मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३६४ * मत्स्यपुराण *
| सुवर्णालङ्कृतानां तु नारीणां लभते शतम्।<br>पृथिव्यामासमुद्रायां महाभूमिपतिर्भवेत्॥ ४१<br><br>धनधान्यसमायुक्तो दाता भवति नित्यशः।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः॥ ४२<br><br>अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>उपवासी शुचिः संध्यां ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्॥ ४३<br><br>कोटितीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>कोटिवर्षसहस्राणां स्वर्गलोके महीयते॥ ४४<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>सुवर्णमणिमुक्ताढ्यकुले जायेत रूपवान्॥ ४५<br><br>ततो भोगवतीं गत्वा वासुकेरुत्तरेण तु।<br>दशाश्वमेधकं नाम तीर्थं तत्रापरं भवेत्॥ ४६<br><br>कृताभिषेकस्तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>धनाढ्यो रूपवान् दक्षो दाता भवति धार्मिकः॥ ४७<br><br>चतुर्वेदेषु यत् पुण्यं यत् पुण्यं सत्यवादिषु।<br>अहिंसायां तु यो धर्मो गमनादेव तत् फलम्॥ ४८<br><br>कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र यत्रावगाह्यते।<br>कुरुक्षेत्राद् दशगुणा यत्र विन्ध्येन संगता॥ ४९ | तथा समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका चक्रवर्ती सम्राट् हो जाता है। उसे सुवर्णालंकारोंसे विभूषित सैकड़ों स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं। वह धन-धान्यसे सम्पन्न होकर नित्य दान देता रहता है। इस प्रकार प्रचुर भोगोंका उपभोग करके वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। तदनन्तर रमणीय संध्यावटकी छायामें जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपूर्वक जितेन्द्रिय एवं निराहार रहकर पवित्रभावसे संध्योपासन करता है वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य कोटितीर्थमें जाकर प्राणोंका परित्याग करता है वह हजारों करोड़ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर जब स्वर्गलोकसे नीचे गिरता है, तब सुन्दर रूप धारण कर सुवर्ण, मणि और मोतीसे भरे-पूरे कुलमें जन्म लेता है। इसके बाद वासुकिह्रदकी उत्तर दिशामें स्थित भोगवती नामक तीर्थमें जानेपर वहाँ दशाश्वमेध नामवाला दूसरा तीर्थ मिलता है। वहाँ जो मनुष्य स्नान करता है उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वह सम्पत्तिशाली, सौन्दर्य-सम्पन्न, चतुर, दानी और धर्मात्मा होता है। चारों वेदोंके अध्ययनसे जो पुण्य होता है, सत्यभाषणसे जो पुण्य कहा गया है तथा अहिंसा-व्रतका पालन करनेसे जो धर्म बतलाया गया है, वह सारा फल प्रयागतीर्थकी यात्रासे ही प्राप्त हो जाता है। गङ्गामें जहाँ कहीं भी स्नान किया जाय, वहाँ गङ्गा कुरुक्षेत्रके समान फलदायिका मानी गयी हैं, परंतु जहाँ वह विन्ध्यपर्वतसे संयुक्त हुई हैं, वहाँ गङ्गा कुरुक्षेत्रसे दसगुना अधिक फलदायिनी हो जाती हैं॥ ४०—४९॥ |
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| यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्था तपोधना।<br>सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा॥ ५०<br><br>क्षितौ तारयते मर्त्यान् नागांस्तारयतेऽप्यधः।<br>दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता॥ ५१<br><br>यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति हि शरीरिणः।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ ५२<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>तीर्थानां तु परं तीर्थं नदीनां तु महानदी।<br>मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि॥ ५३ | जहाँ बहुत-से तीर्थोंसे युक्त, महाभाग्यशालिनी एवं तपस्विनी गङ्गा बहती हैं, उस स्थानको सिद्धक्षेत्र मानना चाहिये, इसमें अन्यथा विचार करना अनुचित है। गङ्गा भूतलपर मनुष्योंको, पातालमें नागोंको तथा स्वर्गलोकमें देवताओंको तारती हैं, इसी कारण उन्हें 'त्रिपथगा'* कहा जाता है। मृत प्राणीकी हड्डियाँ जितने समयतक गङ्गामें वर्तमान रहती हैं, उतने वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् स्वर्गसे च्युत होनेपर वह जम्बूद्वीपका स्वामी होता है। गङ्गा सभी तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ, नदियोंमें महानदी और महान्-से-महान् पाप करनेवाले सभी प्राणियोंके लिये मोक्षदायिनी हैं। |
* तुलनीय वाल्मी० १।४३—त्रीन् पथो भावयन्त्येषा तस्मात् त्रिपथगा स्मृता।