मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३२ | * मत्स्यपुराण * |
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| न बृहस्पतिरप्यनन्तमस्याः<br>फलमिन्द्रो न पितामहोऽपि वक्तुम्।<br>न च सिद्धगणोऽप्यलं न चाहं<br>यदि जिह्वायुतकोटयोऽपि वक्त्रे॥ ३६<br><br>भवत्यमरवल्लभः पठति यः स्मरेद् वा सदा<br>शृणोत्यपि विमत्सरः सकलपापनिर्मोचनीम्।<br>इमां शिवचतुर्दशीममरकामिनीकोटयः<br>स्तुवन्ति तमनिन्दितं किमु समाचरेद् यः सदा॥ ३७<br><br>या वाथ नारी कुरुतेऽतिभक्त्या<br>भर्तारमापृच्छ्य सुतान् गुरून् वा।<br>सापि प्रसादात् परमेश्वरस्य<br>परं पदं याति पिनाकपाणेः॥ ३८ | यदि मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हो जायँ तो भी इस चतुर्दशीके अनन्त फलका वर्णन करनेमें न तो बृहस्पति समर्थ हैं न इन्द्र, न ब्रह्मा समर्थ हैं न सिद्धगण तथा मैं भी इसका वर्णन नहीं कर सकता। जो मनुष्य मत्सररहित हो सम्पूर्ण पापोंसे विमुक्त करनेवाली इस शिवचतुर्दशीके माहात्म्यको सदा पढ़ता, स्मरण करता अथवा श्रवण करता है, उस पुण्यात्माका करोड़ों देवाङ्गनाएँ स्तवन करती हैं, फिर जो सदा इसका अनुष्ठान करता है, उसकी तो बात ही क्या है? स्त्री भी यदि अपने पति, पुत्र और गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी परमेश्वरकी कृपासे पिनाकपाणि भगवान् शंकरके परमपदको प्राप्त हो जाती है*॥ ३३—३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शिवचतुर्दशीव्रतं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शिवचतुर्दशी-व्रत नामक पंचानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९५॥
छानबेवाँ अध्याय
सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>फलत्यागस्य माहात्म्यं यद् भवेच्छृणु नारद।<br>यदक्षयं परं लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br>मार्गशीर्षे शुभे मासि तृतीयायां मुने व्रतम्।<br>द्वादश्यामथवाष्टम्यां चतुर्दश्यामथापि वा।<br>आरभेच्छुक्लपक्षस्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्॥ २<br>अन्येष्वपि हि मासेषु पुण्येषु मुनिसत्तम।<br>सदक्षिणं पायसेन भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! अब कर्म-'फलत्याग' नामक व्रतका जो महत्त्व है, उसे सुनिये। वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। मुने! मङ्गलमय मार्गशीर्षमासमें शुक्लपक्षकी तृतीया, अष्टमी, द्वादशी अथवा चतुर्दशी तिथिको ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। मुनिसत्तम! इसी प्रकार यह व्रत अन्य पुण्यप्रद महीनोंमें भी किया जा सकता है। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। |
* मन्वादिके अनुसार पति आदिकी आज्ञाके बिना स्त्रीको व्रत करनेका अधिकार नहीं है।