भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

३५८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं वटं रक्षति सदा शूलपाणिर्महेश्वरः।<br>स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम्॥ १०<br>अधर्मेणावृतो लोको नैव गच्छति तत्पदम्।<br>अल्पमल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप।<br>प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम्॥ ११<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते॥ १२<br>पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी।<br>प्रयागस्य प्रवेशे तु पापं नश्यति तत्क्षणात्॥ १३<br>योजनानां सहस्रेषु गङ्गायाः स्मरणान्नरः।<br>अपि दुष्कृतकर्मा तु लभते परमां गतिम्॥ १४<br>कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति।<br>अवगाह्य च पीत्वा तु पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ १५<br>सत्यवादी जितक्रोधो ह्यहिंसायां व्यवस्थितः।<br>धर्मानुसारी तत्त्वज्ञो गोब्राह्मणहिते रतः॥ १६<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नातो मुच्येत किल्बिषात्।<br>मनसा चिन्तयन् कामानवाप्नोति सुपुष्कलान्॥ १७<br>ततो गत्वा प्रयागं तु सर्वदेवाभिरक्षितम्।<br>ब्रह्मचारी वसेन्मासं पितॄन् देवांश्च तर्पयेत्।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् यत्र यत्राभिजायते॥ १८<br>तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>समागता महाभागा यमुना तत्र निम्नगा।<br>तत्र संनिहितो नित्यं साक्षाद् देवो महेश्वरः॥ १९<br>दुष्प्राप्यं मानुषैः पुण्यं प्रयागं तु युधिष्ठिर।<br>देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>तदुपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोकमुपासते॥ २०महेश्वर हाथमें त्रिशूल लेकर सदा वट-वृक्षकी रक्षा करते रहते हैं। देवगण इस सर्वपापहारी मङ्गलमय स्थानकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। इसलिये इस लोकमें अधर्मसे घिरा हुआ मनुष्य प्रयागक्षेत्रमें प्रवेश नहीं कर सकता। नरेश्वर! यदि किसीका स्वल्प अथवा उससे भी थोड़ा पाप होगा तो वह सारा-का-सारा प्रयागका स्मरण करनेसे नष्ट हो जायगा; क्योंकि (ऐसा विधान है कि) प्रयागतीर्थके दर्शन, नाम-संकीर्तन अथवा मृत्तिकाका स्पर्श करनेसे मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है ॥४—१२॥<br><br>राजेन्द्र! प्रयागक्षेत्रमें पाँच कुण्ड हैं, उन्हींके मध्यमें गङ्गा बहती हैं, इसलिये प्रयागमें प्रवेश करते ही उसी क्षण पाप नष्ट हो जाता है। मनुष्य कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, यदि वह हजारों योजन दूरसे भी गङ्गाका स्मरण करता है तो उसे परम गतिकी प्राप्ति होती है। गङ्गाका नाम लेनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है, दर्शन करनेसे उसे जीवनमें माङ्गलिक अवसर देखनेको मिलते हैं तथा स्नान और जलपान करके तो वह अपनी सात पीढ़ियोंको पावन बना देता है। जो मनुष्य सत्यवादी, क्रोधरहित, अहिंसापरायण, धर्मानुगामी, तत्त्वज्ञ और गौ एवं ब्राह्मणके हितमें तत्पर रहकर गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है तथा जो मनसे चिन्तनमात्र करता है, वह अपने अधिक-से-अधिक मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। इसलिये समस्त देवताओंद्धारा सुरक्षित प्रयाग-क्षेत्रमें जाकर वहाँ एक मासतक ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करते हुए देवों और पितरोंका तर्पण करना चाहिये। वहाँ रहते हुए मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ उसे अभिलषित पदार्थोंकी प्राप्ति होती है। वहाँ सूर्य-कन्या महाभागा यमुना देवी, जो तीनों लोकोंमें विख्यात हैं, नदीरूपमें आयी हुई हैं और साक्षात् भगवान् शंकर वहाँ नित्य निवास करते हैं। इसलिये युधिष्ठिर! यह पुण्यप्रद प्रयाग मनुष्योंके लिये दुर्लभ है। राजेन्द्र! देव, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध, चारण आदि गङ्गा-जलका स्पर्श कर स्वर्गलोकमें विराजमान होते हैं ॥ १३—२० ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये चतुरधिकशततमोऽध्यायः॥ १०४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रयागमाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०४॥

१०८- प्रयागमें अनशन-व्रत तथा एक मासतकके निवास (कल्पवास)-का महत्त्व

* अध्याय १०५ *३५९

एक सौ पाँचवाँ अध्याय

प्रयागमें मरनेवालोंकी गति और गो-दानका महत्त्व

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव च।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १<br>आर्त्तानां हि दरिद्राणां निश्चितव्यवसायिनाम्।<br>स्थानमुक्तं प्रयागं तु नाख्येयं तु कदाचन॥ २<br>व्याधितो यदि वा दीनो वृद्धो वापि भवेन्नरः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ ३<br>दीप्तकाञ्चनवर्णाभैर्विमानैः सूर्यवर्चसैः।<br>गन्धर्वाप्सरसां मध्ये स्वर्गे मोदति मानवः।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ४<br>सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः ।<br>वराङ्गनासमाकीर्णैर्मोदते शुभलक्षणैः॥ ५<br>गीतवाद्यविनिर्घोषैः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते।<br>यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते॥ ६<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>हिरण्यरत्नसम्पूर्णे समृद्धे जायते कुले।<br>तदेव स्मरते तीर्थं स्मरणात् तत्र गच्छति॥ ७<br>देशस्थो यदि वारण्ये विदेशस्थोऽथवा गृहे।<br>प्रयागं स्मरमाणोऽपि यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति ऋषिपुङ्गवाः॥ ८**मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! पुनः प्रयागके माहात्म्यका ही वर्णन सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। दुःखियों, दरिद्रों और निश्चित व्यवसाय करनेवालोंके कल्याणके लिये प्रयागक्षेत्र ही प्रशस्त कहा गया है। इसे कभी (कहीं) प्रकट नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ ऋषियोंका कथन है कि जो मनुष्य रोगग्रस्त, दीन अथवा वृद्ध होकर गङ्गा और यमुनाके संगममें प्राणोंका त्याग करता है, वह तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले एवं सूर्यसदृश तेजस्वी विमानोंद्वारा स्वर्गमें जाकर गन्धर्वों और अप्सराओंके मध्यमें आनन्दका उपभोग करता है और अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। वहाँ वह सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित, अनेकों रंगोंकी ध्वजाओंसे मण्डित, अप्सराओंसे खचाखच भरे हुए शुभ लक्षणसम्पन्न दिव्य विमानोंमें बैठकर आनन्द मनाता है तथा माङ्गलिक गीतों और बाजोंके शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार जबतक वह अपने जन्मका स्मरण नहीं करता, तबतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर उसका स्वर्गसे पतन हो जाता है। इस प्रकार स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ वह जीव सुवर्ण-रत्नसे परिपूर्ण एवं समृद्ध कुलमें जन्म धारण करता है और समयानुसार पुनः उसी तीर्थका स्मरण करता है तथा स्मरण आनेसे पुनः उस प्रयागक्षेत्रकी यात्रा करता है। ऋषिवरोंका कथन है कि मनुष्य चाहे देशमें हो अथवा विदेशमें, घरमें हो अथवा वनमें, यदि वह प्रयागका स्मरण करते हुए प्राणोंका परित्यग करता है तो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ १-८॥
सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी।<br>ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोके स गच्छति॥ ९<br>स्त्रीसहस्रावृते रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।<br>मोदते ऋषिभिः सार्धं सुकृतेनेह कर्मणा॥ १०<br>सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि दैवतैः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्॥ ११वह ऐसे लोकमें जाता है, जहाँकी भूमि स्वर्णमयी है, जहाँके वृक्ष इच्छानुसार फल देनेवाले हैं और जहाँ ऋषि, मुनि तथा सिद्धलोग निवास करते हैं। वहाँ वह अपने इस जन्ममें किये हुए पुण्यकर्मोंके प्रभावसे सहस्रों स्त्रियोंसे युक्त, मङ्गलमय एवं रमणीय मन्दाकिनीके तटपर ऋषियोंके साथ सुख भोगता है। स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ सिद्ध, चारण और गन्धर्व उसकी पूजा करते हैं। तत्पश्चात् (पुण्य क्षीण होनेपर) वह स्वर्गसे च्युत होकर

३६० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनः पुनः।<br>गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह न संशयः॥ १२<br>कर्मणा मनसा वाचा सत्यधर्मप्रतिष्ठितः।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु गां सम्प्रयच्छति।<br>स गोरोमसमाब्दानि लभते स्वर्गमुत्तमम्॥ १३<br>स्वकार्ये पितृकार्ये वा देवताभ्यर्चनेऽपि वा।<br>यस्तु गां प्रतिगृह्णाति गङ्गायमुनसङ्गमे॥ १४<br>सुवर्णमणिमुक्ताश्च यदि वान्यत् परिग्रहम्।<br>विफलं तस्य तत्तीर्थं यावत् तद्धनमश्नुते॥ १५<br>एवं तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येष्व्यायनेषु च।<br>निमित्तेषु च सर्वेषु ह्यप्रमत्तो भवेद् द्विजः॥ १६भूतलपर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है। इस जन्ममें उसे बारंबार अपने शुभकर्मोंका स्मरण होता है, जिससे वह निस्संदेह गुणवान् और धनसम्पन्न होता है तथा वह मनुष्य मन-वचन-कर्मसे सत्यधर्ममें स्थित रहता है। जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके संगमपर कार्योंमें अपने मङ्गलके निमित्त या पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले अथवा देवपूजन आदि कार्योंमें गोदान करता है, वह उस गौके रोमतुल्य वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। यदि कोई वहाँ गोदान लेता है या स्वर्ण, मणि, मोती अथवा अन्य जो कुछ सामग्री दानरूपमें ग्रहण करता है, तो जबतक वह धन उसके पास रहता है, तबतक उसका वह तीर्थ विफल होता है। इस प्रकार (तीर्थयात्रीको) तीर्थमें, पुण्यमय देव-मन्दिरोंमें तथा सभी निमित्तों (दानपर्वों)-में दान लेना कदापि उचित नहीं है। इसके लिये ब्राह्मणको विशेषरूपसे सावधान रहना चाहिये॥ ९-१६॥
कपिलां पाटलावर्णां यस्तु धेनुं प्रयच्छति।<br>स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां कांस्यदोहां पयस्विनीम्॥ १७<br>प्रयागे श्रोत्रियं सन्तं ग्राहयित्वा यथाविधि।<br>शुक्लाम्बरधरं शान्तं धर्मज्ञं वेदपारगम्॥ १८<br>सा गौस्तस्मै प्रदातव्या गङ्गायमुनसङ्गमे।<br>वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च॥ १९<br>यावद् रोमाणि तस्या गोः सन्ति गात्रेषु सत्तम।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ २०<br>यत्रासौ लभते जन्म सा गौस्तस्याभिजायते।<br>न च पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ २१<br>गवां शतसहस्रेभ्यो दद्यादेकां पयस्विनीम्।<br>पुत्रान् दारांस्तथा भृत्यान् गौरैका प्रति तारयेत्॥ २२<br>तस्मात् सर्वेषु दानेषु गोदानं तु विशिष्यते।<br>दुर्गमे विषमे घोरे महापातकसम्भवे।<br>गौरैव कुरुते रक्षां तस्माद् देया द्विजोत्तमे॥ २३जो मनुष्य प्रयागमें जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए हों, निकटमें काँसेकी दोहनी भी रखी हो, ऐसी लाल रंगकी दुधारू कपिला* गौका दान करना चाहता हो तो उसे वह गौ गङ्गा-यमुनाके संगमपर विधिपूर्वक ऐसे ब्राह्मणको देनी चाहिये, जो श्रोत्रिय, साधुस्वभाव, श्वेत वस्त्र धारण करनेवाला, शान्त, धर्मज्ञ और वेदोंका पारगामी विद्वान् हो। उसके साथ बहुमूल्य वस्त्र और अनेकों प्रकारके रत्न भी दान करने चाहिये। राजसत्तम! ऐसा करनेसे उस गौके अङ्गोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् जहाँ वह जन्म लेता है, वहीं वह गौ भी उसके घर उत्पन्न होती है। उस पुण्यकर्मके प्रभावसे उसे नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु-प्रदेशको पाकर अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। लाखों गौओंकी अपेक्षा एक ही दुधारू गौका दान प्रशस्त माना गया है; क्योंकि वह एक ही गौ पुत्रों, स्त्रियों और नौकरोंतकका उद्धार कर देती है। यही कारण है कि समस्त दानोंमें गो-दानका विशेष महत्त्व बतलाया जाता है। दुर्गम स्थानपर, भयंकर विषम परिस्थितिमें और महापातकके घटित हो जानेपर केवल गौ ही रक्षा कर सकती है, अतः मनुष्यको श्रेष्ठ ब्राह्मणको गो-दान देना चाहिये॥ १७-२३॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०५॥


