भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५४* मत्स्यपुराण *

| ततश्चाचम्य विधिवदालिखेत् पद्ममग्रतः।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः सजलारुणचन्दनम्।<br>अर्घ्यं दद्यात् प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत्॥ २७<br>नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुखाय वै।<br>सहस्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे॥ २८<br>नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते सर्ववत्सल।<br>जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित॥ २९<br>पद्मासन नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूषित।<br>नमस्ते सर्वलोकेश जगत् सर्वं विबोधसे॥ ३०<br>सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्वं पश्यसि सर्वग।<br>सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्कर॥ ३१<br>दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते।<br>एवं सूर्य नमस्कृत्य त्रिःकृत्वाथ प्रदक्षिणम्।<br>द्विजं गां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततश्च स्वगृहं व्रजेत्॥ ३२ | तदुपरान्त विधिपूर्वक आचमनकर अपने सामनेकी भूमिपर कमलका चित्र बनाकर अक्षत, पुष्प आदिसे सूर्यकी पूजा करे और प्रयत्नपूर्वक सूर्यके नामोंका कीर्तन करते हुए लाल चन्दनमिश्रित जलसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे—'सूर्यदेव! आप विष्णुरूप हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुके मुखस्वरूप आपको प्रणाम है। सहस्रकिरणधारी एवं समस्त तेजोंके धामको नित्य अभिवादन है। सर्वेश्वर! दिव्य चन्दनसे विभूषित देव! आप रुद्र (शिव)-रूप हैं। आप सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणकारक तथा उनके प्रति पुत्रवत् प्रेमभाव रखनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। पद्मासन! आप सदा कुण्डल और बाजूबंदसे सुसज्जित रहते हैं, आपको अभिवादन है। समस्त लोकोंके अधीश्वर! आप सारे जगत्को उद्बुद्ध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वत्र गमन करनेवाले सत्यदेव! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके सारे पुण्यों एवं पापोंको देखते रहते हैं, आपको प्रणाम है। भास्कर! मुझपर प्रसन्न हो जाइये। दिवाकर! आपको अभिवादन है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद तीन बार प्रदक्षिणा कर सूर्यको नमस्कार करे। पुनः ब्राह्मण, गौ और सुवर्णका स्पर्श करनेके पश्चात् अपने घर जाना चाहिये॥ २७—३२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे स्नानविधिर्नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १०२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें स्नानविधि नामक एक सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०२॥


एक सौ तीनवाँ अध्याय

युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम

| नन्दिकेश्वर उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रयागस्योपवर्णनम्।<br>मार्कण्डेयेन कथितं यत् पुरा पाण्डुसूनवे॥ १<br>भारते तु यदा वृत्ते प्राप्तराज्ये पृथासुते।<br>एतस्मिन्नन्तरे राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः॥ २<br>भ्रातृशोकेन संतप्तश्चिन्तयन् स पुनः पुनः।<br>आसीत् सुयोधनो राजा एकादशचमूपतिः॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! इसके बाद मैं प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहा हूँ जिसे पूर्वकालमें महर्षि मार्कण्डेयने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा था। जब महाभारत-युद्ध समाप्त हो गया और कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिरको राज्य प्राप्त हो गया, इसी बीच कुन्ती-नन्दन महाराज युधिष्ठिर भाइयोंके शोकसे अत्यन्त दुःखी होकर बारम्बार इस प्रकार चिन्तन करने लगे—'हाय! जो राजा दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था, |