भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १०९ *३७१
अश्रद्दधानो ह्यशुचिर्दुर्मतिस्त्यक्तमङ्गलः।<br>एते पातकिनः सर्वे तेनेदं भाषितं त्वया॥ ७<br>शृणु प्रयागमाहात्म्यं यथादृष्टं यथाश्रुतम्।<br>प्रत्यक्षं च परोक्षं च यथान्यस्तं भविष्यति॥ ८<br>शास्त्रं प्रमाणं कृत्वा च युज्यते योगमात्मनः।<br>क्लिश्यते चापरस्तत्र नैव योगमवाप्नुयात्॥ ९<br>जन्मान्तरसहस्रेभ्यो योगो लभ्येत वा न वा।<br>तथा युगसहस्रेण योगो लभ्येत मानवैः॥ १०<br>यस्तु सर्वाणि रत्नानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति।<br>तेन दानेन दत्तेन योगं नाभ्येति मानवः॥ ११<br>प्रयागे तु मृतस्येदं सर्वं भवति नान्यथा।<br>प्रधानहेतुं वक्ष्यामि श्रद्धत्स्व च भारत॥ १२है, उसे 'अश्रद्धेय' तो नहीं कहना चाहिये। अश्रद्धालु, अपवित्र, दुर्बुद्धि और माङ्गलिक कार्योंसे विमुख—ये सभी पापी कहलाते हैं। (ऐसा प्रतीत होता है कि मानो तुम्हारे सिरपर भी कोई पाप सवार है) जिसके कारण तुमने ऐसी बात कही है। अब प्रयागका माहात्म्य जैसा मैंने देखा अथवा सुना है, उसे बतला रहा हूँ, सुनो। जगत्में जो बात प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपमें देखी अथवा सुनी गयी हो, उसे शास्त्रोंद्वारा प्रमाणित कर अपने कल्याण-कार्यमें लगाना चाहिये। जो ऐसा नहीं करता, वह कष्टभागी होता है और उसे योगकी प्राप्ति नहीं होती। यह योग हजारों युगों या जन्मोंमें किन्हीं मनुष्योंको सुलभ होता या नहीं भी होता है। जो मनुष्य सभी प्रकारके रत्न ब्राह्मणोंको दान करता है, परंतु उस दानके प्रभावसे भी उसे उस योगकी प्राप्ति नहीं होती। किंतु प्रयागमें मरनेवालेको वह सब कुछ सुलभ हो जाता है, उसमें कुछ भी विपरीतता नहीं होती। भारत! मैं इसका प्रधान कारण बतला रहा हूँ, उसे श्रद्धापूर्वक सुनो॥६—१२॥
यथा सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र दृश्यते।<br>ब्राह्मणे चास्ति यत्किञ्चित्तद् ब्राह्ममिति चोच्यते॥ १३<br>एवं सर्वेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वत्र पूज्यते।<br>तथा सर्वेषु लोकेषु प्रयागं पूजयेद् बुधः॥ १४<br>पूज्यते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर।<br>ब्रह्मापि स्मरते नित्यं प्रयागं तीर्थमुत्तमम्॥ १५<br>तीर्थराजमनुप्राप्य न चान्यत् किञ्चिदर्हति।<br>को हि देवत्वमासाद्य मनुष्यत्वं चिकीर्षति॥ १६<br>अनेनैवोपमानेन त्वं ज्ञास्यसि युधिष्ठिर।<br>यथा पुण्यतमं चास्ति तथैव कथितं मया॥ १७जैसे ब्रह्म सभी प्राणियोंमें सर्वत्र विद्यमान रहता है, और ब्राह्मणमें उसका कुछ विशेष अंश रहता है, जिसके कारण वह सब ब्राह्म कहे जाते हैं। जिस प्रकार सभी प्राणियोंमें सर्वत्र ब्रह्मकी सत्ता मानकर उनकी पूजा होती है (परंतु ब्राह्मण विशेषरूपसे पूजित होता है), उसी प्रकार विद्वान् लोग सभी तीर्थोंमें प्रयागको विशेष मान्यता देते हैं। युधिष्ठिर! सचमुच तीर्थराज पूजनीय है। ब्रह्मा भी इस उत्तम प्रयागतीर्थका नित्य स्मरण करते हैं। ऐसे तीर्थराजको पाकर मनुष्यको किसी अन्य वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं रह जाती। भला कौन ऐसा मनुष्य होगा जो देवत्वको पाकर मनुष्य बननेकी इच्छा करेगा। युधिष्ठिर! इसी उपमानसे तुम समझ जाओगे (कि प्रयागका इतना महत्त्व क्यों है)। जिस प्रकार प्रयाग सभी तीर्थोंमें विशेष पुण्यप्रद है, वैसा मैंने तुम्हें बतला दिया॥१३—१७॥
युधिष्ठिर उवाच<br>श्रुतं चेदं त्वया प्रोक्तं विस्मितोऽहं पुनः पुनः।<br>कथं योगेन तत्प्राप्तिः स्वर्गवासस्तु कर्मणा॥ १८युधिष्ठिरने पूछा— महर्षे! मैंने आपके द्वारा कहा गया प्रयाग-माहात्म्य तो सुना, किंतु इस योगरूप कर्मसे वैसे महान् फलकी प्राप्ति कैसे होती है तथा स्वर्गमें निवास कैसे मिलता है, इस विषयको सोचकर मैं बारंबार