भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 339
* अध्याय ९५ *३२९

पंचानबेवाँ अध्याय

माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृतहिन्दी
नारद उवाच<br><br>भगवन् भूतभव्येश तथान्यदपि यच्छ्रुतम्।<br>भुक्तिमुक्तिफलायालं तत् पुनर्वक्तुमर्हसि॥ १<br>एवमुक्तोऽब्रवीच्छम्भुरयं वाङ्मयपारगः।<br>मत्समस्तपसा ब्रह्मन् पुराणश्रुतिविस्तरैः॥ २<br>धर्मोऽयं वृषरूपेण नन्दी नाम गणाधिपः।<br>धर्मान् माहेश्वरान् वक्ष्यत्यतः प्रभृति नारद॥ ३नारदजीने पूछा— भूत और भविष्यके स्वामी भगवन्! इनके अतिरिक्त भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेमें समर्थ यदि कोई अन्य व्रत सुना गया हो तो उसे पुनः कहनेकी कृपा करें। ऐसा पूछे जानेपर भगवान् शम्भुने कहा—‘ब्रह्मन्! यह नन्दी शब्दशास्त्रका पारगामी विद्वान् और तपस्या तथा पुराणों एवं श्रुतियोंकी विस्तृत जानकारीमें मेरे समान है। यह वृषरूपसे साक्षात् धर्म और गणका अधीश्वर है। नारद! अब यही इससे आगे माहेश्वर-धर्मोंका वर्णन करेगा॥’ १-३॥
मत्स्य उवाच<br><br>इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>नारदोऽपि हि शुश्रूषुरपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्।<br>आदिष्टस्त्वं शिवेनेह वद माहेश्वरं व्रतम्॥ ४मत्स्यभगवान्ने कहा— ऐसा कहकर देवाधिदेव शम्भु वहीं अन्तर्हित हो गये। तब श्रवण करनेकी उत्कट इच्छावाले नारदने नन्दिकेश्वरसे पूछा—‘नन्दी! शिवजीने आपको इसके लिये जैसा आदेश दिया है, आप उस प्रकार माहेश्वर-व्रतका वर्णन कीजिये'॥ ४॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् वक्ष्ये माहेश्वरं व्रतम्।<br>त्रिषु लोकेषु विख्याता नाम्ना शिवचतुर्दशी॥ ५<br>मार्गशीर्षत्रयोदश्यां सितायामेकभोजनः।<br>प्रार्थयेद् देवदेवेशं त्वामहं शरणं गतः॥ ६<br>चतुर्दश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य शंकरम्।<br>सुवर्णवृषभं दत्त्वा भोक्ष्यामि च परेऽहनि॥ ७<br>एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>कृतस्नानजपः पश्चादुमया सह शंकरम्।<br>पूजयेत् कमलैः शुभ्रैर्गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ ८<br>पादौ नमः शिवायति शिरः सर्वात्मने नमः।<br>त्रिनेत्रायेति नेत्राणि ललाटं हरये नमः॥ ९<br>मुखमिन्दुमुखायेति श्रीकण्ठायेति कन्थराम्।<br>सद्योजाताय कर्णौ तु वामदेवाय वै भुजौ॥ १०<br>अघोरहृदयायेति हृदयं चाभिपूजयेत्।<br>स्तनौ तत्पुरुषायेति तथेशानाय चोदरम्॥ ११नन्दिकेश्वर बोले— ब्रह्मन्! मैं माहेश्वर-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, आप समाहितचित्तसे श्रवण कीजिये। वह व्रत तीनों लोकोंमें शिवचतुर्दशीके नामसे विख्यात है। (इस व्रतके आरम्भमें) व्रती मानव मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको एक बार भोजन कर देवाधिदेव शंकरजीसे इस प्रकार प्रार्थना करे—‘भगवन्! मैं आपके शरणागत हूँ। मैं चतुर्दशी तिथिको निराहार रहकर भगवान् शंकरकी भलीभाँति अर्चना करनेके पश्चात् स्वर्ण-निर्मित वृषभका दान करके दूसरे दिन भोजन करूँगा।' इस प्रकारका नियम ग्रहण कर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर सुन्दर कमल-पुष्पों, सुगन्धित पुष्पमालाओं और चन्दन आदिसे पार्वतीसहित शंकरजीकी वक्ष्यमाण रीतिसे पूजा करे—‘शिवाय नमः' से दोनों चरणोंका, ‘सर्वात्मने नमः' से सिरका, ‘त्रिनेत्राय नमः' से नेत्रोंका, ‘हरये नमः' से ललाटका, ‘इन्दुमुखाय नमः' से मुखका, ‘श्रीकण्ठाय नमः' से कंधोंका, ‘सद्योजाताय नमः' से कानोंका, ‘वामदेवाय नमः' से भुजाओंका और ‘अघोरहृदाय नमः' से हृदयका पूजन करे। ‘तत्पुरुषाय नमः' से स्तनोंकी, ‘ईशानाय नमः' से उदरकी,