ति गात्रेषु सत्तम।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ २०<br>यत्रासौ लभते जन्म सा गौस्तस्याभिजायते।<br>न च पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ २१<br>गवां शतसहस्रेभ्यो दद्यादेकां पयस्विनीम्।<br>पुत्रान् दारांस्तथा भृत्यान् गौरैका प्रति तारयेत्॥ २२<br>तस्मात् सर्वेषु दानेषु गोदानं तु विशिष्यते।<br>दुर्गमे विषमे घोरे महापातकसम्भवे।<br>गौरैव कुरुते रक्षां तस्माद् देया द्विजोत्तमे॥ २३ | जो मनुष्य प्रयागमें जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए हों, निकटमें काँसेकी दोहनी भी रखी हो, ऐसी लाल रंगकी दुधारू कपिला* गौका दान करना चाहता हो तो उसे वह गौ गङ्गा-यमुनाके संगमपर विधिपूर्वक ऐसे ब्राह्मणको देनी चाहिये, जो श्रोत्रिय, साधुस्वभाव, श्वेत वस्त्र धारण करनेवाला, शान्त, धर्मज्ञ और वेदोंका पारगामी विद्वान् हो। उसके साथ बहुमूल्य वस्त्र और अनेकों प्रकारके रत्न भी दान करने चाहिये। राजसत्तम! ऐसा करनेसे उस गौके अङ्गोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् जहाँ वह जन्म लेता है, वहीं वह गौ भी उसके घर उत्पन्न होती है। उस पुण्यकर्मके प्रभावसे उसे नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु-प्रदेशको पाकर अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। लाखों गौओंकी अपेक्षा एक ही दुधारू गौका दान प्रशस्त माना गया है; क्योंकि वह एक ही गौ पुत्रों, स्त्रियों और नौकरोंतकका उद्धार कर देती है। यही कारण है कि समस्त दानोंमें गो-दानका विशेष महत्त्व बतलाया जाता है। दुर्गम स्थानपर, भयंकर विषम परिस्थितिमें और महापातकके घटित हो जानेपर केवल गौ ही रक्षा कर सकती है, अतः मनुष्यको श्रेष्ठ ब्राह्मणको गो-दान देना चाहिये॥ १७-२३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०५॥
* कपिला गौ 'स्वर्णकपिला' आदिके भेदसे दस प्रकारकी होती है। इसका विस्तृत वर्णन महाभारत, आश्वमेधिक, वैष्णवधर्म-पर्व, अ० ९५ गीताप्रेसमें दाक्षि० प्र० के श्लोकमें तथा वृद्ध गौतमस्मृतिमें अ० ९-१० में देखना चाहिये।
* अध्याय १०६ * | ३६१
एक सौ छठा अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन
| युधिष्ठिर उवाच | |
|---|---|
| यथा यथा प्रयागस्य माहात्म्यं कथ्यते त्वया।<br>तथा तथा प्रमुच्येऽहं सर्वपापैर्न संशयः॥ १<br>भगवन् केन विधिना गन्तव्यं धर्मनिश्चयैः।<br>प्रयागे यो विधिः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि महामुने॥ २ | युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आप ज्यों-ज्यों प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं, त्यों-त्यों मैं निःसंदेह समस्त पापोंसे मुक्त होता जा रहा हूँ। महामुने! धर्ममें सुदृढ़ बुद्धि रखनेवाले मनुष्योंको किस विधिसे प्रयागकी यात्रा करनी चाहिये? इसके लिये शास्त्रोंमें जिस विधिका वर्णन किया गया है, वह मुझे बतलाइये॥ १-२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! मैंने ऋषिप्रणीत विधिके अनुसार जैसा देखा एवं जैसा सुना है, उसीके अनुरूप प्रयागतीर्थकी यात्रा-विधिका क्रम बतला रहा हूँ। जो मनुष्य कहींसे भी प्रयागतीर्थकी यात्राके लिये हृष्ट-पुष्ट बैलपर सवार होकर प्रस्थान करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो। गो-वंशको कष्ट देनेवाला वह मनुष्य अत्यन्त घोर नरकमें निवास करता है तथा उस प्राणीके पितर उसका दिया हुआ जल नहीं ग्रहण करते; क्योंकि गौओंका क्रोध बड़ा भयानक होता है। जो विधिके अनुसार पुत्रों तथा बालकोंको प्रयागमें स्नान कराता है, गङ्गाजलका पान कराता है तथा अपनी ही तरह ब्राह्मणोंको सारा दान दिलाता है (वह तीर्थ-फलका भागी होता है)। जो मनुष्य ऐश्वर्यके लोभसे अथवा मोहवश सवारीपर बैठकर प्रयागकी यात्रा करता है, उसका वह तीर्थफल नष्ट हो जाता है, इसलिये सवारीका परित्याग कर