मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अश्रद्दधानाः पुरुषाः पापोपहतचेतसः।<br>प्राप्नुवन्ति न तत्स्थानं प्रयागं देवरक्षितम्॥ ११<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>स्नेहाद् वा द्रव्यलोभाद् वा ये तु कामवशं गताः।<br>कथं तीर्थफलं तेषां कथं पुण्यफलं भवेत्॥ १२<br>विक्रयी सर्वभाण्डानां कार्याकार्यमजानतः।<br>प्रयागे का गतिस्तस्य तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १३<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महागुह्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>मासमेकं तु यः स्नायात् प्रयागे नियतेन्द्रियः॥ १४<br>शुचिस्तु प्रयतो भूत्वाहिसंकः श्रद्धयान्वितः।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः स गच्छेत् परमं पदम्॥ १५<br>विश्रम्भघातकानां तु प्रयागे शृणु यत् फलम्।<br>त्रिकालमेव स्नायीत आहारं भैक्ष्यमाचरेत्।<br>त्रिभिर्मासैः स मुच्येत प्रयागे नात्र संशयः॥ १६<br>अज्ञानेन तु यस्येह तीर्थयात्रादिकं भवेत्।<br>सर्वकामसमृद्धस्तु स्वर्गलोके महीयते।<br>स्थानं च लभते नित्यं धनधान्यसमाकुलम्॥ १७<br>एवं ज्ञानेन सम्पूर्णः सदा भवति भोगवान्।<br>तारिताः पितरस्तेन नरकात् सपितामहाः॥ १८<br>धर्मानुसारि तत्त्वज्ञ पृच्छतस्ते पुनः पुनः।<br>त्वत्प्रियार्थं समाख्यातं गुह्यमेतत् सनातनम्॥ १९<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्।<br>प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि दर्शनादेव ते मुने॥ २०<br>त्वद्दर्शनात् तु धर्मात्मन् मुक्तोऽहं चाद्य किल्बिषात्।<br>इदानीं वेद्मि चात्मानं भगवन् गतकल्मषम्॥ २१ | राजेन्द्र! जिनमें श्रद्धा नहीं है तथा जिनका चित्त पापोंसे आच्छादित हो गया है, ऐसे पुरुष देवताओंद्वारा सुरक्षित उस प्रयागतीर्थमें नहीं पहुँच पाते॥ ८—११॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! प्रयागमें जाकर जो लोग स्नेहसे अथवा धनके लोभसे कामनाके वशीभूत हो जाते हैं, उन्हें कैसे तीर्थ-फलकी प्राप्ति होती है तथा किस प्रकारका पुण्यफल मिलता है? जो कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानसे विहीन पुरुष वहाँ सभी प्रकारके पात्रोंका व्यापार करता है, उसकी क्या गति होती है? यह सब मुझे बतलाइये॥ १२-१३॥<br><br>मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! यह प्रसङ्ग तो परम गोपनीय एवं समस्त पापोंका विनाशक है, इसे बतला रहा हूँ, सुनो, जो मनुष्य जितेन्द्रिय, श्रद्धायुक्त और अहिंसाव्रती होकर पवित्रभावसे नियमपूर्वक एक मासतक प्रयागमें स्नान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और परमपदको प्राप्त कर लेता है। अब विश्वासघात (रूप पाप) करनेवालोंको प्रयागमें आनेपर जो फल मिलता है, उसे सुनो, वह यदि प्रयागमें तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) वेलामें स्नान करे और भिक्षा माँगकर भोजन करे तो निस्संदेह तीन महीनेमें उस पापसे मुक्त हो सकता है। जो मनुष्य अनजानमें ही प्रयागकी यात्रा आदि कार्य कर बैठता है, वह भी सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा धनधान्यसे परिपूर्ण अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो जान-बूझकर नियमानुसार प्रयागकी यात्रा करता है, वह भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है तथा अपने प्रपितामह आदि पितरोंका नरकसे उद्धार कर देता है। तत्त्वज्ञ! तुम्हारे बारंबार पूछनेके कारण मैंने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये इस धर्मानुकूल परम गोपनीय एवं सनातन (अविनाशी) विषयका वर्णन किया है॥ १४—१९॥<br><br>युधिष्ठिर बोले— मुने! आपके दर्शनसे आज मेरा जन्म सफल हो गया और आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया। मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है तथा मैं अनुगृहीत हो गया हूँ। धर्मात्मन्! आपके दर्शनसे आज पापसे मुक्त हो गया हूँ। भगवन्! अब मैं अपनेको पापरहित अनुभव कर रहा हूँ॥ २०-२१॥ |