* कपिला गौ 'स्वर्णकपिला' आदिके भेदसे दस प्रकारकी होती है। इसका विस्तृत वर्णन महाभारत, आश्वमेधिक, वैष्णवधर्म-पर्व, अ० ९५ गीताप्रेसमें दाक्षि० प्र० के श्लोकमें तथा वृद्ध गौतमस्मृतिमें अ० ९-१० में देखना चाहिये।

* अध्याय १०६ * | ३६१

एक सौ छठा अध्याय

प्रयाग-माहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें वहाँके विविध तीर्थोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच
यथा यथा प्रयागस्य माहात्म्यं कथ्यते त्वया।<br>तथा तथा प्रमुच्येऽहं सर्वपापैर्न संशयः॥ १<br>भगवन् केन विधिना गन्तव्यं धर्मनिश्चयैः।<br>प्रयागे यो विधिः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि महामुने॥ २युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आप ज्यों-ज्यों प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं, त्यों-त्यों मैं निःसंदेह समस्त पापोंसे मुक्त होता जा रहा हूँ। महामुने! धर्ममें सुदृढ़ बुद्धि रखनेवाले मनुष्योंको किस विधिसे प्रयागकी यात्रा करनी चाहिये? इसके लिये शास्त्रोंमें जिस विधिका वर्णन किया गया है, वह मुझे बतलाइये॥ १-२॥
मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! मैंने ऋषिप्रणीत विधिके अनुसार जैसा देखा एवं जैसा सुना है, उसीके अनुरूप प्रयागतीर्थकी यात्रा-विधिका क्रम बतला रहा हूँ। जो मनुष्य कहींसे भी प्रयागतीर्थकी यात्राके लिये हृष्ट-पुष्ट बैलपर सवार होकर प्रस्थान करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो। गो-वंशको कष्ट देनेवाला वह मनुष्य अत्यन्त घोर नरकमें निवास करता है तथा उस प्राणीके पितर उसका दिया हुआ जल नहीं ग्रहण करते; क्योंकि गौओंका क्रोध बड़ा भयानक होता है। जो विधिके अनुसार पुत्रों तथा बालकोंको प्रयागमें स्नान कराता है, गङ्गाजलका पान कराता है तथा अपनी ही तरह ब्राह्मणोंको सारा दान दिलाता है (वह तीर्थ-फलका भागी होता है)। जो मनुष्य ऐश्वर्यके लोभसे अथवा मोहवश सवारीपर बैठकर प्रयागकी यात्रा करता है, उसका वह तीर्थफल नष्ट हो जाता है, इसलिये सवारीका परित्याग कर देना चाहिये। जो गङ्गा-यमुनाके संगमपर ऋषिप्रणीत विवाह-विधिसे अपनी सम्पत्तिके अनुसार कन्या-दान करता है, उसे उस पुण्यकर्मके फलस्वरूप पूर्वोक्त घोर नरकका दर्शन नहीं होता, अपितु वह उत्तरकुरु देशमें जाकर अक्षय-कालतक आनन्दका उपभोग करता है और उसे धर्मात्मा एवं सौन्दर्यशाली स्त्री-पुत्रोंकी भी प्राप्ति होती है। इसलिये राजेन्द्र! अपनी सम्पत्तिके अनुकूल प्रयागमें दान अवश्य करना चाहिये। इससे तीर्थका फल बढ़ जाता है और वह दाता प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है॥ ३—१०॥
कथयिष्यामि ते राजंस्तीर्थयात्राविधिक्रमम्।<br>आर्षेण विधिनानेन यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३<br>प्रयागतीर्थं यात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।<br>बलीवर्दसमारूढः शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ४<br>नरके वसते घोरे गवां क्रोधो हि दारुणः।<br>सलिलं न च गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ५<br>यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।<br>यथात्मना तथा सर्वं दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ६<br>ऐश्वर्यलोभान्मोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद् यानं विवर्जयेत्॥ ७<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।<br>आर्षेणैव विवाहेन यथाविभवसम्भवम्॥ ८<br>न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्।<br>पुत्रान् दारांश्च लभते धार्मिकान् रूपसंयुतान्॥ ९<br>तत्र दानं प्रकर्तव्यं यथाविभवसम्भवम्।<br>तेन तीर्थफलं चैव वर्धते नात्र संशयः।<br>स्वर्गे तिष्ठति राजेन्द्र यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १०
वटमूलं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।<br>सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ११जो मनुष्य प्रयागस्थित अक्षयवटके नीचे पहुँचकर प्राणोंका त्याग करता है, वह अन्य सभी पुण्यलोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोकको चला जाता है।

१०९- अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा प्रयागकी महत्ताका वर्णन

३६२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र ते द्वादशादित्यास्तपन्ते रुद्रसंश्रिताः।<br>निर्दहन्ति जगत् सर्वं वटमूलं न दह्यते ॥ १२<br>नष्टचन्द्रार्कभुवनं यदा चैकार्णवं जगत्।<br>स्थीयते तत्र वै विष्णुर्यजमानः पुनः पुनः॥ १३<br>देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः।<br>सदा सेवन्ति तत् तीर्थं गङ्गायमुनसङ्गमम् ॥ १४<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागं संस्तुवंश्च यत्।<br>यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ १५<br>लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसम्मताः।<br>सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः॥ १६<br>अङ्गिराः प्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयः परे।<br>तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्च खेचराश्च ये ॥ १७<br>सागराः सरितः शैला नागा विद्याधराश्च ये।<br>हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरःसरः ॥ १८<br>गङ्गायमुनोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्।प्रलयकालमें जब बारह सूर्य रुद्रके आश्रयमें स्थित होकर अपने प्रखर तेजसे तपने लगते हैं, उस समय वे सारे जगत्को तो जलाकर भस्म कर देते हैं, परंतु अक्षयवटको वे भी नहीं जला पाते। प्रलयकालमें जब सूर्य, चन्द्रमा और चौदहों भुवन नष्ट हो जाते हैं तथा सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाता है, उस समय भी भगवान् विष्णु प्रयागमें यज्ञााराधनमें तत्पर होकर स्थित रहते हैं। देवता, दानव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण आदि गङ्गा-यमुनाके संगमभूत तीर्थका सदा सेवन करते हैं। अतः राजेन्द्र! जहाँ प्रयागकी स्तुति करते हुए ब्रह्मा आदि देवगण; ऋषि, सिद्ध, चारण, लोकपाल, साध्यगण, लोकसम्मत पितर; सनत्कुमार आदि परमर्षि; अङ्गिरा आदि महर्षि तथा अन्य ब्रह्मर्षि, नाग, एवं गरुड़ आदि पक्षी, सिद्ध, आकाशचारी जीव, सागर, नदियाँ, पर्वत, सर्प, विद्याधर तथा ब्रह्मासहित भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं, उस प्रयागकी यात्रा अवश्य करनी चाहिये। राजसिंह! यह गङ्गा-यमुनाके अन्तरालका प्रयाग-क्षेत्र पृथ्वीका जघनस्थल कहा गया है॥ ११-१८ १/२ ॥
प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>ततः पुण्यतमं नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १९<br>श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ २०<br>तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे शंसितव्रतः।<br>तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ २१<br>न वेदवचनात् तात न लोकवचनादपि।<br>मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमनं प्रति ॥ २२<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथापराः।<br>तेषां सांनिध्यमत्रैव ततस्तु कुरुनन्दन ॥ २३<br>या गतिर्योगयुक्तस्य सत्यस्थस्य मनीषिणः।<br>सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसङ्गमे ॥ २४<br>न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिंस्तत्र तत्र युधिष्ठिर।<br>ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु वञ्चिताः ॥ २५<br>एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा ॥ २६भारत! यह प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है। इससे बढ़कर पुण्यप्रद तीर्थ तीनों लोकोंमें दूसरा नहीं है। इस प्रयागतीर्थका नाम सुननेसे, इसके नामोंका संकीर्तन करनेसे अथवा इसकी मिट्टीका स्पर्श करनेसे मनुष्य पापसे छूट जाता है। जो व्रतनिष्ठ मनुष्य उस संगममें स्नान करता है, उसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंके समान फलकी प्राप्ति होती है। तात! इसलिये न तो किसी वेद-वचनसे, न लोगोंके आग्रहपूर्ण कथनसे ही तुम्हें प्रयाग-मरणके प्रति निश्चित की हुई अपनी बुद्धिमें किसी प्रकारका उलट-फेर करना चाहिये। कुरुनन्दन! इस भूतलपर जो दस हजार बड़े तीर्थ हैं तथा इनके अतिरिक्त जो तीन करोड़ अन्य तीर्थ हैं, उन सबका प्रयागमें ही निवास है। गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण छोड़नेवालेको वही गति प्राप्त होती है, जो गति योगनिष्ठ एवं सत्यपरायण विद्वान्‌को मिलती है। युधिष्ठिर! जिन लोगोंने प्रयागकी यात्रा नहीं की, वे तो मानो तीनों लोकोंमें ठग लिये गये और उनका जीवन इस लोकमें नहींके समान है। इस प्रकार परमपदस्वरूप इस प्रयागतीर्थका दर्शन करके मनुष्य उसी प्रकार समस्त पापोंसे छूट जाता है, जैसे (ग्रहणकालके बाद) राहुग्रस्त चन्द्रमा ॥ १९-२६॥
* अध्याय १०६ *३६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुना दक्षिणे तटे।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २७कम्बल और अश्वतर नामवाले दोनों नाग यमुनाके दक्षिण तटपर निवास करते हैं, अतः वहाँ स्नान और जलपान कर मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है।
तत्र गत्वा च संस्थानं महादेवस्य विश्रुतम्।<br>नरस्तारयते सर्वान् दश पूर्वान् दशापरान्॥ २८प्रयागक्षेत्रमें स्थित महादेवजीके सुप्रसिद्ध स्थानकी यात्रा करके मनुष्य अपनी दस आगेकी और दस पीछेकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है।
कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २९जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है और वह प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है।
पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रिषु लोकेषु भारत।<br>कूपं चैव तु सामुद्रं प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥ ३०भारत! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकोंमें विख्यात समुद्रकूप और प्रतिष्ठानपुर (झूँसी) है।
ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ३१वहाँ यदि मनुष्य तीन राततक क्रोधको वशमें कर ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करता है तो उसका आत्मा समस्त पापोंसे मुक्त होकर शुद्ध हो जाता है और उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है।
उत्तरेण प्रतिष्ठानाद् भागीरथ्यास्तु पूर्वतः।<br>हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ ३२भारत! भागीरथीके पूर्वतटपर प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-से उत्तर दिशामें 'हंसप्रपतन' नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है।
अश्वमेधफलं तस्मिन् स्नानमात्रेण भारत।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥ ३३वहाँ स्नानमात्र कर लेनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह यात्री सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
उर्वशीरमणे पुण्ये विपुले हंसपाण्डुरे।<br>परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ ३४इसी प्रकार जो मनुष्य पुण्यप्रद उर्वशीरमण तथा विशाल हंसपाण्डुर नामक तीर्थोंमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो!
षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>सेव्यते पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप॥ ३५नरेश्वर! वह स्वर्गलोकमें छाछठ हजार वर्षोंतक पितरोंके साथ सेवित होता है
उर्वशीं तु सदा पश्येत् स्वर्गलोके नरोत्तम।<br>पूज्यते सततं पुत्र ऋषिगन्धर्वकिन्नरैः॥ ३६और नरोत्तम! स्वर्गलोकमें वह सदा उर्वशीको देखता रहता है। पुत्र! साथ ही युधिष्ठिर ऋषि, गन्धर्व और किन्नर निरन्तर उसकी पूजा करते हैं।
ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>उर्वशीसदृशीनां तु कन्यानां लभते शतम्॥ ३७तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेपर जब वह स्वर्गसे च्युत होता है, तब दस हजार गाँवोंका उपभोग करनेवाला भूपाल होता है।
मध्ये नारीसहस्राणां बहूनां च पतिर्भवेत्।<br>दशग्रामसहस्राणां भोक्ता भवति भूमिपः॥ ३८वह अनेकों सहस्र नारियोंके बीच रहता हुआ उनका पति होता है। उससे उर्वशी-सरीखी सौन्दर्यशालिनी सौ कन्याएँ उत्पन्न होती हैं।
काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तोऽसौ प्रतिबुध्यते।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः॥ ३९वह करधनी और नूपुरके झंकार-शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। इस प्रकार प्रचुर भोगोंका उपभोग करके वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है॥ २७-३९॥
शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः संयतेन्द्रियः।<br>एककालं तु भुञ्जानो मासं भूमिपतिर्भवेत्॥ ४०जो मनुष्य प्रयागतीर्थमें एक मासतक श्वेत वस्त्र धारण करके जितेन्द्रिय होकर नित्य नियमपूर्वक रहते हुए एक ही समय भोजन करता है, वह (जन्मान्तरमें) राजा होता है,

