भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 341
* अध्याय ९५ *३३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मन्दारमालतीभिश्च तथा धत्तूरकैरपि।<br>सिन्धुवारैरशोकैश्च मल्लिकाभिश्च पाटलैः॥ २४<br>अर्कपुष्पैः कदम्बैश्च शतपत्न्या तथोत्पलैः।<br>एकैकेन चतुर्दश्योरर्चयेत् पार्वतीपतिम्॥ २५चतुर्दशी तिथियोंमें मन्दार (पारिभद्र), मालती, धतूरा, सिन्दुवार, अशोक, मल्लिका, पाटल (पाँढर पुष्प या लाल गुलाब), मन्दार-पुष्प (सूर्यमुखी), कदम्ब, शतपत्री (श्वेत कमल या गुलाब) और कमल—इनमेंसे क्रमशः एक-एकके द्वारा पार्वतीपति शंकरकी अर्चना करनी चाहिये॥ १८–२५॥
पुनश्च कार्तिके मासे प्राप्ते संतर्पयेद् द्विजान्।<br>अन्नैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्वस्त्रमाल्यविभूषणैः ॥ २६<br>कृत्वा नीलवृषोत्सर्गं श्रुत्युक्तविधिना नरः।<br>उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवा सह॥ २७<br>मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृताम्।<br>सर्वोपस्करसंयुक्तां शय्यां दद्यात् सकुम्भकाम्॥ २८<br>ताम्रपात्रोपरि पुनः शालितण्डुलसंयुतम्।<br>स्थाप्य विप्राय शान्ताय वेदव्रतपराय च॥ २९<br>ज्येष्ठसामविदे देयं न वकव्रतिने क्वचित्।<br>गुणज्ञे श्रोत्रिये दद्यादाचार्ये तत्त्ववेदिनि॥ ३०<br>अव्यङ्गाङ्गाय सौम्याय सदा कल्याणकारिणे।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः॥ ३१<br>गुरौ सति गुरोर्देयं तदभावे द्विजातये।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषात् पतत्यधः॥ ३२पुनः कार्तिकमास आनेपर अन्न, नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ, वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंको पूर्णरूपसे तृप्त करे। व्रती मनुष्यको वेदोक्त विधिके अनुसार नील वृषका भी उत्सर्ग करनेका विधान है। तत्पश्चात् अगहनीके चावलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रपर स्वर्णनिर्मित उमा, महेश्वर और वृषभकी मूर्तिको स्थापित कर दे और उसके निकट आठ मोती रख दे, फिर उसे गौके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। साथ ही दो श्वेत चादरोंसे आच्छादित तथा समस्त उपकरणोंसे युक्त घटसहित एक शय्या भी दान करनी चाहिये। यह दान ऐसे ब्राह्मणको देना चाहिये, जो शान्तस्वभाव, वेदव्रत-परायण और ज्येष्ठसामका ज्ञाता हो। बगुलाव्रती (कपटी) ब्राह्मणको कभी भी दान नहीं देना चाहिये। वस्तुतस्तु गुणज्ञ, वेदपाठी, तत्त्ववेत्ता, सुडौल अङ्गोंवाले, सौम्यस्वभाव, कल्याणकारक एवं सपत्नीक आचार्यकी वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे भलीभाँति पूजा करके यह दान उन्हींको देना चाहिये। यदि गुरु (आचार्य) उस समय उपस्थित हों तो उन्हींको दान देनेका विधान है। उनकी अनुपस्थितिमें अन्य ब्राह्मणको दान दिया जा सकता है। इस दानमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसके दोषसे कर्ताका अधःपतन हो जाता है॥ २६–३२॥
अनेन विधिना यस्तु कुर्याच्छिवचतुर्दशीम्।<br>सोऽश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३३<br>ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>पितृभिर्भ्रातृभिर्वापि तत् सर्वं नाशमाप्नुयात्॥ ३४<br>दीर्घायुरारोग्यकुलान्नवृद्धि-<br>रत्राक्षयामुत्र चतुर्भुजत्वम् ।<br>गणाधिपत्यं दिवि कल्पकोटि-<br>शतान्युषित्वा पदमेति शम्भोः॥ ३५जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शिवचतुर्दशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। उसके द्वारा अथवा उसके पिता या भाईद्वारा इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें जो कुछ ब्रह्महत्या आदि पाप घटित हुए रहते हैं, वे सभी नष्ट हो जाते हैं। इस लोकमें वह दीर्घायु, नीरोगता, कुल और अन्नकी समृद्धिसे युक्त होता है और मरणोपरान्त स्वर्गलोकमें चार भुजाधारी होकर गणाधिप हो जाता है। वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक निवास कर शम्भु-पद—शिवलोकको चला जाता है।
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