भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 365
  • अध्याय १०३ * <p align="right">३५५</p>

| अस्मान् संताप्य बहुशः सर्वे ते निधनं गताः।<br>वासुदेवं समाश्रित्य पञ्च शेषास्तु पाण्डवाः॥ ४<br>हत्वा भीष्मं च द्रोणं च कर्णं चैव महाबलम्।<br>दुर्योधनं च राजानं पुत्रभ्रातृसमन्वितम्॥ ५<br>राजानो निहताः सर्वे ये चान्ये शूरमानिनः।<br>किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥ ६<br>धिक् कष्टमिति संचिन्त्य राजा वैक्लव्यमागतः।<br>निार्विचेष्टो निरुत्साहः किञ्चित् तिष्ठत्यधोमुखः॥ ७<br>लब्धसंज्ञो यदा राजा चिन्तयन् स पुनः पुनः।<br>कतमो विनियोगो वा नियमं तीर्थमेव च॥ ८<br>येनाहं शीघ्रमामुञ्चे महापातककिल्बिषात्।<br>यत्र स्थित्वा नरो याति विष्णुलोकमनुत्तमम्॥ ९<br>कथं पृच्छामि वै कृष्णं येनेदं कारितोऽस्म्यहम्।<br>धृतराष्ट्रं कथं पृच्छे यस्य पुत्रशतं हतम्॥ १०<br>एवं वैक्लव्यमापन्ने धर्मराजे युधिष्ठिरे।<br>रुदन्ति पाण्डवाः सर्वे भ्रातृशोकपरप्लिुताः॥ ११<br>ये च तत्र महात्मानः समेताः पाण्डवाः स्मृताः।<br>कुन्ती च द्रौपदी चैव ये च तत्र समागताः।<br>भूमौ निपतिताः सर्वे रुदन्तस्तु समंततः॥ १२ | वह हमलोगोंको अनेकों बार कष्टमें डालकर अपने सभी सहायकोंके साथ कालके गालमें चला गया। श्रीकृष्णका आश्रय लेनेके कारण केवल हम पाँच पाण्डव ही शेष रह गये हैं। गोविन्द! हमलोगोंने भीष्म, द्रोण, महाबली कर्ण और पुत्रों एवं भाइयोंसमेत राजा दुर्योधनको मारकर जो अन्य शूर, मानी नरेश थे उन सबका भी संहार कर डाला, ऐसी परिस्थितिमें हमें राज्यसे क्या लेना है, अथवा भोगों एवं जीवनसे ही क्या प्रयोजन है? 'हाय! धिक्कार है, महान् कष्ट आ पड़ा'—ऐसा सोचकर राजा युधिष्ठिर व्याकुल हो गये और निश्चेष्ट एवं उत्साहरहित हो कुछ देरतक नीचे मुख किये बैठे ही रह गये। जब राजा युधिष्ठिरको पुनः चेतना प्राप्त हुई तब वे इस प्रकार सोचने लगे—'ऐसा कौन-सा विनियोग (प्रायश्चित्त), नियम (व्रतोपवास) अथवा तीर्थ है, जिसका सेवन करनेसे मैं शीघ्र ही इस महापातकके पापसे मुक्त हो सकूँगा, अथवा जहाँ निवास कर मनुष्य सर्वोत्तम विष्णुलोकको प्राप्त कर सकता है। इसके लिये मैं श्रीकृष्णसे कैसे पूछूँ; क्योंकि उन्होंने ही तो मुझसे ऐसा कर्म करवाया है। दादा धृतराष्ट्रसे भी किसी प्रकार नहीं पूछ सकता; क्योंकि उनके सौ पुत्र मार डाले गये हैं।' ऐसा सोचकर धर्मराज युधिष्ठिर व्याकुल हो गये। उस समय सभी पाण्डव भ्रातृ-शोकमें निमग्न होकर रुदन कर रहे थे। उस समय राजा युधिष्ठिरके समीप जो अन्य महात्मा पुरुष आये थे तथा कुन्ती, द्रौपदी एवं अन्यान्य जो लोग आ गये थे, वे सभी रोते हुए युधिष्ठिरको घेरकर पृथ्वीपर पड़ गये॥ १—१२॥ | | वाराणस्यां मार्कण्डेयस्तेन ज्ञातो युधिष्ठिरः।<br>यथा वैक्लव्यमापन्नो रोदमानस्तु दुःखितः॥ १३<br>अचिरेणैव कालेन मार्कण्डेयो महातपाः।<br>सम्प्राप्तो हास्तिनपुरं राजद्वारे ह्यतिष्ठत॥ १४<br>द्वारपालोऽपि तं दृष्ट्वा राज्ञः कथितवान् द्रुतम्।<br>त्वां द्रष्टुकामो मार्कण्डो द्वारि तिष्ठत्यसौ मुनिः।<br>त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमागादतः परम्॥ १५ | उस समय महर्षि मार्कण्डेय वाराणसीमें निवास कर रहे थे। उन्हें जिस प्रकार युधिष्ठिर दुःखी और व्याकुल हो रो रहे थे, ये सारी बातें (योगबलसे) ज्ञात हो गयीं। तब महातपस्वी मार्कण्डेय थोड़े ही समयमें हस्तिनापुर जा पहुँचे और राजद्वारपर उपस्थित हुए। उन्हें आया हुआ देखकर द्वारपालने तुरंत राजाको सूचना देते हुए कहा—'महाराज! ये महामुनि मार्कण्डेय आपसे मिलनेके लिये दरवाजेपर खड़े हैं।' यह सुनते ही धर्म-पुत्र युधिष्ठिर शीघ्रतापूर्वक दरवाजेपर आ पहुँचे॥ १३—१५॥ | | युधिष्ठिर उवाच<br>स्वागतं ते महाभाग स्वागतं ते महामुने।<br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्॥ १६<br>अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि दृष्टे महामुने।<br>अद्याहं पूतदेहोऽस्मि यत् त्वया सह दर्शनम्॥ १७ | युधिष्ठिरने कहा— महाभाग! आपका स्वागत है। महामुने! आपका स्वागत है। महामुने! आपका दर्शन करके आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया तथा आज मेरे पितर संतुष्ट हो गये। आपका जो यह (आकस्मिक) दर्शन प्राप्त हुआ, इससे आज मेरा शरीर पवित्र हो गया॥ १६-१७॥ |