मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३६२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र ते द्वादशादित्यास्तपन्ते रुद्रसंश्रिताः।<br>निर्दहन्ति जगत् सर्वं वटमूलं न दह्यते ॥ १२<br>नष्टचन्द्रार्कभुवनं यदा चैकार्णवं जगत्।<br>स्थीयते तत्र वै विष्णुर्यजमानः पुनः पुनः॥ १३<br>देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>सदा सेवन्ति तत् तीर्थं गङ्गायमुनसङ्गमम् ॥ १४<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागं संस्तुवंश्च यत्।<br>यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ १५<br>लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसम्मताः।<br>सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः॥ १६<br>अङ्गिराः प्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयः परे।<br>तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्च खेचराश्च ये ॥ १७<br>सागराः सरितः शैला नागा विद्याधराश्च ये।<br>हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरःसरः ॥ १८<br>गङ्गायमुनोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्। | प्रलयकालमें जब बारह सूर्य रुद्रके आश्रयमें स्थित होकर अपने प्रखर तेजसे तपने लगते हैं, उस समय वे सारे जगत्को तो जलाकर भस्म कर देते हैं, परंतु अक्षयवटको वे भी नहीं जला पाते। प्रलयकालमें जब सूर्य, चन्द्रमा और चौदहों भुवन नष्ट हो जाते हैं तथा सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाता है, उस समय भी भगवान् विष्णु प्रयागमें यज्ञााराधनमें तत्पर होकर स्थित रहते हैं। देवता, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण आदि गङ्गा-यमुनाके संगमभूत तीर्थका सदा सेवन करते हैं। अतः राजेन्द्र! जहाँ प्रयागकी स्तुति करते हुए ब्रह्मा आदि देवगण; ऋषि, सिद्ध, चारण, लोकपाल, साध्यगण, लोकसम्मत पितर; सनत्कुमार आदि परमर्षि; अङ्गिरा आदि महर्षि तथा अन्य ब्रह्मर्षि, नाग, एवं गरुड़ आदि पक्षी, सिद्ध, आकाशचारी जीव, सागर, नदियाँ, पर्वत, सर्प, विद्याधर तथा ब्रह्मासहित भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं, उस प्रयागकी यात्रा अवश्य करनी चाहिये। राजसिंह! यह गङ्गा-यमुनाके अन्तरालका प्रयाग-क्षेत्र पृथ्वीका जघनस्थल कहा गया है॥ ११-१८ १/२ ॥ |
| प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>ततः पुण्यतमं नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १९<br>श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ २०<br>तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे शंसितव्रतः।<br>तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ २१<br>न वेदवचनात् तात न लोकवचनादपि।<br>मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमनं प्रति ॥ २२<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथापराः।<br>तेषां सांनिध्यमत्रैव ततस्तु कुरुनन्दन ॥ २३<br>या गतिर्योगयुक्तस्य सत्यस्थस्य मनीषिणः।<br>सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसङ्गमे ॥ २४<br>न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिंस्तत्र तत्र युधिष्ठिर।<br>ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु वञ्चिताः ॥ २५<br>एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा ॥ २६ | भारत! यह प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है। इससे बढ़कर पुण्यप्रद तीर्थ तीनों लोकोंमें दूसरा नहीं है। इस प्रयागतीर्थका नाम सुननेसे, इसके नामोंका संकीर्तन करनेसे अथवा इसकी मिट्टीका स्पर्श करनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है। जो व्रतनिष्ठ मनुष्य उस संगममें स्नान करता है, उसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंके समान फलकी प्राप्ति होती है। तात! इसलिये न तो किसी वेद-वचनसे, न लोगोंके आग्रहपूर्ण कथनसे ही तुम्हें प्रयाग-मरणके प्रति निश्चित की हुई अपनी बुद्धिमें किसी प्रकारका उलट-फेर करना चाहिये। कुरुनन्दन! इस भूतलपर जो दस हजार बड़े तीर्थ हैं तथा इनके अतिरिक्त जो तीन करोड़ अन्य तीर्थ हैं, उन सबका प्रयागमें ही निवास है। गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण छोड़नेवालेको वही गति प्राप्त होती है, जो गति योगनिष्ठ एवं सत्यपरायण विद्वान्को मिलती है। युधिष्ठिर! जिन लोगोंने प्रयागकी यात्रा नहीं की, वे तो मानो तीनों लोकोंमें ठग लिये गये और उनका जीवन इस लोकमें नहींके समान है। इस प्रकार परमपदस्वरूप इस प्रयागतीर्थका दर्शन करके मनुष्य उसी प्रकार समस्त पापोंसे छूट जाता है, जैसे (ग्रहणकालके बाद) राहुग्रस्त चन्द्रमा ॥ १९-२६॥ |