भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 382
३७२* मत्स्यपुराण *

| दाता वै लभते भोगान् गां च यत्कर्मणः फलम्।<br>तानि कर्माणि पृच्छामि पुनस्तैः प्राप्यते मही॥ १९<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br><br>शृणु राजन् महाबाहो यथोक्तकरणं महीम्।<br>गामग्निं ब्राह्मणं शास्त्रं काञ्चनं सलिलं स्त्रियः॥ २०<br>मातरं पितरं चैव ये निन्दन्ति नराधमाः।<br>न तेषामूर्ध्वगमनमिदमाह प्रजापतिः॥ २१<br>एवं योगस्य सम्प्राप्तिस्थानं परमदुर्लभम्।<br>गच्छन्ति नरकं घोरं ये नराः पापकर्मिणः॥ २२<br>हस्त्यश्वं गामनड्वाहं मणिमुक्तादिकाञ्चनम्।<br>परोक्षं हरते यस्तु पश्चाद् दानं प्रयच्छति॥ २३<br>न ते गच्छन्ति वै स्वर्गं दातारो यत्र भोगिनः।<br>अनेककर्मणा युक्ताः पच्यन्ते नरके पुनः॥ २४<br>एवं योगं च धर्मं च दातारं च युधिष्ठिर।<br>यथा सत्यमसत्यं वा अस्ति नास्तीति यत्फलम्।<br>निरुक्तं तु प्रवक्ष्यामि यथाह स्वयमंशुमान्॥ २५ | विस्मयविमुग्ध हो रहा हूँ; अतः जिन कर्मोंके फलस्वरूप दाताको ऐहलौकिक भोग और पृथ्वीकी प्राप्ति होती है तथा जन्मान्तरमें जिन कर्मोंके प्रभावसे पुनः पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त होता है, उन्हीं कर्मोंको मैं जानना चाहता हूँ, अतः उन्हें बतलानेकी कृपा करें॥ १८-१९॥<br>मार्कण्डेयजीने कहा— महाबाहु राजन्! मैंने जैसा करनेके लिये कहा है, उस विषयमें पुनः सुनो। जो नीच मनुष्य पृथ्वी, गौ, अग्नि, ब्राह्मण, शास्त्र, काञ्चन, जल, स्त्री, माता और पिताकी निन्दा करते हैं, उनकी ऊर्ध्वगति नहीं होती—ऐसा प्रजापति ब्रह्माने कहा है। अतः इस प्रकारके कर्मोंद्वारा योगकी प्राप्तिका स्थान परम दुर्लभ है; क्योंकि जो मनुष्य पापकर्ममें निरत रहते हैं, वे घोर नरकमें जाते हैं। जो मनुष्य परोक्षमें दूसरेकी हाथी, घोड़ा, गौ, बैल, मणि, मुक्ता और सुवर्ण आदि वस्तुओंको चुरा लेता है और पीछे उसे दान कर देता है, ऐसे लोग उस स्वर्गलोकमें नहीं जाते, जहाँ (अपनी वस्तु दान करनेवाले) दाता सुख भोगते हैं, अपितु वे अनेकों पापकर्मोंसे युक्त होकर पुनः नरकमें कष्ट भोगते हैं। युधिष्ठिर! इस प्रकार योग, धर्म, दाता, सत्य, असत्य, अस्ति, नास्तिका जो फल कहा गया है तथा स्वयं सूर्यने जैसा बतलाया है, वही मैं तुमसे वर्णन कर रहा हूँ॥ २०—२५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये नवाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०९॥


एक सौ दसवाँ अध्याय

जगत्के समस्त पवित्र तीर्थोंका प्रयागमें निवास

| मार्कण्डेय उवाच<br><br>शृणु राजन् प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव तु।<br>नैमिषं पुष्करं चैव गोतीर्थं सिन्धुसागरम्॥ १<br>गया च धेनुकं चैव गङ्गासागरमेव च।<br>एते चान्ये च बहवो ये च पुण्याः शिलोच्चयाः॥ २<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथा पराः।<br>प्रयागे संस्थिता नित्यमेवमाहुर्मनीषिणः॥ ३<br>त्रीणि चाप्यग्निकुण्डानि येषां मध्ये तु जाह्नवी।<br>प्रयागादभिनिष्क्रान्ता सर्वतीर्थनमस्कृता॥ ४ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! पुनः प्रयागका ही माहात्म्य सुनो। विद्वानोंका ऐसा कथन है कि नैमिषारण्य, पुष्कर, गोतीर्थ, सिन्धुसागर, गयातीर्थ, धेनुक (गयाके पासका एक तीर्थ) और गङ्गासागर—ये तथा इनके अतिरिक्त तीन करोड़ दस हजार जो अन्य तीर्थ हैं, वे सभी एवं पुण्यप्रद पर्वत प्रयागमें नित्य निवास करते हैं। यहाँ तीन अग्निकुण्ड भी हैं, जिनके बीचसे सम्पूर्ण तीर्थोंद्वारा नमस्कृत गङ्गा प्रवाहित होती हुई प्रयागसे आगे निकलती हैं। |

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