मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १०२ * | ३५१ |
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| त्रिरात्रोपोषितो दद्यात् फाल्गुन्यां भवनं शुभम्।<br>आदित्यलोकमाप्नोति धामव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७९<br><br>त्रिसंध्यं पूज्य दाम्पत्यमुपवासी विभूषणैः।<br>अन्नं गाश्च समाप्नोति मोक्षममिन्द्रव्रतादिह॥ ८०<br><br>दत्त्वा सितद्वितीयायामिन्दोर्लवणभाजनम्।<br>समान्ते गोप्रदो याति विप्राय शिवमन्दिरम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् सोमव्रतमिदं स्मृतम्॥ ८१<br><br>प्रतिपद्येकभक्ताशी समान्ते कपिलाप्रदः।<br>वैश्वानरपदं याति शिवव्रतमिदं स्मृतम्॥ ८२<br><br>दशम्यामेकभक्ताशी समान्ते दशधेनुदः।<br>दिशश्च काञ्चनैर्दद्याद् ब्रह्माण्डाधिपतिर्भवेत्।<br>एतद् विश्वव्रतं नाम महापातकनाशनम्॥ ८३<br><br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि व्रतषष्टिमनुत्तमाम्।<br>मन्वन्तरशतं सोऽपि गन्धर्वाधिपतिर्भवेत्॥ ८४<br><br>षष्टिव्रतं नारद पुण्यमेतत्<br>तवोदितं विश्वजनीनमन्यत्।<br>श्रोतुं तवेच्छा तदुदीरयामि<br>प्रियेषु किं वाकथनीयमस्ति॥ ८५ | राजा होता है। 'यह पवनव्रत' है। जो तीन राततक उपवास करके फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको सुन्दर गृह दान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। यह 'धामव्रत' नामसे प्रसिद्ध है। जो निराहार रहकर तीनों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) संध्याओंमें आभूषणोंद्वारा ब्राह्मण-दम्पत्तिकी पूजा करता है, उसे इस लोकमें इन्द्रव्रतसे भी बढ़कर अधिक मात्रामें अन्न एवं गोधनकी प्राप्ति होती है तथा अन्तमें वह मोक्षलाभ करता है। जो शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिको चन्द्रमाके उद्देश्यसे नमकसे परिपूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान करता है और वर्षकी समाप्तिमें गोदान देता है, वह शिवलोकको जाता है और एक कल्प व्यतीत होनेपर भूतलपर राजराजेश्वर होता है। यह 'सोमव्रत' नामसे विख्यात है। जो प्रतिपदा तिथिको दिनमें एक बार भोजन करता है और वर्षान्तमें कपिला गौका दान देता है, वह वैश्वानरलोकको जाता है। इसे 'शिवव्रत' कहते हैं। जो दशमी तिथिको दिनमें एक बार भोजन करता है और वर्षकी समाप्तिके अवसरपर स्वर्णनिर्मित दसों दिशाओंकी प्रतिमाके साथ दस गायें दान करता है वह ब्रह्माण्डका अधीश्वर होता है। यह 'विश्वव्रत' है जो महापातकोंका विनाशक है। जो इस सर्वोत्तम 'षष्टिव्रत' (६० व्रतोंकी चर्चा)-को पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह भी सौ मन्वन्तरतक गन्धर्वलोकका अधिपति होता है। नारद! यह षष्टिव्रत परम पुण्यप्रद और सभी जीवोंके लिये लाभदायक है, मैंने आपसे इसका वर्णन कर दिया। अब यदि आपकी और भी कुछ सुननेकी इच्छा हो तो मैं उसका वर्णन करूँगा; क्योंकि प्रियजनोंके प्रति भला कौन-सी वस्तु अकथनीय हो सकती है॥ ७७–८५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे षष्टिव्रतमाहात्म्यं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें षष्टिव्रतमाहात्म्य नामक एक सौ एकवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १०१॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
स्नान² और तर्पणकी विधि
| नन्दिकेश्वर उवाच | नन्दिकेश्वर बोले— |
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| नैर्मल्यं भावशुद्धिश्च विना स्नानं न विद्यते।<br>तस्मान्मनोविशुद्ध्यर्थं स्नानमादौ विधीयते॥ १ | नारदजी! स्नान किये बिना शरीरकी निर्मलता और भाव-शुद्धि नहीं प्राप्त होती, अतः मनकी विशुद्धिके लिये (सभी व्रतोंमें) सर्वप्रथम स्नानका |
१. स्वल्पान्तरसे ये सभी व्रत पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, अ० २०, श्लोक ४५ से १४४ तकमें तथा भविष्योत्तरपुराणके १२०वें अध्यायमें भी निर्दिष्ट हैं।
२. स्नानविधिकी विस्तृत चर्चा 'स्नानव्यास' में है। यह सुन्दर प्रकरण बृहद्व्यासादि स्मृतियोंमें भी संगृहीत है।