मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३७० | * मत्स्यपुराण * |
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| गङ्गा च यमुना चैव उभे तुल्यफले स्मृते।<br>केवलं ज्येष्ठभावेन गङ्गा सर्वत्र पूज्यते॥ ३३<br>एवं कुरुष्व कौन्तेय सर्वतीर्थाभिषेचनम्।<br>यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ३४<br>यस्त्विमं कल्य उत्थाय पठते च शृणोति च।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोकं स गच्छति॥ ३५ | गङ्गा और यमुना—ये दोनों समान फल देनेवाली बतलायी जाती हैं। केवल ज्येष्ठ होनेके कारण गङ्गाकी सर्वत्र पूजा होती है। कुन्तीनन्दन! इस प्रकार तुम सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करो; क्योंकि ऐसा करनेसे जीवनपर्यन्त किया हुआ सारा पाप तत्काल ही नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस प्रसङ्गका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है॥ २४—३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये अष्टाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्यमें एक सौ आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०८॥
एक सौ नवाँ अध्याय
अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा प्रयागकी महत्ताका वर्णन
| मार्कण्डेय उवाच<br><br>श्रुतं मे ब्रह्मणा प्रोक्तं पुराणे ब्रह्मसम्भवे।<br>तीर्थानां तु सहस्राणि शतानि नियुतानि च।<br>सर्वे पुण्याः पवित्राश्च गतिश्च परमा स्मृता॥ १<br><br>सोमतीर्थं महापुण्यं महापातकनाशनम्।<br>स्नानमात्रेण राजेन्द्र पुरुषांस्तारयेच्छतम्।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नानं समाचरेत्॥ २<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br><br>पृथिव्यां नैमिषं पुण्यमन्तरिक्षे च पुष्करम्।<br>त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते॥ ३<br><br>सर्वाणि तानि संत्यज्य कथमेकं प्रशंससि।<br>अप्रमाणं तु तत्रोक्तमश्रद्धेयमनुत्तमम्॥ ४<br><br>गतिं च परमां दिव्यां भोगांश्चैव यथेप्सितान्।<br>किमर्थमल्पयोगेन बहु धर्मं प्रशंससि।<br>एतन्मे संशयं ब्रूहि यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ५<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br><br>अश्रद्धेयं न वक्तव्यं प्रत्यक्षमपि यद् भवेत्।<br>नरस्याश्रद्दधानस्य पापोपहतचेतसः॥ ६ | मार्कण्डेयजीने कहा—राजेन्द्र! मैंने ब्रह्माके मुखसे प्रादुर्भूत हुए पुराणोंमें ब्रह्माद्वारा कहे जाते हुए सुना है कि तीर्थोंकी संख्या कहीं सौ, कहीं हजार और कहीं लाखोंतक बतलायी गयी है। ये सभी पुण्यप्रद एवं परम पवित्र हैं। (इनमें स्नान करनेसे) परम गतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है। इन्हीं तीर्थोंमें सोमतीर्थ महान् पुण्यप्रद एवं महापातकोंका विनाशक है। वहाँ केवल स्नान करनेसे वह स्नानकर्ताके सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है, अतः सभी उपायोंद्वारा वहाँ स्नान अवश्य करना चाहिये॥ १-२॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा—महामुने! भूतलपर नैमिषारण्य और अन्तरिक्षमें पुष्कर पुण्यप्रद माने गये हैं तथा तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्रकी विशेषता बतलायी जाती है, परंतु आप इन सबको छोड़कर एक प्रयागकी ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? साथ ही वहाँ जानेसे परम दिव्य गति और अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति भी बतला रहे हैं, आपका यह कथन मुझे प्रमाणरहित, अश्रद्धेय और अनुचित प्रतीत हो रहा है। आप थोड़े-से परिश्रमसे बहुत बड़े धर्मकी प्राप्तिकी प्रशंसा किसलिये कर रहे हैं? अतः इस विषयमें आपने जैसा देखा अथवा सुना हो, उसके अनुसार कहकर मेरे इस संशयको दूर कीजिये॥ ३—५॥<br><br>मार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! जो श्रद्धाहीन है तथा जिसके चित्तपर पापने अपना स्वत्व जमा लिया है, ऐसे मनुष्यकी आँखोंके सामने जो बात घटित हो रही |