११०- जगत्के समस्त पवित्र तीर्थोंका प्रयागमें निवास

३६४ * मत्स्यपुराण *

सुवर्णालङ्कृतानां तु नारीणां लभते शतम्।<br>पृथिव्यामासमुद्रायां महाभूमिपतिर्भवेत्॥ ४१<br><br>धनधान्यसमायुक्तो दाता भवति नित्यशः।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत्तीर्थं भजते पुनः॥ ४२<br><br>अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>उपवासी शुचिः संध्यां ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्॥ ४३<br><br>कोटितीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>कोटिवर्षसहस्राणां स्वर्गलोके महीयते॥ ४४<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>सुवर्णमणिमुक्ताढ्यकुले जायेत रूपवान्॥ ४५<br><br>ततो भोगवतीं गत्वा वासुकेरुत्तरेण तु।<br>दशाश्वमेधकं नाम तीर्थं तत्रापरं भवेत्॥ ४६<br><br>कृताभिषेकस्तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>धनाढ्यो रूपवान् दक्षो दाता भवति धार्मिकः॥ ४७<br><br>चतुर्वेदेषु यत् पुण्यं यत् पुण्यं सत्यवादिषु।<br>अहिंसायां तु यो धर्मो गमनादेव तत् फलम्॥ ४८<br><br>कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र यत्रावगाह्यते।<br>कुरुक्षेत्राद् दशगुणा यत्र विन्ध्येन संगता॥ ४९तथा समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका चक्रवर्ती सम्राट् हो जाता है। उसे सुवर्णालंकारोंसे विभूषित सैकड़ों स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं। वह धन-धान्यसे सम्पन्न होकर नित्य दान देता रहता है। इस प्रकार प्रचुर भोगोंका उपभोग करके वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। तदनन्तर रमणीय संध्यावटकी छायामें जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपूर्वक जितेन्द्रिय एवं निराहार रहकर पवित्रभावसे संध्योपासन करता है वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य कोटितीर्थमें जाकर प्राणोंका परित्याग करता है वह हजारों करोड़ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर जब स्वर्गलोकसे नीचे गिरता है, तब सुन्दर रूप धारण कर सुवर्ण, मणि और मोतीसे भरे-पूरे कुलमें जन्म लेता है। इसके बाद वासुकिह्रदकी उत्तर दिशामें स्थित भोगवती नामक तीर्थमें जानेपर वहाँ दशाश्वमेध नामवाला दूसरा तीर्थ मिलता है। वहाँ जो मनुष्य स्नान करता है उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वह सम्पत्तिशाली, सौन्दर्य-सम्पन्न, चतुर, दानी और धर्मात्मा होता है। चारों वेदोंके अध्ययनसे जो पुण्य होता है, सत्यभाषणसे जो पुण्य कहा गया है तथा अहिंसा-व्रतका पालन करनेसे जो धर्म बतलाया गया है, वह सारा फल प्रयागतीर्थकी यात्रासे ही प्राप्त हो जाता है। गङ्गामें जहाँ कहीं भी स्नान किया जाय, वहाँ गङ्गा कुरुक्षेत्रके समान फलदायिका मानी गयी हैं, परंतु जहाँ वह विन्ध्यपर्वतसे संयुक्त हुई हैं, वहाँ गङ्गा कुरुक्षेत्रसे दसगुना अधिक फलदायिनी हो जाती हैं॥ ४०—४९॥
यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्था तपोधना।<br>सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा॥ ५०<br><br>क्षितौ तारयते मर्त्यान् नागांस्तारयतेऽप्यधः।<br>दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता॥ ५१<br><br>यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति हि शरीरिणः।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ ५२<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>तीर्थानां तु परं तीर्थं नदीनां तु महानदी।<br>मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि॥ ५३जहाँ बहुत-से तीर्थोंसे युक्त, महाभाग्यशालिनी एवं तपस्विनी गङ्गा बहती हैं, उस स्थानको सिद्धक्षेत्र मानना चाहिये, इसमें अन्यथा विचार करना अनुचित है। गङ्गा भूतलपर मनुष्योंको, पातालमें नागोंको तथा स्वर्गलोकमें देवताओंको तारती हैं, इसी कारण उन्हें 'त्रिपथगा'* कहा जाता है। मृत प्राणीकी हड्डियाँ जितने समयतक गङ्गामें वर्तमान रहती हैं, उतने वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् स्वर्गसे च्युत होनेपर वह जम्बूद्वीपका स्वामी होता है। गङ्गा सभी तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ, नदियोंमें महानदी और महान्-से-महान् पाप करनेवाले सभी प्राणियोंके लिये मोक्षदायिनी हैं।

* तुलनीय वाल्मी० १।४३—त्रीन् पथो भावयन्त्येषा तस्मात् त्रिपथगा स्मृता।

* अध्याय १०७ *३६५

| सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।<br>गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसंगमे।<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ ५४॥<br>सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम्।<br>गतिमान्विष्यमाणानां नास्ति गङ्गासमा गतिः॥ ५५॥<br>पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>महेश्वरशिरोभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा॥ ५६॥ | गङ्गा सर्वत्र तो सुलभ हैं, परंतु गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गासागर-संगममें दुर्लभ मानी गयी हैं। इन स्थानोंपर स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकको चले जाते हैं और जो यहाँ शरीर-त्याग करते हैं, उनका तो पुनर्जन्म होता ही नहीं, अर्थात् वे मुक्त हो जाते हैं। जिनका चित्त पापसे आच्छादित है, अतः उद्धार पानेके लिये गतिकी खोजमें लगे हैं, उन सभी प्राणियोंके लिये गङ्गाके समान दूसरी गति नहीं है। महेश्वरके जटाजूटसे च्युत हुई मङ्गलमयी गङ्गा समस्त पापोंका हरण करनेवाली हैं। ये पवित्रोंमें परम पवित्र और मङ्गलोंमें मङ्गल-स्वरूपा हैं॥ ५०—५६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये षडधिकशततमोऽध्यायः॥ १०६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०६॥


एक सौ सातवाँ अध्याय

प्रयाग-स्थित विविध तीर्थोंका वर्णन

मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा—
शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव तु।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १॥राजन्! पुनः प्रयागका ही माहात्म्य श्रवण करो, जिसे सुनकर मनुष्य निस्संदेह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
मानसं नाम तीर्थं तु गङ्गाया उत्तरे तटे।<br>त्रिरात्रोपोषितो स्नात्वा सर्वकामानवाप्नुयात्॥ २॥गङ्गाके उत्तरी तटपर मानस नामक तीर्थ है, जहाँ तीन राततक निराहार रहकर निवास करनेसे मनुष्य अपनी सारी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
गोभूहिरण्यदानेन यत् फलं प्राप्नुयान्नरः।<br>स तत्फलमवाप्नोति तत् तीर्थं स्मरते पुनः॥ ३॥गौ, पृथ्वी और सुवर्ण दान करनेसे मनुष्यको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल उसे मानस-तीर्थके स्मरणसे प्राप्त हो जाता है।
अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो विपद्यते।<br>मृतस्तु लभते स्वर्गं नरकं च न पश्यति॥ ४॥जो मनुष्य निष्कामभावसे अथवा किसी कामनाको लेकर गङ्गाकी धारामें डूबकर मर जाता है, वह स्वर्गमें चला जाता है। उसे नरकका दर्शन नहीं करना पड़ता;
अप्सरोगणसंगीतैः सुप्तोऽसौ प्रतिबुद्ध्यते।<br>हंससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति।<br>बहुवर्षसहस्राणि स्वर्गं राजेन्द्र भुञ्जते॥ ५॥वह हंस और सारससे युक्त विमानपर चढ़कर देवलोकको जाता है। वहाँ वह अप्सरासमूहके सुमधुर गान-शब्दोंद्वारा नींदसे जगाया जाता है। राजेन्द्र! इस प्रकार वह अनेकों हजार वर्षोंतक स्वर्ग-सुखका उपभोग करता है।
ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः।<br>सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये जायते विपुले कुले॥ ६॥पुनः पुण्य-कर्मके क्षीण हो जानेपर जब उसका स्वर्गसे पतन हो जाता है, तब वह सुवर्ण, मणि और मोतियोंसे सम्पन्न विशाल कुलमें जन्म लेता है।
षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टितीर्थशतानि च।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम्॥ ७॥माघमासमें गङ्गा-यमुनाके संगमपर छाछठ हजार तीर्थ एकत्र होते हैं।

