मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| पार्श्वौ चानन्तधर्माय ज्ञानभूताय वै कटिम्।<br>ऊरू चानन्तवैराग्यसिंहायेत्यभिपूजयेत् ॥ १२<br>अनन्तैश्वर्यनाथाय जानुनी चार्चयेद् बुधः।<br>प्रधानाय नमो जङ्घे गुल्फौ व्योमात्मने नमः ॥ १३<br>व्योमकेशात्मरूपाय केशान् पृष्ठं च पूजयेत्।<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै पार्वतीं चापि पूजयेत् ॥ १४<br>ततस्तु वृषभं हैममुदकुम्भसमन्वितम्।<br>शुक्लमाल्याम्बरधरं पञ्चरत्नसमन्वितम्।<br>भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ १५<br>प्रीयतां देवदेवोऽत्र सद्योजातः पिनाकधृक्।<br>ततो विप्रान् समाहूय तर्पयेद् भक्तितः शुभान्।<br>पृषदाज्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावुदङ्मुखः ॥ १६<br>पञ्चदश्यां च सम्पूज्य विप्रान् भुञ्जीत वाग्यतः।<br>तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामेतत् सर्वं समाचरेत् ॥ १७<br>चतुर्दशीषु सर्वासु कुर्यात् पूर्ववदर्चनम्।<br>ये तु मासे विशेषाः स्युस्तान् निबोध क्रमादिह ॥ १८<br>मार्गशीर्षादिमासेषु क्रमादेतदुदीरयेत्।<br>शंकराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते करवीरक ॥ १९<br>त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमतः परम्।<br>नमस्तेऽस्तु महादेव स्थाणवे च ततः परम् ॥ २०<br>नमः पशुपते नाथ नमस्ते शाम्भवे पुनः।<br>नमस्ते परमानन्द नमः सोमार्धधारिणे ॥ २१<br>नमो भीमाय इत्येवं त्वामहं शरणं गतः।<br>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ॥ २२<br>पञ्चगव्यं ततो बिल्वं कर्पूरचागुरुं यवाः।<br>तिलाः कृष्णाश्च विधिवत् प्राशनं क्रमशः स्मृतम्।<br>प्रतिमासं चतुर्दश्योरेकैकं प्राशनं स्मृतम् ॥ २३ | ‘अनन्तधर्माय नमः’ से दोनों पार्श्वभागोंकी, ‘ज्ञानभूताय नमः’ से कटिकी और ‘अनन्तवैराग्यसिंहाय नमः’ से ऊरुओंकी अर्चना करे। बुद्धिमान् व्रतीको ‘अनन्तैश्वर्यनाथाय नमः’ से जानुओंका, ‘प्रधानाय नमः’ से जङ्घाओंका और ‘व्योमात्मने नमः’ से गुल्फोंका पूजन करना चाहिये। फिर ‘व्योमकेशात्मरूपाय नमः’ से बालों और पीठकी अर्चना करे। ‘पुष्ट्यै नमः’ एवं ‘तुष्ट्यै नमः’ से पार्वतीका भी पूजन करे। तत्पश्चात् जलपूर्ण कलशसहित, श्वेत पुष्पमाला और वस्त्रसे सुशोभित, पञ्चरत्नयुक्त स्वर्णमय वृषभको नाना प्रकारके खाद्य पदार्थोंके साथ ब्राह्मणको दान कर दे और यों प्रार्थना करे—‘पिनाकधारी देवाधिदेव सद्योजात मेरे व्रतमें प्रसन्न हों।’ तदनन्तर माङ्गलिक ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भक्तिपूर्वक भोजन एवं दक्षिणा आदि देकर तृप्त करे और स्वयं दधिमिश्रित घी खाकर रात्रिमें उत्तराभिमुख हो भूमिपर शयन करे। पूर्णिमा तिथिको प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके पश्चात् मौन होकर भोजन करे। उसी प्रकार कृष्णपक्षकी चतुर्दशीमें भी यह सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये॥ ५—१७॥<br><br>इसी प्रकार सभी चतुर्दशी तिथियोंमें पूर्ववत् शिवपार्वतीका पूजन करना चाहिये। अब प्रत्येक मासमें जो विशेषताएँ हैं, उन्हें क्रमशः (बतला रहा हूँ,) सुनिये। मार्गशीर्ष आदि प्रत्येक मासमें क्रमशः इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—‘शंकराय नमस्तेऽस्तु’— आप शंकरके लिये मेरा नमस्कार प्राप्त हो। ‘नमस्ते करवीरक’—करवीरक! आपको नमस्कार है। ‘त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु’—आप त्र्यम्बकके लिये प्रणाम है। इसके बाद ‘महेश्वराय नमः’—महेश्वरको अभिवादन है। ‘महादेव नमस्तेऽस्तु’—महादेव! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। उसके बाद ‘स्थाणवे नमः’—स्थाणुको प्रणाम है। ‘पशुपतये नमः’—पशुपतिको अभिवादन है। ‘नाथ नमस्ते’—नाथ! आपको नमस्कार है। पुनः ‘शाम्भवे नमः’—शम्भुको प्रणाम है। ‘परमानन्द नमस्ते’—परमानन्द! आपको अभिवादन है। ‘सोमार्थधारिणे नमः’—ललाटमें अर्धचन्द्र धारण करनेवालेको नमस्कार है। ‘भीमाय नमः’—भयंकर रूपधारीको प्रणाम है। ऐसा कहकर अन्तमें कहे कि ‘मैं आपके शरणागत हूँ।’ प्रत्येक मासकी दोनों चतुर्दशी तिथियोंमें गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, पञ्चगव्य, बेल, कर्पूर, अगुरु, यव और काला तिल—इनमेंसे क्रमशः एक-एक पदार्थका प्राशन बतलाया गया है। इसी प्रकार प्रत्येक मासकी दोनों |