देना चाहिये। जो गङ्गा-यमुनाके संगमपर ऋषिप्रणीत विवाह-विधिसे अपनी सम्पत्तिके अनुसार कन्या-दान करता है, उसे उस पुण्यकर्मके फलस्वरूप पूर्वोक्त घोर नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु देशमें जाकर अक्षय-कालतक आनन्दका उपभोग करता है और उसे धर्मात्मा एवं सौन्दर्यशाली स्त्री-पुत्रोंकी भी प्राप्ति होती है। इसलिये राजेन्द्र! अपनी सम्पत्तिके अनुकूल प्रयागमें दान अवश्य करना चाहिये। इससे तीर्थका फल बढ़ जाता है और वह दाता प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है॥ ३—१०॥ |
| कथयिष्यामि ते राजंस्तीर्थयात्राविधिक्रमम्।<br>आर्षेण विधिनानेन यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३<br>प्रयागतीर्थं यात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।<br>बलीवर्दसमारूढः शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ४<br>नरके वसते घोरे गवां क्रोधो हि दारुणः।<br>सलिलं न च गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ५<br>यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।<br>यथात्मना तथा सर्वं दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ६<br>ऐश्वर्यलोभान्मोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद् यानं विवर्जयेत्॥ ७<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।<br>आर्षेणैव विवाहेन यथाविभवसम्भवम्॥ ८<br>न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्।<br>पुत्रान् दारांश्च लभते धार्मिकान् रूपसंयुतान्॥ ९<br>तत्र दानं प्रकर्तव्यं यथाविभवसम्भवम्।<br>तेन तीर्थफलं चैव वर्धते नात्र संशयः।<br>स्वर्गे तिष्ठति राजेन्द्र यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १० | |
| वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।<br>सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ११ | जो मनुष्य प्रयागस्थित अक्षयवटके नीचे पहुँचकर प्राणोंका त्याग करता है, वह अन्य सभी पुण्यलोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोकको चला जाता है। |
१०९- अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा प्रयागकी महत्ताका वर्णन
३६२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र ते द्वादशादित्यास्तपन्ते रुद्रसंश्रिताः।<br>निर्दहन्ति जगत् सर्वं वटमूलं न दह्यते ॥ १२<br>नष्टचन्द्रार्कभुवनं यदा चैकार्णवं जगत्।<br>स्थीयते तत्र वै विष्णुर्यजमानः पुनः पुनः॥ १३<br>देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>सदा सेवन्ति तत् तीर्थं गङ्गायमुनसङ्गमम् ॥ १४<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागं संस्तुवंश्च यत्।<br>यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ १५<br>लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसम्मताः।<br>सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः॥ १६<br>अङ्गिराः प्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयः परे।<br>तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्च खेचराश्च ये ॥ १७<br>सागराः सरितः शैला नागा विद्याधराश्च ये।<br>हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरःसरः ॥ १८<br>गङ्गायमुनोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्। | प्रलयकालमें जब बारह सूर्य रुद्रके आश्रयमें स्थित होकर अपने प्रखर तेजसे तपने लगते हैं, उस समय वे सारे जगत्को तो जलाकर भस्म कर देते हैं, परंतु अक्षयवटको वे भी नहीं जला पाते। प्रलयकालमें जब सूर्य, चन्द्रमा और चौदहों भुवन नष्ट हो जाते हैं तथा सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाता है, उस समय भी भगवान् विष्णु प्रयागमें यज्ञााराधनमें तत्पर होकर स्थित रहते हैं। देवता, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण आदि