१११- प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवके निवासका वर्णन

३६६* मत्स्यपुराण *
गवां शतसहस्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम्।<br>प्रयागे माघमासे तु त्र्यहःस्नानात्तु तत् फलम्॥ ८<br>गङ्गायमुनोर्मध्ये कर्षाग्निं यस्तु साधयेत्।<br>अहीनाङ्गो ह्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसन्वितः॥ ९<br>यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु देहिनः।<br>तावद् वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ १०<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>स भुक्त्वा विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं स्मरते पुनः॥ ११इसलिये विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल माघमासमें प्रयाग-तीर्थमें तीन दिनतक स्नान करनेसे मिलता है। जो मनुष्य गङ्गा-यमुनाके संगमपर कर्षाग्नि (कंडा जलाकर पञ्चाग्नि)-की साधना करता है, वह सभी अङ्गोंसे सम्पन्न, नीरोग और पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे स्वस्थ हो जाता है। उस प्राणीके अङ्गोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुण्य क्षीण हो जानेपर वह स्वर्गसे च्युत होकर भूतलपर जम्बूद्वीपका अधिपति होता है और यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग करके पुनः प्रयागतीर्थका स्मरण करता तथा वहाँ पहुँचता है॥ १—११॥
जलप्रवेशं यः कुर्यात् सङ्गमे लोकविश्रुते।<br>राहुग्रस्ते तथा सोमे विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः॥ १२<br>सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते।<br>षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ १३<br>स्वर्गे च शक्रलोकेऽस्मिन्नृषिगन्धर्वसेविते।<br>परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले॥ १४<br>अधःशिरास्तु यो ज्वालामूर्ध्वपादः पिबेन्नरः।<br>शतवर्ष सहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥ १५<br>परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र सोऽग्निहोत्री भवेन्नरः।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १६<br>यः स्वदेहं तु कर्तित्वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति।<br>विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत् फलम्॥ १७<br>शतं वर्षसहस्राणां सोमलोके महीयते।<br>तस्मादपि परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १८<br>गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वांश्च प्रियवाचकः।<br>भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १९<br>यामुने चोत्तरे कूले प्रयागस्य तु दक्षिणे।<br>ऋणप्रमोचनं नाम तत् तीर्थं परमं स्मृतम्॥ २०<br>एकरात्रोषितः स्नात्वा ऋणैः सर्वैः प्रमुच्यते।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति ह्यनृणश्च सदा भवेत्॥ २१राहुद्वारा चन्द्रमाको ग्रस्त कर लिये जानेपर अर्थात् चन्द्रग्रहणके अवसरपर जो मनुष्य इस लोकप्रसिद्ध संगमके जलमें प्रवेश करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सोमलोकको प्राप्त होता है और वहाँ चन्द्रमाके साथ आनन्द मनाता है। पुनः साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गलोक तथा ऋषियों एवं गन्धर्वोंद्वारा सेवित इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। राजेन्द्र! स्वर्गसे च्युत होनेपर वह समृद्ध कुलमें जन्म धारण करता है। राजेन्द्र! जो मनुष्य प्रयागमें पैरोंको ऊपर और सिरको नीचे कर अग्निकी ज्वालाका पान करता है, वह एक लाख वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा स्वर्गसे च्युत होनेपर भूतलपर अग्निहोत्री होता है। यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग कर वह पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। जो मनुष्य प्रयागतीर्थमें अपने शरीरके मांसको काटकर पक्षियोंको खानेके लिये दे देता है, पक्षियोंद्वारा खाये गये शरीरवाले उस प्राणीको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो। वह एक लाख वर्षोंतक सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहाँसे च्युत होनेपर वह इस लोकमें धर्मात्मा, गुणसम्पन्न, सौन्दर्यशाली, विद्वान् और प्रियभाषी राजा होता है तथा यहाँ प्रचुर भोगोंका उपभोग कर पुनः प्रयागतीर्थकी यात्रा करता है। प्रयागके दक्षिण और यमुनाके उत्तर तटपर ऋणप्रमोचन नामक तीर्थ है, जो परम श्रेष्ठ कहा जाता है। वहाँ एक रात निवास कर स्नान करनेसे मनुष्य सभी ऋणोंसे मुक्त हो जाता है और सदाके लिये ऋणरहित होकर स्वर्गलोकमें चला जाता है॥ १२—२१॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥ १०७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०७॥

११२- भगवान् वासुदेवद्वारा प्रयागके माहात्म्यका वर्णन

  • अध्याय १०८ * | ३६७ ---|---

एक सौ आठवाँ अध्याय

प्रयागमें अनशन-व्रत तथा एक मासतकके निवास (कल्पवास)-का महत्त्व

युधिष्ठिर उवाचयुधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आपने जो प्रयागके माहात्म्यका वर्णन किया है, उसे सुनकर प्रयागका कीर्तन करनेसे अब मेरा हृदय विशुद्ध हो गया है। अब मुझे यह बतलाइये कि प्रयागमें अनशन (उपवास) करनेसे कैसा फल प्राप्त होता है और उसके प्रभावसे समस्त पापोंसे मुक्त होकर मनुष्य किस लोकमें जाता है?॥ १-२॥
एतच्छ्रुत्वा प्रयागस्य यत् त्वया परिकीर्तितम्।<br>विशुद्धं मेऽद्य हृदयं प्रयागस्य तु कीर्तनात्॥ १<br>अनाशकफलं ब्रूहि भगवंस्तत्र कीदृशम्।<br>यं च लोकमवाप्नोति विशुद्धः सर्वकिल्बिषैः॥ २
मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा— ऐश्वर्यशाली राजन्! प्रयागतीर्थमें जो श्रद्धालु विद्वान् इन्द्रियोंको वशमें करके अनशन-व्रतका पालन करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो। राजेन्द्र! वह सर्वाङ्गसे सम्पन्न, नीरोग और पाँचों कर्मेन्द्रियोंसे स्वस्थ रहता है। चलते समय उसे पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वह अपने पहलेके दस और पीछे होनेवाले दस कुलोंका उद्धार कर देता है तथा सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाता है॥ ३-५॥
शृणु राजन् प्रयागे तु अनाशकफलं विभो।<br>प्राप्नोति पुरुषो श्रीमान् श्रद्दधानो जितेन्द्रियः॥ ३<br>अहीनाङ्गोऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः।<br>अश्वमेधफलं तस्य गच्छतस्तु पदे पदे॥ ४<br>कुलानि तारयेद् राजन् दश पूर्वान् दशापरान्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो गच्छेत् तु परमं पदम्॥ ५
युधिष्ठिर उवाचयुधिष्ठिरने पूछा— प्रभो! आप मुझे जो धर्मका माहात्म्य बतला रहे हैं, उसके अनुसार एक ओर तो थोड़े ही प्रयत्नसे महान् धर्मकी प्राप्ति होती है और दूसरी ओर वह धर्म अश्वमेध-सदृश अनेकों उत्तम व्रतोंके अनुष्ठानसे मिलता है। (इस विषमताको लेकर मेरे मनमें महान् संदेह उत्पन्न हो गया है, अतः) मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये; क्योंकि मेरे मनमें महान् आश्चर्य हो रहा है॥ ६-७॥
महाभाग्यं हि धर्मस्य यत् त्वं वदसि मे प्रभो।<br>अल्पेनैव प्रयत्नेन बहून् धर्मानवाप्नुते॥ ६<br>अश्वमेधैस्तु बहुभिः प्राप्यते सुव्रतैरिह।<br>इमं मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे॥ ७
मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! पूर्वकालमें पद्मयोनि ब्रह्माने ऋषियोंके निकट जिसका वर्णन किया था, उसे कहते समय मैंने भी सुना था। (वही इस समय बतला रहा हूँ।) प्रयागका मण्डल पाँच योजन विस्तारवाला है। उसकी भूमिमें प्रवेश करते ही पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य प्रयागमण्डलमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह बीती हुई सात पीढ़ियोंका तथा आनेवाली चौदह पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। ऐसा जानकर मनुष्यको सदा प्रयागके सेवनमें तत्पर होना चाहिये।
शृणु राजन् महावीर यदुक्तं पद्मयोनिना।<br>ऋषीणां संनिधौ पूर्वं कथ्यमानं मया श्रुतम्॥ ८<br>पञ्चयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मण्डलम्।<br>प्रविष्टमात्रे तद्भूमावश्वमेधः पदे पदे॥ ९<br>व्यतीतान् पुरुषान् सप्त भविष्यांश्च चतुर्दश।<br>नरस्तारयते सर्वान् यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ १०<br>एवं ज्ञात्वा तु राजेन्द्र सदा श्रद्धापरो भवेत्।

