मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १०६ * | ३६१
एक सौ छठा अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन
| युधिष्ठिर उवाच | |
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| यथा यथा प्रयागस्य माहात्म्यं कथ्यते त्वया।<br>तथा तथा प्रमुच्येऽहं सर्वपापैर्न संशयः॥ १<br>भगवन् केन विधिना गन्तव्यं धर्मनिश्चयैः।<br>प्रयागे यो विधिः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि महामुने॥ २ | युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आप ज्यों-ज्यों प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं, त्यों-त्यों मैं निःसंदेह समस्त पापोंसे मुक्त होता जा रहा हूँ। महामुने! धर्ममें सुदृढ़ बुद्धि रखनेवाले मनुष्योंको किस विधिसे प्रयागकी यात्रा करनी चाहिये? इसके लिये शास्त्रोंमें जिस विधिका वर्णन किया गया है, वह मुझे बतलाइये॥ १-२॥ |
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! मैंने ऋषिप्रणीत विधिके अनुसार जैसा देखा एवं जैसा सुना है, उसीके अनुरूप प्रयागतीर्थकी यात्रा-विधिका क्रम बतला रहा हूँ। जो मनुष्य कहींसे भी प्रयागतीर्थकी यात्राके लिये हृष्ट-पुष्ट बैलपर सवार होकर प्रस्थान करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो। गो-वंशको कष्ट देनेवाला वह मनुष्य अत्यन्त घोर नरकमें निवास करता है तथा उस प्राणीके पितर उसका दिया हुआ जल नहीं ग्रहण करते; क्योंकि गौओंका क्रोध बड़ा भयानक होता है। जो विधिके अनुसार पुत्रों तथा बालकोंको प्रयागमें स्नान कराता है, गङ्गाजलका पान कराता है तथा अपनी ही तरह ब्राह्मणोंको सारा दान दिलाता है (वह तीर्थ-फलका भागी होता है)। जो मनुष्य ऐश्वर्यके लोभसे अथवा मोहवश सवारीपर बैठकर प्रयागकी यात्रा करता है, उसका वह तीर्थफल नष्ट हो जाता है, इसलिये सवारीका परित्याग कर देना चाहिये। जो गङ्गा-यमुनाके संगमपर ऋषिप्रणीत विवाह-विधिसे अपनी सम्पत्तिके अनुसार कन्या-दान करता है, उसे उस पुण्यकर्मके फलस्वरूप पूर्वोक्त घोर नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु देशमें जाकर अक्षय-कालतक आनन्दका उपभोग करता है और उसे धर्मात्मा एवं सौन्दर्यशाली स्त्री-पुत्रोंकी भी प्राप्ति होती है। इसलिये राजेन्द्र! अपनी सम्पत्तिके अनुकूल प्रयागमें दान अवश्य करना चाहिये। इससे तीर्थका फल बढ़ जाता है और वह दाता प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है॥ ३—१०॥ |
| कथयिष्यामि ते राजंस्तीर्थयात्राविधिक्रमम्।<br>आर्षेण विधिनानेन यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३<br>प्रयागतीर्थं यात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।<br>बलीवर्दसमारूढः शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ४<br>नरके वसते घोरे गवां क्रोधो हि दारुणः।<br>सलिलं न च गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ५<br>यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।<br>यथात्मना तथा सर्वं दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ६<br>ऐश्वर्यलोभान्मोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद् यानं विवर्जयेत्॥ ७<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।<br>आर्षेणैव विवाहेन यथाविभवसम्भवम्॥ ८<br>न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्।<br>पुत्रान् दारांश्च लभते धार्मिकान् रूपसंयुतान्॥ ९<br>तत्र दानं प्रकर्तव्यं यथाविभवसम्भवम्।<br>तेन तीर्थफलं चैव वर्धते नात्र संशयः।<br>स्वर्गे तिष्ठति राजेन्द्र यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १० | |
| वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।<br>सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ११ | जो मनुष्य प्रयागस्थित अक्षयवटके नीचे पहुँचकर प्राणोंका त्याग करता है, वह अन्य सभी पुण्यलोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोकको चला जाता है। |