मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १०२ * | ३५३ ---|---:
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य च विधानतः।<br>उत्थाय वाससी शुक्ले शुद्धे तु परिधाय वै॥ १३<br><br>ततस्तु तर्पणं कुर्यात् त्रैलोक्याप्यायनाय वै।<br>ब्रह्माणं तर्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम्॥ १४<br><br>देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः।<br>क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्बुकाः खगाः॥ १५<br><br>वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिनः।<br>निराधाराश्च ये जीवाः पापे धर्मे रताश्च ये॥ १६<br><br>तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया।<br>कृतोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत् ततः॥ १७ | तुम्हें नमस्कार है।' इस प्रकार मिट्टी लगाकर स्नान करनेके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। पुनः जलसे बाहर निकलकर दो श्वेत रंगके शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये इस प्रकार तर्पण करना चाहिये। उस समय उपवीती होकर (जनेऊको जैसे पहनते हैं, बायें कंधेपर तथा दाहिने हाथके नीचे कर) सर्वप्रथम देवतर्पण करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'देव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, क्रूर सर्प, गरुड आदि पक्षी, वृक्ष, शृगाल, अन्य पक्षिगण तथा जो जीव वायु एवं जलके आधारपर जीवित रहनेवाले हैं, आकाशचारी हैं, निराधार हैं और जो जीव पाप एवं धर्ममें लगे हुए हैं, उन सबकी तृप्तिके लिये मैं यह जल दे रहा हूँ।' तदनन्तर निवीती हो जाय (जनेऊको मालाकार कर लें)॥९—१७॥ |
| मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा।<br>सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः॥ १८<br><br>कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा।<br>सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥ १९<br><br>मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>प्रचेतं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च।<br>देवब्रह्मर्षीन् सर्वांस्तर्पयेदक्षतोदकैः॥ २०<br><br>अपसव्यं ततः कृत्वा सव्यं जान्वाच्य भूतले।<br>अग्निष्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोषमपाः॥ २१<br><br>सुकालिनो बर्हिषदस्तथा चैवाज्यपाः पुनः।<br>संतर्प्याः पितरो भक्त्या सतिलोदकचन्दनैः॥ २२<br><br>यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।<br>वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥ २३<br><br>औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।<br>वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः।<br>दर्भपाणिस्तु विधिना पितॄन् संतर्पयेद् बुधः॥ २४<br><br>पित्रादीन् नामगोत्रेण तथा मातामहानपि।<br>संतर्प्य विधिना भक्त्या इमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ २५<br><br>येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।<br>ते तृप्तिमखिलां यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥ २६ | फिर भक्तिपूर्वक मनुष्यों तथा ब्रह्मपुत्र ऋषियोंके तर्पणका विधान है—'सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु तथा पञ्चशिख—ये सभी मेरे द्वारा दिये हुए जलसे सदा तृप्त हो जायँ।' तत्पश्चात् मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद—इन सभी देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंका अक्षत और जलसे तर्पण करनेका विधान है। तदनन्तर अपसव्य होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर) और बायें घुटनेको भूमिपर टेककर अग्निष्वात्त, सौम्य, हविष्मान्, ऊष्मप, सुकाली, बर्हिषद तथा अन्य आज्यप नामक पितरोंको भक्तिपूर्वक तिल, जल, चन्दन आदिसे तृप्त करना चाहिये। पुनः बुद्धिमान् मनुष्य हाथमें कुश लेकर यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त—इन चौदह दिव्य पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करके इन्हें नमस्कार करे। तत्पश्चात् अपने पिता आदि तथा नाना आदिके नाम और गोत्रका उच्चारण कर भक्तिपूर्वक विधानके साथ तर्पण करनेके पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो लोग इस जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों या इनके अतिरिक्त कुटुम्बमें पैदा हुए हों अथवा जन्मान्तरमें भाई-बन्धु रहे हों तथा जो कोई भी मुझसे जलकी इच्छा रखते हों, वे सभी पूर्णतया तृप्त हो जायँ'॥१८—२६॥ |