मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| कृच्छ्रान्ते गोप्रदः कुर्याद् भोजनं शक्तितः पदम्।<br>विप्राणां शाङ्करं याति प्राजापत्यमिदं व्रतम्॥ ६६<br>चतुर्दश्यां तु नक्ताशी समान्ते गोधनप्रदः।<br>शैव पदमवाप्नोति त्रैयम्बकमिदं व्रतम्॥ ६७<br>समरात्रोषितो दद्याद् घृतकुम्भं द्विजातये।<br>घृतव्रतमिदं प्राहुर्ब्रह्मलोकफलप्रदम्॥ ६८<br>आकाशशायी वर्षासु धेनुमन्ते पयस्विनीम्।<br>शक्रलोके वसेन्नित्यमिन्द्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६९<br>अनग्निपक्वमश्नाति तृतीयायां तु यो नरः।<br>गां दत्त्वा शिवमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>इह चानन्दकृत् पुंसां श्रेयोव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७०<br>हैमं पलद्वयादूर्ध्वं रथमश्वयुगान्वितम्।<br>ददन् कृतोपवासः स्याद् दिवि कल्पशतं वसेत्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यादश्वव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७१<br>तद्वद्धेमरथं दद्यात् करिभ्यां संयुतं नरः।<br>सत्यलोके वसेत् कल्पं सहस्रमथ भूपतिः।<br>भवेदुपोषितो भूत्वा करिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७२<br>उपवासं परित्यज्य समान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>यक्षाधिपत्यमाप्नोति सुखव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७३<br>निशि कृत्वा जले वासं प्रभाते गोप्रदो भवेत्।<br>वारुणं लोकमाप्नोति वरुणव्रतमुच्यते॥ ७४<br>चान्द्रायणं च यः कुर्याद्धेमचन्द्रं निवेदयेत्।<br>चन्द्रव्रतमिदं प्रोक्तं चन्द्रलोकफलप्रदम्॥ ७५<br>ज्येष्ठे पञ्चतपाः सायं हेमधेनुप्रदो दिवम्।<br>यात्यष्टमीचतुर्दश्यो रुद्रव्रतमिदं स्मृतम्॥ ७६ | जो कृच्छ्र-चान्द्रायण-व्रतकी समाप्तिपर गोदान करके यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'प्राजापत्यव्रत' है। जो चतुर्दशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करता है और वर्ष समाप्त होनेपर गोधनका दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'त्रैयम्बकव्रत' है। जो सात राततक उपवास कर ब्राह्मणको घृतपूर्ण घटका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। यह ब्रह्मलोकरूप फल प्रदान करनेवाला 'घृतव्रत' है। जो वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे (खुले मैदानमें) शयन करता हैं और व्रतान्तमें दुधारू गौका दान करता है, वह सदाके लिये इन्द्रलोकमें निवास करता है। इसे 'इन्द्रव्रत' कहा जाता हैं। जो मनुष्य तृतीया तिथिको बिना अग्निमें पकाया हुआ पदार्थ भोजन करता है और व्रतान्तमें गौ-दान देता है, वह पुनरागमनरहित शिवलोकको प्राप्त होता है। मनुष्योंको इस लोकमें आनन्द प्रदान करनेवाला यह 'श्रेयोव्रत' कहलाता है। जो निराहार रहकर दो पलसे अधिक सोनेसे दो घोड़ोंसे जुता हुआ रथ बनवाकर दान करता है, वह सौ कल्पोंतक स्वर्गलोकमें वास करता है और कल्पान्तमें भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'अश्वव्रत' कहते हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य निराहार रहकर दो हाथियोंसे जुता हुआ सोनेका रथ दान करता है, वह एक हजार कल्पोंतक सत्यलोकमें निवास करता है और (पुण्य-क्षीण होनेपर भूतलपर) राजा होता है। यह 'करिव्रत' कहलाता है। इसी प्रकार जो मनुष्य वर्षके अन्तमें उपवासका परित्याग कर गोदान करता है, वह यक्षोंका अधीश्वर होता है। इसे 'सुखव्रत' कहा जाता है। जो रातभर जलमें निवास कर प्रातःकाल गोदान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त करता है। इसे 'वरुणव्रत' कहते हैं। जो मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान कर स्वर्णनिर्मित चन्द्रमाका दान करता है, वह चन्द्रलोकको जाता है। चन्द्रलोकरूप फलका प्रदाता यह 'चन्द्रव्रत' कहलाता है। जो ज्येष्ठमासकी अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथियोंमें पञ्चाग्नि तपकर सायंकाल स्वर्णनिर्मित गौका दान करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। यह 'रुद्रव्रत' नामसे विख्यात है॥ ६४—७६॥ | | सकृद् वितानकं कुर्यात् तृतीयायां शिवालये।<br>समान्ते धेनुदो याति भवानीव्रतमुच्यते॥ ७७<br>माघे निश्यार्द्रवासाः स्यात् सप्तम्यां गोप्रदो भवेत्।<br>दिवि कल्पमुषित्वेह राजा स्यात् पवनं व्रतम्॥ ७८ | जो तृतीया तिथिको शिवालयमें एक बार चंदोवा या चाँदनी लगा देता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह भवानीलोकको जाता है। इसे 'भवानीव्रत' कहते हैं। जो माघमासमें सप्तमी तिथिको रातभर गीला वस्त्र धारण किये रहता है और प्रातःकाल गौका दान करता है, वह एक कल्पतक स्वर्गमें निवास करके भूतलपर |