मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १०७ * | ३६५ |
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| सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।<br>गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसंगमे।<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ ५४॥<br>सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम्।<br>गतिमान्विष्यमाणानां नास्ति गङ्गासमा गतिः॥ ५५॥<br>पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>महेश्वरशिरोभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा॥ ५६॥ | गङ्गा सर्वत्र तो सुलभ हैं, परंतु गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गासागर-संगममें दुर्लभ मानी गयी हैं। इन स्थानोंपर स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकको चले जाते हैं और जो यहाँ शरीर-त्याग करते हैं, उनका तो पुनर्जन्म होता ही नहीं, अर्थात् वे मुक्त हो जाते हैं। जिनका चित्त पापसे आच्छादित है, अतः उद्धार पानेके लिये गतिकी खोजमें लगे हैं, उन सभी प्राणियोंके लिये गङ्गाके समान दूसरी गति नहीं है। महेश्वरके जटाजूटसे च्युत हुई मङ्गलमयी गङ्गा समस्त पापोंका हरण करनेवाली हैं। ये पवित्रोंमें परम पवित्र और मङ्गलोंमें मङ्गल-स्वरूपा हैं॥ ५०—५६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये षडधिकशततमोऽध्यायः॥ १०६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०६॥
एक सौ सातवाँ अध्याय
प्रयाग-स्थित विविध तीर्थोंका वर्णन
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— |
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| शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव तु।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १॥ | राजन्! पुनः प्रयागका ही माहात्म्य श्रवण करो, जिसे सुनकर मनुष्य निस्संदेह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
| मानसं नाम तीर्थं तु गङ्गाया उत्तरे तटे।<br>त्रिरात्रोपोषितो स्नात्वा सर्वकामानवाप्नुयात्॥ २॥ | गङ्गाके उत्तरी तटपर मानस नामक तीर्थ है, जहाँ तीन राततक निराहार रहकर निवास करनेसे मनुष्य अपनी सारी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। |
| गोभूहिरण्यदानेन यत् फलं प्राप्नुयान्नरः।<br>स तत्फलमवाप्नोति तत् तीर्थं स्मरते पुनः॥ ३॥ | गौ, पृथ्वी और सुवर्ण दान करनेसे मनुष्यको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल उसे मानस-तीर्थके स्मरणसे प्राप्त हो जाता है। |
| अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो विपद्यते।<br>मृतस्तु लभते स्वर्गं नरकं च न पश्यति॥ ४॥ | जो मनुष्य निष्कामभावसे अथवा किसी कामनाको लेकर गङ्गाकी धारामें डूबकर मर जाता है, वह स्वर्गमें चला जाता है। उसे नरकका दर्शन नहीं करना पड़ता; |
| अप्सरोगणसंगीतैः सुप्तोऽसौ प्रतिबुद्ध्यते।<br>हंससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति।<br>बहुवर्षसहस्राणि स्वर्गं राजेन्द्र भुञ्जते॥ ५॥ | वह हंस और सारससे युक्त विमानपर चढ़कर देवलोकको जाता है। वहाँ वह अप्सरासमूहके सुमधुर गान-शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। राजेन्द्र! इस प्रकार वह अनेकों हजार वर्षोंतक स्वर्ग-सुखका उपभोग करता है। |
| ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये जायते विपुले कुले॥ ६॥ | पुनः पुण्य-कर्मके क्षीण हो जानेपर जब उसका स्वर्गसे पतन हो जाता है, तब वह सुवर्ण, मणि और मोतियोंसे सम्पन्न विशाल कुलमें जन्म लेता है। |
| षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टितीर्थशतानि च।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम्॥ ७॥ | माघमासमें गङ्गा-यमुनाके संगमपर छाछठ हजार तीर्थ एकत्र होते हैं। |