३६८ * मत्स्यपुराण *


| अश्रद्दधानाः पुरुषाः पापोपहतचेतसः।<br>प्राप्नुवन्ति न तत्स्थानं प्रयागं देवरक्षितम्॥ ११<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>स्नेहाद् वा द्रव्यलोभाद् वा ये तु कामवशं गताः।<br>कथं तीर्थफलं तेषां कथं पुण्यफलं भवेत्॥ १२<br>विक्रयी सर्वभाण्डानां कार्याकार्यमजानतः।<br>प्रयागे का गतिस्तस्य तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १३<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महागुह्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>मासमेकं तु यः स्नायात् प्रयागे नियतेन्द्रियः॥ १४<br>शुचिस्तु प्रयतो भूत्वाहिसंकः श्रद्धयान्वितः।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः स गच्छेत् परमं पदम्॥ १५<br>विश्रम्भघातकानां तु प्रयागे शृणु यत् फलम्।<br>त्रिकालमेव स्नायीत आहारं भैक्ष्यमाचरेत्।<br>त्रिभिर्मासैः स मुच्येत प्रयागे नात्र संशयः॥ १६<br>अज्ञानेन तु यस्येह तीर्थयात्रादिकं भवेत्।<br>सर्वकामसमृद्धस्तु स्वर्गलोके महीयते।<br>स्थानं च लभते नित्यं धनधान्यसमाकुलम्॥ १७<br>एवं ज्ञानेन सम्पूर्णः सदा भवति भोगवान्।<br>तारिताः पितरस्तेन नरकात् सपितामहाः॥ १८<br>धर्मानुसारि तत्त्वज्ञ पृच्छतस्ते पुनः पुनः।<br>त्वत्प्रियार्थं समाख्यातं गुह्यमेतत् सनातनम्॥ १९<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्।<br>प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि दर्शनादेव ते मुने॥ २०<br>त्वद्दर्शनात् तु धर्मात्मन् मुक्तोऽहं चाद्य किल्बिषात्।<br>इदानीं वेद्मि चात्मानं भगवन् गतकल्मषम्॥ २१ | राजेन्द्र! जिनमें श्रद्धा नहीं है तथा जिनका चित्त पापोंसे आच्छादित हो गया है, ऐसे पुरुष देवताओंद्वारा सुरक्षित उस प्रयागतीर्थमें नहीं पहुँच पाते॥ ८—११॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! प्रयागमें जाकर जो लोग स्नेहसे अथवा धनके लोभसे कामनाके वशीभूत हो जाते हैं, उन्हें कैसे तीर्थ-फलकी प्राप्ति होती है तथा किस प्रकारका पुण्यफल मिलता है? जो कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानसे विहीन पुरुष वहाँ सभी प्रकारके पात्रोंका व्यापार करता है, उसकी क्या गति होती है? यह सब मुझे बतलाइये॥ १२-१३॥<br><br>मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! यह प्रसङ्ग तो परम गोपनीय एवं समस्त पापोंका विनाशक है, इसे बतला रहा हूँ, सुनो, जो मनुष्य जितेन्द्रिय, श्रद्धायुक्त और अहिंसाव्रती होकर पवित्रभावसे नियमपूर्वक एक मासतक प्रयागमें स्नान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और परमपदको प्राप्त कर लेता है। अब विश्वासघात (रूप पाप) करनेवालोंको प्रयागमें आनेपर जो फल मिलता है, उसे सुनो, वह यदि प्रयागमें तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) वेलामें स्नान करे और भिक्षा माँगकर भोजन करे तो निस्संदेह तीन महीनेमें उस पापसे मुक्त हो सकता है। जो मनुष्य अनजानमें ही प्रयागकी यात्रा आदि कार्य कर बैठता है, वह भी सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा धनधान्यसे परिपूर्ण अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो जान-बूझकर नियमानुसार प्रयागकी यात्रा करता है, वह भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है तथा अपने प्रपितामह आदि पितरोंका नरकसे उद्धार कर देता है। तत्त्वज्ञ! तुम्हारे बारंबार पूछनेके कारण मैंने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये इस धर्मानुकूल परम गोपनीय एवं सनातन (अविनाशी) विषयका वर्णन किया है॥ १४—१९॥<br><br>युधिष्ठिर बोले— मुने! आपके दर्शनसे आज मेरा जन्म सफल हो गया और आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया। मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है तथा मैं अनुगृहीत हो गया हूँ। धर्मात्मन्! आपके दर्शनसे आज पापसे मुक्त हो गया हूँ। भगवन्! अब मैं अपनेको पापरहित अनुभव कर रहा हूँ॥ २०-२१॥ |

११३- भूगोलका विस्तृत वर्णन

* अध्याय १०८ *३६९

| मार्कण्डेय उवाच <br><br> दिष्ट्या ते सफलं जन्म दिष्ट्या ते तारितं कुलम्। <br> कीर्तनाद् वर्धते पुण्यं श्रुतात् पापप्रणाशनम्॥ २२॥ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तुम्हारे सौभाग्यसे तुम्हारा जन्म सफल हुआ है और सौभाग्यसे ही तुम्हारे कुलका उद्धार हुआ है। प्रयागतीर्थका नाम लेनेसे पुण्यकी वृद्धि होती है और श्रवण करनेसे पापका नाश होता है॥ २२॥ | | युधिष्ठिर उवाच <br><br> यमुनायां तु किं पुण्यं किं फलं तु महामुने। <br> एतन्मे सर्वमाख्याहि यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ २३॥ | युधिष्ठिरने पूछा— महामुने! यमुनामें स्नान करनेपर कैसा पुण्य होता है और कैसा फल प्राप्त होता है, इस विषयमें आपने जैसा देखा एवं सुना हो, वह सब मुझे बतलाइये॥ २३॥ | | मार्कण्डेय उवाच <br><br> तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता। <br> समाख्याता महाभागा यमुना तत्र निम्नगा॥ २४॥ <br><br> येनैव निःसृता गङ्गा तेनैव यमुनाऽऽगता। <br> योजनानां सहस्रेषु कीर्तनात् पापनाशिनी॥ २५॥ <br><br> तत्र स्नात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर। <br> कीर्तनाल्लभते पुण्यं दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति॥ २६॥ <br><br> अवगाह्याथ पीत्वा च पुनात्यासप्तमं कुलम्। <br> प्राणांस्त्यजति यस्तत्र स याति परमां गतिम्॥ २७॥ <br><br> अग्नितीर्थमिति ख्यातं यमुनादक्षिणे तटे। <br> पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थं तु नरकं स्मृतम्॥ २८॥ <br><br> तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः। <br> एवं तीर्थसहस्राणि यमुनादक्षिणे तटे॥ २९॥ <br><br> उत्तरेण प्रवक्ष्यामि आदित्यस्य महात्मनः। <br> तीर्थं नीरुजकं* नाम यत्र देवा सवासवाः॥ ३०॥ <br><br> उपासते सदा संध्यां त्रिकालं हि युधिष्ठिर। <br> देवाः सेवन्ति तत् तीर्थं ये चान्ये विदुषो जनाः॥ ३१॥ <br><br> श्रद्धानपरो भूत्वा कुरु तीर्थाभिषेचनम्। <br> अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापहराः स्मृताः। <br> तेषु स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ ३२॥ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! महाभागा यमुनादेवी सूर्यकी कन्या हैं। ये तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। प्रयागमें (संगम-स्थलपर) ये नदीरूपसे विशेष ख्याति प्राप्त कर रही हैं। जहाँसे गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है, वहींसे यमुना भी उद्भूत हुई हैं। ये हजार योजन (चार हजार मील) दूरसे भी नाम लेनेसे पापोंका नाश करनेवाली हैं। युधिष्ठिर! यमुनामें स्नान, जलपान और यमुनाका नाम-कीर्तन करनेसे महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है तथा दर्शन करनेसे मनुष्यको अपने जीवनमें कल्याणकारी अवसर देखनेको मिलते हैं। यमुनामें स्नान और जलपान करके मनुष्य अपने सात कुलोंको पावन बना देता है, परंतु जो यमुना-तटपर अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। यमुनाके दक्षिण तटपर सुप्रसिद्ध अग्नितीर्थ है और उसमें पश्चिम दिशामें धर्मराजका तीर्थ है, जो नरक नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको चले जाते हैं तथा जो लोग वहाँ प्राण-त्याग करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात् वे मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार यमुनाके दक्षिण तटपर हजारों तीर्थ हैं। युधिष्ठिर! अब मैं यमुनाके उत्तर तटपर महात्मा सूर्यके नीरुजक (निरंजन) नामक तीर्थका वर्णन कर रहा हूँ, जहाँ इन्द्रसहित सभी देवता त्रिकाल संध्योपासन करते हैं। देवता तथा अन्यान्य विद्वज्जन सदा उस तीर्थका सेवन करते हैं। इसी प्रकार और भी बहुत-से तीर्थ हैं, जो समस्त पापोंके विनाशक बतलाये जाते हैं। इसलिये तुम भी श्रद्धापरायण होकर उन तीर्थोंमें स्नान करो; क्योंकि उन तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें चले जाते हैं और जो वहाँ मरते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। |


* इसका—'विरुजकम्' तथा 'निरञ्जनम्' नाम पाठान्तर भी मिलता है।

३७०* मत्स्यपुराण *
गङ्गा च यमुना चैव उभे तुल्यफले स्मृते।<br>केवलं ज्येष्ठभावेन गङ्गा सर्वत्र पूज्यते॥ ३३<br>एवं कुरुष्व कौन्तेय सर्वतीर्थाभिषेचनम्।<br>यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ३४<br>यस्त्विमं कल्य उत्थाय पठते च शृणोति च।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोकं स गच्छति॥ ३५गङ्गा और यमुना—ये दोनों समान फल देनेवाली बतलायी जाती हैं। केवल ज्येष्ठ होनेके कारण गङ्गाकी सर्वत्र पूजा होती है। कुन्तीनन्दन! इस प्रकार तुम सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करो; क्योंकि ऐसा करनेसे जीवनपर्यन्त किया हुआ सारा पाप तत्काल ही नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस प्रसङ्गका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है॥ २४—३५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये अष्टाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०८॥


