भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 369
* अध्याय १०५ *३५९

एक सौ पाँचवाँ अध्याय

प्रयागमें मरनेवालोंकी गति और गो-दानका महत्त्व

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव च।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १<br>आर्त्तानां हि दरिद्राणां निश्चितव्यवसायिनाम्।<br>स्थानमुक्तं प्रयागं तु नाख्येयं तु कदाचन॥ २<br>व्याधितो यदि वा दीनो वृद्धो वापि भवेन्नरः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ ३<br>दीप्तकाञ्चनवर्णाभैर्विमानैः सूर्यवर्चसैः।<br>गन्धर्वाप्सरसां मध्ये स्वर्गे मोदति मानवः।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ४<br>सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः ।<br>वराङ्गनासमाकीर्णैर्मोदते शुभलक्षणैः॥ ५<br>गीतवाद्यविनिर्घोषैः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते।<br>यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते॥ ६<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>हिरण्यरत्नसम्पूर्णे समृद्धे जायते कुले।<br>तदेव स्मरते तीर्थं स्मरणात् तत्र गच्छति॥ ७<br>देशस्थो यदि वारण्ये विदेशस्थोऽथवा गृहे।<br>प्रयागं स्मरमाणोऽपि यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ८**मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! पुनः प्रयागके माहात्म्यका ही वर्णन सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। दुःखियों, दरिद्रों और निश्चित व्यवसाय करनेवालोंके कल्याणके लिये प्रयागक्षेत्र ही प्रशस्त कहा गया है। इसे कभी (कहीं) प्रकट नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ ऋषियोंका कथन है कि जो मनुष्य रोगग्रस्त, दीन अथवा वृद्ध होकर गङ्गा और यमुनाके संगममें प्राणोंका त्याग करता है, वह तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले एवं सूर्यसदृश तेजस्वी विमानोंद्वारा स्वर्गमें जाकर गन्धर्वों और अप्सराओंके मध्यमें आनन्दका उपभोग करता है और अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। वहाँ वह सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित, अनेकों रंगोंकी ध्वजाओंसे मण्डित, अप्सराओंसे खचाखच भरे हुए शुभ लक्षणसम्पन्न दिव्य विमानोंमें बैठकर आनन्द मनाता है तथा माङ्गलिक गीतों और बाजोंके शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार जबतक वह अपने जन्मका स्मरण नहीं करता, तबतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर उसका स्वर्गसे पतन हो जाता है। इस प्रकार स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ वह जीव सुवर्ण-रत्नसे परिपूर्ण एवं समृद्ध कुलमें जन्म धारण करता है और समयानुसार पुनः उसी तीर्थका स्मरण करता है तथा स्मरण आनेसे पुनः उस प्रयागक्षेत्रकी यात्रा करता है। ऋषिवरोंका कथन है कि मनुष्य चाहे देशमें हो अथवा विदेशमें, घरमें हो अथवा वनमें, यदि वह प्रयागका स्मरण करते हुए प्राणोंका परित्यग करता है तो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ १-८॥
सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी।<br>ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोके स गच्छति॥ ९<br>स्त्रीसहस्रावृते रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।<br>मोदते ऋषिभिः सार्धं सुकृतेनेह कर्मणा॥ १०<br>सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि दैवतैः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्॥ ११वह ऐसे लोकमें जाता है, जहाँकी भूमि स्वर्णमयी है, जहाँके वृक्ष इच्छानुसार फल देनेवाले हैं और जहाँ ऋषि, मुनि तथा सिद्धलोग निवास करते हैं। वहाँ वह अपने इस जन्ममें किये हुए पुण्यकर्मोंके प्रभावसे सहस्रों स्त्रियोंसे युक्त, मङ्गलमय एवं रमणीय मन्दाकिनीके तटपर ऋषियोंके साथ सुख भोगता है। स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ सिद्ध, चारण और गन्धर्व उसकी पूजा करते हैं। तत्पश्चात् (पुण्य क्षीण होनेपर) वह स्वर्गसे च्युत होकर