गङ्गा-यमुनाके संगमभूत तीर्थका सदा सेवन करते हैं। अतः राजेन्द्र! जहाँ प्रयागकी स्तुति करते हुए ब्रह्मा आदि देवगण; ऋषि, सिद्ध, चारण, लोकपाल, साध्यगण, लोकसम्मत पितर; सनत्कुमार आदि परमर्षि; अङ्गिरा आदि महर्षि तथा अन्य ब्रह्मर्षि, नाग, एवं गरुड़ आदि पक्षी, सिद्ध, आकाशचारी जीव, सागर, नदियाँ, पर्वत, सर्प, विद्याधर तथा ब्रह्मासहित भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं, उस प्रयागकी यात्रा अवश्य करनी चाहिये। राजसिंह! यह गङ्गा-यमुनाके अन्तरालका प्रयाग-क्षेत्र पृथ्वीका जघनस्थल कहा गया है॥ ११-१८ १/२ ॥ |
| प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>ततः पुण्यतमं नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १९<br>श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ २०<br>तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे शंसितव्रतः।<br>तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ २१<br>न वेदवचनात् तात न लोकवचनादपि।<br>मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमनं प्रति ॥ २२<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथापराः।<br>तेषां सांनिध्यमत्रैव ततस्तु कुरुनन्दन ॥ २३<br>या गतिर्योगयुक्तस्य सत्यस्थस्य मनीषिणः।<br>सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसङ्गमे ॥ २४<br>न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिंस्तत्र तत्र युधिष्ठिर।<br>ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु वञ्चिताः ॥ २५<br>एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा ॥ २६ | भारत! यह प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है। इससे बढ़कर पुण्यप्रद तीर्थ तीनों लोकोंमें दूसरा नहीं है। इस प्रयागतीर्थका नाम सुननेसे, इसके नामोंका संकीर्तन करनेसे अथवा इसकी मिट्टीका स्पर्श करनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है। जो व्रतनिष्ठ मनुष्य उस संगममें स्नान करता है, उसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंके समान फलकी प्राप्ति होती है। तात! इसलिये न तो किसी वेद-वचनसे, न लोगोंके आग्रहपूर्ण कथनसे ही तुम्हें प्रयाग-मरणके प्रति निश्चित की हुई अपनी बुद्धिमें किसी प्रकारका उलट-फेर करना चाहिये। कुरुनन्दन! इस भूतलपर जो दस हजार बड़े तीर्थ हैं तथा इनके अतिरिक्त जो तीन करोड़ अन्य तीर्थ हैं, उन सबका प्रयागमें ही निवास है। गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण छोड़नेवालेको वही गति प्राप्त होती है, जो गति योगनिष्ठ एवं सत्यपरायण विद्वान्को मिलती है। युधिष्ठिर! जिन लोगोंने प्रयागकी यात्रा नहीं की, वे तो मानो तीनों लोकोंमें ठग लिये गये और उनका जीवन इस लोकमें नहींके समान है। इस प्रकार परमपदस्वरूप इस प्रयागतीर्थका दर्शन करके मनुष्य उसी प्रकार समस्त पापोंसे छूट जाता है, जैसे (ग्रहणकालके बाद) राहुग्रस्त चन्द्रमा ॥ १९-२६॥ |
| * अध्याय १०६ * | ३६३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुना दक्षिणे तटे।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २७ | कम्बल और अश्वतर नामवाले दोनों नाग यमुनाके दक्षिण तटपर निवास करते हैं, अतः वहाँ स्नान और जलपान कर मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। |
| तत्र गत्वा च संस्थानं महादेवस्य विश्रुतम्।<br>नरस्तारयते सर्वान् दश पूर्वान् दशापरान्॥ २८ | प्रयागक्षेत्रमें स्थित महादेवजीके सुप्रसिद्ध स्थानकी यात्रा करके मनुष्य अपनी दस आगेकी और दस पीछेकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। |
| कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २९ | जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है और वह प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है। |
| पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रिषु लोकेषु भारत।<br>कूपं चैव तु सामुद्रं प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥ ३० | भारत! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकोंमें विख्यात समुद्रकूप और प्रतिष्ठानपुर (झूँसी) है। |
| ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ३१ | वहाँ यदि मनुष्य तीन राततक क्रोधको वशमें कर ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करता है तो उसका आत्मा समस्त पापोंसे मुक्त होकर शुद्ध हो जाता है और उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। |
| उत्तरेण प्रतिष्ठानाद् भागीरथ्यास्तु पूर्वतः।<br>हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ ३२ | भारत! भागीरथीके पूर्वतटपर प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-से उत्तर दिशामें 'हंसप्रपतन' नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। |
| अश्वमेधफलं तस्मिन् स्नानमात्रेण भारत।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥ ३३ | वहाँ स्नानमात्र कर लेनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह यात्री सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। |
| उर्वशीरमणे पुण्ये विपुले हंसपाण्डुरे।<br>परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ३४ | इसी प्रकार जो मनुष्य पुण्यप्रद उर्वशीरमण तथा विशाल हंसपाण्डुर नामक तीर्थोंमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो! |
| षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>सेव्यते पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप॥ ३५ | नरेश्वर! वह स्वर्गलोकमें छाछठ हजार वर्षोंतक पितरोंके साथ सेवित होता है |
| उर्वशीं तु सदा पश्येत् स्वर्गलोके नरोत्तम।<br>पूज्यते सततं पुत्र ऋषिगन्धर्वकिन्नरैः॥ ३६ | और नरोत्तम! स्वर्गलोकमें वह सदा उर्वशीको देखता रहता है। पुत्र! साथ ही युधिष्ठिर ऋषि, गन्धर्व और किन्नर निरन्तर उसकी पूजा करते हैं। |
| ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>उर्वशीसदृशीनां तु कन्यानां लभते शतम्॥ ३७ | तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेपर जब वह स्वर्गसे च्युत होता है, तब दस हजार गाँवोंका उपभोग करनेवाला भूपाल होता है। |
| मध्ये नारीसहस्राणां बहूनां च पतिर्भवेत्।<br>दशग्रामसहस्राणां भोक्ता भवति भूमिपः॥ ३८ | वह अनेकों सहस्र नारियोंके बीच रहता हुआ उनका पति होता है। उससे उर्वशी-सरीखी सौन्दर्यशालिनी सौ कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। |
| काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तोऽसौ प्रतिबुध्यते।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः॥ ३९ | वह करधनी और नूपुरके झंकार-शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार प्रचुर भोगोंका उपभोग करके वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है॥ २७-३९॥ |
| शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः संयतेन्द्रियः।<br>एककालं तु भुञ्जानो मासं भूमिपतिर्भवेत्॥ ४० | जो मनुष्य प्रयागतीर्थमें एक मासतक श्वेत वस्त्र धारण करके जितेन्द्रिय होकर नित्य नियमपूर्वक रहते हुए एक ही समय भोजन करता है, वह (जन्मान्तरमें) राजा होता है, |
११०- जगत्के समस्त पवित्र तीर्थोंका प्रयागमें निवास
३६४ * मत्स्यपुराण *
