मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३६० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनः पुनः।<br>गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह न संशयः॥ १२<br>कर्मणा मनसा वाचा सत्यधर्मप्रतिष्ठितः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु गां सम्प्रयच्छति।<br>स गोरोमसमाब्दानि लभते स्वर्गमुत्तमम्॥ १३<br>स्वकार्ये पितृकार्ये वा देवताभ्यर्चनेऽपि वा।<br>यस्तु गां प्रतिगृह्णाति गङ्गायमुनसङ्गमे॥ १४<br>सुवर्णमणिमुक्ताश्च यदि वान्यत् परिग्रहम्।<br>विफलं तस्य तत्तीर्थं यावत् तद्धनमश्नुते॥ १५<br>एवं तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येष्व्यायनेषु च।<br>निमित्तेषु च सर्वेषु ह्यप्रमत्तो भवेद् द्विजः॥ १६ | भूतलपर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है। इस जन्ममें उसे बारंबार अपने शुभकर्मोंका स्मरण होता है, जिससे वह निस्संदेह गुणवान् और धनसम्पन्न होता है तथा वह मनुष्य मन-वचन-कर्मसे सत्यधर्ममें स्थित रहता है। जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके संगमपर कार्योंमें अपने मङ्गलके निमित्त या पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले अथवा देवपूजन आदि कार्योंमें गोदान करता है, वह उस गौके रोमतुल्य वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। यदि कोई वहाँ गोदान लेता है या स्वर्ण, मणि, मोती अथवा अन्य जो कुछ सामग्री दानरूपमें ग्रहण करता है, तो जबतक वह धन उसके पास रहता है, तबतक उसका वह तीर्थ विफल होता है। इस प्रकार (तीर्थयात्रीको) तीर्थमें, पुण्यमय देव-मन्दिरोंमें तथा सभी निमित्तों (दानपर्वों)-में दान लेना कदापि उचित नहीं है। इसके लिये ब्राह्मणको विशेषरूपसे सावधान रहना चाहिये॥ ९-१६॥ |
| कपिलां पाटलावर्णां यस्तु धेनुं प्रयच्छति।<br>स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां कांस्यदोहां पयस्विनीम्॥ १७<br>प्रयागे श्रोत्रियं सन्तं ग्राहयित्वा यथाविधि।<br>शुक्लाम्बरधरं शान्तं धर्मज्ञं वेदपारगम्॥ १८<br>सा गौस्तस्मै प्रदातव्या गङ्गायमुनसङ्गमे।<br>वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च॥ १९<br>यावद् रोमाणि तस्या गोः सन्ति गात्रेषु सत्तम।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ २०<br>यत्रासौ लभते जन्म सा गौस्तस्याभिजायते।<br>न च पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ २१<br>गवां शतसहस्रेभ्यो दद्यादेकां पयस्विनीम्।<br>पुत्रान् दारांस्तथा भृत्यान् गौरैका प्रति तारयेत्॥ २२<br>तस्मात् सर्वेषु दानेषु गोदानं तु विशिष्यते।<br>दुर्गमे विषमे घोरे महापातकसम्भवे।<br>गौरैव कुरुते रक्षां तस्माद् देया द्विजोत्तमे॥ २३ | जो मनुष्य प्रयागमें जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए हों, निकटमें काँसेकी दोहनी भी रखी हो, ऐसी लाल रंगकी दुधारू कपिला* गौका दान करना चाहता हो तो उसे वह गौ गङ्गा-यमुनाके संगमपर विधिपूर्वक ऐसे ब्राह्मणको देनी चाहिये, जो श्रोत्रिय, साधुस्वभाव, श्वेत वस्त्र धारण करनेवाला, शान्त, धर्मज्ञ और वेदोंका पारगामी विद्वान् हो। उसके साथ बहुमूल्य वस्त्र और अनेकों प्रकारके रत्न भी दान करने चाहिये। राजसत्तम! ऐसा करनेसे उस गौके अङ्गोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् जहाँ वह जन्म लेता है, वहीं वह गौ भी उसके घर उत्पन्न होती है। उस पुण्यकर्मके प्रभावसे उसे नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु-प्रदेशको पाकर अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। लाखों गौओंकी अपेक्षा एक ही दुधारू गौका दान प्रशस्त माना गया है; क्योंकि वह एक ही गौ पुत्रों, स्त्रियों और नौकरोंतकका उद्धार कर देती है। यही कारण है कि समस्त दानोंमें गो-दानका विशेष महत्त्व बतलाया जाता है। दुर्गम स्थानपर, भयंकर विषम परिस्थितिमें और महापातकके घटित हो जानेपर केवल गौ ही रक्षा कर सकती है, अतः मनुष्यको श्रेष्ठ ब्राह्मणको गो-दान देना चाहिये॥ १७-२३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०५॥
* कपिला गौ 'स्वर्णकपिला' आदिके भेदसे दस प्रकारकी होती है। इसका विस्तृत वर्णन महाभारत, आश्वमेधिक, वैष्णवधर्म-पर्व, अ० ९५ गीताप्रेसमें दाक्षि० प्र० के श्लोकमें तथा वृद्ध गौतमस्मृतिमें अ० ९-१० में देखना चाहिये।