एक सौ नवाँ अध्याय

अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा प्रयागकी महत्ताका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच<br><br>श्रुतं मे ब्रह्मणा प्रोक्तं पुराणे ब्रह्मसम्भवे।<br>तीर्थानां तु सहस्राणि शतानि नियुतानि च।<br>सर्वे पुण्याः पवित्राश्च गतिश्च परमा स्मृता॥ १<br><br>सोमतीर्थं महापुण्यं महापातकनाशनम्।<br>स्नानमात्रेण राजेन्द्र पुरुषांस्तारयेच्छतम्।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नानं समाचरेत्॥ २<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br><br>पृथिव्यां नैमिषं पुण्यमन्तरिक्षे च पुष्करम्।<br>त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते॥ ३<br><br>सर्वाणि तानि संत्यज्य कथमेकं प्रशंससि।<br>अप्रमाणं तु तत्रोक्तमश्रद्धेयमनुत्तमम्॥ ४<br><br>गतिं च परमां दिव्यां भोगांश्चैव यथेप्सितान्।<br>किमर्थमल्पयोगेन बहु धर्मं प्रशंससि।<br>एतन्मे संशयं ब्रूहि यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ५<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br><br>अश्रद्धेयं न वक्तव्यं प्रत्यक्षमपि यद् भवेत्।<br>नरस्याश्रद्दधानस्य पापोपहतचेतसः॥ ६मार्कण्डेयजीने कहा—राजेन्द्र! मैंने ब्रह्माके मुखसे प्रादुर्भूत हुए पुराणोंमें ब्रह्माद्वारा कहे जाते हुए सुना है कि तीर्थोंकी संख्या कहीं सौ, कहीं हजार और कहीं लाखोंतक बतलायी गयी है। ये सभी पुण्यप्रद एवं परम पवित्र हैं। (इनमें स्नान करनेसे) परम गतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है। इन्हीं तीर्थोंमें सोमतीर्थ महान् पुण्यप्रद एवं महापातकोंका विनाशक है। वहाँ केवल स्नान करनेसे वह स्नानकर्ताके सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है, अतः सभी उपायोंद्वारा वहाँ स्नान अवश्य करना चाहिये॥ १-२॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा—महामुने! भूतलपर नैमिषारण्य और अन्तरिक्षमें पुष्कर पुण्यप्रद माने गये हैं तथा तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्रकी विशेषता बतलायी जाती है, परंतु आप इन सबको छोड़कर एक प्रयागकी ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? साथ ही वहाँ जानेसे परम दिव्य गति और अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति भी बतला रहे हैं, आपका यह कथन मुझे प्रमाणरहित, अश्रद्धेय और अनुचित प्रतीत हो रहा है। आप थोड़े-से परिश्रमसे बहुत बड़े धर्मकी प्राप्तिकी प्रशंसा किसलिये कर रहे हैं? अतः इस विषयमें आपने जैसा देखा अथवा सुना हो, उसके अनुसार कहकर मेरे इस संशयको दूर कीजिये॥ ३—५॥<br><br>मार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! जो श्रद्धाहीन है तथा जिसके चित्तपर पापने अपना स्वत्व जमा लिया है, ऐसे मनुष्यकी आँखोंके सामने जो बात घटित हो रही
* अध्याय १०९ *३७१
अश्रद्दधानो ह्यशुचिर्दुर्मतिस्त्यक्तमङ्गलः।<br>एते पातकिनः सर्वे तेनेदं भाषितं त्वया॥ ७<br>शृणु प्रयागमाहात्म्यं यथादृष्टं यथाश्रुतम्।<br>प्रत्यक्षं च परोक्षं च यथान्यस्तं भविष्यति॥ ८<br>शास्त्रं प्रमाणं कृत्वा च युज्यते योगमात्मनः।<br>क्लिश्यते चापरस्तत्र नैव योगमवाप्नुयात्॥ ९<br>जन्मान्तरसहस्रेभ्यो योगो लभ्येत वा न वा।<br>तथा युगसहस्रेण योगो लभ्येत मानवैः॥ १०<br>यस्तु सर्वाणि रत्नानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति।<br>तेन दानेन दत्तेन योगं नाभ्येति मानवः॥ ११<br>प्रयागे तु मृतस्येदं सर्वं भवति नान्यथा।<br>प्रधानहेतुं वक्ष्यामि श्रद्धत्स्व च भारत॥ १२है, उसे 'अश्रद्धेय' तो नहीं कहना चाहिये। अश्रद्धालु, अपवित्र, दुर्बुद्धि और माङ्गलिक कार्योंसे विमुख—ये सभी पापी कहलाते हैं। (ऐसा प्रतीत होता है कि मानो तुम्हारे सिरपर भी कोई पाप सवार है) जिसके कारण तुमने ऐसी बात कही है। अब प्रयागका माहात्म्य जैसा मैंने देखा अथवा सुना है, उसे बतला रहा हूँ, सुनो। जगत्में जो बात प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपमें देखी अथवा सुनी गयी हो, उसे शास्त्रोंद्वारा प्रमाणित कर अपने कल्याण-कार्यमें लगाना चाहिये। जो ऐसा नहीं करता, वह कष्टभागी होता है और उसे योगकी प्राप्ति नहीं होती। यह योग हजारों युगों या जन्मोंमें किन्हीं मनुष्योंको सुलभ होता या नहीं भी होता है। जो मनुष्य सभी प्रकारके रत्न ब्राह्मणोंको दान करता है, परंतु उस दानके प्रभावसे भी उसे उस योगकी प्राप्ति नहीं होती। किंतु प्रयागमें मरनेवालेको वह सब कुछ सुलभ हो जाता है, उसमें कुछ भी विपरीतता नहीं होती। भारत! मैं इसका प्रधान कारण बतला रहा हूँ, उसे श्रद्धापूर्वक सुनो॥६—१२॥
यथा सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र दृश्यते।<br>ब्राह्मणे चास्ति यत्किञ्चित्तद् ब्राह्ममिति चोच्यते॥ १३<br>एवं सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र पूज्यते।<br>तथा सर्वेषु लोकेषु प्रयागं पूजयेद् बुधः॥ १४<br>पूज्यते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर।<br>ब्रह्मापि स्मरते नित्यं प्रयागं तीर्थमुत्तमम्॥ १५<br>तीर्थराजमनुप्राप्य न चान्यत् किञ्चिदर्हति।<br>को हि देवत्वमासाद्य मनुष्यत्वं चिकीर्षति॥ १६<br>अनेनैवोपमानेन त्वं ज्ञास्यसि युधिष्ठिर।<br>यथा पुण्यतमं चास्ति तथैव कथितं मया॥ १७जैसे ब्रह्म सभी प्राणियोंमें सर्वत्र विद्यमान रहता है, और ब्राह्मणमें उसका कुछ विशेष अंश रहता है, जिसके कारण वह सब ब्राह्म कहे जाते हैं। जिस प्रकार सभी प्राणियोंमें सर्वत्र ब्रह्मकी सत्ता मानकर उनकी पूजा होती है (परंतु ब्राह्मण विशेषरूपसे पूजित होता है), उसी प्रकार विद्वान् लोग सभी तीर्थोंमें प्रयागको विशेष मान्यता देते हैं। युधिष्ठिर! सचमुच तीर्थराज पूजनीय है। ब्रह्मा भी इस उत्तम प्रयागतीर्थका नित्य स्मरण करते हैं। ऐसे तीर्थराजको पाकर मनुष्यको किसी अन्य वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं रह जाती। भला कौन ऐसा मनुष्य होगा जो देवत्वको पाकर मनुष्य बननेकी इच्छा करेगा। युधिष्ठिर! इसी उपमानसे तुम समझ जाओगे (कि प्रयागका इतना महत्त्व क्यों है)। जिस प्रकार प्रयाग सभी तीर्थोंमें विशेष पुण्यप्रद है, वैसा मैंने तुम्हें बतला दिया॥१३—१७॥
युधिष्ठिर उवाच<br>श्रुतं चेदं त्वया प्रोक्तं विस्मितोऽहं पुनः पुनः।<br>कथं योगेन तत्प्राप्तिः स्वर्गवासस्तु कर्मणा॥ १८युधिष्ठिरने पूछा— महर्षे! मैंने आपके द्वारा कहा गया प्रयाग-माहात्म्य तो सुना, किंतु इस योगरूप कर्मसे वैसे महान् फलकी प्राप्ति कैसे होती है तथा स्वर्गमें निवास कैसे मिलता है, इस विषयको सोचकर मैं बारंबार
३७२* मत्स्यपुराण *

| दाता वै लभते भोगान् गां च यत्कर्मणः फलम्।<br>तानि कर्माणि पृच्छामि पुनस्तैः प्राप्यते मही॥ १९<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br><br>शृणु राजन् महाबाहो यथोक्तकरणं महीम्।<br>गामग्निं ब्राह्मणं शास्त्रं काञ्चनं सलिलं स्त्रियः॥ २०<br>मातरं पितरं चैव ये निन्दन्ति नराधमाः।<br>न तेषामूर्ध्वगमनमिदमाह प्रजापतिः॥ २१<br>एवं योगस्य सम्प्राप्तिस्थानं परमदुर्लभम्।<br>गच्छन्ति नरकं घोरं ये नराः पापकर्मिणः॥ २२<br>हस्त्यश्वं गामनड्वाहं मणिमुक्तादिकाञ्चनम्।<br>परोक्षं हरते यस्तु पश्चाद् दानं प्रयच्छति॥ २३<br>न ते गच्छन्ति वै स्वर्गं दातारो यत्र भोगिनः।<br>अनेककर्मणा युक्ताः पच्यन्ते नरके पुनः॥ २४<br>एवं योगं च धर्मं च दातारं च युधिष्ठिर।<br>यथा सत्यमसत्यं वा अस्ति नास्तीति यत्फलम्।<br>निरुक्तं तु प्रवक्ष्यामि यथाह स्वयमंशुमान्॥ २५ | विस्मयविमुग्ध हो रहा हूँ; अतः जिन कर्मोंके फलस्वरूप दाताको ऐहलौकिक भोग और पृथ्वीकी प्राप्ति होती है तथा जन्मान्तरमें जिन कर्मोंके प्रभावसे पुनः पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त होता है, उन्हीं कर्मोंको मैं जानना चाहता हूँ, अतः उन्हें बतलानेकी कृपा करें॥ १८-१९॥<br>मार्कण्डेयजीने कहा— महाबाहु राजन्! मैंने जैसा करनेके लिये कहा है, उस विषयमें पुनः सुनो। जो नीच मनुष्य पृथ्वी, गौ, अग्नि, ब्राह्मण, शास्त्र, काञ्चन, जल, स्त्री, माता और पिताकी निन्दा करते हैं, उनकी ऊर्ध्वगति नहीं होती—ऐसा प्रजापति ब्रह्माने कहा है। अतः इस प्रकारके कर्मोंद्वारा योगकी प्राप्तिका स्थान परम दुर्लभ है; क्योंकि जो मनुष्य पापकर्ममें निरत रहते हैं, वे घोर नरकमें जाते हैं। जो मनुष्य परोक्षमें दूसरेकी हाथी, घोड़ा, गौ, बैल, मणि, मुक्ता और सुवर्ण आदि वस्तुओंको चुरा लेता है और पीछे उसे दान कर देता है, ऐसे लोग उस स्वर्गलोकमें नहीं जाते, जहाँ (अपनी वस्तु दान करनेवाले) दाता सुख भोगते हैं, अपितु वे अनेकों पापकर्मोंसे युक्त होकर पुनः नरकमें कष्ट भोगते हैं। युधिष्ठिर! इस प्रकार योग, धर्म, दाता, सत्य, असत्य, अस्ति, नास्तिका जो फल कहा गया है तथा स्वयं सूर्यने जैसा बतलाया है, वही मैं तुमसे वर्णन कर रहा हूँ॥ २०—२५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये नवाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०९॥


एक सौ दसवाँ अध्याय

जगत्के समस्त पवित्र तीर्थोंका प्रयागमें निवास

| मार्कण्डेय उवाच<br><br>शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव तु।<br>नैमिषं पुष्करं चैव गोतीर्थं सिन्धुसागरम्॥ १<br>गया च धेनुकं चैव गङ्गासागरमेव च।<br>एते चान्ये च बहवो ये च पुण्याः शिलोच्चयाः॥ २<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथा पराः।<br>प्रयागे संस्थिता नित्यमेवमाहुर्मनीषिणः॥ ३<br>त्रीणि चाप्यग्निकुण्डानि येषां मध्ये तु जाह्नवी।<br>प्रयागादभिनिष्क्रान्ता सर्वतीर्थनमस्कृता॥ ४ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! पुनः प्रयागका ही माहात्म्य सुनो। विद्वानोंका ऐसा कथन है कि नैमिषारण्य, पुष्कर, गोतीर्थ, सिन्धुसागर, गयातीर्थ, धेनुक (गयाके पासका एक तीर्थ) और गङ्गासागर—ये तथा इनके अतिरिक्त तीन करोड़ दस हजार जो अन्य तीर्थ हैं, वे सभी एवं पुण्यप्रद पर्वत प्रयागमें नित्य निवास करते हैं। यहाँ तीन अग्निकुण्ड भी हैं, जिनके बीचसे सम्पूर्ण तीर्थोंद्वारा नमस्कृत गङ्गा प्रवाहित होती हुई प्रयागसे आगे निकलती हैं। |

