मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 373, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 373
| * अध्याय १०६ * | ३६३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुना दक्षिणे तटे।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २७ | कम्बल और अश्वतर नामवाले दोनों नाग यमुनाके दक्षिण तटपर निवास करते हैं, अतः वहाँ स्नान और जलपान कर मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। |
| तत्र गत्वा च संस्थानं महादेवस्य विश्रुतम्।<br>नरस्तारयते सर्वान् दश पूर्वान् दशापरान्॥ २८ | प्रयागक्षेत्रमें स्थित महादेवजीके सुप्रसिद्ध स्थानकी यात्रा करके मनुष्य अपनी दस आगेकी और दस पीछेकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। |
| कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २९ | जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है और वह प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है। |
| पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रिषु लोकेषु भारत।<br>कूपं चैव तु सामुद्रं प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥ ३० | भारत! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकोंमें विख्यात समुद्रकूप और प्रतिष्ठानपुर (झूँसी) है। |
| ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ३१ | वहाँ यदि मनुष्य तीन राततक क्रोधको वशमें कर ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करता है तो उसका आत्मा समस्त पापोंसे मुक्त होकर शुद्ध हो जाता है और उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। |
| उत्तरेण प्रतिष्ठानाद् भागीरथ्यास्तु पूर्वतः।<br>हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ ३२ | भारत! भागीरथीके पूर्वतटपर प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-से उत्तर दिशामें 'हंसप्रपतन' नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। |
| अश्वमेधफलं तस्मिन् स्नानमात्रेण भारत।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥ ३३ | वहाँ स्नानमात्र कर लेनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह यात्री सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। |
| उर्वशीरमणे पुण्ये विपुले हंसपाण्डुरे।<br>परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ३४ | इसी प्रकार जो मनुष्य पुण्यप्रद उर्वशीरमण तथा विशाल हंसपाण्डुर नामक तीर्थोंमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो! |
| षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>सेव्यते पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप॥ ३५ | नरेश्वर! वह स्वर्गलोकमें छाछठ हजार वर्षोंतक पितरोंके साथ सेवित होता है |
| उर्वशीं तु सदा पश्येत् स्वर्गलोके नरोत्तम।<br>पूज्यते सततं पुत्र ऋषिगन्धर्वकिन्नरैः॥ ३६ | और नरोत्तम! स्वर्गलोकमें वह सदा उर्वशीको देखता रहता है। पुत्र! साथ ही युधिष्ठिर ऋषि, गन्धर्व और किन्नर निरन्तर उसकी पूजा करते हैं। |
| ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>उर्वशीसदृशीनां तु कन्यानां लभते शतम्॥ ३७ | तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेपर जब वह स्वर्गसे च्युत होता है, तब दस हजार गाँवोंका उपभोग करनेवाला भूपाल होता है। |
| मध्ये नारीसहस्राणां बहूनां च पतिर्भवेत्।<br>दशग्रामसहस्राणां भोक्ता भवति भूमिपः॥ ३८ | वह अनेकों सहस्र नारियोंके बीच रहता हुआ उनका पति होता है। उससे उर्वशी-सरीखी सौन्दर्यशालिनी सौ कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। |
| काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तोऽसौ प्रतिबुध्यते।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः॥ ३९ | वह करधनी और नूपुरके झंकार-शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार प्रचुर भोगोंका उपभोग करके वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है॥ २७-३९॥ |
| शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः संयतेन्द्रियः।<br>एककालं तु भुञ्जानो मासं भूमिपतिर्भवेत्॥ ४० | जो मनुष्य प्रयागतीर्थमें एक मासतक श्वेत वस्त्र धारण करके जितेन्द्रिय होकर नित्य नियमपूर्वक रहते हुए एक ही समय भोजन करता है, वह (जन्मान्तरमें) राजा होता है, |