भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६६* मत्स्यपुराण *
गवां शतसहस्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम्।<br>प्रयागे माघमासे तु त्र्यहःस्नानात्तु तत् फलम्॥ ८<br>गङ्गायमुनोर्मध्ये कर्षाग्निं यस्तु साधयेत्।<br>अहीनाङ्गो ह्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसन्वितः॥ ९<br>यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु देहिनः।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ १०<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>स भुक्त्वा विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं स्मरते पुनः॥ ११इसलिये विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल माघमासमें प्रयाग-तीर्थमें तीन दिनतक स्नान करनेसे मिलता है। जो मनुष्य गङ्गा-यमुनाके संगमपर कर्षाग्नि (कंडा जलाकर पञ्चाग्नि)-की साधना करता है, वह सभी अङ्गोंसे सम्पन्न, नीरोग और पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे स्वस्थ हो जाता है। उस प्राणीके अङ्गोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुण्य क्षीण हो जानेपर वह स्वर्गसे च्युत होकर भूतलपर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है और यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग करके पुनः प्रयागतीर्थका स्मरण करता तथा वहाँ पहुँचता है॥ १—११॥
जलप्रवेशं यः कुर्यात् सङ्गमे लोकविश्रुते।<br>राहुग्रस्ते तथा सोमे विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः॥ १२<br>सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते।<br>षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ १३<br>स्वर्गे च शक्रलोकेऽस्मिन्नृषिगन्धर्वसेविते।<br>परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले॥ १४<br>अधःशिरास्तु यो ज्वालामूर्ध्वपादः पिबेन्नरः।<br>शतवर्ष सहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ १५<br>परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र सोऽग्निहोत्री भवेन्नरः।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १६<br>यः स्वदेहं तु कर्तित्वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति।<br>विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ १७<br>शतं वर्षसहस्राणां सोमलोके महीयते।<br>तस्मादपि परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १८<br>गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वांश्च प्रियवाचकः।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १९<br>यामुने चोत्तरे कूले प्रयागस्य तु दक्षिणे।<br>ऋणप्रमोचनं नाम तत् तीर्थं परमं स्मृतम्॥ २०<br>एकरात्रोषितः स्नात्वा ऋणैः सर्वैः प्रमुच्यते।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति ह्यनृणश्च सदा भवेत्॥ २१राहुद्वारा चन्द्रमाको ग्रस्त कर लिये जानेपर अर्थात् चन्द्रग्रहणके अवसरपर जो मनुष्य इस लोकप्रसिद्ध संगमके जलमें प्रवेश करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सोमलोकको प्राप्त होता है और वहाँ चन्द्रमाके साथ आनन्द मनाता है। पुनः साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गलोक तथा ऋषियों एवं गन्धर्वोंद्वारा सेवित इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। राजेन्द्र! स्वर्गसे च्युत होनेपर वह समृद्ध कुलमें जन्म धारण करता है। राजेन्द्र! जो मनुष्य प्रयागमें पैरोंको ऊपर और सिरको नीचे कर अग्निकी ज्वालाका पान करता है, वह एक लाख वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा स्वर्गसे च्युत होनेपर भूतलपर अग्निहोत्री होता है। यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग कर वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। जो मनुष्य प्रयागतीर्थमें अपने शरीरके मांसको काटकर पक्षियोंको खानेके लिये दे देता है, पक्षियोंद्वारा खाये गये शरीरवाले उस प्राणीको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो। वह एक लाख वर्षोंतक सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहाँसे च्युत होनेपर वह इस लोकमें धर्मात्मा, गुणसम्पन्न, सौन्दर्यशाली, विद्वान् और प्रियभाषी राजा होता है तथा यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग कर पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। प्रयागके दक्षिण और यमुनाके उत्तर तटपर ऋणप्रमोचन नामक तीर्थ है, जो परम श्रेष्ठ कहा जाता है। वहाँ एक रात निवास कर स्नान करनेसे मनुष्य सभी ऋणोंसे मुक्त हो जाता है और सदाके लिये ऋणरहित होकर स्वर्गलोकमें चला जाता है॥ १२—२१॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥ १०७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०७॥