मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 359, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 359
| * अध्याय १०१ * | ३४९ |
|---|---|
| वत्सरं त्वेकभक्ताशी सभक्ष्यजलकुम्भदः ।<br>शिवलोके वसेत् कल्पं प्राप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५५ | जो एक वर्षतक दिनमें एक ही बार भोजन करके व्रतान्तमें खाद्य पदार्थोंसहित जलपूर्ण घटका दान करता है, वह एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। इसे 'प्राप्तिव्रत' कहा जाता है। |
| नक्ताशी चाष्टमीषु स्याद् वत्सरान्ते च धेनुदः ।<br>पौरन्दरं पुरं याति सुगतिव्रतमुच्यते॥ ५६ | जो प्रत्येक मासकी अष्टमी तिथियोंमें रातमें एक बार भोजन करता है और वर्षके अन्तमें गोदान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। इसे 'सुगतिव्रत' कहा जाता है। |
| विप्रायेन्धनदो यस्तु वर्षादिचतुरो ऋतून्।<br>घृतधेनुप्रदोऽन्ते च स परं ब्रह्म गच्छति।<br>वैश्वानरव्रतं नाम सर्वपापविनाशनम्॥ ५७ | जो वर्षा-ऋतुसे लेकर चार ऋतुओंतक ब्राह्मणको ईंधनका दान देता है और व्रतान्तमें घृत-धेनु प्रदान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला यह 'वैश्वानरव्रत' है। |
| एकादश्यां च नक्ताशी यश्चक्रं विनिवेदयेत् ।<br>समान्ते वैष्णवं हैमं स विष्णोः पदमाप्नुयात्।<br>एतत् कृष्णव्रतं नाम कल्पान्ते राज्यभाग् भवेत्॥ ५८ | जो एकादशी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें सोनेका विष्णु-चक्र बनवाकर दान करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है और एक कल्पके बीतनेपर भूतलपर राज्यका भागी होता है। यह 'कृष्णव्रत' है। |
| पायसाशी समान्ते तु दद्याद् विप्राय गोयुगम्।<br>लक्ष्मीलोकमवाप्नोति ह्येतद् देवीव्रतं स्मृतम्॥ ५९ | जो खीरका भोजन करते हुए वर्षके अन्तमें ब्राह्मणको दो गौ दान करता है, वह लक्ष्मीलोकको प्राप्त होता है। इसे 'देवीव्रत' कहा जाता है। |
| सप्तम्यां नक्तभुग् दद्यात् समान्ते गां पयस्विनीम्।<br>सूर्यलोकमवाप्नोति भानुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६० | जो सप्तमी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिमें दुधारू गौका दान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। यह 'भानुव्रत' कहलाता है। |
| चतुर्थ्यां नक्तभुग्दद्यादब्दान्ते हेमवारणम्।<br>व्रतं वैनायकं नाम शिवलोकफलप्रदम्॥ ६१ | जो चतुर्थी तिथिको रातमें एक बार भोजन करते हुए वर्षकी समाप्तिके अवसरपर सोनेका हाथी दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। शिवलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'विनायकव्रत' है। |
| महाफलानि यस्त्यक्त्वा चतुर्मासं द्विजातये।<br>हैमानि कार्तिके दद्याद् गोयुगेन समन्वितम्।<br>एतत् फलव्रतं नाम विष्णुलोकफलप्रदम्॥ ६२ | जो चौमासेमें (बेल, जामुन, बेर, कैथ और बीजपुर नीबू) इन पाँच महाफलोंका परित्याग कर कार्तिकमासमें सोनेसे इन फलोंका निर्माण कराकर दो गौओंके साथ दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। विष्णुलोकरूप फल प्रदान करनेवाला यह 'फलव्रत' है। |
| यश्चोपवासी सप्तम्यां समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>गाश्च वै शक्तितो दद्याद्धेमान्नघटसंयुताः।<br>एतत् सौरव्रतं नाम सूर्यलोकफलप्रदम्॥ ६३ | जो सप्तमी तिथिको निराहार रहते हुए वर्षके अन्तमें अपनी शक्तिके अनुसार स्वर्णनिर्मित कमल तथा सुवर्ण, अन्न और घटसहित गौओंका दान करता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। सूर्यलोकरूप फलका प्रदाता यह 'सौरव्रत' है॥ ५२—६३॥ |
| द्वादश द्वादशीर्यस्तु समाप्योपोषणेन च।<br>गोवस्त्रकाञ्चनैर्विप्रान् पूजयेच्छक्तितो नरः।<br>परमं पदमाप्नोति विष्णुव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६४ | जो मनुष्य बारह द्वादशियोंको उपवास करके यथाशक्ति गौ, वस्त्र और सुवर्णसे ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'विष्णुव्रत' कहा जाता है। |
| कार्तिक्यां च वृषोत्सर्गं कृत्वा नक्तं समाचरेत् ।<br>शैवं पदमवाप्नोति वार्षव्रतमिदं स्मृतम्॥ ६५ | जो कार्तिककी पूर्णिमा तिथिको वृषोत्सर्ग करके नक्तव्रतका पालन करता है, वह शिवलोकको प्राप्त होता है। यह 'वार्षव्रत' कहलाता है। |