मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १०८ * | ३६९ |
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| मार्कण्डेय उवाच <br><br> दिष्ट्या ते सफलं जन्म दिष्ट्या ते तारितं कुलम्। <br> कीर्तनाद् वर्धते पुण्यं श्रुतात् पापप्रणाशनम्॥ २२॥ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तुम्हारे सौभाग्यसे तुम्हारा जन्म सफल हुआ है और सौभाग्यसे ही तुम्हारे कुलका उद्धार हुआ है। प्रयागतीर्थका नाम लेनेसे पुण्यकी वृद्धि होती है और श्रवण करनेसे पापका नाश होता है॥ २२॥ | | युधिष्ठिर उवाच <br><br> यमुनायां तु किं पुण्यं किं फलं तु महामुने। <br> एतन्मे सर्वमाख्याहि यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ २३॥ | युधिष्ठिरने पूछा— महामुने! यमुनामें स्नान करनेपर कैसा पुण्य होता है और कैसा फल प्राप्त होता है, इस विषयमें आपने जैसा देखा एवं सुना हो, वह सब मुझे बतलाइये॥ २३॥ | | मार्कण्डेय उवाच <br><br> तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता। <br> समाख्याता महाभागा यमुना तत्र निम्नगा॥ २४॥ <br><br> येनैव निःसृता गङ्गा तेनैव यमुनाऽऽगता। <br> योजनानां सहस्रेषु कीर्तनात् पापनाशिनी॥ २५॥ <br><br> तत्र स्नात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर। <br> कीर्तनाल्लभते पुण्यं दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति॥ २६॥ <br><br> अवगाह्याथ पीत्वा च पुनात्यासप्तमं कुलम्। <br> प्राणांस्त्यजति यस्तत्र स याति परमां गतिम्॥ २७॥ <br><br> अग्नितीर्थमिति ख्यातं यमुनादक्षिणे तटे। <br> पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थं तु नरकं स्मृतम्॥ २८॥ <br><br> तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः। <br> एवं तीर्थसहस्राणि यमुनादक्षिणे तटे॥ २९॥ <br><br> उत्तरेण प्रवक्ष्यामि आदित्यस्य महात्मनः। <br> तीर्थं नीरुजकं* नाम यत्र देवा सवासवाः॥ ३०॥ <br><br> उपासते सदा संध्यां त्रिकालं हि युधिष्ठिर। <br> देवाः सेवन्ति तत् तीर्थं ये चान्ये विदुषो जनाः॥ ३१॥ <br><br> श्रद्धानपरो भूत्वा कुरु तीर्थाभिषेचनम्। <br> अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापहराः स्मृताः। <br> तेषु स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ ३२॥ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! महाभागा यमुनादेवी सूर्यकी कन्या हैं। ये तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। प्रयागमें (संगम-स्थलपर) ये नदीरूपसे विशेष ख्याति प्राप्त कर रही हैं। जहाँसे गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है, वहींसे यमुना भी उद्भूत हुई हैं। ये हजार योजन (चार हजार मील) दूरसे भी नाम लेनेसे पापोंका नाश करनेवाली हैं। युधिष्ठिर! यमुनामें स्नान, जलपान और यमुनाका नाम-कीर्तन करनेसे महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है तथा दर्शन करनेसे मनुष्यको अपने जीवनमें कल्याणकारी अवसर देखनेको मिलते हैं। यमुनामें स्नान और जलपान करके मनुष्य अपने सात कुलोंको पावन बना देता है, परंतु जो यमुना-तटपर अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। यमुनाके दक्षिण तटपर सुप्रसिद्ध अग्नितीर्थ है और उसमें पश्चिम दिशामें धर्मराजका तीर्थ है, जो नरक नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको चले जाते हैं तथा जो लोग वहाँ प्राण-त्याग करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात् वे मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार यमुनाके दक्षिण तटपर हजारों तीर्थ हैं। युधिष्ठिर! अब मैं यमुनाके उत्तर तटपर महात्मा सूर्यके नीरुजक (निरंजन) नामक तीर्थका वर्णन कर रहा हूँ, जहाँ इन्द्रसहित सभी देवता त्रिकाल संध्योपासन करते हैं। देवता तथा अन्यान्य विद्वज्जन सदा उस तीर्थका सेवन करते हैं। इसी प्रकार और भी बहुत-से तीर्थ हैं, जो समस्त पापोंके विनाशक बतलाये जाते हैं। इसलिये तुम भी श्रद्धापरायण होकर उन तीर्थोंमें स्नान करो; क्योंकि उन तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें चले जाते हैं और जो वहाँ मरते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। |
* इसका—'विरुजकम्' तथा 'निरञ्जनम्' नाम पाठान्तर भी मिलता है।