मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ९६ * | ३३३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| अष्टादशानां धान्यानामवद्यं फलमूलकैः।<br>वर्जयेदब्दमेकं तु ऋते औषधकारणम्।<br>सवृषं काञ्चनं रुद्रं धर्मराजं च कारयेत्॥ ४<br>कूष्माण्डं मातुलुङ्गं च वार्त्ताकं पनसं तथा।<br>आम्राम्रातककपित्थानि कलिङ्गमथ वालुकम्॥ ५<br>श्रीफलाश्र्वत्थबदरं जम्बीरं कदलीफलम्।<br>काश्मरं दाडिमं शक्त्या कलधौतानि षोडश॥ ६<br>मूलकामलकं जम्बूतिन्तिडी करमर्दकम्।<br>कङ्कोलैलाकतूण्डीरकरीरकुटजं शमी॥ ७<br>औदुम्बरं नारिकेलं द्राक्षाथ बृहतीद्वयम्।<br>रौप्याणि कारयेच्छक्त्या फलानीमानि षोडश॥ ८ | इस व्रतमें औषधके अतिरिक्त सामान्यरूपसे निन्द्य फल और मूलके साथ अठारह* प्रकारके धान्य त्याज्य—वर्जनीय माने गये हैं, अतः उन्हें एक वर्षतक त्याग देना चाहिये। पुनः रुद्र, धर्मराज और वृषभकी स्वर्णमयी मूर्ति बनवायी जाय। इसी प्रकार यथाशक्ति कूष्माण्ड, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), वार्त्ताक (भाँटा), पनस (कटहल), आम, आम्रातक (आमड़ा), कपित्थ (कैथ), कलिङ्ग (तरबूज), बालुक (पनियाला), बेल, पीपल, बेर, जम्बीर (जमीरी नींबू), केला, काश्मर (गम्भारी) और दाडिम (अनार)—ये सोलह प्रकारके फल भी सोनेके बनवाये जायें। मूली, आँवला, जामुन, इमली, करमर्दक (करौंदा), कङ्कोल (शीतलचीनीकी जातिके एक वृक्षका फल), इलायची, तुण्डीर (कुँदरू), करीर (करील), कुटज (इन्द्रयव), शमी, गूलर, नारियल, अंगूर और दोनों बृहती (बनभंटा, भटकटैया)—इन सोलहोंको अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीका बनवाना चाहिये॥ १—८॥ |
| ताम्रं तालफलं कुर्यादगस्तिफलमेव च।<br>पिण्डारकाश्मर्यफलं तथा सूरणकन्दकम्॥ ९<br>रक्ताल्लुकाकन्दकं च कनकाह्वं च चिर्भिटम्।<br>चित्रवल्लीफलं तद्वत् कूटशाल्मलिजं फलम्॥ १०<br>आम्रनिष्पावमधुकवटमुद्गपटोलकम् ।<br>ताम्राणि षोडशैतानि कारयेच्छक्तितो नरः॥ ११<br>उदकुम्भद्वयं कुर्याद् धान्योपरि सवस्त्रकम्।<br>ततश्र्व कारयेच्छय्यां यथोपरि सुवाससी॥ १२<br>भक्ष्यपात्रत्रयोपेतं यमरुद्रवृषान्वितम्।<br>धेन्वा सहैव शान्ताय विप्रायाथ कुटुम्बिने।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य पुण्येऽह्नि विनिवेदयेत्॥ १३<br>यथा फलेषु सर्वेषु वसन्त्यमरकोटयः।<br>तथा सर्वफलत्यागव्रताद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे॥ १४<br>यथा शिवश्र्व धर्मश्र्व सदानन्तफलप्रदौ।<br>तद्युक्तफलदानेन तौ स्यातां मे वरप्रदौ॥ १५<br>यथा फलान्यनन्तानि शिवभक्तेषु सर्वदा।<br>तथानन्तफलावाप्तिरस्तु जन्मनि जन्मनि॥ १६<br>यथा भेदं न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्।<br>तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकरः शंकरः सदा॥ १७ | व्रती मनुष्य सम्पत्तिके अनुकूल ताड़-फल, अगस्तफल, पिण्डारक (विकंकत या पिड़ार), काश्मर्य (गम्भारी)-फल, सूरणकन्द (जमीकन्द), रतालू, धतूरा, चिर्भिट (ककड़ी या पिहटिया), चित्रवल्ली (तेजपात)-फल, काले सेमलका फल, आम, निष्पाव (सेम या मटर), महुआ, बरगद, मूँग और परवल—इन सोलहोंका ताँबेसे निर्माण कराये। तत्पश्चात् वस्त्रसे सुशोभित दो कलश सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। वह तीन भोजन-पात्रोंसे युक्त हो और उसपर धर्मराज, रुद्र और वृषकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। साथ ही दो सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित एक शय्या भी प्रस्तुत करे। फिर उस पुण्यप्रद दिनमें यह सारा उपकरण एक गौके साथ किसी शान्त स्वभाववाले एवं कुटुम्बी सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उसे दान कर दे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'जिस प्रकार सभी फलोंमें करोड़ों देवता निवास करते हैं, उसी प्रकार सर्वफलत्याग-व्रतके अनुष्ठानसे शिवजीमें मेरी भक्ति हो। जैसे शिव और धर्म—दोनों सदा अनन्त फलके दाता कहे गये हैं, अतः उनसे युक्त फलका दान करनेसे वे दोनों मेरे लिये भी वरदायक हों। जिस प्रकार शिवभक्तोंको सदा अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहती है, उसी तरह मुझे प्रत्येक जन्ममें अनन्त फलकी प्राप्ति हो। जैसे मैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और सूर्यमें कोई भेद नहीं मानता, वैसे ही विश्वात्मा भगवान् शंकर सदा मेरे लिये कल्याणकारक हों'॥ ९—१७॥ |
* अठारह प्रकारके धान्योंकी बात यहाँके अतिरिक्त मत्स्यपुराणके अगले दानप्रकरणमें (विशेषकर २७६।७, २७७।११ आदिमें) भी आयी है, पर इसमें उनका पूर्ण विवरण कहीं नहीं आया है। ये अठारह धान्य—याज्ञवल्क्य-स्मृ० १।२०८ की अपरार्क व्याख्या, व्याकरणमहाभाष्य ५।२।४, वाजसने० संहिता १८।१२, दानमयूख तथा विधानपारिजात आदिके अनुसार इस प्रकार हैं—सावाँ, धान, जौ, मूँग, तिल, अणु (कँगनी), उड़द, गेहूँ, कोदो, कुलथी, सतीन (छोटी मटर), सेम, आढ़की (अरहर) या मयुष्ट (उजली मटर), चना, कलाय, मटर, प्रियङ्गु (सरसों, राई या टाँगुन) और मसूर। अन्य मतसे मयुष्टादिककी जगह अतसी और नीवार ग्राह्य हैं।