मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १०४ * | ३५७ |
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एक सौ चारवाँ अध्याय
प्रयाग¹-माहात्म्य-प्रसङ्गमें प्रयाग-क्षेत्रके विविध तीर्थस्थानोंका वर्णन
| युधिष्ठिर उवाच | युधिष्ठिरने पूछा— ऐश्वर्यशाली मुने! प्राचीन कल्पमें प्रयाग-क्षेत्रकी जैसी स्थिति थी तथा देवश्रेष्ठ ब्रह्माने जिस प्रकार इसका वर्णन किया था, वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। मुने! प्रयागकी यात्रा किस प्रकार करनी चाहिये? वहाँ मनुष्योंको कैसा आचार-व्यवहार करनेका विधान है? वहाँ मरनेवालेको कौन-सी गति प्राप्त होती है? वहाँ स्नान करनेसे क्या फल मिलता है? जो लोग सदा प्रयागमें निवास करते हैं, उन्हें किस फलकी प्राप्ति होती है? यह सब मुझे बतलाइये; क्योंकि इसे जाननेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है॥ १—३॥ | | भगवञ्श्रोतुमिच्छामि पुरा कल्पे यथास्थितम्।<br>ब्रह्मणा देवमुख्येन यथावत् कथितं मुने॥ १<br>कथं प्रयागे गमनं नराणां तत्र कीदृशम्।<br>मृतानां का गतिस्तत्र स्नातानां तत्र किं फलम्॥ २<br>ये वसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेषां च किं फलम्।<br>एतन्मे सर्वमाख्याहि परं कौतूहलं हि मे॥ ३ | | | मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— वत्स! पूर्वकालमें प्रयागक्षेत्रमें जो श्रेष्ठ स्थान हैं तथा वहाँकी यात्रासे जो फल प्राप्त होता है, इस विषयमें ऋषियों एवं ब्राह्मणोंके मुखसे मैंने जो कुछ सुना है, वह सब तुम्हें बतला रहा हूँ। प्रयागके प्रतिष्ठानपुर² (झूँसी)-से वासुकिह्रदतकका भाग, जहाँ कम्बल, अश्वतर और बहुमूलक नामवाले नाग निवास करते हैं, तीनों लोकोंमें प्रजापति-क्षेत्रके नामसे विख्यात है, वहाँ स्नान करनेसे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं और जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। ब्रह्मा आदि देवता संगठित होकर (वहाँ रहनेवालोंकी) रक्षा करते हैं। राजन्! इसके अतिरिक्त इस क्षेत्रमें मङ्गलमय एवं समस्त पापोंका विनाश करनेवाले और भी बहुत-से तीर्थ हैं, जिनका वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता, अतः मैं संक्षेपमें प्रयागका वर्णन कर रहा हूँ। यहाँ साठ हजार धनुर्धर वीर गङ्गाकी रक्षा करते हैं तथा सात घोड़ोंसे जुते हुए रथपर चलनेवाले सूर्य सदा यमुनाकी देखभाल करते रहते हैं। इन्द्र विशेषरूपसे सदा प्रयागकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। श्रीहरि देवताओंको साथ लेकर पूरे प्रयाग-मण्डलकी रखवाली करते हैं। | | कथयिष्यामि ते वत्स यच्छ्रेष्ठं तत्र यत् फलम्।<br>पुरा ऋषीणां विप्राणां कथ्यमानं मया श्रुतम्॥ ४<br>आप्रयागं प्रतिष्ठानादापुराद् वासुकेर्ह्रदात्।<br>कम्बलाश्वतरौ नागौ नागाच्च बहुमूलकात्।<br>एतत् प्रजापतेः क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ५<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः।<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वन्ति संगताः॥ ६<br>अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापहराः शुभाः।<br>न शक्याः कथितुं राजन् बहुवर्षशतैरपि।<br>संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्य तु कीर्तनम्॥ ७<br>षष्टिर्धनुःसहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम्।<br>यमुनां रक्षति सदा सविता सप्तवाहनः॥ ८<br>प्रयागं तु विशेषेण सदा रक्षति वासवः।<br>मण्डलं रक्षति हरिर्देवैः सह संगतः॥ ९ | |
१. भारतमें देव, रुद्र, कर्ण, नंदादि पञ्चप्रयाग प्रसिद्ध हैं। यह तीर्थराज उनमें भी सर्वश्रेष्ठ हैं। इसकी महिमापर प्रयागशताध्यायीके अतिरिक्त महाभारत, वनपर्व ८५।७, अग्नि, गरुड, नारद, कूर्म ३५, पद्म-स्कन्दसौरादि पुराणोंमें भी कई अध्याय हैं। इसके अतिरिक्त 'त्रिस्थलीसेतु', 'तीर्थकल्पतरु', 'तीर्थ-चिन्तामणि' आदिमें भी इनकी महिमा वर्णित है।
२. प्रतिष्ठानपुर दो हैं—एक गोदावरी-तटका पैठन तथा दूसरा यह झूँसी। प्रयागमाहात्म्यमें सर्वत्र यही अभिप्रेत है।