मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३५२ | * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shlokas | Hindi Translation |
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| अनुद्धतैरुरुद्धतैर्वा जलैः स्नानं समाचरेत्।<br>तीर्थं प्रकल्पयेद् विद्वान् मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्।<br>नमो नारायणायेति मन्त्र एष उदाहृतः॥ २<br><br>दर्भपाणिस्तु विधिना आचान्तः प्रयततः शुचिः।<br>चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समन्ततः।<br>प्रकल्प्यावाहयेद् गङ्गामेभिर्मन्त्रैर्विचक्षणः॥ ३<br><br>विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता।<br>त्राहि नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणात्तिकात्॥ ४<br><br>तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्।<br>दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्ति जाह्नवि॥ ५<br><br>नन्दिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च।<br>दक्षा पृथ्वी च विहगा विश्वकायामृता शिवा॥ ६<br><br>विद्याधरी सुप्रसन्ना तथा विश्वप्रसादिनी।<br>क्षेमा च जाह्नवी चैव शान्ता शान्तिप्रदायिनी॥ ७<br><br>एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रकीर्तयेत्।<br>भवेत् संनिहिता तत्र गङ्गा त्रिपथगामिनी॥ ८ | विधान है। कुएँ आदिसे निकाले हुए अथवा बिना निकाले हुए नदी-तालाब आदिके जलसे स्नान करना चाहिये। मन्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुषको मूलमन्त्रद्वारा उस जलमें तीर्थकी कल्पना करनी चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय'—यह मूलमन्त्र कहा गया है। मनुष्य पहले हाथमें कुश लिये हुए विधिपूर्वक आचमन कर ले, फिर जितेन्द्रिय एवं शुद्ध भावसे अपने चारों ओर चार हाथका चौकोर मण्डल बनाकर उसमें तीर्थकी कल्पना कर इन (वक्ष्यमाण) मन्त्रोंद्वारा गङ्गाजीका आवाहन करे—'देवि! तुम भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हो, वैष्णवी कही जाती हो और विष्णु ही तुम्हारे देवता हैं, अतः तुम जन्मसे लेकर मरणान्तक होनेवाले पापसे हमारी रक्षा करो। जह्ननन्दिनी! वायुदेवने स्वर्गलोक, मृत्युलोक और अन्तरिक्षलोक—इन तीनों लोकोंमें जिन साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंको बतलाया है, वे सभी तुम्हारे भीतर निवास करते हैं। देवोंमें तुम नन्दिनी और नलिनी नामसे प्रसिद्ध हो। इसके अतिरिक्त दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, विश्वप्रसादिनी, क्षेमा, जाह्नवी, शान्ता और शान्तिप्रदायिनी—ये भी तुम्हारे ही नाम हैं।' स्नानके समय इन पुण्यमय नामोंका कीर्तन करना चाहिये, इससे त्रिपथगामिनी गङ्गा वहाँ उपस्थित हो जाती हैं॥ १—८॥ |
| सप्तवाराभिजप्तेन करसम्पुटयोजितम्।<br>मूर्ध्नि कुर्याज्जलं भूयस्त्रिचतुःपञ्चसप्तकम्।<br>स्नानं कुर्यान्मृदा तद्वदामन्त्र्य तु विधानतः॥ ९ | हाथोंको सम्पुटित करके सात बार इन नामोंका जप करनेके पश्चात् तीन, चार, पाँच अथवा सात बार जलको अपने मस्तकपर छिड़क ले। तत्पश्चात् विधिपूर्वक पृथ्वीको आमन्त्रित करके पहले शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करना चाहिये। (आमन्त्रण-मन्त्र इस प्रकार है)— |
| अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।<br>मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥ १० | 'मृत्तिके! तुम अग्निचयन, उख संभरणादिके समय अश्वके द्वारा शुद्ध की जाती हो, तुम (शिवके) रथ और वामन-अवतारमें भगवान् विष्णुके पैरद्वारा भी आक्रान्त होकर शुद्ध हुई हो, सारा धन तुम्हारे ही भीतर वर्तमान है, इसलिये मेरे द्वारा जो कुछ भी पाप घटित हुए हैं, उन सभीको हर लो। |
| उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।<br>मृत्तिके ब्रह्मदत्तासि कश्यपेनाभिमन्त्रिता।<br>आरुह्य मम गात्राणि सर्वं पापं प्रचोदय॥ ११* | मृत्तिके! शतबाहु भगवान् विष्णुने श्यामवर्णका वराहरूप धारण कर तुम्हारा पातालसे उद्धार किया है, पुनः महर्षि कश्यपद्वारा आमन्त्रित होकर तुम ब्राह्मणोंको प्रदान की गयी हो, अतः मेरे अङ्गोंपर आरूढ़ होकर मेरे सारे पापोंको दूर कर दो। |
| मृत्तिके देहि नः पुष्टिं सर्वं त्वयि प्रतिष्ठितम्।<br>नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुव्रते॥ १२ | मृत्तिके! विश्वके सारे पदार्थ तो तुम्हारे भीतर ही स्थित हैं, अतः तुम हमें पुष्टि प्रदान करो। सुव्रते! तुम समस्त जीवोंकी उत्पत्तिके लिये अरणिरस्वरूपा हो, |
* ये दो मन्त्र तैत्तिरीयारण्यक १०।१।३—२४ में भी प्राप्त हैं। उनपर सायणका भाष्य बहुत सुन्दर है।