  • अध्याय ११० *
३७३
तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>यमुना गङ्गया सार्धं संगता लोकभाविनी॥ ५<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्।<br>प्रयागं राजशार्दूल कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ६<br>तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्।<br>दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तत् सर्वं तव जाह्नवि॥ ७<br>प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरावुभौ।<br>भोगवत्यथ या चैषा वेदिरेषा प्रजापतेः॥ ८<br>तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर।<br>प्रजापतिमुपासन्ते ऋषयश्च तपोधनाः॥ ९<br>यजन्ते क्रतुभिर्देवास्तथा चक्रधरा नृपाः।<br>ततः पुण्यतमो नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत॥ १०उसी प्रकार तीनों लोकोंमें विख्यात लोकभाविनी सूर्य-पुत्री यमुनादेवी यहीं गङ्गाके साथ सम्मिलित हुई हैं। गङ्गा और यमुनाका यह मध्यभाग पृथ्वीका जघनस्थल कहा जाता है। राजसिंह! भूतल, अन्तरिक्ष और स्वर्गलोक—सभी जगहमें कुल मिलाकर साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, परंतु वे सभी प्रयागस्थित गङ्गाकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते—ऐसा वायुने कहा है। अतः गङ्गाकी ही प्रधानता मानी गयी है। प्रयागमें झूँसी है। यहाँ कम्बल और अश्वतर नामक दोनों नागोंका निवासस्थान है। यहाँ जो भोगवती तीर्थ है, वह प्रजापति ब्रह्माकी वेदी है। युधिष्ठिर! वहाँ शरीरधारी वेद एवं यज्ञ तथा तपोधन महर्षिगण ब्रह्माकी उपासना करते हैं। भारत! वहाँ देवगण तथा चक्रवर्ती सम्राट् यज्ञोंद्वारा यजन करते रहते हैं॥ १—१०॥
प्रयागः सर्वतीर्थेभ्यः प्रभवत्यधिकं विभो।<br>यत्र गङ्गा महाभागा स देशस्तत्तपोधनम्॥ ११<br>सिद्धक्षेत्रं च विज्ञेयं गङ्गातीरसमन्वितम्।<br>इदं सत्यं विजानीयात् साधूनामात्मनश्च वै॥ १२<br>सुहृदश्च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च।<br>इदं धन्यमिदं स्वर्ग्यमिदं सत्यमिदं सुखम्॥ १३<br>इदं पुण्यमिदं धर्म्यं पावनं धर्ममुत्तमम्।<br>महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ १४<br>अधीत्य च द्विजोऽप्ये तन्निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात्।<br>य इदं शृणुयान्नित्यं तीर्थं पुण्यं सदा शुचिः॥ १५<br>जातिस्मरत्वं लभते नाकपृष्ठे च मोदते।<br>प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शिष्टानुदर्शिभिः॥ १६<br>स्नाहि तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्भव।<br>त्वया च सम्यक् पृष्टेन कथितं वै मया विभो॥ १७<br>पितरस्तारिताः सर्वे तथैव च पितामहाः।<br>प्रयागस्य तु सर्वे ते कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १८<br>एवं ज्ञानं च योगश्च तीर्थं चैव युधिष्ठिर।विभो! तीनों लोकोंमें प्रयागसे बढ़कर अन्य कोई तीर्थ नहीं है, सबसे अधिक प्रभावशालिनी महाभागा गङ्गा जहाँ वर्तमान हैं, वह देश तपोमय (श्रेष्ठ सत्त्वसे युक्त) है। इस गङ्गाके तटवर्ती क्षेत्रको सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये। इस माहात्म्यको सत्य मानना चाहिये और साधुओं तथा अपने मित्रों एवं आज्ञाकारी शिष्योंके कानमें ही इसे बतलाना उचित है। यह प्रयाग-माहात्म्य धन्य, स्वर्गप्रद, सत्य, सुखदायक, पुण्यप्रद, धर्मसम्पन्न, परम पावन, श्रेष्ठ धर्मस्वरूप और समस्त पापोंका विनाशक है। यह महर्षियोंके लिये भी अत्यन्त गोपनीय है। इसका पाठकर द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) पापरहित हो स्वर्गको प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य पवित्रतापूर्वक इस अविनाशी एवं पुण्यप्रद तीर्थमाहात्म्यको सदा सुनता है, उसे जातिस्मरत्व (जन्मान्तर-स्मरण)-की प्राप्ति हो जाती है और वह स्वर्गलोकमें आनन्दका उपभोग करता है। कौरवकुलश्रेष्ठ युधिष्ठिर! शिष्ट पुरुषोंका अनुकरण करनेवाले सत्पुरुष ही इन तीर्थोंमें पहुँच पाते हैं, अतः तुम इन तीर्थोंमें स्नान करो, अश्रद्धा मत करो। सामर्थ्यशाली राजन्! तुम्हारे पूछनेपर ही मैंने सम्यक्रूपसे इसका वर्णन किया है। ऐसा प्रश्न कर तुमने अपने पितामह आदि सभी पितरोंका उद्धार कर दिया। (अन्य जितने तीर्थ हैं) वे सभी प्रयागकी सोलहवीं कलाकी बराबरी नहीं कर सकते। युधिष्ठिर! इस प्रकारके ज्ञान, योग और तीर्थकी प्राप्तिका

३७४ * मत्स्यपुराण *


| बहुक्लेशेन युज्यन्ते तेन यान्ति परां गतिम्।<br><br>त्रिकालं जायते ज्ञानं स्वर्गलोकं गमिष्यति॥ १९ | संयोग बड़े कष्टसे मिलता है; क्योंकि उसके संयोगसे मनुष्यको परमगतिकी प्राप्ति हो जाती है, उसके हृदयमें तीनों कालोंका ज्ञान उत्पन्न हो जाता है और वह स्वर्गलोकको चला जाता है॥ ११—१९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये दशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११०॥


एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय

प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवके निवासका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच<br>कथं सर्वमिदं प्रोक्तं प्रयागस्य महामुने।<br>एतन्नः सर्वमाख्याहि यथा हि मम तारयेत्॥ १युधिष्ठिरने पूछा— महामुने! आपने तो यह सारा महत्त्व प्रयागका ही बतलाया है, इसका क्या कारण है? यह सब मुझे बतलािये, जिससे मेरा तथा मेरे कुटुम्बका उद्धार हो जाय॥ १॥
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् प्रयागे तु प्रोक्तं सर्वमिदं जगत्।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानो देवताः प्रभुरव्ययः॥ २<br>ब्रह्मा सृजति भूतानि स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>तान्येतानि परं लोके विष्णुः संवर्धते प्रजाः॥ ३<br>कल्पान्ते तत् समग्रं हि रुद्रः संहरते जगत्।<br>तदा प्रयागतीर्थं च न कदाचिद् विनश्यति॥ ४<br>ईश्वरं सर्वभूतानां यः पश्यति स पश्यति।<br>यत्नेनानेन तिष्ठन्ति ते यान्ति परमां गतिम्॥ ५मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! इसका कारण सुनो। प्रयागमें इस सारे जगत्‌का निवास बतलाया जाता है। यहाँ अविनाशी एवं सामर्थ्यशाली ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सम्पूर्ण देवता वास करते हैं, ब्रह्मा जिन स्थावर-जङ्गम्रूप प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, उन सभी प्रजाओंका इस लोकमें भगवान् विष्णु पालन करते हैं तथा कल्पान्तमें रुद्र इस सारे जगत्‌का संहार कर देते हैं, किंतु इस प्रयागतीर्थका कभी विनाश नहीं होता। सम्पूर्ण प्राणियोंका जो ईश्वर है, उसे जो देखता है, वही सचमुच देखनेवाला है। इस प्रयत्नसे जो लोग प्रयागमें निवास करते हैं, वे परमगतिको प्राप्त होते हैं॥ २—५॥
युधिष्ठिर उवाच<br>आख्याहि मे यथातथ्यं यथैषा तिष्ठति श्रुतिः।<br>केन वा कारणेनैव तिष्ठन्ते लोकसत्तमाः॥ ६युधिष्ठिरने पूछा— मुने! ये लोकश्रेष्ठ देवगण किस कारणवश प्रयागमें निवास करते हैं, इस विषयमें जैसा श्रुति-वचन हो, उसके अनुसार मुझे यथार्थरूपसे बतलािये॥ ६॥
मार्कण्डेय उवाच<br>प्रयागे निवसन्त्येते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>कारणं तत् प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं युधिष्ठिर॥ ७<br>पञ्चयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मण्डलम्।<br>तिष्ठन्ति रक्षणायात्र पापकर्मनिवारणात्॥ ८<br>उत्तरेण प्रतिष्ठानाच्छद्मना ब्रह्म तिष्ठति।<br>वेणीमाधवरूपी तु भगवांस्तत्र तिष्ठति॥ ९मार्कण्डेयजीने कहा— युधिष्ठिर! ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिस प्रयोजनसे प्रयागमें निवास करते हैं, वह कारण बतला रहा हूँ; उसके तत्त्वको श्रवण करो। प्रयागका मण्डल पाँच योजनमें फैला हुआ है। यहाँ पापकर्मका निवारण तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिये उपर्युक्त देवगण निवास करते हैं। प्रतिष्ठानपुरसे उत्तरकी ओर गुप्तरूपसे ब्रह्माजी निवास करते हैं। भगवान् विष्णु प्रयागमें वेणीमाधवरूपसे विद्यमान हैं

११४- भारतवर्ष, किम्पुरुषवर्ष तथा हरिवर्षका वर्णन

* अध्याय ११२ *३७५

| महेश्वरो वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वरः।<br>ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>रक्षन्ति मण्डलं नित्यं पापकर्मनिवारणात्॥ १०<br>यस्मिञ्जुह्वन् स्वकं पापं नरकं च न पश्यति।<br>एवं ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रयागे समहेश्वरः॥ ११<br>सप्तद्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च महीतले।<br>रक्षमाणाश्च तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १२<br>ये चान्ये बहवः सर्वे तिष्ठन्ति च युधिष्ठिर।<br>पृथिवीं तत्समाश्रित्य निर्मिता दैवतैस्त्रिभिः॥ १३<br>प्रजापतेरिदं क्षेत्रं प्रयागमिति विश्रुतम्।<br>एतत् पुण्यं पवित्रं वै प्रयागं च युधिष्ठिर।<br>स्वराज्यं कुरु राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽनघ॥ १४ | तथा परमेश्वर शिव अक्षयवटके रूपमें स्थित हैं। इनके अतिरिक्त गन्धर्वोंसहित देवगण, सिद्धसमूह तथा यूथ-के-यूथ परमर्षि पाप-कर्मसे निवारण करनेके निमित्त नित्य प्रयागमण्डलकी रक्षा करते हैं, जिस मण्डलमें अपने पापोंका हवन करके प्राणी नरकका दर्शन नहीं करता, इस प्रकार प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, सातों द्वीप, सातों समुद्र और भूतलपर स्थित सभी पर्वत उसकी रक्षा करते हुए प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। युधिष्ठिर! इनके अतिरिक्त अन्य जो बहुत-से देवता पृथ्वीका आश्रय लेकर निवास करते हैं, उनके निवासस्थानका निर्माण इन्हीं तीनों देवताओंद्वारा हुआ है। यह प्रयाग प्रजापति ब्रह्माका क्षेत्र है—ऐसी प्रसिद्धि है। युधिष्ठिर! यह प्रयाग पुण्यप्रद एवं परम पवित्र है। निष्पाप राजेन्द्र! तुम अपने भाइयोंके साथ अपना राज्य-कार्य सँभालो॥ ७–१४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ १११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १११॥


