भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं वटं रक्षति सदा शूलपाणिर्महेश्वरः।<br>स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम्॥ १०<br>अधर्मेणावृतो लोको नैव गच्छति तत्पदम्।<br>अल्पमल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप।<br>प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम्॥ ११<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते॥ १२<br>पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी।<br>प्रयागस्य प्रवेशे तु पापं नश्यति तत्क्षणात्॥ १३<br>योजनानां सहस्रेषु गङ्गायाः स्मरणान्नरः।<br>अपि दुष्कृतकर्मा तु लभते परमां गतिम्॥ १४<br>कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति।<br>अवगाह्य च पीत्वा तु पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ १५<br>सत्यवादी जितक्रोधो ह्यहिंसायां व्यवस्थितः।<br>धर्मानुसारी तत्त्वज्ञो गोब्राह्मणहिते रतः॥ १६<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नातो मुच्येत किल्बिषात्।<br>मनसा चिन्तयन् कामानवाप्नोति सुपुष्कलान्॥ १७<br>ततो गत्वा प्रयागं तु सर्वदेवाभिरक्षितम्।<br>ब्रह्मचारी वसेन्मासं पितॄन् देवांश्च तर्पयेत्।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् यत्र यत्राभिजायते॥ १८<br>तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>समागता महाभागा यमुना तत्र निम्नगा।<br>तत्र संनिहितो नित्यं साक्षाद् देवो महेश्वरः॥ १९<br>दुष्प्राप्यं मानुषैः पुण्यं प्रयागं तु युधिष्ठिर।<br>देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>तदुपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोकमुपासते॥ २०महेश्वर हाथमें त्रिशूल लेकर सदा वट-वृक्षकी रक्षा करते रहते हैं। देवगण इस सर्वपापहारी मङ्गलमय स्थानकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। इसलिये इस लोकमें अधर्मसे घिरा हुआ मनुष्य प्रयागक्षेत्रमें प्रवेश नहीं कर सकता। नरेश्वर! यदि किसीका स्वल्प अथवा उससे भी थोड़ा पाप होगा तो वह सारा-का-सारा प्रयागका स्मरण करनेसे नष्ट हो जायगा; क्योंकि (ऐसा विधान है कि) प्रयागतीर्थके दर्शन, नाम-संकीर्तन अथवा मृत्तिकाका स्पर्श करनेसे मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है ॥४—१२॥<br><br>राजेन्द्र! प्रयागक्षेत्रमें पाँच कुण्ड हैं, उन्हींके मध्यमें गङ्गा बहती हैं, इसलिये प्रयागमें प्रवेश करते ही उसी क्षण पाप नष्ट हो जाता है। मनुष्य कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, यदि वह हजारों योजन दूरसे भी गङ्गाका स्मरण करता है तो उसे परम गतिकी प्राप्ति होती है। गङ्गाका नाम लेनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है, दर्शन करनेसे उसे जीवनमें माङ्गलिक अवसर देखनेको मिलते हैं तथा स्नान और जलपान करके तो वह अपनी सात पीढ़ियोंको पावन बना देता है। जो मनुष्य सत्यवादी, क्रोधरहित, अहिंसापरायण, धर्मानुगामी, तत्त्वज्ञ और गौ एवं ब्राह्मणके हितमें तत्पर रहकर गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है तथा जो मनसे चिन्तनमात्र करता है, वह अपने अधिक-से-अधिक मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। इसलिये समस्त देवताओंद्धारा सुरक्षित प्रयाग-क्षेत्रमें जाकर वहाँ एक मासतक ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करते हुए देवों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। वहाँ रहते हुए मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ उसे अभिलषित पदार्थोंकी प्राप्ति होती है। वहाँ सूर्य-कन्या महाभागा यमुना देवी, जो तीनों लोकोंमें विख्यात हैं, नदीरूपमें आयी हुई हैं और साक्षात् भगवान् शंकर वहाँ नित्य निवास करते हैं। इसलिये युधिष्ठिर! यह पुण्यप्रद प्रयाग मनुष्योंके लिये दुर्लभ है। राजेन्द्र! देव, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध, चारण आदि गङ्गा-जलका स्पर्श कर स्वर्गलोकमें विराजमान होते हैं ॥ १३—२० ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये चतुरधिकशततमोऽध्यायः॥ १०४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रयागमाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०४॥