| सुवर्णालङ्कृतानां तु नारीणां लभते शतम्।<br>पृथिव्यामासमुद्रायां महाभूमिपतिर्भवेत्॥ ४१<br><br>धनधान्यसमायुक्तो दाता भवति नित्यशः।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः॥ ४२<br><br>अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>उपवासी शुचिः संध्यां ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्॥ ४३<br><br>कोटितीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>कोटिवर्षसहस्राणां स्वर्गलोके महीयते॥ ४४<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>सुवर्णमणिमुक्ताढ्यकुले जायेत रूपवान्॥ ४५<br><br>ततो भोगवतीं गत्वा वासुकेरुत्तरेण तु।<br>दशाश्वमेधकं नाम तीर्थं तत्रापरं भवेत्॥ ४६<br><br>कृताभिषेकस्तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>धनाढ्यो रूपवान् दक्षो दाता भवति धार्मिकः॥ ४७<br><br>चतुर्वेदेषु यत् पुण्यं यत् पुण्यं सत्यवादिषु।<br>अहिंसायां तु यो धर्मो गमनादेव तत् फलम्॥ ४८<br><br>कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र यत्रावगाह्यते।<br>कुरुक्षेत्राद् दशगुणा यत्र विन्ध्येन संगता॥ ४९ | तथा समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका चक्रवर्ती सम्राट् हो जाता है। उसे सुवर्णालंकारोंसे विभूषित सैकड़ों स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं। वह धन-धान्यसे सम्पन्न होकर नित्य दान देता रहता है। इस प्रकार प्रचुर भोगोंका उपभोग करके वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। तदनन्तर रमणीय संध्यावटकी छायामें जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपूर्वक जितेन्द्रिय एवं निराहार रहकर पवित्रभावसे संध्योपासन करता है वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य कोटितीर्थमें जाकर प्राणोंका परित्याग करता है वह हजारों करोड़ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर जब स्वर्गलोकसे नीचे गिरता है, तब सुन्दर रूप धारण कर सुवर्ण, मणि और मोतीसे भरे-पूरे कुलमें जन्म लेता है। इसके बाद वासुकिह्रदकी उत्तर दिशामें स्थित भोगवती नामक तीर्थमें जानेपर वहाँ दशाश्वमेध नामवाला दूसरा तीर्थ मिलता है। वहाँ जो मनुष्य स्नान करता है उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वह सम्पत्तिशाली, सौन्दर्य-सम्पन्न, चतुर, दानी और धर्मात्मा होता है। चारों वेदोंके अध्ययनसे जो पुण्य होता है, सत्यभाषणसे जो पुण्य कहा गया है तथा अहिंसा-व्रतका पालन करनेसे जो धर्म बतलाया गया है, वह सारा फल प्रयागतीर्थकी यात्रासे ही प्राप्त हो जाता है। गङ्गामें जहाँ कहीं भी स्नान किया जाय, वहाँ गङ्गा कुरुक्षेत्रके समान फलदायिका मानी गयी हैं, परंतु जहाँ वह विन्ध्यपर्वतसे संयुक्त हुई हैं, वहाँ गङ्गा कुरुक्षेत्रसे दसगुना अधिक फलदायिनी हो जाती हैं॥ ४०—४९॥ |
|---|---|
| यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्था तपोधना।<br>सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा॥ ५०<br><br>क्षितौ तारयते मर्त्यान् नागांस्तारयतेऽप्यधः।<br>दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता॥ ५१<br><br>यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति हि शरीरिणः।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ ५२<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>तीर्थानां तु परं तीर्थं नदीनां तु महानदी।<br>मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि॥ ५३ | जहाँ बहुत-से तीर्थोंसे युक्त, महाभाग्यशालिनी एवं तपस्विनी गङ्गा बहती हैं, उस स्थानको सिद्धक्षेत्र मानना चाहिये, इसमें अन्यथा विचार करना अनुचित है। गङ्गा भूतलपर मनुष्योंको, पातालमें नागोंको तथा स्वर्गलोकमें देवताओंको तारती हैं, इसी कारण उन्हें 'त्रिपथगा'* कहा जाता है। मृत प्राणीकी हड्डियाँ जितने समयतक गङ्गामें वर्तमान रहती हैं, उतने वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् स्वर्गसे च्युत होनेपर वह जम्बूद्वीपका स्वामी होता है। गङ्गा सभी तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ, नदियोंमें महानदी और महान्-से-महान् पाप करनेवाले सभी प्राणियोंके लिये मोक्षदायिनी हैं। |
* तुलनीय वाल्मी० १।४३—त्रीन् पथो भावयन्त्येषा तस्मात् त्रिपथगा स्मृता।