एक सौ बारहवाँ अध्याय

भगवान् वासुदेवद्वारा प्रयागके माहात्म्यका वर्णन

| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्द्रौपद्या सह भार्यया।<br>ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य गुरून् देवानतर्पयत्॥ १<br>वासुदेवोऽपि तत्रैव क्षणेनाभ्यागतस्तदा।<br>पाण्डवैः सहितैः सर्वैः पूज्यमानस्तु माधवः॥ २<br>कृष्णेन सहितैः सर्वैः पुनरेव महात्मभिः।<br>अभिषिक्तः स्वराज्ये च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ ३<br>एतस्मिन्नन्तरे चैव मार्कण्डेयो महामुनिः।<br>ततः स्वस्तीति चोक्त्वा तु क्षणादाश्रममागमत्॥ ४<br>युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितोऽवसत्।<br>महादानं ततो दत्त्वा धर्मपुत्रो महामनाः॥ ५<br>यस्त्विदं कल्य उत्थाय माहात्म्यं पठते नरः।<br>प्रयागं स्मरते नित्यं स याति परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ६ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सभी भाइयों तथा पत्नी द्रौपदीके साथ ब्राह्मणोंको नमस्कार कर देवताओं एवं अपने गुरुजनोंको तर्पणद्वारा तृप्त किया। भगवान् वासुदेव भी अकस्मात् उसी क्षण वहीं आ पहुँचे। तब सभी पाण्डवोंने मिलकर भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की। तत्पश्चात् सभी महात्माओंके साथ-साथ भगवान् श्रीकृष्णने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पुनः उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। इसी बीच महामुनि मार्कण्डेय ‘स्वस्ति—तुम्हारा कल्याण हो’—यों कहकर क्षणमात्रमें अपने आश्रमको लौट गये। तदनन्तर महामना एवं धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर भी बड़ा-बड़ा दान देकर भाइयोंके साथ वहाँ निवास करने लगे। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस माहात्म्यका पाठ करता है तथा नित्य प्रयागका स्मरण करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है तथा समस्त पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको चला जाता है॥ १–६॥ |

३७६* मत्स्यपुराण *
वासुदेव उवाच
मम वाक्यं च कर्तव्यं महाराज ब्रवीम्यहम्।<br>नित्यं जपस्व जुह्वस्व प्रयागे विगतज्वरः ॥ ७<br>प्रयागं स्मर वै नित्यं सहास्माभिर्युधिष्ठिर।<br>स्वयं प्राप्स्यसि राजेन्द्र स्वर्गलोकं न संशयः ॥ ८<br>प्रयागमनुगच्छेद् वा वसते वापि यो नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९<br>प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो नियतः शुचिः।<br>अहङ्कारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥ १०<br>अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी दृढव्रतः।<br>आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ॥ ११<br>ऋषिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवैश्चापि यथाक्रमम्।<br>न हि शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते ॥ १२<br>बहुपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः।<br>प्राप्यन्ते पार्थिवैरेतैः समृद्धैर्वा नरैः क्वचित् ॥ १३<br>यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर।<br>तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस्तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १४<br>ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम।<br>तीर्थानुगमनं पुण्यं यज्ञेभ्योऽपि विशिष्यते ॥ १५<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथाऽपगाः।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायां भरतर्षभ ॥ १६<br>स्वस्थो भव महाराज भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्।<br>पुनर्द्रक्ष्यसि राजेन्द्र यजमानो विशेषतः ॥ १७**भगवान् वासुदेवने कहा—**महाराज युधिष्ठिर! मैं जैसा कह रहा हूँ, मेरे उस वचनका पालन कीजिये। आप प्रयागमें जाकर संतापरहित हो नित्य भगवन्नामका जप और हवन कीजिये तथा हमलोगोंके साथ नित्य प्रयागका स्मरण कीजिये। राजेन्द्र! ऐसा करनेसे आप स्वयं स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो मनुष्य प्रयागकी यात्रा करता है अथवा वहाँ निवास करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह रुद्रलोकको चला जाता है। जो प्रतिग्रह (दान लेने)-से विमुख, संतुष्ट, जितेन्द्रिय, पवित्र और अहंकारसे दूर रहता है, उसे तीर्थफलकी प्राप्ति होती है। जो क्रोधरहित, ईमानदार, सत्यवादी, दृढ़व्रत और समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही व्यवहार करता है, वह तीर्थफलका भागी होता है। महीपते! ऋषियोंने तथा देवताओंने क्रमशः जिन यज्ञोंका विधान बतलाया है, उन यज्ञोंका अनुष्ठान निर्धन मनुष्य नहीं कर सकता; क्योंकि उन यज्ञोंमें बहुत-से उपकरणों तथा नाना प्रकारकी सामग्रियोंकी आवश्यकता पड़ती है। इनका अनुष्ठान तो राजा अथवा कहीं-कहीं कुछ समृद्धिशाली मनुष्य ही कर सकते हैं। नरेश्वर युधिष्ठिर! निर्धन मनुष्योंद्वारा भी जिस विधिका पालन किया जा सकता है और जो पुण्यमें यज्ञफलके समान है, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनो! भरतसत्तम! यह पुण्यमयी तीर्थयात्रा ऋषियोंके लिये भी परम गोपनीय है तथा यज्ञोंसे भी बढ़कर फलदायक है। भरतर्षभ! दस हजार तीर्थ तथा तीन करोड़ नदियाँ माघमासमें गङ्गामें आकर निवास करती हैं। महाराज! आप स्वस्थ हो जायँ और निष्कण्टक राज्यका उपभोग करें। राजेन्द्र! पुनः कभी विशेषरूपसे यज्ञ करते समय आप मुझे देख सकेंगे॥ ७—१७॥
नन्दिकेश्वर उवाच
इत्युक्त्वा स महाभागो वासुदेवो महातपाः।<br>युधिष्ठिरस्य नृपतेस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १८<br>ततस्तत्र समाप्लाव्य गात्राणि सगणो नृपः।<br>यथोक्तेनाथ विधिना परां निर्वृतिमागमत् ॥ १९<br>तथा त्वमपि देवर्षे प्रयागाभिमुखो भव।<br>अभिषेकं तु कृत्वाद्य कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २०**नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! महान् भाग्यशाली एवं महान् तपस्वी वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण महाराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर महाराज युधिष्ठिरने सकुदुम्ब प्रयागमें जाकर यथोक्त विधिके अनुसार स्नान किया, जिससे उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई। देवर्षे! इसलिये आप भी प्रयागकी ओर पधारिये और वहाँ स्नान कर आज ही कृतकृत्य हो जाइये॥ १८—२०॥
सूत उवाच
एवमुक्त्वाथ नन्दीशस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>नारदोऽपि जगामाशु प्रयागाभिमुखस्तथा ॥ २१**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! तदनन्तर नन्दिकेश्वर ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये तथा नारदजी भी शीघ्र ही प्रयागकी ओर चल दिये।
* अध्याय ११३ *३७७

| तत्र स्नात्वा च जप्त्वा च विधिदृष्टेन कर्मणा।<br>दानं दत्त्वा द्विजाग्र्येभ्यो गतः स्वभवनं तदा॥ २२ | वहाँ पहुँचकर उन्होंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार स्नान एवं जप आदि कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देकर वे अपने आश्रमकी ओर चले गये॥ २१-२२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्यं नाम द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रयागमाहात्म्य नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११२॥


एक सौ तेरहवाँ अध्याय

भूगोलका विस्तृत वर्णन

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
कति द्वीपाः समुद्रा वा पर्वता वा कति प्रभो।<br>कियन्ति चैव वर्षाणि तेषु नद्यश्च काः स्मृताः॥ १<br>महाभूमिप्रमाणं च लोकालोकस्तथैव च।<br>पर्याप्तिः परिमाणं च गतिश्चन्द्रार्कयोस्तथा॥ २<br>एतद् ब्रवीहि नः सर्वं विस्तरेण यथार्थवित्।<br>त्वदुक्तमेतत् सकलं श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥ ३प्रभो! इस भूतलपर कितने द्वीप हैं? कितने समुद्र और पर्वत हैं? कितने वर्ष (पृथ्वीके खण्ड) हैं? उनमें कौन-कौन-सी नदियाँ बतलायी जाती हैं? इस विस्तृत भूमिका प्रमाण कितना है? लोकालोक पर्वत कैसा है? तथा चन्द्रमा और सूर्यकी गति, अवस्थिति और परिमाण कितना है? यह सब हमें विस्तारपूर्वक बतलाइये, क्योंकि आप यथार्थवेत्ता हैं। हमलोग यह सारा विषय आपके मुखसे सुनना चाहते हैं॥ १-३॥
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
द्वीपभेदसहस्राणि सप्त चान्तर्गतानि च।<br>न शक्यन्ते क्रमेणेह वक्तुं वै सकलं जगत्॥ ४<br>सप्तैव तु प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सह।<br>तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते॥ ५<br>अचिन्त्याः खलु ये भावास्तांस्तु तर्केण साधयेत्।<br>प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम्॥ ६<br>सप्त वर्षाणि वक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथाविधिम्।<br>विस्तरं मण्डलं यच्च योजनैस्तन्निबोधत॥ ७<br>योजनानां सहस्राणि शतं द्वीपस्य विस्तरः।<br>नानाजनपदाकीर्णं पुरैश्च विविधैः शुभैः॥ ८<br>सिद्धचारणसंकीर्णं पर्वतैरुपशोभितम्।<br>सर्वधातुपिनद्धैस्तैः शिलाजालसमुद्गतैः॥ ९ऋषियो! द्वीपोंके तो हजारों भेद हैं, परंतु वे सभी इन्हीं सात प्रधान द्वीपोंके अन्तर्गत हैं। इस सम्पूर्ण जगत्का क्रमशः वर्णन करना सम्भव नहीं है, अतः चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रहोंके साथ उन सात द्वीपोंका ही वर्णन कर रहा हूँ। साथ ही मनुष्यके अनुमानानुसार उनका प्रमाण भी बतला रहा हूँ; क्योंकि जो अचिन्त्य भाव हैं, उन्हें बुद्धि, ज्ञान एवं अनुमानद्वारा ही सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये*। जो प्रकृतिसे परे है, वही अचिन्त्यका लक्षण है। अब मैं सातों वर्षोंका वर्णन प्रारम्भ कर रहा हूँ। इनमें सर्वप्रथम योजनके परिमाणसे जम्बूद्वीपका जितना बड़ा विस्तृत मण्डल है, उसे बतला रहा हूँ, सुनिये। जम्बूद्वीपका विस्तार एक लाख योजन है। यह अनेकों प्रकारके सुन्दर देशों एवं नगरोंसे परिपूर्ण है। इसमें सिद्ध और चारण निवास करते हैं। यह सभी प्रकारकी धातुओंसे संयुक्त एवं शिलासमूहोंसे समन्वित पर्वतोंद्वारा सुशोभित

* महाभारत ६। ६। १२ आदिका पाठ-अर्थ कुछ भिन्न होनेपर भी यहाँ यही पाठ एवं अर्थ युक्तियुक्त है।