मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३४८ | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वर्जयेच्चैत्रमासे च यश्च गन्धानुलेपनम्।<br>शुक्तिं गन्धभृतां दत्त्वा विप्राय सितवाससी।<br>वारुणं पदमाप्नोति दृढव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४४ | जो चैत्रमासमें सुगन्धित वस्तुओंका अनुलेपन छोड़ देता है अर्थात् शरीरमें सुगन्धित पदार्थ नहीं लगाता और व्रतान्तमें ब्राह्मणको दो श्वेत वस्त्रोंके साथ गन्धधारियोंकी शुक्ति (गन्धद्रव्यविशेष)-का दान करता है वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। यह 'दृढव्रत' कहलाता है। |
| वैशाखे पुष्पलवणं वर्जयित्वाथ गोप्रदः।<br>भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजा भवेदिह।<br>एतत् कान्तिव्रतं नाम कान्तिकीर्तिफलप्रदम्॥ ४५ | जो वैशाख-मासमें पुष्प और नमकका परित्याग कर व्रतान्तमें गोदान करता है वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके (पुण्य क्षीण होनेपर) इस लोकमें राजा होता है। यह 'कान्तिव्रत' है, जो कान्ति और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। |
| ब्रह्माण्डं काञ्चनं कृत्वा तिलराशिसमन्वितम्।<br>त्र्यहं तिलप्रदो भूत्वा वह्निं संतर्प्य सद्धिजम्॥ ४६<br>सम्पूज्य विप्रदाम्पत्यं माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति॥ ४७<br>पुण्येऽह्नि दद्यात् स परं ब्रह्म यात्यपुनर्भवम्।<br>एतद् ब्रह्मव्रतं नाम निर्वाणपददायकम्॥ ४८ | जो किसी पुण्यप्रद दिनमें अपनी शक्तिके अनुसार तीन पलसे अधिक सोनेका ब्रह्माण्ड बनवाकर तिलकी राशिपर स्थापित कर देता है और तीन दिनतक ब्राह्मणसहित अग्निको संतुष्ट करके तिलका दान देता रहता है, पुनः चौथे दिन एक विप्र-दम्पतिकी पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे विधिपूर्वक पूजा करके 'विश्वात्मा मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे वह ब्रह्माण्ड दान कर देता है, वह पुनर्जन्मरहित परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। यह 'ब्रह्मव्रत' है, जो मोक्षपदका दाता है। |
| यश्चोभयमुखीं दद्यात् प्रभूतकनकान्विताम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेत् स याति परमं पदम्।<br>एतद् धेनुव्रतं नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ४९ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन (दूधका आहार) करके अधिक-से-अधिक सोनेकी बनी हुई उभयमुखी (दो मुखवाली अथवा सवत्सा) गौका दान करता है, वह पुनरागमनरहित परमपदको प्राप्त हो जाता है। यह 'धेनुव्रत' है। |
| त्र्यहं पयोव्रते स्थित्वा काञ्चनं कल्पपादपम्।<br>पलादूर्ध्वं यथाशक्त्या तण्डुलैस्तूपसंयुतम्।<br>दत्त्वा ब्रह्मपदं याति कल्पव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५० | जो तीन दिनतक पयोव्रतका पालन करके अपनी शक्तिके अनुसार एक पलसे अधिक सोनेका कल्पवृक्ष बनवाकर उसे चावलकी राशिपर स्थापित करके दान कर देता है वह ब्रह्मपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'कल्पव्रत' कहा जाता है। |
| मासोपवासी यो दद्याद् धेनुं विप्राय शोभनाम्।<br>स वैष्णवं पदं याति भीमव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५१ | जो एक मासतक निराहार रहकर ब्राह्मणको सुन्दर गौका दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है। यह 'भीमव्रत' कहलाता है॥ ४२—५१॥ |
| दद्याद् विंशत्पलादूर्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेद् रुद्रलोके महीयते।<br>धराव्रतमिदं प्रोक्तं सप्तकल्पशतानुगम्॥ ५२ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन कर बीस पलसे अधिक सोनेसे पृथ्वीकी मूर्ति बनवाकर दान करता है, वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे 'धराव्रत' कहते हैं, जो सात सौ कल्पोंतक दाताका अनुगमन करता रहता है। |
| माघे मासेऽथवा चैत्रे गुडधेनुप्रदो भवेत्।<br>गुडव्रतस्तृतीयायां गौरीलोके महीयते।<br>महाव्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम्॥ ५३ | जो माघ अथवा चैत्रमासमें तृतीया तिथिको गुडव्रतका पालन कर गुडधेनुका दान करता है वह गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह परमानन्द प्रदान करनेवाला 'महाव्रत' है। |
| पक्षोपवासी यो दद्याद् विप्राय कपिलाद्वयम्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति देवासुरसुपूजितम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् प्रभाव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५४ | जो एक पक्षतक निराहार रहकर ब्राह्मणको दो कपिला गौका दान करता है वह देवताओं एवं असुरोंद्वारा सुपूजित ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है और एक कल्प बीतनेपर भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'प्रभाव्रत' कहते हैं। |