मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| इति दत्त्वा च तत् सर्वमलङ्कृत्य च भूषणैः।<br>शक्तिश्चेच्छयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १८<br>अशक्तस्तु फलान्येव यथोक्तानि विधानतः।<br>तथोदकुम्भसंयुक्तौ शिवधर्मौ च काञ्चनौ॥ १९<br>विप्राय दत्त्वा भुञ्जीत वाग्यतस्तैलवर्जितम्।<br>अन्यान्नपि यथाशक्त्या भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ २०<br>एतद् भागवतानां तु सौरवैष्णवयोगिनाम्।<br>शुभं सर्वफलत्यागव्रतं वेदविदो विदुः॥ २१<br>नारीभिश्च यथाशक्त्या कर्तव्यं द्विजपुङ्गव।<br>एतस्मान्नापरं किञ्चिदिह लोके परत्र च।<br>व्रतमस्ति मुनिश्रेष्ठ यदनन्तफलप्रदम्॥ २२<br>सौवर्णरौप्यताम्रेषु यावन्तः परमाणवः।<br>भवन्ति चूर्ण्यमानेषु फलेषु मुनिसत्तम।<br>तावद् युगसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ २३<br>एतत् समस्तकलुषापहरं जनाना-<br>माजीवनाय मनुजेषु च सर्वदा स्यात्।<br>जन्मान्तरेष्वपि न पुत्रवियोगदुःख-<br>माप्नोति धाम च पुरंदरलोकजुष्टम्॥ २४<br>यो वा शृणोति पुरुषोऽल्पधनः पठेद् वा<br>देवालयेषु भवनेषु च धार्मिकाणाम्।<br>पापैर्विमुक्तवपुरत्र पुरं मुरारे-<br>रानन्दकृत् पदमुपैति मुनीन्द्र सोऽपि॥ २५ | इस प्रकार आभूषणोंसे अलंकृत कर वह सारा सामान ब्राह्मणको दान कर दे। यदि सम्पत्तिरूपी शक्ति हो तो समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्या भी देनी चाहिये। यदि असमर्थ हो तो पूर्वोक्त फलोंका ही विधिपूर्वक दान करे। तत्पश्चात् शिव और धर्मराजकी स्वर्णमयी मूर्तिको दोनों कलशोंके साथ ब्राह्मणको दान करके स्वयं मौन होकर तैलरहित पदार्थोंका भोजन करे। इसके बाद यथाशक्ति अन्य ब्राह्मणोंको भी भोजन करानेका विधान है। वेदवेत्तालोग सूर्य, विष्णु और शिवके उपासक भक्तोंके लिये इस मङ्गलमय सर्वफल-त्यागव्रतको बतलाते हैं। द्विजपुंगव! स्त्रियोंको भी यथाशक्ति इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! इस लोक या परलोकमें इससे बढ़कर कोई दूसरा ऐसा व्रत नहीं है, जो अनन्त फलका प्रदायक हो। मुनिसत्तम! फलोंको चूर्ण कर देनेपर उनमें लगे हुए सोने, चाँदी और ताँबेके जितने परमाणु होते हैं, उतने सहस्र युगोंतक व्रती रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस व्रतका जीवनपर्यन्त अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंको यह विनष्ट कर देता है, उन्हें जन्मान्तरमें भी पुत्रवियोगका कष्ट नहीं भोगना पड़ता और मरणोपरान्त वे इन्द्रलोकमें चले जाते हैं। मुनीश्वर! जो निर्धन पुरुष देव-मन्दिरों अथवा धर्मात्मा पुरुषोंके गृहोंमें इस व्रत-माहात्म्यको सुनता अथवा पढ़ता है, उसका शरीर इस लोकमें पापसे मुक्त हो जाता है और मरणोपरान्त वह विष्णुलोकमें आनन्ददायक स्थान प्राप्त कर लेता है॥ १८-२५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सर्वफलत्यागमाहात्म्यं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः॥ ९६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सर्वफलत्याग-माहात्म्य नामक छानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९६॥
सत्तानबेवाँ अध्याय
आदित्यवार-कल्पका विधान और माहात्म्य
| नारद उवाच<br>यदारोग्यकरं पुंसां यदनन्तफलप्रदम्।<br>यच्छान्त्यै च मर्त्यानां वद नन्दीश तद् व्रतम्॥ १ | नारदजीने पूछा— नन्दीश्वर! अब जो व्रत मृत्युलोकवासी पुरुषोंके लिये आरोग्यकारी, अनन्त फलका प्रदाता और शान्तिकारक हो, उसका वर्णन कीजिये॥ १॥ |