भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५६ * मत्स्यपुराण *

Sanskrit ShlokaHindi Translation
नन्दिकेश्वर उवाच<br>सिंहासने समास्थाप्य पादशौचार्चनादिभिः ।<br>युधिष्ठिरो महात्मा वै पूजयामास तं मुनिम् ॥ १८<br>ततः स तुष्टो मार्कण्डः पूजितश्चाह तं नृपम् ।<br>आख्याहि त्वरितं राजन् किमर्थं रुदितं त्वया ।<br>केन वा विक्लवीभूतः का बाधा ते किमप्रियम् ॥ १९**नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! तत्पश्चात् महात्मा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिको सिंहासनपर बैठाकर पादप्रक्षालन आदि अर्चाविधिके अनुसार उनकी पूजा की। तब पूजनसे संतुष्ट हुए मुनिवर मार्कण्डेयने राजा युधिष्ठिरसे पूछा—'राजन्! तुम किसलिये रो रहे थे? किसने तुम्हें व्याकुल कर दिया? तुम्हें कौन-सी बाधा सता रही है? तुम्हारा कौन-सा अमङ्गल हो गया? यह सब हमें शीघ्र बतलाओ'॥ १८-१९॥
युधिष्ठिर उवाच<br>अस्माकं चैव यद् वृत्तं राज्यस्यार्थे महामुने ।<br>एतत् सर्वं विदित्वा तु चिन्तावशमुपागतः ॥ २०**युधिष्ठिरने कहा—**महामुने! राज्यकी प्राप्तिके लिये हमलोगोंने जैसा-जैसा व्यवहार किया है, वही सब सोचकर मैं चिन्ताके वशीभूत हो गया हूँ॥ २०॥
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाबाहो क्षात्रधर्मव्यवस्थितिम् ।<br>नैव दृष्टं रणे पापं युध्यमानस्य धीमतः ॥ २१<br>किं पुना राजधर्मेण क्षत्रियस्य विशेषतः ।<br>तदेवं हृदयं कृत्वा तस्मात् पापं न चिन्तयेत् ॥ २२<br>ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्य शिरसा मुनिम् ।<br>पप्रच्छ विनयोपेतः सर्वपातकनाशनम् ॥ २३**मार्कण्डेयजी बोले—**महाबाहु राजन्! क्षात्रधर्मकी व्यवस्था तो सुनो। इसके अनुसार रणस्थलमें युद्ध करते हुए बुद्धिमान्‌के लिये पाप नहीं बतलाया गया है, तब फिर राजधर्मके अनुसार विशेषरूपसे युद्ध करनेवाले क्षत्रियके लिये तो पापकी बात ही क्या है। हृदयमें ऐसा विचारकर युद्धसे उत्पन्न हुए पापकी भावनाको छोड़ दो। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयको सिर झुकाकर प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक समस्त पापोंका विनाश करनेवाले साधनके विषयमें प्रश्न किया॥ २१—२३॥
युधिष्ठिर उवाच<br>पृच्छामि त्वां महाप्राज्ञ नित्यं त्रैलोक्यदर्शिनम् ।<br>कथय त्वं समासेन येन मुच्येत किल्बिषात् ॥ २४**युधिष्ठिरने पूछा—**महाप्राज्ञ! आप तो नित्य त्रैलोक्यदर्शी हैं, अतः मैं आपसे पूछ रहा हूँ। आप संक्षेपमें कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसका पालन करनेसे पापसे छुटकारा मिल सके॥ २४॥
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाबाहो सर्वपातकनाशनम् ।<br>प्रयागगमनं श्रेष्ठं नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥ २५**मार्कण्डेयजी बोले—**महाबाहु राजन्! सुनो, पुण्यकर्मा मनुष्योंके लिये प्रयाग-गमन ही सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला सर्वश्रेष्ठ साधन है॥ २५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयागमाहात्म्य-वर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०३ ॥